Showing posts with label ब्‍लॉग सैद्धांतिकी. Show all posts
Showing posts with label ब्‍लॉग सैद्धांतिकी. Show all posts

Monday, April 18, 2016

रैण दो, आपसे न हो पाएगा प्रोफेसर साहब

प्रो. गोपेश्‍वर सिंह हमारे ही विश्‍वविद्यालय में हिन्‍दी के प्रोफेसर हैं। पहले विभागाध्‍यक्ष रह चुके हैं। कल के जनसत्‍ता में उन्‍होंने आलोचना की अधोगति के स्‍यापे में ठीकरा सोशल मीडिया के सर फोड़ा है। विनीत, रवीश और प्रभात जैसे सक्रिय ब्‍लॉगरों को उदाहरण की तरह प्रस्‍तुत करते हुए यह साबित करने की जिद दिखाई है कि सोशल मीडिया के कथित तुरंता होन के चलते गंभीर आलोचना की संभावना खत्‍म हो गई है। मेरी प्रतिक्रिया: 

यात्रा में था तो कल जनसत्‍ता उपलब्‍ध नहीं था आज पढ़ा है। सोशल मीडिया को लेकर की गई ये कोई पहली गैर जिम्‍मेदार टिप्‍पणी नहीं है। पिछले दस साल में हम जो ब्‍लॉग-इंटरनेट वाले हैं उन्‍होंने उपहास, उपेक्षा,असुरक्षा, ईर्ष्‍या सब चरणों को भुगता है, सो ये टिप्‍प्‍णी तो फिर भी खिसियाहट ज्‍यादा है। तब भी मैंने सोचा था कि पूर्वग्रह छोड़कर प्रो. सिंह के नजरिए को पूरी सदाशयता से समझने कर कोशिश की जाए। किंतु दिक्‍कत ये है कि आलेख में सोशल मीडिया की समझ की एबीसीडी भी नदारद है।
प्रो. सिंह अपनी आधारभूत पूर्वधारणाओं के आधार तक स्‍पष्‍ट कर पा रहे हैं...आलोचना में वर्णित पतन की जिम्‍मेदारी सोशल मीडिया पर कैसे है ? यूनीकोड 2003-04 में दिखता है और ब्‍लॉगेतर हिन्‍दी सोशल मीडिया की उम्र उससे भी कम है यानि सोशल मीडिया की 'छाया' आलोचना पर मात्र 5-7 साल की है तो क्‍या उससे पहले हमें आलोचना का स्‍वर्ण काल चल रहा था ?
एक अहम पूर्वधारण ये भी है हिन्‍दी पब्लिक स्‍फेयर मोनोलिथिक है यानि सोशल मीडिया और शेष आलोचना वृत्‍त में लोग एक ही हैं... अजब जिद है, सारे उदाहरण बताते हैं कि दरअसल सोशल मीडिया के हिन्‍दी वाले (खासकर पाठक) अधिकांशत वे हैं जो अन्‍यथा हिन्‍दी जगत से दूर होते..सोशल मीडिया ने हिन्‍दी के पब्लिक स्‍फेयर को विस्‍तार दिया है। ब्‍लॉगर याद करेंगे कि इस बात को वहॉं बार बार रेखांकित किया जाता था ये हिन्‍दी के यूनीलेखक व यूनीपाठक, छपाई वाले लेखको/पाठकों से अलग हैं तथा बहुत ही थोड़ा हिस्‍सा कॉमन है।
एक आलोचकीय प्रश्‍न यह भी है कि सरजी ये जो कथन है कि 'सोशल मीडिया अभिव्‍यक्ति की भूख मार देती है' इसके लिए कोई संदर्भ, कोई शोध उद्धृत करने की कोई जरूरत क्‍यों नहीं लगी आपको... या जो ठाकुर साहब कहें उसे बस मान लेना पड़ेगा...क्‍योंकि बाकी सब सबूत तो बताते हैं कि इससे हिन्‍दी टेक्‍सट के उपभोग और उत्‍पादन दोनों का विस्‍तार हुआ है।
अब खरी खरी कुछ सुन लीजिए, सरजी कुछ पढ़ा कीजिए, हिन्‍दी में न मिले तो अंग्रेजी का पढ़ लीजिए। हाईपर टेक्‍स्‍ट वहीं नहीं है जो टेक्‍स्‍ट है उसे न पढ़ा वैसे जाता है जैसे छापे के टेक्‍स्‍ट को न लिखा ही वैसे जाता है। यूँ आपको चंद संदर्भ यहॉं दे सकता हूँ किंतु सही तो होगा कि जिन्‍हें तिलंगे कहकर अपमानित कर रहे हैं, खासकर विनीत (Vineet Kumar)को उसे एक बार फोन लगाएं (कोई शर्म की बात नहीं है, ज्ञान जिसके पास हो ले लेना चाहिए) वे आपको चार किताब गिना सकता है उसे पढ़कर आपकी कुछ नजर खुलेगी।
मजे की बात यह है‍ कि आपकी उम्‍मीद तो यह है कि इस सर फुटौवल में आप टेक्‍स्‍ट को हाईपरटेक्‍स्‍ट के सामने ला खड़ा कर पाएंगे और इस धुंधलके में आपको टेक्‍स्‍ट खेमे की सरदारी मिल जाएगी पर है ये गलतफहमी ही। तिस पर मजेदार बात यह है कि जिस पोलिमिकल अंदाज में आपने यह लेख लिखा है वह खुद ही दरअसल सोशल मीडिया तेवर...यानि दरअसल जनसत्‍ता में एक ब्‍लॉग पोस्‍ट पर लिख दी है बस लिंक नहीं दे पाए हैं :)
अब आखिरी बात इसी विश्‍वविद्यालय का ही शिक्षक होने के नाते मुझे शिकायत करनी चाहिए थी कि आपने तो डीयू प्रोफेसरों की इज्‍जत ही मिटा दी..पर अंदर की बात हम आप जानते ही हैं कि हमारी इज्‍जत पिछले कुछ सालों से, खासकर एफवाईयूपी/सीबीसीएस के बाद कुछ रही ही नहीं। तो वो कोई वांदा नहीं। एक सवाल सो साथी जातिखोज शिक्षकों में जरूर कुलबुलाएगा कि ये 'चौहान' भला 'सिंह साहब' पर ढेले क्‍यों भांज रहा है, तो पहली बार साफ कर दूँ मुझे अपनी जाति पता ही नहीं है, जब तक पता नहीं चलती तब तक लोग ठाकुर समझें इस पर आपत्ति न करने की नीति अपनाई हुई है :)


