tag:blogger.com,1999:blog-18436534.post490951155645252204..comments2007-03-31T11:34:16.434+05:30Comments on मसिजीवी: ....मुझे मुखौटा आजाद करता हैmasijeevihttp://www.blogger.com/profile/07021246043298418662noreply@blogger.comBlogger16125tag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-22702853006142817572007-03-30T21:08:00.000+05:302007-03-30T21:08:00.000+05:30मै एक ग्रीक रानी की तरह बैठ कर ग्लैडीयेटर्स के गम्...मै एक ग्रीक रानी की तरह बैठ कर ग्लैडीयेटर्स के गम्भीर बाण प्रक्क्षेपण देख रही हूँ|<BR/><BR/>कुछ ना कहूँगी|<BR/><BR/>- अपराजिताअपराजिताnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-68934846967615124982007-03-30T20:33:00.000+05:302007-03-30T20:33:00.000+05:30@ Anupam Pachauriदेखिये आप यूँ खरी खरी ना कहेँ| हम...@ Anupam Pachauri<BR/><BR/>देखिये आप यूँ खरी खरी ना कहेँ| <BR/>हम खुद इस प्रकार के धर्म गुरु बनने की सोच रहे हैँ| सुना है, हमारी पत्रि मेँ ऐसा ही योग है|<BR/><BR/><BR/>सादर <BR/>रिपुदमन पचौरी<BR/>PS: allow people to send comments on your blog (ANONYMOUSLY)Anonymousnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-77485507605599771312007-03-18T03:35:00.000+05:302007-03-18T03:35:00.000+05:30कुछ और भी दर्ज किय है http://naadkari.blogspot.com...कुछ और भी दर्ज किय है http://naadkari.blogspot.com/2007/03/blog-post_18.html<BR/><BR/>क्या कहते है?<BR/><BR/>नाद के साथियोँ को कुछ और भी ज़िम्मेदारी लेनी चहिये।Anupam Pachaurihttp://www.blogger.com/profile/13789876710796748641noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-30891634187542211832007-03-16T21:48:00.000+05:302007-03-16T21:48:00.000+05:30@ अनूपजी। मैं प्रतीक्षारत हूँ, आपसे मिलकर प्रसन्‍न...@ अनूपजी। मैं प्रतीक्षारत हूँ, आपसे मिलकर प्रसन्‍नता होगी।<BR/>@ नोटपैड अरे अपने मोना डार्लिंग वाला कमेंट पढ़ लिया था ? मैंने तो उसकी अभिव्‍यक्ति का गला दिखते ही घोंट डाला था। :)......पर उसके तक गुमनाम रहने के अधिकार के अपन समर्थक हैं। ये अलग बात है कि उनकी गंदगी मैं अपने चिट्ठे पर स्‍वीकारूं या नहीं ये मेरे विवेक का मामला है। एक और बार गुमनाम साहब अपनी सभ्‍यता का परिचय देकर गए हैं<BR/>@ प्रत्‍यक्षा, शुएब, मनीष आपका कहना ठीक है कि यदि आपको वही मुखौटा पसंद है जो 'रीयल' जिंदगी में पहनते हैं तो भला क्‍यों मुखौटा बदलना। मैं सहमत हूँ।<BR/>@ अभय, हॉं अभय आपकी बात ठीक है, मेरी अंग्रेजी शायद बहुत खराब है और इसी खराब अंग्रेजी में एक अंग्रेजी में भी ब्‍लॉग लिखता हूँ जोकि हिंदी के बलॉगों पर ही होता है। अब उसपर तो बदलाव न हो पाएगा। संकेत करने के लिए शुक्रिया। कृपया अपने सुझाव देते रहें।masijeevihttp://www.blogger.com/profile/07021246043298418662noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-88260633300574739552007-03-16T20:25:00.000+05:302007-03-16T20:25:00.000+05:30मसिजीवी जी..आप मुखौटा पहनें ना पहनें ये आपका ज़ाती ...मसिजीवी जी..