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Tuesday, February 16, 2016

रकीब के पक्ष में तैनाती: महबूब जो न करा दे सो कम

वक़्त कैसे कैसे दिन दिखाता है, किसे पता था कि जिस जेएनयू को सदा रकीबी नज़र से देखा, हर जेएनयू वाले को जब मौका मिला याद दिलाया कि लाख अच्छा हो पर जेएनयू इस शहर के साथ अपने व्यवहार में टापूवादी है। उसी जेएनयू के पक्ष में दम लगाउंगा। मेरे विद्यार्थी कन्फ्यूज़ न हो जाएं इसलिए इस रकीब पर उमड़ते प्यार की सफाई दी जाए। 
मेरा प्यार अपनी इस जान दिल्ली शहर से है सो है उससे कोई बेवफाई नहीं। जेएनयू में टापू रहकर बनने की एक बीमारी रही है माने शहर के दुःख दर्द में फिलॉन्थ्रोपी टाइप या मुद्दे के समर्थन में जेएनयू कैम्पस से शहर की ओर निकलता है कभी कभी पर वो अपनी पहचान को शहर से एकात्म नहीं करता, जैसे चांदनी चौक करता है, मेरा दिल्ली कॉलेज (ज़ाकिर हुसैन) या दिल्ली विश्वविद्यालय करता है। जेएनयू मुनीरका भर को अपनी पहचान में जुड़ने दे तो दे वर्ना वो एक टापू होना ज्यादा पसंद करता है। 
ये न समझें कि इस बेरुखी का मतलब है कि दिल्ली भी उसे तन्हा छोड़ देती है, न जी मेरी महबूबा इस जेएनयू को न केवल भरपूर तवज्जो देती है बल्कि दरअसल उस पर जान छिड़कती है। (तो महबूबा के आशिक़ होने की वजह से जेएनयू हुआ न रकीब) इस तरह यह शहर इस टापू को अपनी पहचान में बाकायदा शामिल मानता है और सच्चाई तो यह है कि जेएनयू को जेएनयू होने, बने रहने देने में इसके दिल्ली में होने की बड़ी भूमिका है और अब यह दिल्ली के लिए भी एक परीक्षा की घडी है कि उसकी इस पहचान पर जो संकट है, उसे यह सहारा दे। चाहे खुद जेएनयू में कितनी ही बेमुरव्वती क्यों न दिखाई हो लेकिन ये दिल्ली की अपनी ग़रज़ है कि वह कुक्कुटों को इस खूबसूरत चमन को बर्बाद न करने दे। 
तो मैं जेएनयू के लिए उतना नहीं अपने महबूब दिल्ली शहर के लिए ज्यादा इस बेचैनी में हूँ। 
लेकिन अब एक सवाल उनके भी लिए जिनका जेएनयू से रकीब का नहीं महबूबा का रिश्ता है, सोचो दोस्तो अगर ऑक्सफ़ोर्ड या कैंब्रिज पर यह हमला होते तो उनके शहर अपने विश्वविद्यालय को तन्हा छोड़ देते क्या? आपने अपने पूरे देश समाज से प्यार किया है लेकिन खुद दिल्ली शहर से वो नाता नहीं बनाया। जब इससे भी ज्यादा नृशंस ताकतों ने दिल्ली कॉलेज को बंद कर दिया था तो यह शहर पूरी ताकत से इसके पक्ष में आ खड़ा हुआ था, दिल्ली की मोहब्बत जेएनयू पर बरकरार है पर इकतरफा मोहब्बत ज्यादा इम्तिहान लेती है, इस शहर की मोहब्बत को लौटाने की जिम्मेदारी लो जेएनयू वालों।

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Wednesday, January 07, 2009

खानपान का देहलवी अंदाज : चाचे दी हट्टी

आइए एक तस्वीर से बात शुरू करें-

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इस तस्‍वीर को देखकर लाजिमी तौर लगेगा कि कोई किरासिन का डिपो है या ज्ञानदत्‍तजी के ब्‍लॉग पर टिप्‍पणीकार अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं पर नहीं दरअसल ये पूरी तस्‍वीर कुछ ऐसे है-

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एक अन्‍य कोण से ये कुछ यूँ दिखती है

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जी दो दो कतारें, पुरुषों के लिए अलग तथा स्त्रियों के लिए अलग। जैसे कि आप अनुमान कर चुके होंगे हम दिल्‍ली की खानपान को लेकर दीवानगी का एक प्रमाण पेश कर रहे हैं। ये छोटी सी लेकिन बहुत जानी मानी दुकान है- चाचे दी हट्टी:

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चाचे दी हट्टी उत्‍तरी दिल्‍ली के व्‍यावसायिक केंद्र कमला नगर में बँग्लो रोड पर है, किरोडीमल कॉलेज के पीछे। वर्षों से दिल्‍ली भर के ग्राहक इस दुकान पर सुबह 10 से लगभग 3 बजे तक लाइन लगाते हैं ताकि वे आलूवाले या सादा भटूरों का मजा ले सकें पिंडी छोलों के साथ। उसके बाद दुकान बंद  तथा रविवार को पूरे दिन की छुट्टी। ठेठ ठसक की दुकानदारी....है कि नहीं।

जैसाकि आप दुकान के आकार से अनुमान लगा सकते हैं ये बेहद छोटी सी दुकान है बमुश्किल सत्‍तर वर्ग फुट की। जिसमें जैसे तैसे कड़ाहा रखकर भटूरे तलने तथा छोले के साथ परोसने वालों के लिए खड़े होने भर की जगह है। लेकिन दिल्‍ली भर इस स्‍वाद की दीवानी है। विश्‍वविद्यालय के छात्र छात्राओं के लिए ये दशकों से मिलने-जुलने व खानपान की जगह बनी हुई है।