Thursday, December 24, 2015

बामयान के बुत और प्‍यार की पंक्ति


शब्‍द को ही समझना अच्‍छों अच्‍छों के लिए एक बड़ी पहेली है, कैसे एक इंसान के मुँह से निकली आवाजों का एक गुच्‍छा किसी दूसरे इंसान के मन में एक मायने को पैदा कर देता है लेकिन उससे कहीं ज्‍यादा उलझाऊ किस्‍सा लिखित शब्‍द यानि टेक्‍स्‍ट है।  मौखिक शब्‍द में कम से कम वक्‍ता श्रेाता एक ही स्‍थान व समय में उपस्थित तो रहते हैं ताकि अर्थ के पैदा होने और संप्रेषित होने के कुछ कारण तो दिखते हैं। टेक्‍स्‍ट तो माशा अल्‍लाह न वक्त में साझा होने जरूरी हैं न जगह में।  अशोक के शिलालेखों में अशोक के शब्‍द स्‍थान व समय पार करते हुए किस प्रक्रिया से हम तक पहुँचकर कोई अर्थ गढ़ते हैं, जाने वे गढ़ते भी हैं या हम ही खुद उन्‍हें गढ़ लेते हैं? कभी कभी तो लगता है कि न हम  न अशोक ही इसमें बित्‍ते भर की औकात रखते हैं दरअसल अर्थ तो अशोक और हमारे बीच का ढाई हजार साल का इतिहास रचता है। टेक्‍स्‍ट अर्थ का वाहक नहीं वो तो उस सारी पृष्‍ठभूमि से बनता है जिसके सामने टेक्‍स्‍ट को रख देने से अर्थ महकता है। इस ढाई हजार साल का हर क्षण अशोक के कहे के मायने बदल रहा था... मसलन अभी हाल ही तो बामयान के बुत ढहाए गए..देखों झट तालिबान ने बुद्ध के कहे..अशोक के लिखे के मायने बदल दिए न।
अच्‍छा तो कहो, अगर टेक्‍स्‍ट के मायने को बीच के इतिहास की, टेक्‍स्‍ट के पीछे की असलियत की दरकार है तो हायपरटेक्‍स्‍ट के मायने कहॉं से हासिल होते होंगे।  हम जो इतना प्रेम, इतनी नफरत, इतनी राजनीति, इतना झूठ और थोड़ा बहुत सच अपनी टाईमलाइन पर, अपने स्‍टेटस, लाइक, कमेंट, मेसेज में बहाए फिरते हैं, लिखते हैं पढते हैं उनके क्‍या मायने बनते हैं उससे भी अहम कि भला कैसे बनते हैं।  हमारे लिखने और तुम्‍हारे पढ़ने के बीच के मिनटों में, या सेकेंडों में जो अनगिनत बामयान के बुत ढह जाते हैं उनका क्‍या असर इस हाइपरटेक्‍स्‍ट के मायनों पर पड़ता है...पड़ता भी है या नहीं ?
न जवाब की उम्‍मीद मुझसे न रखो, सवाल भर ढंग से पूछ पाऊं खुद को सफल समझूंगा।
अच्‍छा एक तस्‍वीर देखो-