आप मुखौटा पहनें ना पहनें ये आपका ज़ाती मामला है.. पर एक बात मुझे खटकी आपके ब्लॉग पर.. आपने अपने बारे में जो सूचना about me में छोड़ रखी है.. वो अन्ग्रेज़ी में है.. और बहुत अच्छी अन्ग्रेज़ी में नहीं है.. अच्छा नहीं लगता कि हिन्दी साहित्य में शोध किया हुआ व्यक्ति अपने ब्लॉग पर ग़लत अन्ग्रेज़ी में अपना परिचय दे..कृपया उसे सुधार ले.. आशा है आप मेरी बात को अन्यथा न लेंगे..अभय तिवारीhttp://www.blogger.com/profile/05954884020242766837noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-30170960185380654082007-03-16T13:43:00.000+05:302007-03-16T13:43:00.000+05:30मैं Pratyaksha जी की बात पर हूं :)मैं <B>Pratyaksha जी की बात पर हूं :)</B>SHUAIBhttp://shuaib.in/chitthanoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-4707542861422451222007-03-16T12:05:00.000+05:302007-03-16T12:05:00.000+05:30बलॉगिंग एक बिल्हुल अलग मिजाज की लेखन दुनिया है जहा...<I>बलॉगिंग एक बिल्हुल अलग मिजाज की लेखन दुनिया है जहां मुखौटे लगाकर लेखक अपने व्यक्तित्व के बोझ से अपने लेखन को मुक्त करता है इसी वजह से वह सच का बयान कर पाता है</I><BR/><BR/>वाह, क्या generalisation किया है आपने <BR/>:(! मुखौटा पहने बिना कोई सच का बयां नहीं कह सकता....<BR/><BR/>ये सही है नीलिमा जी कि कुछ लोग मुखौटा पहन कर लिख पाते होंगे और पर कुछ के लिए मुखौटा पहन कर बात करना एक घुटन को और बढ़ाने से ज्यादा और कुछ नहीं हो सकता ।Manishhttp://www.blogger.com/profile/10739848141759842115noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-16314323376952171042007-03-16T11:26:00.000+05:302007-03-16T11:26:00.000+05:30आपका चिट्ठा आपकी दुनिया है । जैसे मर्ज़ी हो रहें ।...आपका चिट्ठा आपकी दुनिया है । जैसे मर्ज़ी हो रहें । मुखौटा पहनना चाहें तो वही सही । अपनी शकल अपनी पहचान दिखाना चाहें तो वो भी सही । <BR/>आपकी पारिवारिक फोटो देखकर एक कॉमिक "मैड" याद आ गई । :-)<BR/>चलिये मिलते हैं कभी मुखौटे के बिनाPratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-65898383924743022222007-03-16T08:44:00.000+05:302007-03-16T08:44:00.000+05:30"इतना याराना है सब से तो कहाँ पड़ी हुई थी अब तक? शो..."इतना याराना है सब से तो कहाँ पड़ी हुई थी अब तक? शोध करने के पैसे न मिलते तो ये ठिकाना याद आता?"<BR/>ANONYMOUS के मुखौटे ने तो रुख बदल दिया. आलोचक और मसिजीवी को तो फिर भी उन्के ब्लाग पर पकडा जा सकता है इसका क्या करे??? बोलिये मुखौटो के विरोधीजन! कायर तो दर असल यह ANONYMOUS है और प्रलाप भी यही कर रहा है और हम मे से ही एक है.SANJAY JEE, masijeevi को तो फिर भी कुछ लोगो ने देखा है ,अगली मीटिन्ग मे शायद आलोचक से भी मिल ले. इस ANONYMOUS को कहा पकडकर कूटा जाए.<BR/> मुझे लगता है इस एक comment द्वारा कोई आपको धता बता रहा है.notepadhttp://www.blogger.com/profile/10694935217124478698noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-38283847540551562762007-03-16T00:52:00.000+05:302007-03-16T00:52:00.000+05:30आते हैं कभी दिल्ली मिलते हैं मसिजीवी जी आपसे !आते हैं कभी दिल्ली मिलते हैं मसिजीवी जी आपसे !अनूप शुक्लाhttp://www.blogger.com/profile/07001026538357885879noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-72873180824713816632007-03-15T21:38:00.000+05:302007-03-15T21:38:00.000+05:30@ जी योगेश।। यह आपकी ही/भी दुनिया है@ संजय आपका जव...