अगर दिल्‍ली के स्‍वाद ग्रंथि के इतिहास पर नजर डालें तो दो महत्‍वपूर्ण पड़ाव सहज ही दिखाई पड़ते हैं एक है मुगल चरण, जो पुरानी दिल्‍ली में केंद्रित है- तंदूरी मुर्ग, बटर चिकन, दाल मक्‍खनी, पुरानी दिल्‍ली की चाट आदि वे व्‍यंजन हैं जो इस चरण की देन हैं। दूसरा सोपान है विभाजन के कारण बड़े पैमाने पर विस्‍थापित पंजाबियों के दिल्‍ली आने और दिल्‍ली के अपने दिल व द्वारों को इन पंजाबियों के लिए खोल देने का चरण। इन शरणार्थियों में से अनेक ने खोमचा खानपान का धंधा अपनाया छोले भटूरे इसी कोटि का एक बेहद लोकप्रिय व्‍यंजन सिद्ध हुआ है। चाचे दी हट्टी इसी परंपरा से है।

ऊपर व्‍यक्‍त इतिहास बेहद सरलीकृत है तथा यहॉं उद्देश्‍य दिल्‍ली व पंजाब विशेषकर लाहौर के पहले से विद्यमान संबंधों की उपेक्षा करना कतई नहीं है। दूसरी ओर जब दिल्‍ली की इस शानदार संस्कृति पर विचार करते हैं कि बाहरी प्रभावों को लेकर ये शहर कितना स्‍वागत का रवैया अपनाता है तो आप निश्चित तौर पर गर्व महसूस करते हैं। भाषा, जायका, पहनावा, अंदाज सभी को लेकर एक देहलवी लोच।

आपको इस जायके को खुद महसूस करने के लिए दिल्‍ली सदैव ही आपको आमंत्रित करती है। आलूवाले अठारह रुपए, सादा सोलह रुपए।

Thursday, December 25, 2008

समय से लड़ती घंटाघर की सुइयों के पक्ष में

किसी बुजुर्ग से बात करें या तीस चालीस साल पुराने किसी शहरी उपन्‍यास को पढ़ें, आपको घंटाघर का जिक्र अवश्‍य मिलेगा।  घंटाघर लगभग हर शहर का महत्‍वपूर्ण निशान (लैंडमार्क) हुआ करता था।  सामान्‍यत यह टाउनहॉल की इमारत में होता है तथा इस तरह इसे शहर के बीचोंबीच माना जाता था इसका समय शहर का मानक समय होता था। घडि़यॉं कम घरों में होती थीं तथा कलाई घड़ी एक महँगी चीज थी। पूरा शहर घंटाघर से अपनी घड़ी को मिलाया करता था।  लेकिन समय से अधिक घंटाघर अपने वास्‍तु व शहरी संस्‍कृति का केंद्र होने के कारण अहम थे। यही वजह है कि शहर का हर प्रमुख संस्‍थान अपने स्‍तंभ में घड़ी लगाकर घंटाघर बन जाने की अपनी महत्‍वकांक्षा रखता था। 

फिर देसी विदेशी घड़‍ियों की क्रांति हुई, इतना अधिक कि अब हमारे शहर में तो घड़ी किलो के हिसाब से मिलती हैं। ऐसे में कम से कम समय देखने के उपकरण के लिहाज से घंटाघर का कोई महत्‍व नहीं ही रह जाएगा। ज्ञानदत्‍तजी ने तो घोषित किया ही कि खुद हाथ घडी रिनंडेंट हो गई है। ऐसे में भला शहर भर की घडी की कौन कहे। लेकिन प्रकार्यात्मकता (फंक्‍शैनिलिटी) से परे भी इन घंटाघरों का एक महत्‍व हो सकता है ये याद के मूर्तिमान रूप हैं। कितनी ही यादें इन घंटाघरों से जुड़ी होती है इसलिए भी अरसे तक ये सबसे अहम लैंडमार्क रहे। विदेशों में तो इनकी कलात्‍मकता के ही कारण इन्‍हें सहेजने पर बल रहता है। हमारे शहर के घंटाघरों की बात करें तो टाउनहाल, फतेहपुरी, हरिनगर, मूलचंद, एसआरसीसी आदि कई महत्‍वपूर्ण घंटाघर देखे हैं दिल्‍ली में। जैसे कि  अँधेरे में लिपटा ये मूलचंद अस्‍पताल का घंटाघर जिसे संयोग ठीक तीन साल पहले भी पोस्‍ट किया गया था

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लेकिन घंटाघर नाम से प्रसिद्ध जगह वह है जो जाहिर है घंटाघर कहलाती है। बिरला मिल्‍स के पास। अंग्रेजो के समय यह गैर यूरोपीय पॉश दिल्‍ली के केंद्र में था। हाल में इस घंटाघर का जीर्णोद्धार किया गया है। कम शाम ये ऐसा दिख रहा था।

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Monday, November 17, 2008

(मत) मुस्‍कराएं कि आप कैमरा पर हैं

गनीमत है कि हम भारतीय सार्वजनिक साईनबोर्डों को बहुत गंभीरता से नहीं लेते वरना कम से कम दिल्‍ली के नागरिकों की मुँह की पसलियों का चटकना तो  तय है, हर माल, सड़क, स्‍टेशन, मैट्रो, चौराहे, दफ्तर, स्‍कूल, कॉलेज, होटल-रेस्त्रां में एक कैमरा हम पर चोर नजर रख रहा होता है। अक्‍सर एक साइनबोर्ड भी लगा होता है कि मुस्‍कराएं, आप कैमरा पर हैं। मैं तो बहुत प्रसन्‍न हुआ जब मैंने सुना कि शीला दीक्षितजी ने कहा है कि जल्‍द ही पूरी दिल्‍ली को वाई-फाई बनाया जा रहा है...बाद में पता चला कि इसका उद्देश्‍य सस्‍ता, सुदर टिकाऊ इंटरनेट प्रदान कराना उतना नहीं है जितना यह कि वाई फाई के बाद सर्वेलेंस कैमरे लगाना आसान हो जाएगा..जहॉं चाहो एक कैमरा टांक दो...बाकी तो वाईफाई नेटवर्क से डाटा पहुँच जाएगा जहॉं चाहिए।