देखी न।  ध्‍यान से। तस्‍वीर ? तस्‍वीर कहॉं ये तो टेक्‍स्‍ट है न ।  हॉं हॉं टेक्‍स्‍ट ही है पर खुद टेक्‍स्‍ट नहीं है बल्कि ये तो एक पंक्ति के हाइपरटेक्‍स्‍ट के सोर्स एचटीएमएल की ही तस्‍वीर है। हॉं एक पंक्ति का फेसबुक स्‍टेटस (जिसमें संयोग से मैंने लिखा था - 'प्‍यार'-  पर क्‍या फर्क पड़ता है वहॉं नफरत, कूढेदान या होनोलूलू भी लिखा हो सकता था)  लिखकर पोस्‍ट किया और फिर पृष्‍ठभूमि का पेजसोर्स देखा तो यही सब जार्गन था। जार्गन इसलिए कि अपना वही प्‍यार जब मैंने पंक्ति दर पंक्ति भी खोजने की चेष्‍टा की तो वो नदारद था, खुद छोड़ो फाइंड के औजार को भी मेरा वह टेक्‍स्‍ट नदारद मिला... मुझे शक नहीं कि मेरी वो पंक्ति हाइपरटेक्‍स्‍ट के बामयानों की वजह से ध्‍वंस को प्राप्‍त हुई। हाईपरटेक्‍स्‍ट के मायने बामयान हजम कर जाते हैं और कुछ ही रख देते हैं उसकी जगह जिसे बाकी छोड़ो हम खुद भी अपने शब्‍द अपने मंतव्‍य जान लाइक कमेंट खेला करते हैं।  इस पेजसोर्स जार्गन से अपने प्‍यार की पंक्तियॉं आजाद कराना आज की चुनौती है।
  

