Thursday, May 31, 2007

(दिल्‍ली) कॉलेज के बहाने तारीखे दिल्‍ली पर एक नजर

फुरसतिया ने आयुध निर्माणिनी कानपुर शहर का परिचय अपनी पोस्‍टों में रखा तभी से मुझे अपने शहर दिल्‍ली पर कुछ लिखने का मन था और अपने कॉलेज पर भी। गनीमत है इन दोनों पर अलग अलग लिखने की कोई जरूरत नहीं है क्‍योंकि इस शहर दिल्‍ली की नब्‍ज की पहचान रखने वाले जानते हैं कि दिल्‍ली शहर और दिल्‍ली कॉलेज अपनी रवायत, त्‍वारीख और मिजाज में एक ही हैं। यानि इस कॉलेज के इतिहास पर डाली गई कोई भी दृष्टि प्रकारांतर से आधुनिक दिल्‍ली के इतिहास पर डाली गई दृष्टि ही है।
दिल्‍ली कॉलेज (अब इसका नाम जाकिर हुसैन कॉलेज है) को दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना से पहले ही अस्तित्‍व में होने का गौरव प्राप्‍त है। यह शिक्षण संस्‍था स्‍वयं में तीन सौ सालों का इतिहास संजोए है। 18वीं सदी के अंतिम वर्षों में बादशाह औरंगजेब के दक्‍कन के एक सिपहसलार गजिउद्दीन खान के संरक्षण में यह मदरसा गाजिउद्दीन के नाम से जाना जाता था। कॉलेज के पुराने परिसर में एक मस्जिद के साथ साथ गजिउद्दीन की मजार आज भी विद्यमान है। फिर मुगल शासन के अंतिम चरण की शुरूआत हुई और इसने दिल्‍ली शहर की सास्‍कृतिक व शैक्षिक जिंदगी को भी प्रभावित किया जिससे कॉलेज भी प्रभावित हुआ। कॉलेज पर संकट के बादल छाने लगे किंतु शहर की बौद्धिक जमात की दिलचस्‍पी के परिणामस्‍वरूप 1792 में ओरिएन्‍टल कॉलेज के रूप में पुनर्व्‍यवस्थित होने पर इस कॉलेज ने साहित्‍य, कला एवं विज्ञान के प्राच्‍य कॉलेज के रूप में ख्‍याति प्राप्‍त की। बाद में यह एंग्लो अरेबिक कॉलेज के रूप में जाना गया। इस कॉलेज में भाषा, तर्कशास्‍त्र, न्‍यायशास्‍त्र, दर्शन, ज्‍योतिष और चिकित्‍सा की पढ़ाई होती थी।

मुगल साम्राज्‍य का पतन हो चुका था और औरंगजेब के परवर्ती शासक नाममात्र के शासक थे। इसी दौरान सन 1824 में ब्रिटिश ईस्‍ट इंडिया कंपनी ने इस कॉलेज से ही एक नवीन आधुनिक कॉलेज को खड़ा किया और इसे दिल्‍ली कॉलेज का नाम दिया गया। अगले 150 सालों तक, यानि 1975 तक यह दिल्‍ली कॉलेज के नाम से ही प्रसिद्ध रहा। 1824 में ही अवध के वजीर नवाब इत्‍मदुद्दौला ने 1,70,000 रुपए का अनुदान यहॉं शास्‍त्रीय भाषाओं अरबी, फारसी और संस्‍कृत के विभागों को मजबूत करने के लिए दिया।

इस कॉलेज के इतिहास का दिल्‍ली शहर के इतिहास से अटूट संबंध है। यह संस्‍थान इतिहास के अनेक उतार चढ़ावों का साक्षी रहा है। एक ओर 1857 व 1947 की ऐतिहासिक घटनाओं ने कॉलेज को गहरे प्रभावित किया जबकि दूसरी ओर 19वीं सदी सृजनात्‍मक उभार का वह दौर जो दिल्‍ली नवजागरण के रूप में प्रसिद्ध है, उसकी गतिविधियों का केंद्र भी यही कॉलेज था। इस काल में कॉलेज ने प्रगतिशील आदर्शों के निर्माण में अहम भूमिका अदा की। यही वह संस्‍थान था जिसने 1824 में एक विषय के रूप में अंग्रेजी पढ़ाए जाने की शुरूआत करने का साहसिक निर्णय लिया था जो उस जमाने के लिहाज से एक खासा विवादित मुद्दा था। 1843 में कॉलेज में दिल्‍ली वर्नाक्‍यूलर सोसाइटी की स्‍थापना हुई जिसके माध्‍यम से अनेक महत्‍वपूर्ण वैज्ञानिक व गणितीय ग्रंथों, शास्‍त्रीय ग्रीक साहित्‍य एवं फारसी कृतियों का उस जमाने की जनभाषा उर्दू में अनुवाद हुआ।

भारत के भूतपूर्व राष्‍ट्रपति एवं महान शिक्षाविद् डा. जाकिर हुसैन की महत भूमिका का सम्‍मान करते हुए 1975 में कालेज का नामकरण उन्‍हीं के नाम पर किया गया। अगले डेढ़ दशक बाद जाकिर हुसैन कॉलेज अपने वर्तमान परिसर मे स्‍थानांतरित हो गया। आज जाकिर हुसैन कॉलेज भौगोलिक एवं प्रतीकात्‍मक रूप से ऐसे स्‍थान पर है जो पुरानी दिल्‍ली को नई दिल्‍ली से जोड़ता है इस प्रकार प्राचीन परंपरा एवं नित नवीन प्रगति व आधुनिकता के बीच समन्‍वय को द्योतित करता है।

1925 में कॉलेज को नवस्‍थापित दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से संबद्ध कर दिया गया। इस कॉलेज ने शिक्षा के प्रचार प्रसार में निरंतर एक केंद्रीय भूमिका अदा की है, चाहे वह स्‍त्री शिक्षा का क्षेत्र हो अथवा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के निर्माण का या फिर भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के परस्‍पर अनुवाद का।