image दुनिया के अन्‍य लोकतंत्रों में भी जहॉं निजता की रक्षा के कानून खासे सख्‍त हैं, वहाँ सर्वेलेंस कैमरों की अति से लोग आजिज हैं। वैसे जाहिर है कैमरे केवल मूर्त प्रतीक भर हैं, सच तो यह है कि हम बहुत तेज गति से एक सर्वेलेंस समाज (हिन्‍दी में इसके लिए क्‍या शब्‍द कहें? अभी नहीं सूझ रहा) में बदलते जा रहे हैं। सावधान कि हम पर नजर रखी जा रही है। कहीं सुरक्षा की जरूरतों के चलते हमारे सार्वजनिक स्‍पेस का चप्‍पा-चप्‍‍पा  इन कैमरों के जद में आ गया है। वहीं कहीं सुविधा, आईटी आदि के नाम पर भी हमारे निजत्‍‍व पर खतरा बढ़ रहा है। कालेज के हमारे परिसर में कईयों कैमरे लगे हैं इसी तरह मैंने ध्‍यान दिया कि मेरे विश्‍वविद्यालय की वेबसाईट पर सैकडों स्‍त्री- पुरुषों के नाम पते व शिक्षा आदि के ऑंकडे डाल दिए गए हैं, लिंक जानबूझकर नहीं दे रहा हूँ ताकि निजता के इस उल्‍लंघन में मेरी हिस्‍सेदारी न हो। 

अधिकांश आधुनिक समाज इन कैमरों को इस तर्क से सह लेते हैं कि सुरक्षा के लिए नेसेसरी-ईविल हैं, या ये भी कि इनसे अपराधी डरें हम क्‍यों। किंतु अनेक शोध बताते हैं  कि एक सर्वेलेंस समाज स्वाभाविक समाज नहीं होता, जब हमें पता होता है कि हम पर निगाह रखी जा रही है तो हम अधिक तनाव में होते हैं तथा अपने व्‍यवहार को निगाह रखने वाले की अपेक्षा के अनुरूप बनाने का प्रयास करते हैं जो अक्‍सर कृत्रिम होता है। मेरे कॉलेज के युवा छात्र अब चिल्‍लाकर, अट्टहास करते हुए गले मिलते नहीं दिखाई देते या बहुत कम दिखाई देते हैं...ये नहीं कि ये किसी कानून के खिलाफ है पर वे जानते हैं कि उन्‍हें देखा जा रहा हो सकता है...इसी प्रकार दिल्‍ली मैट्रो में दिल्‍लीवासियों के जिस व्‍यवहार की बहुत तारीफ होती है उसके पीछे भी कैमरों की अहम भूमिका है, किंतु आम शहरी हर जगह खुद को 'सिद्ध' करता हुआ घूमे तो कोई खुश होने की बात तो नहीं।

खैर चलूँ कालेज का समय हो रहा है, अगर गिनूं तो मैं घर से कॉलेज तक कम से कम 40 कैमरे मैट्रो के 8 कॉलेज के फिर 3-4 सड़क पर और वापसी में भी इतने ही कैमरे...जहन्‍नुम में जाएं सब, हम नहीं मुस्‍कराते भले ही हम कैमरे पर हों।

Friday, December 28, 2007

जमीन के नीचे से केबलचोरी के हुनर का निजीकरण

कम्यूनिस्‍ट नहीं हैं, इस विचारधारा का घणा विरोध किया है इतना कि कई बार तो लोग सिर्फ इस विरोध की बुनियाद पर मानते रहे हैं कि जरूर 'संघी' ही होउंगा। वो भी नहीं हूँ। ये अकेला अंतर्विरोध नहीं है व्‍यक्तित्‍व में अपने और भी ढेरों हैं। दरअसल इस लिहाज से देखा जाए तो सिर्फ ब्‍लागिंग ही एकमात्र जगह हे ज‍हॉं हमारी निभ रही है वरना हर खांचा एक या दूसरी किस‍म की कैडरबद्धता की मांग करता है। ब्‍लॉगिंग में इसलिए चल जाता है कि यहॉं कोई आपसे अंतर्विरोधों से मुक्‍त होने की शर्त नहीं रखता। जिसे अतर्विरोधों से मुक्‍त लोग मिलें वह उनके साथ मिलकर एक अंतर्विरोधों से मुक्‍त दुनिया बसा ले। हमारी सच्‍चाई ये है कि कम्‍यूनिज्‍म का विरोध करते थे पर प्राइवेट की जगह डीटीसी में बैठना पसंद करते थे, पैसा जाए तो सरकारी क्षेत्र में जाए। अब तक लगातार एमटीएनएल का ही फोन लेते रहे हैं जबकि लोग खूब भरमाते रहे हैं कि सरकारी कंपनी है दो धेले की सर्विस नहीं है, लाइनमैन बिना टाई के है वगैरह। एयरटेल की लाइने लैंडलाइन के लिए बिछाई गईं पर हम नहीं माने।

पिछले दिनों एक गड़बड़ हुई, बीस तारीख की बात है, रात को पोस्‍ट  लिखी की सुबह पब्लिश की जाएगी...सुबह देखा तो हो नहीं रही थी। गौर किया तो पाया कि फोन 'डैड' है। 'मौत की घंटी' होती है यहॉं 'घंटी की मौत' हो गई। खैर दो बातों का आसरा था, एक तो ये कि अब जिंदगी फोन पर उतनी नहीं टिकी नहीं होती मतलब लैंडलाइन पर। दोनों वयस्क सदस्यों यानि हम और वे, के पास अपना अपना मोबाइल हैं तो चल जाएगा काम - शाम तक तो ठीक हो ही जाना चाहिए (इधर एमटीएनएल की सेवा काफी सुधरी है, फाल्‍ट रिपेयर के मामले में तो जरूर ही...ऐसा हमें लगने लगा था) सो मोबाइल से शिकायत दर्ज कराई, शिकायत संख्‍या लिखी और इंतजार करने लगे। मिनट बीते, घंटे बीते होते होते दिन बीत गया। अगले दिन भी कोई घंटी नहीं बजी, इंटरनेट नहीं...अब दिक्‍कत होने लगी। तो निकले कि दरियाफ्त्‍ा करें कि पचड़ा क्‍या हे भई। अभी सोसाइटी के गेट पर ही थे कि गार्ड से समाचार मिला कि पूरे सेक्‍टर के फोन बंद हैं- केबल चोरी हो गई है। 