Tuesday, February 09, 2010

हर घेटो खुद शहर पर एक सवाल है

हिन्‍दी के मानूश हैं पर गणित से मो‍हब्‍बत रही है इतनी कि पहले भी कहीं कह चुके हैं कि गणित की याद उस प्रेमिका की तरह टीस देती है जिससे विवाह न हो पाया हो (कोई ये न माने कि हिन्‍दी से चल रहे गृहस्थिक प्रेम में हमें कोई असंतुष्टि है :) पर पुराने प्रेम की टीस इससे कम थोड़े ही होती है) खैर गणित में जब कोई सवाल अटक जाता था तो बस वो अटक जाता था  और जितना सर भिडा़ओ हल न होकर देता था ..जल्द ही समझ आ गया कि ऐसे में कापी बंद कर घूमने चल देना चाहिए वापस आने तक सवाल का हल या अब तक की कोशिशों की गलती सूझ चुकी होती थी। जब पिछले दिनों तमाम कोशिशों के बावजूद छत्‍तीसगढ़ के ब्‍लॉगर साथियों की खुद से नाराजगी पकड़ में न आई तो हम कापी बंद कर इधर उधर टहलने निकल पड़े। इधर यानि अपने ही ब्‍लॉग पर अपने ही ब्‍लॉग पर दो साल पहले जनवरी 2008 की एक पोस्‍ट और उधर यानि कल मित्र बिल्‍लौरे के ब्‍लॉग पर अनूप के साक्षात्‍कार... इन दोनों पोस्‍टों में ही हमें इस फिनामिना को और बेहतर समझने के सूत्र दिखे।
जब हम ब्‍लॉगस्‍पेस को समझना चाहते हैं तो पब्लिक स्‍पेस की शब्‍दावली में ही समझना होगा। इसलिए अगर किसी शहर में घेटो तैयार हों तो इसके लिए खुद घेटो को या उसके बाशिंदो को दोष देना उनके खड़े होने की प्रक्रिया के प्रति उदासीनता को ही दर्शाता है। दिल्‍ली के ओखला या जाफराबाद में लोग घेटो इसलिए नहीं बसाते कि उन्‍हें असुविधाएं पसंद हैं या तंग गलियों में रहना उन्‍हें अच्‍छा लगता है वरन इसलिए कि बाकी शहर उनके प्रति या तो उदासीन हैं या उनकी उपेक्षा कर रहा है।
'घेटो' के घेटो होने में अपरिचित जगह में अपने जैसों को इकट्ठा कर अपनी असुरक्षाओं से कोप करने का भाव होता है। जो पूरे शहर में डरा डरा सा घूमता है क्‍योंकि वह वहॉं खुद को अजनबी सा पाता है, अल्‍पसंख्‍यक पाता है या शक की निगाह में पाता है वह जैसे ही अपनी बस्‍ती में आता है जो उसने बसाई ही है 'अपने जैसों' की वहॉं वह फैलता है कुछ ज्‍यादा ही फैलता है- गैर आनुपातिक होकर। पहली पीढ़ी के प्रवासी महानगर की सुखद एनानिमिटी के आदी नहीं होते और उससे बचकर भागते हैं और वह छोटी सी बस्ती ही उन्‍हें सुकून देती है जहॉं एनानिमिटी की जगह 'पहचान' की गुजाइश होती है इस तरह महानगर में घेटो बसते हैं- ओखला, तैयार होता है, जाफराबाद, बल्‍लीमारान और मुखर्जीनगर।
ये सही है कि ये प्रवृत्ति मूलत: फिजीकल स्पेस की है तथा इसे वर्च्‍युअल पर सीधे सीधे लागू करने के अपने जोखिम हैं। पर ये घालमेल हम हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत में होता ही रहा है एक बार फिर सही।  अगर छत्‍तीसगढ़ या किसी और क्षेत्र या समूह के ब्‍लॉगर इस पूरे ब्‍लॉगशहर को पूरा अपना न मानकर अपनी बस्‍ती बसाना चाहते हैं तो इसे कानूनी नुक्‍तेनजर से समझने की कोशिश इस एलियनेशन को और बढ़ाएगी ही इसलिए जरूरी है इसे पूरे ब्‍लॉग शहर की असफलता के रूप में देखे जो कुछ साथियों में इस एलियनेशन के पनपने को रोक नहीं पाई।
गणित के उस बेहद उलझे सवाल के साथ सुविधा ये होती थी कि किताब के आखिर में दिए हल से मिलाने पर पता चल जाता था कि हमारा हल ठीक हे कि नहीं। काश ऐसी कोई सुविधा यहॉं भी होती।

Wednesday, November 11, 2009

मैं चर्चाता हूँ...इसलिए मैं हूँ

अगर इंसान पहचान के कई टुकड़ों में साथ साथ जीता है पिता, मित्र, धर्म, जाति... तो भला ब्‍लॉगर की क्‍योंकर एकमुश्‍त पहचान होगी... वो भी अपने अलग अलग चिट्ठों, पोस्‍टों, टिप्‍पणियों से पहचान हासिल करता है... हम भी करते हैं, पर जब कोई हमसे पूछता है तो जिस पहचान को हम मसिजीवी होने के बाद सबसे अहम मानते हैं वह है चर्चाकार होना। चिट्ठाचर्चा के इतिहास पर हमारी कोनो पीएचडी नहीं है, सुकुलजी इतिहास दर्ज कर चुके हैं बांच लें, चिट्ठाचर्चा ने 1000 पोस्‍टों का सफर पूरा करने के अवसर पर हम केवल इस मंच से अपने जुड़ाव की बात करेंगे और नहीं।