दिल्‍ली नवजागरण के केंद्र के रूप में दिल्‍ली कालेज की विरासत को स्‍वीकार करते हुए आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस ने हाल ही में एक विद्वतापूर्ण शोधग्रंथ प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है- ‘द दिल्‍ली कॉलेज: ट्रेडिशनल इलीट्स, द कोलोनियल स्‍टेट एंड एजूकेशन विफोर 1857’।
यह ग्रंथ उन्‍नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में ब्रिटिश शिक्षा नीति एवं पारंपरिक शिक्षा की पृष्‍ठभूमि में दिल्‍ली कॉलेज की विरासत की पड़ताल करता है। इसमें कॉलेज और इससे जुड़े लोगों के जरिए तत्‍कालीन दिल्‍ली के समाज पर अलग अलग नजरिए से विचार किया गया है। पुस्‍तक का संपादकीय सुस्‍थापित विद्वान मार्ग्रिट पर्नाउ ने लिखा है। यह पुस्‍तक इतिहास, समाजशास्‍त्र, शिक्षा एवं साहित्‍य के शोधार्थियों व विद्यार्थियों के लिए अत्‍यधिक उपयोगी है विशेषकर उनके लिए जिनकी रुचि संस्‍थाई इतिहास, उर्दू भाषा के विकास अथवा दिल्‍ली के इतिहास में है।
वैसे दिल्‍ली के इतिहास पर लिखी कोई भी पुस्‍तक शायद ही इस कॉलेज की उपेक्षा कर सके क्‍योंकि मुगलकालीन दिल्‍ली के जीवन का पूरा परिचय केवल इसी संस्‍थान से मिल पाता है। इस कॉलेज ने गालिब और मीर को खुद सुना और अब तक बचा रखा है (वैसे ‘गालिब ने इस कॉलेज में पढ़ाया है’ किवंदती की, असलियत यह है कि उन्‍हें ऐसा कोई प्रस्‍ताव ससम्‍मान दिया ही नहीं गया था किंतु वे इस कॉलेज के उत्‍कर्ष के दिनों में दिल्‍ली में सक्रिय थे और दिल्‍ली नवजागरण का हिस्‍सा हैं जिसका यह कॉलेज केंद्र रहा है।


जहॉं तक मेरे इस कॉलेज से संबंध की बात है...एक सीधा संबंध यह है कि मैं इस कॉलेज में विद्यार्थियों को कबीर, सूर, दिनकर, प्रसाद, रूपिम, स्‍वनिम, वाक्‍य पढ़ाता हूँ। लेकिन उससे भी गहरा संबंध यह है कि ये सब मैंने 1990-93 में इसी कॉलेज में सीखे थे। मदरसा गजिउद्दीन वाली इमारत में पढ़े विद्यार्थियों का अंतिम बैच हमारा ही था, हमने एक साल मजारों और बलुआ पत्‍थर वाली पुरानी इमारत में और शेष दो साल नई चमचमाती सुविधा संपन्‍न इमारत में बिताए थे। और यहीं दिसंबर 1992 में भी मैं छात्र था ओर सीखा कि कैसे गहरी नींव की संस्‍थाए इतिहास के धक्‍कों को सह जाती हैं। यहीं मुझे पता लगा कि 1857 के विद्रोह में पहले विद्रोहियों ने इस कॉलेज के प्रिसीपल व कई शिक्षकों मार दिया (वे अंगेज थे) और गदर के बाद बदला लेने के उपक्रम में अंगेजों ने कॉलेज को ही तहस नहस कर दिया, विद्यार्थियों ओर शिक्षकों को फांसी चढ़ाया गया और कॉलेज को बंद कर दिया गया। कॉलेज फिर उठ खड़ा हुआ।
1947 के विभाजन ने तो कॉलेज को तोड़ ही दिया था, पुरानी दिल्‍ली का कॉलेज था और बहुत से शिक्षक व विद्यार्थी पाकिस्‍तान चले गए और वहॉं के लाहौर कॉलेज को उन्‍होंने चुना। लेकिन तब भी डा. बेग जैसे लोग यहीं रहे और इस कॉलेज ने अपने दरवाजे पाकिस्‍तान से आए शरणार्थियों के लिए खोल दिए। उन्‍हें बिना प्रमाणपत्रों के ही प्रवेश दे दिए गए और पढ़ाई जारी

यह कॉलेज अपनी संस्‍कृति में दिल्‍ली का प्रतिनिधित्‍व कर पाता है क्‍योंकि इसमें विरोधों के समन्‍वय की अद्भुत शक्ति है। इसमें एडवांस्‍ड टिश्‍यू कल्‍चर लैब में प्रयोग करने के बाद छात्राएं सहजता से अपना बुरका पहनती हैं और रिक्‍शे पर सवार हो जाती हैं। हिंदू-मुसलमान प्रेम प्रसंग जितने इस कॉलेज ने देखे हैं उतने तो बॉलीवुड ने भी नहीं। और भी बहुत कुछ है जो इस शहर में है और इसीलिए कॉलेज में भी....कोई हैरानी नहीं कि हमारे शिक्षक श्री भीष्‍म साहनी यहॉं ‘तमस’ लिख पाए क्‍योंकि वह इतिहास ही तो है..और उनके संस्‍थान के हर पत्‍ते और पत्‍थर के पास ये कथाएं थी।



पुरानी इमारत से स्‍थापत्‍य के कुछ नमूने:





खुला प्रांगण, आज भी कॉलेज का छात्रावास इसी इमारत में चलता है और इस ओर खुलता है।


एक पुरानी तस्‍वीर, सामने के गलियारों में आजकल एंग्‍लो अरेबिक स्‍कूल चलता है।


मुख्‍यद्वार पर अंदर से एक नजर


कॉलेज/एंग्‍लो अरेबिक स्‍कूल का मुख्‍यद्वार

Friday, May 25, 2007

मायावती से कौन डरता है



तमाम आकलनों को धता बताकर कैसे मायावती उप्र के सिहांसन पर आरूढ़ हो गई हैं- ये अब एक पुरानी खबर है। हिंदी चिट्ठाकारों में भी सृजन व अन्‍यों ने इसका पर्याप्‍त संतुलित विश्‍लेषण किया और एक प्रकार से इस घटनाक्रम की ऐतिहासिकता से सहमति जाहिर की है। किंतु दूसरी ओर अंग्रेजी का चिट्ठाकार जगत अभी तक इस ‘सदमे’ से उबर नही पाया है। एक लेख भारतीय अंगेजी चिट्टाजगत में आजकल खूब चर्चा में है। आई.बी.एन के ब्‍लॉग्स में से एक पर हिंदौल सेनगुप्‍ता ने ‘मैं मायावती से क्‍यों डरता हूँ’ शीर्षक से एक लेख लिखा है। अजी लेख क्‍या है, मध्‍यवर्गीय आभिजात्‍य पूर्वाग्रहों की नंगी घोषणा है। कुल जमा तर्क यह कि मायावती की जीत ‘हम’ पढें लिखे मध्‍यवर्गीय कान्‍वेंट शिक्षित, मेहनती लोगों के हाशिए पर चले जाने की घोषणा है। आगे यह भी कहा कि जिस दिन बहनजी या लालू टाईप लोग देश के प्रधानमंत्री बने उस दिन ‘हम’ बेचारों के पास सिवाय देश छोड़ने के कोई उपाय न होगा। शिवम ने काफिला में इस पर अपनी प्रतिक्रिया लिखी है।