मुझे दो चोरियॉं बहुत ही हैरान करती रही है और ये दिल्‍ली के सरकारी तंत्र की मोस्‍ट अमेजिंग कटैगरी की चोरी हैं- एक तो है अस्‍पताल से 'एक्स-रे' चोरी होना दूसरा है जमीन के नीचे से टेलीफोन के केबल चोरी होना।STREET1 क्या बात है...चोर भी कमाल के- मरीज रपट का इंतजार कर रहा है और साहब उसका एक्सरे ही ले उड़े क्‍यों... बताते हैं कि रासायनिक क्रिया से उस फिल्‍म से कुछ काम की धातुण्‍ निकलती हैं। और दूसरा रहा कि और भी मजेदार जमीन को खोदकर केबल को काटकर चोरी करने वाला चोर। कंबख्‍त को पता है कि कहॉं खोदने से सीवर का पाइप नहीं केबल निकलेगी और इतनी देर तक एन सड़क पर अगले खुदाई करेंगे तार निकालेंगे ये भी सिर्फ उससे निकलने वाले तांबे औ रांगे जैसे पदार्थों के लिए। बड़े जुगाड़ु और मेहनती चोर हैं भई।  

यह समझने के लिए आपको कोई शरलॉक होम्‍स होना जरूरी नहीं हे कि ये दोनों ही चोरियॉं कर्मचारियों की मिली भगत से ही हो पाती हैं। इनसे चोर का फायदा तो बहुत कम ही होता है पर सरकार और आम व्‍यक्ति (मरीज या फोन उपभोक्‍ता की असुविधा के रूप में)  का नुक्‍सान बहुत अधिक होता है।

हम रोजाना कई कई बार पता कर रहे थे हर बार बताया गया कि दिन रात काम जारी है, 3-4 दिन लगेंगे। सिफी के परचे घर घर पहुँचने लगे थे, कि उनका इंटरनेट कनेक्शन लो, अंतत: हम खुद उस खुदी साईट पर पहुँचे कि भैया बताओ इरादा क्‍या है। 7-8 मजदूर कड़कड़ाती ठंड में लगे हुए थे, लाइनमैन व सुपरवाइजर भी थे मैंने लाइनमैन से पूछा तो उसने बिना लाब लपेट के बताया जी ये प्राइवेट कंपनी (एयरटेल) आ गई है उसकी ही कारस्‍तानी है। ठेकेदार को खरीद लिया है कि हमारे केबल काटे ताकि लोगों को गुस्‍सा आए वे फोन कपनी बदल लें। 'साब ये कंपनियॉं बरबाद करने पर उतारू हैं' वैसे इस नए बदलते केबल से निकल स्‍क्रेप को ये मजदूर वहीं एक कबाड़ी को बेच रहे थे।

उफ्फ अंतर्विरोध पीछा नहीं छोड़ते, घोषणा ये कि बाजार में प्रतियोगिता होती है जो खुद ही उपभोक्‍ता को लाभ देती है पर बाजार में कोई नैतिकता नहीं...। निजी क्षेत्र लाभ के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के विकारों को हथिया लेता है। हममें से राष्‍ट्रवाद का कीड़ा पूरी तरह से निकलने को तैयार नहीं इसलिए परेशानी सहकर भी सार्वजनिक क्षेत्र से सद्भाव मिटता नहीं। क्‍या करें...कया बनें कुछ्छे नहीं बूझता। और हॉं हम एक आरटीआई जरूरै फाइल करेंगे (एमटीएनएल सरकारी है वहीं इस तरह सूचना मांगी जा सकती है प्राइवेट में नहीं)

Wednesday, August 01, 2007

बिना मुर्ग के सेहराबंदी- ऐ वी कोई गल ओई

सिख दिल्‍ली में एक खाती-पीती प्रभावशाली कौम है और यूँ भी सिख बिरादरी टेंशन न लेने वाली बिरादरी है। खूब मेहनत करते हैं कमाते हैं और शान से जीना पसंद करते हैं। शान से जीने का मतलब ही है अच्‍छा पहना, अच्‍छा खाना, अच्‍छा पीना। अब हाल में दिल्‍ली सिख गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी के निर्देश जारी हुए हैं जिसके तहत सिख समुदाय को विवाह गुरूद्वारों में ही करने होंगे तथा शाम को होने वाले विवाह समारोहों पर कड़े प्रतिबंध लागू किए गए हैं- न तो मांसाहारी भोजन न ही शराब। लो कल्‍लो बात... ये भी भला क्‍या सिख शादी।।

कारण यह बताया जा रहा है कि ऐसा करने शादियों को कम खर्चीला बनाया जा सकेगा जिससे कन्‍या भ्रूण हत्‍या तथा औरतों पर हो रहे अत्‍याचारों को कम किया जा सकेगा।
अब ये इतने 'पवित्र' उद्देश्‍य हैं कि लगता है कि वाह धर्म तो समाज सुधार की महत भूमिका में आ गया है, कितनी अच्‍छी बात है। अब कैसे कोई खिलाफ बोले पर हमें फिर भी बात कुछ जम नहीं रही, कुछ वर्ष पहले ऐसा ही फरमान जम्‍मू कश्‍मीर में सरकार की तरफ से भी जारी किया गया था। भले ही हम इसके उद्देश्‍यों को इतना बुरा नहीं मानते और हमें ये भी लगता है कि फिजूलखर्च विवाहों को थामा जाना चाहिए पर धर्म या राज्‍यों की इसमें क्‍या भूमिका होनी चाहिए ?