@ जी योगेश।। यह आपकी ही/भी दुनिया है<BR/>@ संजय आपका जवाब धुरविरोधी ने दिया है और नीलिमा ने भी। मैं आपके तर्क को एक भला तर्क मानता हूँ, इसी को अपने ट्रेडमार्क संयम के साथ सुनीलजी ने इन शब्‍दों में व्‍यक्‍त किया था-<BR/>शायद यह सच हो, पर गुमनाम हो कर लिखने का सोच कर मुझे लगता है जैसे कि हममें अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं थी इसलिए इसे छुप कर कहते हैं. पर अगर गुमनामी के बदले विभिन्न भेष बदल कर, बहरूपिया बन कर अलग अलग दृष्टिकोणों से बातों को सोचा जाये और उनके बारे में अलग अलग चिट्ठों में विभिन्न नामों से लिखा जाये, यह मुझे अधिक रोचक लगता है, हाँ उसके लिए समय कहाँ से आयेगा, उसकी दिक्कत हो सकती है.<BR/>पर यकीन मानो ये मुखौटा भी 'आपका' ही होता है और हिम्‍मत और तर्क के बिना यहॉं भी काम नहीं चलता।<BR/>@ मान्‍या नहीं आपने कुछ बुरा नहीं कहा, काश कुछ कहने के बाद ऐसा कोई अपराध बोध न हो- मुखौटा लगाकर कहने की कोशिश कीजिए- प्रभावी होता है।<BR/>धुरविरोधी, नीलिमा...शुक्रिया।<BR/>एक बात और...पता नहीं क्‍यों इसे संस्‍थाओं के विरुद्ध कोई आगाज़ की तरह देखा जा रहा है। (मैं तो नारद को अपनी सेवाएं प्रस्‍तुत करने का विचार प्रस्‍तुत करने वाला था....चलो कोई नहीं) नहीं ऐसा नहीं है। और यह भी कि यदि मैं आलोचक होता तो भी मुझ‍े ये बचकानापन वगैरह नहीं लगता...लेकिन सच यह है कि मैं आलोचक नहीं हूँ। किसी क्षमा या सजा की जरूरत नहीं है....अनूपजी। अगली मीट में हो सकता है आलोचक, नोटपैड, मसिजीवी सब ही मिल जाएं।masijeevihttp://www.blogger.com/profile/07021246043298418662noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-51906152273671936582007-03-15T21:10:00.000+05:302007-03-15T21:10:00.000+05:30बिल्कुल सही खरी -खरी कही मसिजीवी जी,मै इस बात को ब...बिल्कुल सही खरी -खरी कही मसिजीवी जी,मै इस बात को बहुत निकटता से देख रही रही हूं और अपने शोध में इस मुद्दे को सबसे मह्त्वपूर्ण मान कर चल रही हूं <BR/>बलॉगिंग एक बिल्हुल अलग मिजाज की लेखन दुनिया है जहां मुखौटे लगाकर लेखक अपने व्यक्तित्व के बोझ से अपने लेखन को मुक्त करता है इसी वजह से वह सच का बयान कर पाता है सच का बयान करने के लिए यह जरूरी भी है <BR/><BR/>मुखौटों के पीछे के कुछ चिट्ठाकारों को मैं जानती हूं उनके बाहर की दुनिया के लिखे को भी जानती हूं ,यकीने मानिए जितने सच्चे,पक्के,पते के इंसान वे इस जगत में हैं उतने वे बाहर की दुनिया में नहीं हो सकते ..न दुनियावी दबाव उन्हें होने देगेNeelimahttp://www.blogger.com/profile/14606208778450390430noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-14379552524072916322007-03-15T19:50:00.000+05:302007-03-15T19:50:00.000+05:30यही तो मेरा असली रूप है.जिसे आप रीयल जिन्दगी कहते ...<B>यही तो मेरा असली रूप है.</B><BR/>जिसे आप रीयल जिन्दगी कहते हैं, उसमे मुझे न चाहते हुये भी लोगों को अच्छा अच्छा बोलना पड़ता है. सोचना होता है कि लोग क्या कहेंगे. एक मुस्कुराहट का मुखौटा ओढ़ना पड़ता है. वो मेरा असली रूप नहीं है. <BR/>लेकिन धुरविरोधी बिना मेरे नाम का मुखौटा ओड़े हुये मेरा असली रूप है. यह मेरा वह रूप है, जैसा मैं हूं. मेरे असली नाम के मुखौटे को उतार कर मैं एकदम आज़ाद हो जाता हूं, बिल्कुल मसिजीवी की तरह.