यूँ अंग्रेजी पत्रकारिता में इस प्रकार का अभिजातपन कोई नई बात नहीं है और सारी अंगेजी पत्रकारिता इससे पगी हुई भी नहीं है, लेकिन फिर भी यह लेख इस मायने में खास है कि यह इस बात को रेखाकिंत करता है कि अब वे भय की बात करने लगे हैं। न लालू मेरे प्रिय नेता हैं न मायावती ही हमें कोई खास पसंद हैं, लेकिन अगर इनमें से किसी के प्रधानमंत्री बनने से देश सेनगुप्‍ता जैसी खरपतवारों से मुक्‍त हो जाएगा तो मैं इनके प्रधानमंत्री बनने का खुशी से स्‍वागत करूंगा।

Tuesday, May 22, 2007

दिल्‍ली से सांगला-चिटकुल : एक ड्राईवरी नजर

पति स्‍विस चाकू की भांति एक बहुद्देशीय उपकरण होता है, माने वह पति तो खैर होता ही है साथ ही साथ अक्‍सर ड्राइवर, कुली, बावर्ची, वाचमैन, कैशियर आदि भी होता है। हम भी पति हैं और जाहिर ये सब भी बनते रहते हैं। कई बार खुशी से बनते हैं और खुशी न भी हो तो भी बनना तो होता ही है। इस बार हम ड्राईवर बने और पूरे चौदह सौ किलोमीटर के लिए बने...पर बने अपनी खुशी से।

तय हुआ था कि इन छुट्टियों में हिमाचल का भ्रमण किया जाएगा इसकी कुछ तस्‍वीरें हम दिखा चुके हैं किंतु आपको यहॉं पूरी यात्रा का वृतांत नहीं बता रहे हैं उसके ड़ाईविंग पक्ष को आपके सामने रख रहे हैं। खैर, हम सपरिवार यानि पति पत्‍नी और बेटा-बिटिया (क्रमश: 7 व 4 साल) के साथ कार्यक्रम बना जिसके लिए HPTDC व तमाम ब्‍लॉगों से शोध कर निम्‍न रास्‍ता चुना गया।


दिल्‍ली – अम्‍बाला (NH-1) – जिरकपुर – पंचकुला-पिंजौर- शिमला- फागु- नारकंडा- रामपुर- सरहन- कल्‍पा- सांगला- चिटकुल – सांगला- रामपुर- शिमला-दिल्‍ली




दिल्‍ली से अम्‍बाला राष्‍ट्रीय राजमार्ग -1 है और अम्‍बाला से कल्‍पा के निकट (पोवारी) तक राष्‍ट्रीय राजमार्ग 22 है।

वाहन के विकल्‍प इस हिंदी मास्‍टर के पास सीमित थे। या तो अपनी 1997 मॉडल की मारूति 800 (हँसो मत यार) या फिर दूसरा उपलब्‍ध विकल्‍प 2005 मॉडल की आल्‍टो। सहज ही आल्‍टो चुन ली गई। वैसे ऐंडेवर या कोई और SUV होती तो उसे ही चुनते पर ...सपने तो सपने हैं सपनों का क्‍या।


साफ कर दें कि शहर की ड्राईविंग से हम बिदकते हैं किंतु हाईवे और पहाड़ पर मजा आता है। इससे पहले ऋषिकेश, देवप्रयाग, नैनीताल, अल्‍मोड़ा-बिनसर-कोसानी, मसूरी, आदि की आसान कारचालन यात्राएं उसी विनम्र 1997 की मारूति-800 से कर चुके हैं। पर इस बार मामला एकदम अलग था। NH-22 कुछ सबसे दुर्गम इलाको से गुजरता राजमार्ग है और बहुत सा हिस्‍सा BRO (बार्डर रोड आर्गनाइजेशन) के जिम्‍मे है। कुंजम पास (4551 मीटर) से रोहतांग पास(3978 मीटर) तक का रास्‍ता केवल 5 माह तक ही आम ट्रैफिक के लिए खुलता है। खैर उस इलाके में इतने छोटे बच्‍चों के साथ खुद ड्राईव करके जाना साहस नहीं मूर्खता होती इसलिए केवल कल्‍पा तक की योजना बनाई गई।

12 मई की सुबह यात्रा शुरू हुई कार के टायर नए थे, आल्‍टो छोटी कार है लेकिन पावर स्‍टीयरिंग व पावर ब्रेक के साथ उसे चलाना एक आनंदमय अनुभव है। NH-1 का 200 किलोमीटर का फासला मजे से गुजरा। जिरकपुर में सड़क के 6 लेनीकरण हो रहा है इसलिए थोड़ा गति धीमी हो गई लेकिन कोई विशेष परेशानी नहीं हुई। पिंजौर उद्यान में उलटी चलती घड़ी और सिमंस का 1910 का DC जनरेटर देखा- अद्भुत अनुभव।