राज्‍य या धर्म जब ऐसी नियामक भूमिकाओं में आने लगें कि वे अपने धर्मावलंबियों की जीवन शैलियों को नियंत्रित करने लगें तो ये आधुनिक समाजों के लिए हितकर बात नहीं है- वैसे यह सिर्फ आधुनिक समाजों के ही लिए कहा जा रहा है वरना मध्‍ययुगीन समाज में तो जीवन का प्रत्‍येक पक्ष ही धर्म ही नियंत्रित करता था। पर आधुनिक समाजों को ये नियंत्रण व्‍यक्ति के ही हाथ में रहने देने चाहिए हॉं कभी कभी राज्‍य को ये नियंत्रण हस्‍तगत करने पड़ सकते हैं पर राज्‍य एक प्रक्रिया से वैधता हासिल करता है किंतु धर्म इस मामले में एक गैर जबावदेह संस्‍था है इसलिए भले शुभेच्‍‍छा से ही सही, उसे ऐसा करने से परहेज करना चाहिए। और तनिक इस बात पर भी विचार करें कि सिख शादी अगर बोटी-बोतल के बिना होगी तो क्‍या खाक होगी। अगर कुछ प्रतिबंध जरूरी ही था तो कह देते कि सिख शादी वधु के बिना होगी - फिर भी चल जाता- पर अच्‍छा खाना न हो, पीण वास्‍ते कुछ न हो- ऐ वी कोई गल ओई।




Saturday, July 21, 2007

दिल्‍ली शहर के लाईट हाऊस यानि पुस्तकालय

कल काकेश जी ने एक पत्र भेजकर जानना कि हिंदी किताबों के लिए कुछ अड्डे बताएं इस शहर के। हमने किताबों की एकाध दुकान का पता भेजा और वायदा किया कि पुस्‍तकालयों को लेकर एक पोस्‍ट लिखी जाएगी। दिल्‍ली में ऐसी पुस्‍तकालय व वाचनालय परंपरा विद्यमान नहीं है जिस पर गर्व किया जा सके पर फिर भी कम से कम कुछ पुस्‍तकालय हैं जिनका उल्‍लेख आवश्‍यक है। वैसे सबसे महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकालय संस्‍थाई पुस्‍तकालय हैं मसलन जवाहरलाल नेहरूविश्‍वविद्यालय, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के दोनों परिसरों के पुस्‍तकालय तथा स्‍टीफेंस, हिंदू व अन्‍य कॉलेजों के पुस्‍तकालय, केंद्रीय सचिवालय की तुलसी सदन का पुस्‍तकालय पर स्‍पष्‍ट है कि इन पुस्‍तकालयों का चरित्र सीमित पहुँच के पुस्‍तकालय हैं क्‍योंकि आप सहजता से इन तक पहुँचकर संदर्भनहींले सकते, पुस्‍तकें पढ़ने के लिए घर ले जानेकी भी सुविधा बाहरी पाठकों के लिए नहीं है।

अत: सार्वजनिक पुस्‍तकालय ही आम शहरी के लिए सर्वश्रेष्‍ठ विकल्‍प हैं और जाहिर है दिल्‍ली में सार्वजनिक पुस्‍तकालय का मतलब है- दिल्‍ली पब्लि‍क लाइब्रेरी। पुरानी दिल्‍ली रेलवे स्‍टेशन के सामने श्‍‍यामा प्रसाद मुखर्जी मार्ग पर स्थित ये पुस्‍तकालय इस मुख्‍‍य पुस्तकालय के अतिरिक्‍त अलग अलग कॉलोनियों में शाखाएं भी संचालित करता है।
इस पुस्‍तकालय की खास बात यह है कि यहॉं दिल्‍ली के अन्‍य पुस्‍तकालयों के विरीत हिंदी के प्रति एक खास लगाव देखने को मिलता है पर ये भी सच है कि अब ये पुस्‍तकालय खस्‍ताहाल स्थिति में है वैसे ये पूरी तरह निशुल्‍क पुस्‍तकालय है जहॉं दो रूपए में बने कार्ड से आप तीन किताबे तक घर ले जाकर पढ़ सकते हैं। सरकार की घोर उपेक्षा ने इस कभी बेहद संपन्‍न रहे पुस्‍तकालय का लगभग पूरी तरह ही नाश कर दिया है। उल्‍लेखनीय कि नियमत: हर प्रकाशित पुस्‍तक की एक प्रति इस पुस्‍तकालय व कोलकाता के राष्‍ट्रीय पुस्‍तकालय को भेजा जाना कानूनन अनिवार्य है पर पता नहीं इस कानून का कितना पालन होता है। इसी मुख्‍य पुस्‍तकालय के पीछे हरदयाल म्‍यूनिसिपल पुस्‍तकालय भी है हरदयाल पुस्‍तकालय की भी कई शाखाएं शहर में हैं, खासतौर पर दरियागंज व दीनदयाल मार्ग (आई टी ओ) की शाखा का उल्‍लेख किया जा सकता है।

इंटरनेट पर उपलब्‍ध दिल्‍ली के पुस्‍तकालयों के इस मानचित्र से दिल्‍ली के प्रमुख पुस्‍तकालयों का पता चलता है।


अगर आप साहित्‍य के कीड़े है या कला के प्रेमी तो दिल्‍ली के पुस्‍तकालयों की चर्चा बिना साहित्‍य अकादमी के उल्‍लेख के पूरी नहीं हो सकती। रवीन्‍द्र भवन मंडी हाऊस पर स्थित साहित्‍य अकादमी के पुस्‍तकालय में केवल हिंदी या अंग्रेजी ही नहीं वरन सभी भारतीय भाषाओं के साहित्‍य की पुस्‍तकें मिल जाती हैं खास बात यहॉं की वातानुकूलित व सुविधाजनक डिस्‍प्‍ले व वाचनालय सुविधा हैं। यहॉं के पुस्‍तकालय की कैटलागिंग व सूचना प्रबंधन काफी विश्‍वसनीय है। यदि आप नॉन देसी टाईप है तो आपको ब्रिटिश काउंसिल व अमरीकी व रूसी कल्‍चर हाऊस अथवा मैक्‍सम्‍यूलर हाडफस के पुस्‍तकालयों में रूचि हो सकती है ये सभी पुस्‍तकालय कनॉट प्‍लेस के इलाके में हैं। विश्‍वविद्यालय प्रणाली से बाहर दिल्‍ली का सबसे संपन्‍न पुस्‍तकालय तीनमूर्ति स्थित नेहरू मैमोरियल पुस्‍तकालय है जहॉं आप काफी विद्वान लोगों के सानिध्‍य में अध्‍ययन करने का गौरव पा सकते हैं। इसी प्रकार इतिहास के गीकों के अध्‍ययन का आनंद राष्‍ट्रीय अभिलेखागार (नेशनल आर्काइव्‍स) के पुस्‍तकालय में मिल सकता है, पुरातत्‍व विभाग का पुस्‍तकालय भी यहीं है।