मित्रों के सद्भाव के चलते जनसत्‍ता से ब्‍लॉगों पर एक स्‍तंभ जिखने की पेशकश हुई... पहले अविनाश अपना कॉलम लिखते थे पर उन्‍होंने भास्‍कर ज्‍वाइन कर लिया तो जाहिर है जनसत्‍ता में जारी नहीं रख सकते थे, थानवीजी से फोन पर बात हुई उन्‍होंने कहा कि आपका कालम है खुद कोई नाम रखें... 'चिट्ठाचर्चा' हमने बिना झिझक कहा, आखिर नियमित रूप से पोस्‍टों की चर्चा और भला क्‍या नाम आ सकता था हमारे मन में। जब तक जनसत्‍ता में कॉलम आया चिट्ठाचर्चा नाम ही रहा कभी मन में नहीं आया कि ये शुक्‍लजी के मॉडरेशन में चल रहे किसी सामूहिक ब्‍लॉग का नाम है... भले ही शुक्‍लजी हमसे सौगुनी मेहनत करते हैं चर्चा पर, किंतु चिट्ठाचर्चा हम सब का है... ये 'अविनाश के' मोहल्‍ले या 'यशवंत के' भड़ास सा कम्‍यूनिटी ब्‍लॉग नहीं है ये वाकई हमारी चिट्ठाचर्चा है इसलिए जब कोई टर्राते हुए इसे सुकुलजी के किन्‍हीं गुट की चर्चा कहता है तो झट मन में आता है बड़े आए सुकुलजी...(नारद को लेकर भी ऐसा ही मन में आता था अभी तक तो उम्‍मीद है कि चर्चा के मामले में ये विश्‍वास बना रहेगा)  

ऐसा नहीं कि नाराजगी नहीं हुई खुद अनूप धुरविरोधी प्रकरण में हमसे धुर असहमत थे... उनकी क्‍या कहें घर में खुद नीलिमा असहमत थीं

धुरविरोधी के विरोध का अपना एकदम निजी तरीका है इसपर सेंटी होने की भी जरूरत नहीं है उक्त विचार भी आपके एकदम निजी हैं

पर हमने चर्चा का विषय इसे बनाया एक बार नहीं लगा कि चिट्ठाचर्चा अनूप के मॉडरेशन में चल रहा ब्‍लॉग है उन्‍हें आपत्ति होगी। दरअसल चिट्ठाचर्चा में वैयक्तिकता व सामुदायिकता का जो संतुलन है उसे महसूसने की जरूरत है इसे साधुवादी वाह वाह से नहीं पकड़ा जा सकता। आप कौन सी पोस्‍ट चर्चा के लिए चुनेंगे ये प्रक्रिया राग द्वेष से मुक्‍त नहीं है होना मुश्किल भी है पर सिद्धांतत: चर्चाकार मानते हैं कि चर्चाकार को अपने विवेक से यह तय करने का हक है इसलिए इन आपत्तियों को कभी तूल नहीं दिया जाता कि कौन सी पोस्‍टें चुनी गईं... इसी प्रकार चर्चाकार की दृष्टि भी स्‍वतंत्र है किंतु दूसरी ओर सरोकारों की एक स्‍वीकृत सामुदायिकता है। पिछले कुछ महीनों से मेरी, नीलिमा तथा सुजाता की   ब्‍लॉगिंग में सक्रियता कम हुई है पर कम से कम इतना प्रयास अवश्‍य करते हैं कि चर्चा अवश्‍य हो जाए भले ही संक्षिप्‍त रह जाए वैसे इसमें कितना योगदान हमारी प्रतिबद्धता है कितना अनूपजी के तकादों का, यह कहना कठिन है।

भविष्‍य की ओर घूरें तो मुझे लगता है कि जैसा कि इलाहाबाद में इरफान ने अपने परचे में कहा था...हम ब्‍लॉगर खुद ब्‍लॉगिंग पर लिखना बांचना पसंद करते हैं इससे तय है कि चर्चा की यात्रा अभी चलेगी...नए चर्चा मंच दिखाई दे रहे हैं...उनकी मौलिकता को लेकर कुछ संशय है पर ये संशय भी मिटेंगे...अपनी तो राय है मोर दि मेरियर।