आराम से चलते हुए भी 3 बजे तक फागु पहुँच चुके थे। सड़क अच्‍छी थी, फागु शिमला से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जो समुद्रतल से 2500 मीटर की ऊंचाई पर है। रमणीक स्‍थल है। यहीं हिमाचल पर्यटन के होटल पीच ब्‍लॉसम में रात्रि विश्राम किया गया और सूर्योदय और सूर्यास्‍त का आनंद लिया। 4 किमी दूर स्थित कुफरी के बाजार को भी घूम आए।
सुबह नाश्‍ते के बाद आगे का सफर शुरू हुआ...ड्राईविंग की असली परीक्षा आगे थी..परिवार के साथ चलते हुए आप कोई जोखिम नहीं लेना चाहते, हमने भी अगले दिन के लिए केवल 150 किमी का ही सफर रखा था रास्‍ते में पड़ते थे ठियोग, नारकंडा, रामपुर, ज्‍योरी और फिर 17 किमी की हाईवे से हटकर चढ़ाई के बाद सरहन। सरहन बुशैर राजवंश की राजधानी रहा है और भीमकाली मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। खैर, रास्‍ता लगातार सतलुज के किनारे किनारे का था, थोड़ी थोड़ी देर के बाद छोटे छोटे झरने थे तस्‍वीरें खींचते, बंदरों को देखते और चेरी के बागों के किनारे से ज..जूम से निकलते हुए आगे बढ़ते गए। एक झरने पर तो बाकायदा मन लगाकर कार वाश भी किया...देखें।




रामपुर पहुँचकर लंच किया गया और कुछ देर में सरहन...। ज्‍योरी से सरहन का रास्‍ता एक पतली सी सड़क है जिसपर बसें चलती देख हम हैरान और आतंकित थे...पर हम कितने नादान थे इसका पता हमें अगले दिन की यात्रा में चलने वाला था। सरहन के रास्‍ते में हम जैसे ड्राईवर के लिए खतरा यह है कि कहीं आस पास की खूबसूरती में उलझे तो ...। सरहन में हमारा ठिकाना था हिमाचल पर्यटन का खूबसूरत होटल श्रीखंड, जो क्षेत्र की एक धार्मिक महत्‍व की एक चोटी के नाम पर था।

बेहद मोहक व सुंदर अगली सुबह सामने हिमाच्‍छादित शिखरों के साए में सरहन से कल्‍पा की यात्रा शुरू की जो थी तो 109 किमी की ही पर..बाबा रे। रास्‍ते के पड़ाव थे सरहन-ज्‍योरी-वाग्‍टू-करचम-पोवारी-कल्‍पा सारा हाईवे सतलुज के साथ साथ चलता है..भूस्‍स्‍खलन का इलाका है।
वांग्‍टू से करचम की सड़क पर दोहरी मार है एक तो प्राकृतिक रूप से ही दुर्गम इलाका है दूसरे जेपी घराना यहॉं एक बहुत बड़ी पनबिजली परियोजना का निर्माण कर रहा है जिस कारण पर्वतों को सुरंगें बना बनाकर छलनी कर दिया गया है और कच्‍ची सड़क पर भारी डंपर डंपर चलाकर उसे खतरनाक बना दिया है, रेंगेती गति और आशंकित हृदय से जैसे तैसे करचम पहुँचे...हर किमी इस बेचारी आल्‍टो के साथ अन्‍याय सरीखा था। पर असली परीक्षा तो अभी बाकी थी।

करचम से पोवारी है तो केवल 13 किमी लेकिन कदम कदम पर जोखिम हैं...पिछले रास्‍ते पर हम इतनी अधिक ऊंचाई पर होते थे कि नीचे नदी दिखाई ही नहीं देती थी...यहॉं भय और अधिक हो जाता है...एक तो बेहद पतली सड़क और जगह जगह गाड़ी के फिसलकर नीचे जा गिरने का डर दो जगह तो सड़क पर तेज धार से कार को गुजारना था और पानी, कम ग्राउंड क्‍लीयरेंस वाली गाडियों के लिए लिहाज से अधिक था।
यह 13 किमी जैसे तैसे कटे। इस सारे सफर में मैं यही आकलन करता रहा कि मैं इसका आनंद ले रहा हूँ कि डरा हुआ हूँ...दरअसल दोनों ही बात थीं। पोवारी जाकर पता चला कि पोवारी से रिकांगपिऊ की सड़क बंद है और तीन किमी आगे जाकर एक कच्‍ची सड़क से घूमकर वहॉं जाना होगा। रिकांगपिऊ किन्‍नौर जिले का मुख्‍यालय है। यह तीन किमी की सड़क और ऊपर कच्‍चा रास्‍ता मेरे अब तक के जीवन 85000 किमी के ड्राईविंग अनुभव में सबसे रोमांचक और जोखिम भरे थे। इस रास्‍ते को सड़क कहना इस संज्ञा के साथ अन्‍याय है..ये आठेक किमी के रास्‍ते पर संतुलन बनाए रखने में बड़ी परेशानी थी...गनीमत है कि हमें ऐसा कोई मुगालता नहीं है कि हम कोई बड़े तीस मारखां ड्राईवर हैं, इसलिए जब एक बस ने साईड मांगी तो हमने गाड़ी साईड में लगाकर हाथ खड़े कर दिए..यहॉं साईड का मतलब कोई साईड नहीं है, आठ दस फुट के रास्‍ते में क्‍या बीच क्‍या साईड। जैसे तैसे मुख्‍य सड़क तक पहुँचे और फिर रिकांगपिऊ होकर कल्‍पा पहुँचे जहॉं के सौंदर्य ने सारे भय और थकान को हवा कर दिया। यहॉं किन्‍नर कैलाश के ठीक चरणों में हमें पर्यटन विभाग के होटल किन्‍न्‍र कैलाश में हमें दो दिन रुकना था। अगले दिन 7-8 किमी के सुनसान व रोमांचक रास्‍ते से इस इलाके के अंतिम भारतीय गांव रोघी भी गए...देखिए रास्‍ते में लहराता भारतीय ध्‍वज