तो कुल मिलाकर जहॉं उच्‍च स्‍तर के पुस्‍तकालयों की दिल्‍ली में भरमार हैं वहीं आम रुचि के लोगों के लिए पुस्‍तकालय सुविधाओं में बहुत सुधार की गुंजाइश है।

चित्र CCS की रपट से कीर्ति से साभार


Friday, July 13, 2007

दिल्‍ली में बेतकल्‍लुफी के कुछ अड्डे

जब हम कानपुर गए तो हमने अपनी शिकायत ब्‍लॉग पर दर्ज की कि समय की कमी कहो या जो कुछ पर हमें शहर के वो अड्डे नहीं मिल पाए जिनमें हमारी खास रुचि रही है। ये अड्डे किसी भी शहर को उसका असली मिजाज दे पाते हैं और शहरवासियों को उनकी स्मृतियॉं। स्‍मृति भी दरअसल एक टाईम-स्‍पेस प्रकार्य (फंक्शन) ही है इसलिए जब कोई स्‍पेस उससे जुड़ जाता है तो वह शब्‍दों में व्‍यक्‍त हो पाने की अहर्ता प्राप्‍त करती है। हम हिंदी चिट्ठाकारों में उस छोटे से क्‍लब से जो अपने साथ कोई कस्‍बाई, ग्रामीण, आंचलिक अतीत नहीं समेटे हैं अत: हमारी गोद में कोई अमराई यादों की प्रत्‍यक्षाई पोटली नहीं बंधी है पर फिर भी न तो इसका कोई अफसोस महसूस होता है न ही भाषाई या अनुभव के मामले में वंचित होने का ऐसा गहरा अभास ही हमें होता है। मेरे या मुझ जैसे एक ठेठ दिल्‍लीवाले के पास अनामदास, प्रियंकर, प्रमोद से शायद एक बड़ी थैली भर कम शब्‍द होंगे पर उनका दोष मेरा शहराती अनुभव नहीं वरन कमजोर अवलोकन रहा होगा। वरना इस शहर की फिज़ा में शब्‍द बोलियॉं तो कम न थीं न ही हम किसी एमबीए की गर्दनतोड़ तैयारी में जुटे की ध्‍यान न दे सके...पर कुल मिलाकर बात ये कि इस शहर दिल्‍ली में केवल डेंगू के मच्छर ही अपने पनपने के लिए टायर और प्‍लास्टिक के डब्‍बे नहीं ढूंढ लेते है वरन भाषा, यारबाशी, निठल्‍लई, मुबाहिसे के लार्वा पनपने की गुजाईश भी इस शहर में है और जम के हैं- हर किस्‍म के हैं। प्रेस क्लब, मंडी हाउस, आई आई सी किस्‍म के पूरी तरह संस्‍थाई अड्डे तो खैर हैं ही पर शहर तो बसता है इसके बाशिंदों के हाथों जमे नुक्‍कड़ वाले अड्डों में।

इन्‍हीं टूरिस्‍ट गाइडों में दर्ज न होने वाले कितने ही अड्डों पर हमने टनों वकत बिताया है। भड़ास निकाली हैं और अपने ही 'दूर की सोची' टाईप विचारों पर खुद ही मुग्‍ध हुए हैं। हैरान हुए हैं कि कमाल है दिल्‍ली की लड़केयॉं अगर इन अड्डों से नदारद हैं तो वे भला क्‍या खाक जिंदगी जी रही है। अपने जनसत्‍ताई लेखों के पहले ड्राफ्ट का सस्‍वर पाठ करते हुए दोस्‍तों को सुना सुनाया है।

 



संस्‍थाई अड्डे की बात करें तो मोहन सिंह प्‍लेस के काफी हाऊस को लें- दिल्‍ली में एक फक्‍कड़ खुशनुमा शाम बिताने के लिए ये शानदार जगह है। रिवोली के पीछे स्थित मोहन सिंह प्‍लेस अपनी अंधियारी दुकानों के लिए जाना जाता है जहॉं आप एक सस्‍ती जींस सिलवा सकते हैं- अपनी पसंद से। इसी इमारत की चौथी मंजिल के टेरेस पर हैं- इंडियन कॉफी हाऊस। शाम को यहॉं बरसों से बैठकबाजी होती रही है। अकसर गर्म बहसों में काफी ठंडी होने के नजारे यहॉं दिखते रहे हैं। कभी आइए...

 

Monday, June 25, 2007

गोलचा के फुटपाथ पर संडे के संडे

आज का जनसत्‍ता पढ़ा क्‍या- अगर नहीं तो आपसे अनुरोध है कि रहने ही दें अगर पढ़ा तो आप जान गए होंगे कि हम तिलमिलाए हुए हैं, और इस कदर तिलमिलाए हैं कि बिना संजयजी द्वारा दी गई किसी सफाई के ही हमें बोध हो गया है कि उन्‍हें अविनाश....वगैरह से क्‍या दिक्‍कत रही होगी- मामला कट्टरता या धर्म का नहीं 'जगह' का है भई। अशोक वाजपेई (अगर आप जानते हैं कि वे कौन हैं तो आप जानते ही हैं नहीं जानते तो ये सिर्फ उनका दुर्भाग्‍य है आपका नहीं- उन्‍हें जाने बिना जिंदगी खूब चल सकती है) हॉं तो अशोक वाजपेई ने आज दिल्‍ली को बेशऊर लोगों का शहर कहा है। अपने स्‍तंभ ‘कभी कभार’ में अभद्र राजधानी शीर्षक से लिखते हुए उन्‍होंने यातायात में उनकी गाड़ी की बगल में अपना दुपहिया लगा देने के लिए, क्‍लबों में शराब ठीक से न पीने, पीकर तेज बोलने वगैरह वगैरह को राजधानी के अभद्र होने का प्रमाण माना है- अब अगर राहुल या भड़ासी तरीके से जबाव दें तब तो उनका आरोप सिद्ध माना जाएगा इसलिए दूसरे तरीके से कहा जाएगा। पर हॉं, चूंकि संजय/पंकज जी के मामले भी यही होता रहा कि इस-उस की करतूत के लिए पूरे गुजरात को लांछित किया गया इसलिए किसी ऐसे शख्‍स के लिए जो अपनी पहचान को अपने स्‍थान से जोड़ता हो ये नागवार गुजरा होगा।