<BR/>इस दौरान हमारी आपस में असहमतियां या सहमतियां हो सकती हैं. संजयजी, मेरे प्रलाप में तर्क भी हैं और हिम्मत भी. क्या हम असहमति एवं सहमति दोनों के बीच में नहीं जी सकते?<BR/>मुझे तो अब नकली और पाखंड दूर यह दुनियां ही पसंद है.<BR/>धुरविरोधीdhurvirodhihttp://www.blogger.com/profile/14333651535802973230noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-26507705379103287582007-03-15T18:55:00.000+05:302007-03-15T18:55:00.000+05:30Mujhe lagta hai bloggers ki duniya ek alag duniya ...Mujhe lagta hai bloggers ki duniya ek alag duniya hai.. ek jagah hai jahaan sab apne lekhan ke shauk ko poora karte hain ...apne mann ki kahtehain... ek doosare ki wichaar share karte hain.. auron ko samjhne ki koshish karte hain.. aur achcha laga tha yahan aakar.. waise mujhe jyada din huye nhai yahan aaye.. aur aap logon jitna experience bhi nahi.. par haan ye jaroor kahungi ki abhuwyakti ki swantrataa sabko honi chahiye.. par maulik adhikaar ka matlab ye nahi hona chahiye ki hamen kisi aur ko chot pahunchaane ka bhi adhikaar hai... Satya kaha jaana, jaananaa aur use samjhna jaroori hai... par uske saath ye bhi jaroori hai ye dhyaan rakhna ki hamaari seemaayen kisi aur ki maryada ka atikrman to nahi kar rahi.. rahi baat mukhoton ki .. to chahen jitne bhi mukhote lagaye jaaye jo sach hai wo to saat taalon me nahi chhip sakta... kaash ek swasth maansiktaa ka aagaaz ho.. nahi to shayd aapke dwara kathit duniya .. duniya nahi rahegi weeraan ho jaayegi.. wo kahte hn na " zindagi alag cheez hai , jeena ek alag baat hai.." .. waise hi duniya ka chalanaa bhi h.. fark hai Duniya kahne aur uske hone me... N am really sorry if said anythng wrong... i think frst time i have given such a long comment...manyahttp://www.blogger.com/profile/02268500799521003069noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-39647243945668477542007-03-15T18:38:00.000+05:302007-03-15T18:38:00.000+05:30यह एक ऐसी दुनिया थी जहाँ कोई मुखोटा नहीं पहनता था,...यह एक ऐसी दुनिया थी जहाँ कोई मुखोटा नहीं पहनता था, किसी को इसकी आवश्यकता भी नहीं थी.<BR/>फिर कुछ नए लोग आए. उनके पास न हिम्मत थी न तर्क मगर प्रलाप करना था. तब उन्होने मुखोटे पहन कर अपना काम शुरू किया.<BR/>आगे की कहानी आप घड़ लें.संजय बेंगाणीwww.tarakash.com/joglikhinoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18436534.post-76471025143863770532007-03-15T18:09:00.000+05:302007-03-15T18:09:00.000+05:30अच्छा है साहब, आपकी दुनिया की कहानी अपनी दुनिया जै...अच्छा है साहब, <BR/><BR/>आपकी दुनिया की कहानी अपनी दुनिया जैसी लगती है, क्या हर दुनिया इसी दुनियादारी के चक्कर में लगी रहेगी. ? <BR/>योगेश समदर्शीyogesh samdarshihttp://www.blogger.com/profile/05774430361051230942noreply@blogger.com