और मील के पत्‍थर पर टिके हमारे लाल को।

दिन में आए तूफान ने कल्‍पा के दृश्‍य को तो और सुंदर बना दिया था, शिखरों पर ताजा बर्फ पड़ी थी किंतु इसने हमारे कल्‍पा से सांग्‍ला के सफर पर ढेरो सवालिया निशान लगा दिए थे। तूफान तेज था और रास्‍ते में पेड़ और पत्‍थरों के सड़क पर आ गिरने की आशंका थी। चन्‍द्रगुप्‍त में प्रसाद का कथन है कि समझदारी आने पर यौवन चला जाता है..और हम सौभाग्‍य से अभी उतने समझदार नहीं है इसीलिए वावजूद इसके कि अभी अभी सांग्‍ला से आए एक टैक्‍सी ड्राईवर कम मालिक ने हमसे कहा कि भाईजी हमें तो कोई पैसे दे और कहे कि सांग्‍ला घूम आओ तो हम हाथ जोड़ दें..बहुत खतरनाक है। हमने तय किया कि देखा जाएगा। चाभी घुमाई और चल दिए। इस बार सड़क खुली हुई थी इसलिए पोवारी आसानी से पहुँच गए। पोवारी से करचम सड़क पर पत्‍थर थे और धाराओं का बहाव अणिक था पर विशेष कठिनाई नहीं हुई। असली परीक्षा थी करचम से सांग्‍ला का 16 किमी का रास्‍ता। विशेषता यह थी कि गाड़ी को बेहद संकरे रास्‍ते पर चलना था और पहाड़ी रास्‍ते के सभी जोखिम यानि घुमावदार सड़क, संकरा रास्‍ता और बहुत ही गहरी खाई सभी यहॉं विद्यमान थे उस पर तुर्रा ये कि इसी रास्‍ते पर बास्‍पा नदी को बांधने के पाप में रत कंपनी के विशाल डंपर भी यहॉं से गुजरते थे...जब सामने से ट्रक आता था तो किसी भी तरह कार उसके बराबर से नहीं निकल सकती थी इसलिए कार को बैक करके सुरक्षित कोने तक ले जाना होता था...कोई भी ड्राईवर जानता है कि कितना भी कुशल चालक क्‍यों न हो बैक करना अंतत: अनुमान का काम है और जमीन से सैकडों मीटर ऊपर, पतली सी सड़क पर पत्‍नी और छोटे बच्‍चों को कार में बैठाकर ऐसा अनुमान लगाना..उ..फ्फ।
खैर इस रोमांचक अनुभव के बाद हम जा पहुंचे सांग्‍ला (2680 मीटर) जो एक तरह से एंटी क्‍लाइमेक्‍स सा था जब तक कि हमने चिटकुल (3460 मीटर) की ओर रुख नहीं किया जो 26 किमी दूर है। ये रास्‍ता ट्रक रूपी दानवों से मुक्‍त था और बेहद मोहक था। चिटकुल सांग्‍ला क्षेत्र का अंतिम गांव है जिसके ढाबे पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा है हिंदुस्‍तान का आखरी ढाबा-चाय 4 रूपै। ये था हमारा अंतिम पड़ाव और यहाँ से हमारी वापसी की यात्रा शुरू....।

Sunday, May 20, 2007

बंदिनी बस्‍पा और मोहक किन्‍नर कैलाश: एक स्‍लाइड शो

लीजिए हम भी वापस आ गए हैं। सप्‍ताह भर किन्‍नौर में रहे। विवरण और अनुभव साझी किए जाएंगे पर फिल‍हाल तो रविजी और जितेंद्र के बताए तरीके से चंद तस्‍वीरें दिखा रहे हैं। आनंद लीजिए। हम तो अभी आनलाईन हुए हैं जरा झांक लें कि पिछले सप्‍ताह यहॉं क्‍या क्‍या घटा।


Friday, May 11, 2007

फुरसतिया, उनका उबटनिआया लैपटॉप...और कानपुर

7-8 की मध्‍यरात्रि हम वाकई कानपुर के लिए बमुश्किल मिले आरक्षण के साथ कथित पटना स्‍पेशल के कोच ए.एस-1 में सवार हुए और फुरसतिया के शहर की ओर रवाना हुए। ये हमें जानने वाले हर शख्‍स के लिए हैरान करने वाली घटना थी खुद हम भी नहीं जानते कि हमें क्‍या हुआ था। कारण साफ है हम एक घोर असामाजिक किस्‍म के प्राणी हैं, पिछले तेरह साल के विवाहित जीवन में हमने कुल जमा चार पॉंच से अधिक विवाह समारोह से अधिक में हिस्‍सा नहीं लिया है और शहर से बाहर तो आज तक किसी विवाह में सम्मिलित होने नहीं गए थे। हालत ये कि कानपुर में हमारे एकमात्र परिचित हमारे अंकल को ये बताना पड़ा कि किसी आधिकारिक काम से आए हैं क्‍योंकि पिछले ही वर्ष उनकी बेटी के विवाह में भी परिवार का प्रतिनिधित्‍व हमारे माता-पिता ने किया था, हमने नहीं।
उस एसी कोच के शांत वातावरण में अपने इस कायांतरण पर विचार करने का पर्याप्‍त अवसर था और हमारा निष्‍कर्ष था कि ये चिट्ठाकारी असामाजिक लोगों में भी सामाजिकता का संचार करने की काबिलियत रखने वाली चीज है। खैर रात कुछ तो युवा डाक्‍टर सहयात्री की अपनी गर्लफ्रेंड से चर्चा को सुनकर या अन्‍य युवा साफ्टवेयर इंजीनियर के साथ गूगल बनाम माइक्रोसॉफ्ट पर हलकी फुलकी चर्चा से कटी और शेष सोकर। सुबह हम कानपुर में थे।

शहर हमारा अध्‍ययन और रूचि का क्षेत्र है, एक मित्र ने पिछले साल कानपुर को मृत औद्योगिक शहर के रूप में परिभाषित किया था, हम भी इसे और प्रत्‍यक्ष अनुभव करना चाहते थे ताकि इस राय के पक्ष या विपक्ष में खड़े हो सकें। आयुध निर्माणिनी के रास्‍ते में ही हमारी राय बनने लगी थी कि वाकई एक औद्योगिक शहर के रूप में यौवन इस शहर का बचा नहीं है...झुर्रियॉं हैं जो न केवल अतीत की चुगली करती हैं वरन ये भी कहती सी लगती हैं कि ये सब ऐतिहासिक अचानकता से हुआ है...कल तक ये था आज ये ...ये हो गया है।
खैर हमने एक SMS से अनूपजी को अपने पहुँच जाने की सूचना दी, अपना सामान अपने परिचितों के यहॉं पटका और स्‍नानादि के बाद शहर की ओर रवाना हुए जहॉं हमारी विशेष इच्‍छा वही थी जो किसी भी शहर के मामले में होती है, यानि वहॉं के ‘अड्डों’ तक पहुँचने की कोशिश कर शहर के मिजाज को समझने की कोशिश करना। लेकिन हम इस इरादे में सफल हो सकें तभी अनूपजी का फोन आया कि भई आने की सूचना से ज्‍वाईनिंग नहीं मानी जाती बताइए कहॉं हैं लेने आते हैं, वे इससे पहले ही घर पर फोन कर चुके थे, खैर हमने शहर का इरादा टाला और वापस अनूपजी से मिलने के लिए लौट चले।
अब अनूपजी एक बड़े अफसर हैं और ये प्रभाव उनके ऐस्‍टेट में लगातर अनुभव होता है, हम कुछ सकुचा से गए थे, लेकिन ये उनसे मिलने भर तक था, मिलना ऐसा तो नहीं हुआ जैसे पहली बार मिल रहे हों क्‍योंकि अक्‍सर नेट पर तो भेंट हो ही जाती है। वे बड़े उत्‍साह से मिले और परिवार के लोगों से परिचय करवाया हमने स्‍वाति को खुभकामनाएं दी...और लीजिए ब्‍लॉगर मीट बाकायदा शुरू हुई।