हम इस शहर दिल्‍ली जिससे कभी सुनील व कभी लाल्‍टू शिकायत करते हैं, अपनी पहचान से पूरी तरह जुड़ी मानते हैं- बार बार इस बात को कह भी चुके हैं। इसलिए अशोक वाजपेई ने जो कहा उसपर कुछ न कहना हमें गवारा नहीं।


जी ये शहर दिल्‍ली क्‍लबों में पीने वालों की तहजीब जल्‍दी नहीं सीख पा रहा शायद, आपकी कारों पर भी इसका रवैया उतना जायज नहीं पर क्‍या करें हमें ये किसी शहर की तहजीब जॉंचने के सही पैमाने नहीं लगते। मेरा शहर वह है जो मैं हूँ- ये बदबूदार है तो इसकी बदबू में हमारी बदबू शामिल है बल्कि उसी से ये बदबूदार हुआ है। आज फिर दरियागंज गया था- रविवार दर रविवार जा रहा हूँ- अठारह साल हुए, ऐसा नहीं कि नागा नहीं होती पर फिर भी हूँ नियमित ही। वही फुटपाथ पर जीआरई, जीमैट, के बीच कहीं दबे हुए टैगोर। यहीं से खरीदकर बीएल थरेजा की इलैक्ट्रिकल टेक्‍नॉलॉजी खरीदी थी वरना 1988 में डेढ़ सौ की किताब खरीदना तीसरे दर्जे के टेक्निशियन पिता के लिए मुश्किल होता। वहीं से सप्‍ताह दर सप्‍ताह ऐसी
सैकड़ों किताबें खरीदीं कि इन अशोक वाजपेईयों के डी-ई स्‍कूल में सिगरेट फूंकते बेटे बेटियॉं कम से कम नेमड्रापिंग से तो न डरा सकें और मौका मिलने पर कभी कभी हम भी इस शगल को पूरा कर सकें। मुल्‍कराज आनंद के कामसूत्र को 40 रुपए खरीदा यहॉं से और भी अच्‍छी बुरी न जाने कितनी किताबें, सीडी और स्‍टेश्‍नरी। इस शहर से इसलिए शिकायत न हुई कि इसमें मेरे लिए स्‍पेस था, है- अशोक वाजपेई को बदबू आती है तो आया करे।
अगर एक ये रविवार बाजार ही होता तो भी मेरे इस शहर में रहते रहने का पर्याप्‍त कारण था, अपने मामले में तो और सैकड़ों कारण हैं, और कई सारे तो हमें खुद ही नहीं पता। बस इतना पता है कि हैं। खैर जो इस बाजार से परिचित नहीं- ये एक किस्‍म का कबाड़ी बाजार ही है पर किताबों का। 250 के लगभग पटरी दुकानदार अलग अलग स्रोतों से किताबें जुटाते हैं- दुकानों से , कबाडियों से, नीलामी से और भी न जाने कहॉं कहॉं से और रविवार को गोलचा वाली पटरी पर आ बैठते हैं
नेताजी सुभाष मार्ग पर और फिर मुड़कर आसफ अली मार्ग पर डिलाइट तक। ढेरों ढेर किताबें, अब हिंदी की कम होती हैं पर मिलने वाले दिन मिल ही जाती हैं- लौटते समय छ: रूपए का ब्रेड पकौड़ा, कभी कभी एकाध गेम की सीडी बच्‍चे के लिए और मैट्रो पर सवार होकर घर (पहले इन अशोक वाजपेइयों की आंख का नासूर बनते हुए बस से जाते थे अब मैट्रो का खच्र सह सकते हैं) ! इसलिए जब प्रत्‍यक्षा या सुनील कहते हैं कि किताबें नहीं मिलती इस शहर में, तो सुखद नहीं लगता- शायद सच हो। किताबों का जितना बजट हम सोचते हैं उतने की खपत तो हो ही जाती है। और रही अभद्रता जो वाजपेई को दिखती है वह इस शहर में हो भी तो यहॉं की तहजीब नहीं है- यहॉं की तहजीब तो है जगह बनाना- एकोमोडेट करना, ट्रेफिक को भी, नव धनाढ्यों को भी, स्‍नॉब्‍स को भी और छोटे मोटे सपने वाले इस-उस को भी। हमारी तहजीब इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में खोजोगे तो वही मिलेगा जो मिलता है तुम्‍हें- वरना आओ मिलते हो अगले रविवार गोलचा से चार कदम दिल्‍ली गेट की तरफ- कहो तो इंतजार करूं।