Sunday, July 15, 2007

ब्‍लॉगिंग की सिद्धांत पुराणिका

कानपुर मीट में हुए मिलन का क्षेत्रफल फुरसतिया बता ही चुके हैं और दिल्‍ली के सम्मिलन की चर्चा भी शैलेश ने की, कुछ अन्‍य ने भी की। उस पर अधिक चर्चा की कम से कम अभी तो इच्‍छा नहीं...क्‍यों इसका भी काई जबाव नहीं।


आलोक पुराणिक ब्रह्मांड के सर्वश्रेष्ठ रचनाकार हैं (ये उनकी खुदकी घोषणा है खुद समझें), बहुत ही अच्‍छा व्‍यंग्‍य लिखते हैं और बहुत ही अच्‍छे आर्थिक चिंतक भी हैं। हमारी ही तरह अध्‍यापक हैं इसलिए जो सोचते हैं उसे छुपा पाने में असमर्थ रहते हैं- एकाध बार पहले भी मिलना हुआ है इस बार भी मिले। एक धराप्रवाह तरीके से कल उन्होनें ब्‍लॉगिंग की सैद्धांतिकी का स्‍पष्‍ट खाका सामने रखा। वैसे साफ बताएं तो इतनी स्‍प्‍ष्‍टता हमें भयभीत करती है, कारण यह कि दुनिया में उतना स्‍पष्‍ट अब कुछ भी नहीं है इसलिए जिस सिद्धांतकार को साफ दिखाई देता है उसे जाहिर है पूरी तरह सही तो नहीं ही दिखाई दे रहा होगा- पर सही गलत को जानें दें- ब्‍लॉगिंग की जो सैद्धांतिकी कल आलोक जी ने ओजस्‍वी तरीके से प्रस्‍तुत की वह हमें इतनी अहम जान पड़ती है कि हम उसके उस रूप को सामने रख रहे हैं जो हमें समझ आया- वैसे 'नथिंग आफिसियल एबाउट इट' - ये उनकी सैद्धांतिकी की हमारी समझ भर है।


शैलेशजी की रिपोर्टिंग से शुरू करें-



आलोक पुराणिक ने ब्लॉगिंग के पीछे छिपे मार्केट का कांसेप्ट रखा। उनके अनुसार दुनिया की हर चीज़ मार्केट का पार्ट है। कोई अपना नाम एनजीवो रख लेता है, कोई अपना नाम ट्रस्ट के रूप में तो कोई व्यवसायिक उपक्रम के रूप में अभिव्यक्त करता है लेकिन सभी का उद्देश्य इस मार्केट से कुछ न कुछ कमाना है। कोई आत्म संतुष्टि कमाता है, कोई धन, कोई ऐश्वर्य तो कोई अटेन्शन। हर कोई कुछ न कुछ इस मार्केट से कमा रहा है। मार्केट है तो एंटी-मार्केट का भी अपना मार्केट है। हर कोई अपने-अपने ब्लॉग की , अपने-अपने एग्रीगेटर की दुकान लगाकर बैठा है।