अनूपजी लगभग भूल ही गए कि वे उसी दिन शाम को आयोजित विवाह समारोह के मेजबान हैं और उनके जिम्‍मे हजारों काम हैं..वे तो बस किलकते चिट्ठाकार बन चुके थे....ये ओर वो और वो बीच बीच में भोजन, मिठाई, इस काम के निर्देश उसे, उस काम के निर्देश इसे दिए जाते रहे। तभी आया किस्‍सा उबटनिआए लैपटॉप का... जी आनुष्‍ठानिक पूर्तियों में बेचारे लैपटॉप को ही उबटन से अभिसिक्‍त कर दिया गया था। हमें ये बेहद चिट्ठोपयोगी प्रकरण लगा, अनूपजी ने झट से अपने साहबजादे को बुलाकर उस लैपटॉप की तस्‍वीर खींचने की हिदायत दी लेकिन अफसोस उसे पहले ही साफ कर दिया गया था।
खैर हमारी ब्‍लॉगर मीट जारी थी, हमें वह गुलमोहर दिखाया गया और उसके विषय में बताया गया जो उनकी चर्चित पोस्‍ट का आधार बना था। ऐसी ही और चीजें और व्‍यक्ति भी मिले या उनपर चर्चा हुई जो उनके चिट्ठा-लेखन का आधार बनते रहे हैं। और यहॉं अब मुझे फुरसतियात्‍व से साक्षात्‍कार हो रहा था जिसे जानने मैं वहाँ पहुँचा था। वे मानते हैं कि चिट्ठाकारी सहज स्‍वाभाविक लेखन है जितना स्‍वाभाविक व निजी अनुभव से जुड़ा होगा उतना बेहतर। ये इतनी ढेर सी बातें हम फुरसत से कर रहे थे जबकि उन्‍हें कुछ घंटों में कन्‍यादान की जिम्‍मेदारी निबाहनी थी- फुरसत इस शख्‍स की शख्सियत में है। कोई तनाव नहीं, हड़बड़ाहट नहीं बस मौज ही मौज।
अगले बीसेक घंटे में मैनें चिट्ठाकारी के इतने पाठ सीखे जितने दो वर्षों की चिट्ठाकारी में नहीं सीखे हैं। उन पाठों को बांटते रहेंगे आपसे...और राजीव टंडनजी से मुलाकात, ढेर सारी बातें...कुछ ऐसी कि हम बस उनके मुरीद ही हो गए हैं, इनपर भी चर्चा की जाऐगी।

फिलहाल के लिए इतना ही...
और हाँ काकेश ने कई कनपुरिया अड्डों की ओर इशारा किया पर अफसोस हमें वे नहीं मिले...हम तो बहुत उम्‍मीद के साथ कानपुर प्रैस क्‍लब में भी घुसे लेकिन ठीक तब जबकि शाम गुलजार थी वहॉं कई मुए पत्रकार बाकायदा सो रहे थे। क्‍या कहें..

Monday, May 07, 2007

कंपू शहर में ब्‍लॉगर मीट

अनूपजी का निमंत्रण मिला और हमने बोरिया बिस्‍तर बांधा और जा रहे हैं कम्‍पू शहर। हमारे साथ दिल्‍ली के तमाम चिट्ठाकारों की शुभाकांक्षाओं की पोटली है अनूपजी के लिए। वहाँ हमें मिलेंगे अनूपजी (लेकिन वे उतनी फुरसत में होंगे नहीं) और विश्‍वास है राजीवजीआशीष से भी मिलना हो पाऐगा। इस तरह 8 मई को कंपू शहर में हिंदी ब्‍लॉगर मीट का मुहुर्त बनता है। हम इस शहर में पूरे पच्‍चीस सालों के बाद जा रहे हैं पर इस फुरसतिया आख्‍यान को फिर से पढ लिया है। जो चिट्ठाकार मित्र कानपुर में हैं वे संपर्क कर सकते हैं मुझे मिलकर प्रसन्‍न्‍ता होगी। तो कंपू शहर हम आ रहे हैं...

Sunday, May 06, 2007

पत्रकारिता की दुनिया में ये हो क्‍या रहा है ..अविनाश

कई पत्रकार अब हम लोगों के बीच हैं कोई बताए हमें कि भला ये हो क्‍या रहा है ? अविनाश के गुजरात दंगे प्रकरण को तो चलो ट्रॉलिंग मान लेते हैं पर भैया ये ‘द हिंदू’ को क्‍या हो गया है। कल उसने उदबाहू घोषणा की (ये मुखपृष्‍ठ की पहली खबर थी कल) कि गुजरात सरकार दंगों की संचालक थी गृहमंत्री खुद दोषी हैं.
The report on the Gujarat fake encounter killings submitted by Inspector General of Police Geetha Johri speaks of "the collusion of [the] State government in the form of Shri Amit Shah, MOS for Home." It says the episode "makes a complete mockery of the rule of law and is perhaps an example of the involvement of [the] State government in a major crime."

लगा कि भई ये तो पातालफोड़ खबर है, गुजरात की सरकार के लिए हमारे मन में कोई सहानुभूति न थी न है। नवंबर 84 के दंगे स्‍मृति में हैं और उस बालक अनुभव से भी जानते हैं कि बिना राज्‍य की मिली भगत के इतने बड़े नरसंहार नहीं होते। पर यहॉं सवाल पत्रकारिता के मूल्‍यों और पाठकों के विश्‍वास का भी है, क्‍योंकि अगले ही दिन यानि आज हिंदू ने लिखा
The Hindu retracts its front-paged assertion that the Johri report speaks of
``collusion of the State government'' and of the role of Mr. Amit Shah, Minister of State for Home; and also that it recommends a CBI enquiry. We deeply regret these serious errors in a story that drew on documents we relied upon in good faith. We agree that we should have verified the facts, especially those relating to the provenance of ``Facts of the Case,'' before publishing the news stories

अब इस सारे प्रकरण को इस तरह भी देखा जा सकता है कि देखो कितने ईमानदार तरीके से गलती मान ली जो अखबार अपनी लीड में ऐसे कर्म करता हो उसे तो पांचजन्‍य ले जाकर बैठा देना चहिए और ये तो ‘द हिंदू’ है। हमें तो मामला इतना सीधा लगा नहीं पर पत्रकारिता की बातें हैं...पत्रकार ही जानें।

Friday, May 04, 2007

हसन जमाल प्रकरण और चौपटस्‍वामी का गिद्धदृष्टि संधान

चौपटस्‍वामी जी ने हसन जमाल प्रकरण पर अपने विचार रखें हैं हमने पढ़े। टिप्‍पणी लिखनी शुरू की तो कुछ ज्‍यादा लंबी हो गई फिर कुछ लिंकन प्रतिलिंकन कर पोस्‍ट बनाना उचित जान पड़ा, इससे जाहिर है एक किस्‍म की एकमुखता इसमें आ गई है उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

हम चौपट स्‍वामीजी को कहीं गंभीरता से लेते रहे हैं। पर हसन जमाल प्रकरण में वे लिखे से ज्‍यादा पढ रहे हैं। मुझे रविजी (रतलामी) के लेख में, अपनी पोस्‍ट में और अन्‍य लोगों के हसनजी को संबोधित प्रतिक्रियाओं में उनकी व्‍यक्तिगत उपलब्धियों को कूड़ा कहती एक भी प्रतिक्रिया नहीं दिखी। उन्‍हें नोचने की कोशिश, उनपर गिद्धदृष्टि जैसी कोई बात भी कही नहीं है। इन पोस्‍टों की प्रतिक्रिया में जरूर एकाध मित्र ने उत्‍साह का आधिक्‍य दिखाया है जिसे आनुपातिक महत्‍व ही दिया जाना चाहिए।
चौपटस्‍वामी व्‍यक्तियों की निजी तफसीलों में इतने रमे है कि वे परिवारों को खोज रहे हैं, अकारण।
मेरी पोस्‍ट का सीधा सा उद्देश्‍य था जो व्‍यक्‍त था इस प्रकार-


'अब तक चिट्ठाकारी चंद सिरफिरों के खतूत भर थी इसलिए एम एस एम यानि मेन स्‍ट्रीम मीडिया या मुख्‍यधारा मीडिया उदासीन उपेक्षा से काम लेता था पर अब आवरण कथाएं आ रही हैं, इलेक्‍ट्रानिक मीडिया पर कवरेज हो रहा है, लेख भी छप रहे हैं। यानि सत्‍ता प्रतिष्‍ठानों के जड़ दरवाजों पर खटखटाहट अब शुरू हो गई है इसलिए इन दुर्गों के किलेदार हसन जमाल साहब जैसे ही तर्कों के हथियारों से हमला करने वाले हैं। कम से कम दो तर्क तो बार बार आने वाले हैं पहला ये कि इंटरनेट चंद खाते पीते लोगों की चीज है इसका हिंदी मुख्‍यधारा से कोई सरोकार नहीं और दूसरा यह कि यह हिंदी के बहुत छोटे समुदाय की नुमाईंदगी करता है ( यानि से विध्‍न संतोषी लोग हैं) इन्‍हें मत सुनो। ऐसा नहीं जबाव हें नहीं या दिए नहीं जा सकते पर बंधु लोगों संवाद उससे ही हो सकता है जो संवाद में यकीन करता हो। हम तो अपने बीच के अविनाशों से संवाद कायम कर पाने में असफल सिद्ध हुए.....

अर्थात इस प्रकरण को चिट्ठाकारी के लिए आत्‍मालोचन व वैध अवैध तर्कों के लिए तैयार होने की जरूरत को रेखांकित करने के लिए ही इस पोस्‍ट को लिखा गया था। और जैसा कहा गया कि भैया हमारी तो पहुँच उन तक नहीं है (बहुत पहूँचे हुए लोग है भई) पर उनकी पहूँच और प्रतिनिधि देखिए जरूर सब जगह हैं। कृपया उन्‍हें बताइए कि इसमें कोई हेठी की बात नहीं है, आइए हमें जानिए और शामिल होइए ठीक वैसे ही जैसे रविजी व्‍यंजल लिखने का प्रयास करते ही हैं।

बाकी हिंदी उर्दू मसले को संकेतित करना...जैसी हवा और पंगे इधर चिट्ठाजगत में चल रहे हैं, बहुत निर्दोष सी दिख रही चीज नहीं है। वैसे भी मजे की बात है जिन्‍हें चुन चुनकर आप गालिया रहे हैं वे ही वे लोग हैं जिन्‍होंने हसन साहब की चिट्ठाकारी से प्रमुख आपत्ति यानि प्रिंट के विरुद्ध होने वाली बात उसके निराकरण की कोशिश की। रविजी ने उत्‍तर प्रिंट में दिया, और मनीषा ने भी जैसा भी लिखा प्रिंट में लिखा, हमने भी लिखा। दरअसल लगता है चौपटस्‍वामीजी की मुख्‍य आपत्ति कूपमंडूकता शब्‍द से अधिक है....पर रुककर देखें जमाल साहब के तर्कों को, वे कहते हैं- जिसे हाथ से लिखने की या टाईप करने की आदत हो गई है वे हजार प्रलोभनों के बावजूद इंटरनेट के गुलाम नहीं बनेंगे....।
क्‍या कहेंगे इसे आप.. टाईपराईटर की ही तरह आप और हम कंप्‍यूटर पर टाईप करते हैं..इसमें क्‍या संघर्ष है। पर वे खोजकर मानेंगे। जो जी में आए करें हमें क्‍या।
असंतुलित विकास वाले पक्ष पर हम में से किसी ने नही लिखा, न उनके 'महान' व्‍यक्तित्‍व पर कीचड़ उछाली उनके परिवार को बीच में खींचा (कुछ लोगों को इसका विशेष शौक है) हमने केवल तात्‍कालिक उद्दीपक पर उनकी समझ पर प्रश्‍नचिह्न लगाया, जो जरूरी था। उनके तर्क फूहड़ थे, अब वे चौप्‍टस्‍वामी से अपने पुराने कर्मों के आधार पर वकालत करवा रहे हैं, हम फिर वही कह रहे हैं कि ऐसे ही और इससे भी अधिक टटकी तर्कपद्धति से लेकिन अधिक मजबूत किलेबंदी से सवाल उठाए जाएंगे...भाषा इससे भी ज्‍यादा अश्‍लील होगी।