अब जाहिर है कि ब्लॉगिंग के बाजार होने को आलोकजी की मोलिक उद्भावना तो कहा नहीं जा सकता फिर इसमें खास क्‍या है, खास है बाजार की प्रवृत्तियों का ब्‍लॉगिंग के परिदृश्‍य पर सांगोपांग निरूपण। आलोक जी ने अनुसार जीवन के लगभग किसी भी पक्ष को बातार की शब्‍दावली से समझा जा सकता है बशर्ते हम 'दुकान' शब्‍द से अनावश्‍यक आहत न हों। ये ब्‍लॉगिंग का बाजार भी हम सभी की दुकानों का बाजार है जो दुकानदार अपने ग्राहक समुदाय की सुतुष्टि का माल प्रस्‍तुत कर पाता है वही बचा रह पाता है। और यह भी कि 'जिसकी दुकान उसका विधान' यानि अमित ने थ्रेड बंद क्‍यों किया नारद ने अमुक को क्‍यों हटाया क्‍यों पोस्‍ट देर से दिखी...सब वेबकूफी भरी बातें हैं- अरे भई उनकी दुकान उनकी मर्जी- किसी एकाधिकार में ये अधिक हो पाता है अब कुछ कम क्‍योंकि नए एग्रीगेटर आ गए हैं पर वे भी वही करेंगे उनकी दुकानदारी के लिहाज से जिसे दिखाना होगा वे दिखाएंगे जिसे नहीं वे नहीं दिखाएंगे- और आप भी अगर अपनी दुकान के लिए कहीं दिखना चाहते हैं जो जाहिर है आप धोंसपट्टी सहेंगे वरना नहीं। जै रामजी की। पर आलोकजी फिर इतना हल्‍ला बोल क्‍यों ? अफलातून, मसिजीवी, अविनाश ....क्‍यों चिंहुँकते हैं....इसलिए कि इस चिहुँक की भी मार्केट है। लोगों की इस चिहुँक और हाय हाय में भी रुचि है सिर्फ इसलिए। ब्रांड कंसोलिडेशन के लिए जरूरी है कि हर कोई अपनी दुकान के तेवर को बनाए और अपनी ग्राहकी के फोकस्‍ड समूह को बचाए सखे और जैसे तैसे इसे बढ़ाने की कोशिश करे।


और हॉं अगर किसी को ये गलतफहमी है कि वह किसी 'निस्‍वार्थ सेवा' के चलते कोई काम बाजार में करता है तो वह मूर्ख है..है तो रहे पर ये न समझे कि दूसरे भी मूर्ख हैं और वे इस निस्‍वार्थता के मोह में आपके ग्राहक बने रहेंगे- कल के तह करके रखते आज रख दें- बाजार में बचेगा तो वही जो बाजार के अनुरूप होगा।
और ये अलग बात है कि बाजार की सभी चीजों की अनिवार्यत: मोनेटरी वैल्‍यू नहीं होती। दुकान पर रखा हर सामान बिकाऊ नहीं होता- आपकी निस्‍वार्थ सेवा या तो आतमसंतुष्टि के लिए होती है या इस या उस भावना के लिए पर है आपे ही लिए। साधु नहीं तो घुमाकर पर ये आपका स्‍वार्थ ही है। इसलिए हमने रातें कालीं की या हमने बीस दिन में तैयार कर सामने रख दिया ये सब न गिनाएं देखा तो ये ही जाएगा कि कुल मिलाकर प्रोडक्‍ट या सर्विस कैसी दे रहे हैं। जो ट्रस्‍ट या एन.जी.ओ. वाले घोषणा करते हैं कि लाभ के लिए नहीं है तो लाभ ऐसा नहीं तो वैसा होगा। आल नहीं तो दस साल बाद होगा।


पर घुघुती का क्या करें जिन्‍हें तकलीफ है कि नारद के, परिचर्चा के इस व्‍यवहार से, जो किसी गला काट में शामिल नहीं होना चाहतीं- भई ये तो उनकी परेशानी है जिससे हमें तकलीफ हो सकती है पर इस वजह से बाजार अपना रुख नहीं बदलेगा- मतलब बाजार नाम सत्‍य है- ये अटेंशन, धन, प्रभाव, सम्‍मान भले ही किसी मुद्रा में धंधा करे पर है धंधा ही।


अलोक पुराणिकजी की ब्‍लॉग सैद्धांतिकी के कुछ पक्ष हो सकता है छूट भी गए हों- पर मूल बात इसी के आस पास थी।


अब सवाल ये कि ये तो आलोकजी के विचार हुए आप कितना सहमत हैं- भई हम तो भूपेन के आस पास थे, आलोकजी की सैद्धांतिकी से सहमति है पर पूरी तरह तो हम खुद से भी सहमत नहीं होते (प्रमोदजी से उधारी ली हुईग्‍ अभिव्‍यक्ति) तो आलोकजी से क्‍या खाक होंगे पर ये खूब मजेदार रहा कि समाजवादियों का लोकतंत्र के लिए संघर्ष तक यहॉं एक उत्‍पाद बन गया....जय गूगल...जय ब्‍लॉगर....जय अलोक पुराणिक।