Thursday, May 03, 2007

नोम चोमस्‍की, अमर्त्‍य सेन अब हिंदी में नेट पर उपलब्‍ध

अपनी विश्‍वविद्यालयी दुनिया के विषय में मेरे कितने 'उदार' विचार हैं ये आपको पहले से मालूम हैं किंतु इसके बावजूद कई बार शुद्धत: लिपिकीय वजहों से ही सही वहॉं कुछ ढंग के भी काम हो जाते है। मसलन पिछले साल एक अच्‍छा सा बी.ए. प्रोग्राम का नया कोर्स शुरू किया गया। कोर्स नया था मास्‍टर पुराने इसलिए सध नहीं पा रहा था। हिंदी में पाठ्यसामग्री उपलब्‍ध कराने की मांग आई परिणामत: विश्‍वविद्यालय ने अनुवाद करवाकर सामग्री तैयार कर अपनी साईट पर उपलब्‍ध करा दी है। इस तरह काफी मात्रा में सामग्री जिसमें से कुछ पठनीय भी है उपलब्‍ध हो गई है। लीजिए हाजिर है सूची तथा लिंक। ( सामग्री pdf में है)

1. साझी दुनिया में न्‍यायपूर्ण साझेदारी- अमर्त्‍य सेन

2.विकासशील देशों में कृषि भूमंडलीकरण- जे मोहन राव तथा सर्वास स्‍ट्राम

3.भूमंडलीकरण और अंतर्राष्‍ट्रीय वित्‍त की राजनीति - कौशिक बासु

4. शक्ति और वैश्‍वीकरण पर विचार - नोम चोमस्‍की

5. विकासशील देशों में कृषि भूमंडलीकरण : नियम, तर्काधार और परिणाम जे मोहन राव व सर्वास स्‍ट्राम


और भी कुछ विषयों पर विशेषकर हिंदी भाषा, साहित्‍य, संस्‍कृति पर भी सामग्री उपलब्‍ध है। जिसके लिंक विषय अलग हाने के कारण अलग से उपलब्‍ध कराए जाएंगे।

Tuesday, May 01, 2007

फो-ग्रास उर्फ बत्‍तख का कलेजा..... अहिस्‍ता से निकालो


हमारी अंगेजी बहुतई खराब है लेकिन इस बार तो इस बहाने भी नहीं बच सकते क्‍योंकि ये फो-ग्रास अंग्रेजी नहीं वरन फ्रेंच शब्‍द निकला, तो लो कह देते हैं कि हमारी फ्रेंच और भी खराब है। हमने कभी भी ये ग्रास नहीं खाई है लेकिन हमारी हालत यही रही है कि हम ये हमेशा से खाना चाहते थे वो इसलिए कि कथित लक्‍जरी फूड आइटम में ये हमें शाकाहार की नाक लगता था। हास्‍टल के जमाने में भी सब मँहगा यानि मटन, मछली और चिकन होता था और हम शाकाहारी लोगों को मिलता था बस पनीर पनीर और पनीर :( । बृहत्‍तर संदर्भ में भी कोबे बीफ, कैवियार, ओर न जाने क्‍या क्‍या जो भी मं‍हगा माना जाता है वो कमबख्‍त माँसाहारी निकलता है। केवल फो-ग्रास से इज्‍जत बची मानता था। सोचता था कि पैसे हुए तो इसे जरूर खाउंगा लेकिन बुरा हो वीर संघवी का- इस रविवार के ब्रंच में जब उन्‍होंने हम जैसे कमअक्‍लों की बुद्धि पर तरस खाते हुए घोषणा की कि भाई लोगो ये फो-ग्रास कोई ग्रास नहीं है। ये तो प्रवासी पक्षियों के कलेजे को कहा जाता है। हमारे तो पांव के नीचे से जमीन ही खिसक गई। अपने शाकाहार पर एक बार लिख चुके हैं खैर... चलो अब बचा है ट्रफल, उम्‍मीद है कि किसी दिन कोई शैतान घोषणा कर देगा कि यह भी किसी कबूतर का गुर्दा होता है।

खैर इसी लेख में वीर संघवी ने एक और लफड़े के विषय में बताया कि आजकल दुनिया भर में विशेषकर अमेरिका में फो-ग्रास के खिलाफ आंदोलन जारी है क्‍योंकि यह पशुओं (बत्‍तखों) के खिलाफ क्रूरता को बढ़ावा देता है। वीर संघवी को और मुझे भी यह बड़ा बत्‍तख तर्क लगता है कि जी बत्‍तख का कलेजा ऐसे निकालना उसके साथ क्रूरता है, अरे भई या तो सारा माँसाहार क्रूरता है नहीं तो कुछ भी नहीं। कहा जाता है कि प्रवासी पक्षी जब लंबी यात्रा पर निकलते हैं तो बहुत सा खाकर कलेजे को बढ़ा लेते हैं जो स्‍वादिष्‍ट होता है। अब पॉल्‍ट्री फार्म में किया यह जाता है कि वे प्रवास पर तो जाते नहीं लेकिन फॅनल लगाकर उन्‍हें जबरन खिलाया जाता है और कलेजे का आकार बढ़ने पर ...जै राम जी की। क्रूरता है तो सही, पर आराम से मारेंगे तब भी है। दरअसल देखें तो आदमजात है बहुत खुदगर्ज अपने लिए बाकी सारी प्रजातियों को नष्‍ट करने में उसे कोइ्र तकलीफ नहीं।
खैर हमें क्‍या अब माँसाहारी होते भी तो भी शायद कोबे बीफ या फो ग्रास हमें तो नसीब होने वाला नहीं था।