Thursday, May 31, 2007

(दिल्‍ली) कॉलेज के बहाने तारीखे दिल्‍ली पर एक नजर

फुरसतिया ने आयुध निर्माणिनी कानपुर शहर का परिचय अपनी पोस्‍टों में रखा तभी से मुझे अपने शहर दिल्‍ली पर कुछ लिखने का मन था और अपने कॉलेज पर भी। गनीमत है इन दोनों पर अलग अलग लिखने की कोई जरूरत नहीं है क्‍योंकि इस शहर दिल्‍ली की नब्‍ज की पहचान रखने वाले जानते हैं कि दिल्‍ली शहर और दिल्‍ली कॉलेज अपनी रवायत, त्‍वारीख और मिजाज में एक ही हैं। यानि इस कॉलेज के इतिहास पर डाली गई कोई भी दृष्टि प्रकारांतर से आधुनिक दिल्‍ली के इतिहास पर डाली गई दृष्टि ही है।
दिल्‍ली कॉलेज (अब इसका नाम जाकिर हुसैन कॉलेज है) को दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना से पहले ही अस्तित्‍व में होने का गौरव प्राप्‍त है। यह शिक्षण संस्‍था स्‍वयं में तीन सौ सालों का इतिहास संजोए है। 18वीं सदी के अंतिम वर्षों में बादशाह औरंगजेब के दक्‍कन के एक सिपहसलार गजिउद्दीन खान के संरक्षण में यह मदरसा गाजिउद्दीन के नाम से जाना जाता था। कॉलेज के पुराने परिसर में एक मस्जिद के साथ साथ गजिउद्दीन की मजार आज भी विद्यमान है। फिर मुगल शासन के अंतिम चरण की शुरूआत हुई और इसने दिल्‍ली शहर की सास्‍कृतिक व शैक्षिक जिंदगी को भी प्रभावित किया जिससे कॉलेज भी प्रभावित हुआ। कॉलेज पर संकट के बादल छाने लगे किंतु शहर की बौद्धिक जमात की दिलचस्‍पी के परिणामस्‍वरूप 1792 में ओरिएन्‍टल कॉलेज के रूप में पुनर्व्‍यवस्थित होने पर इस कॉलेज ने साहित्‍य, कला एवं विज्ञान के प्राच्‍य कॉलेज के रूप में ख्‍याति प्राप्‍त की। बाद में यह एंग्लो अरेबिक कॉलेज के रूप में जाना गया। इस कॉलेज में भाषा, तर्कशास्‍त्र, न्‍यायशास्‍त्र, दर्शन, ज्‍योतिष और चिकित्‍सा की पढ़ाई होती थी।

मुगल साम्राज्‍य का पतन हो चुका था और औरंगजेब के परवर्ती शासक नाममात्र के शासक थे। इसी दौरान सन 1824 में ब्रिटिश ईस्‍ट इंडिया कंपनी ने इस कॉलेज से ही एक नवीन आधुनिक कॉलेज को खड़ा किया और इसे दिल्‍ली कॉलेज का नाम दिया गया। अगले 150 सालों तक, यानि 1975 तक यह दिल्‍ली कॉलेज के नाम से ही प्रसिद्ध रहा। 1824 में ही अवध के वजीर नवाब इत्‍मदुद्दौला ने 1,70,000 रुपए का अनुदान यहॉं शास्‍त्रीय भाषाओं अरबी, फारसी और संस्‍कृत के विभागों को मजबूत करने के लिए दिया।

इस कॉलेज के इतिहास का दिल्‍ली शहर के इतिहास से अटूट संबंध है। यह संस्‍थान इतिहास के अनेक उतार चढ़ावों का साक्षी रहा है। एक ओर 1857 व 1947 की ऐतिहासिक घटनाओं ने कॉलेज को गहरे प्रभावित किया जबकि दूसरी ओर 19वीं सदी सृजनात्‍मक उभार का वह दौर जो दिल्‍ली नवजागरण के रूप में प्रसिद्ध है, उसकी गतिविधियों का केंद्र भी यही कॉलेज था। इस काल में कॉलेज ने प्रगतिशील आदर्शों के निर्माण में अहम भूमिका अदा की। यही वह संस्‍थान था जिसने 1824 में एक विषय के रूप में अंग्रेजी पढ़ाए जाने की शुरूआत करने का साहसिक निर्णय लिया था जो उस जमाने के लिहाज से एक खासा विवादित मुद्दा था। 1843 में कॉलेज में दिल्‍ली वर्नाक्‍यूलर सोसाइटी की स्‍थापना हुई जिसके माध्‍यम से अनेक महत्‍वपूर्ण वैज्ञानिक व गणितीय ग्रंथों, शास्‍त्रीय ग्रीक साहित्‍य एवं फारसी कृतियों का उस जमाने की जनभाषा उर्दू में अनुवाद हुआ।

भारत के भूतपूर्व राष्‍ट्रपति एवं महान शिक्षाविद् डा. जाकिर हुसैन की महत भूमिका का सम्‍मान करते हुए 1975 में कालेज का नामकरण उन्‍हीं के नाम पर किया गया। अगले डेढ़ दशक बाद जाकिर हुसैन कॉलेज अपने वर्तमान परिसर मे स्‍थानांतरित हो गया। आज जाकिर हुसैन कॉलेज भौगोलिक एवं प्रतीकात्‍मक रूप से ऐसे स्‍थान पर है जो पुरानी दिल्‍ली को नई दिल्‍ली से जोड़ता है इस प्रकार प्राचीन परंपरा एवं नित नवीन प्रगति व आधुनिकता के बीच समन्‍वय को द्योतित करता है।

1925 में कॉलेज को नवस्‍थापित दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से संबद्ध कर दिया गया। इस कॉलेज ने शिक्षा के प्रचार प्रसार में निरंतर एक केंद्रीय भूमिका अदा की है, चाहे वह स्‍त्री शिक्षा का क्षेत्र हो अथवा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के निर्माण का या फिर भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के परस्‍पर अनुवाद का।


दिल्‍ली नवजागरण के केंद्र के रूप में दिल्‍ली कालेज की विरासत को स्‍वीकार करते हुए आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस ने हाल ही में एक विद्वतापूर्ण शोधग्रंथ प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है- ‘द दिल्‍ली कॉलेज: ट्रेडिशनल इलीट्स, द कोलोनियल स्‍टेट एंड एजूकेशन विफोर 1857’।
यह ग्रंथ उन्‍नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में ब्रिटिश शिक्षा नीति एवं पारंपरिक शिक्षा की पृष्‍ठभूमि में दिल्‍ली कॉलेज की विरासत की पड़ताल करता है। इसमें कॉलेज और इससे जुड़े लोगों के जरिए तत्‍कालीन दिल्‍ली के समाज पर अलग अलग नजरिए से विचार किया गया है। पुस्‍तक का संपादकीय सुस्‍थापित विद्वान मार्ग्रिट पर्नाउ ने लिखा है। यह पुस्‍तक इतिहास, समाजशास्‍त्र, शिक्षा एवं साहित्‍य के शोधार्थियों व विद्यार्थियों के लिए अत्‍यधिक उपयोगी है विशेषकर उनके लिए जिनकी रुचि संस्‍थाई इतिहास, उर्दू भाषा के विकास अथवा दिल्‍ली के इतिहास में है।
वैसे दिल्‍ली के इतिहास पर लिखी कोई भी पुस्‍तक शायद ही इस कॉलेज की उपेक्षा कर सके क्‍योंकि मुगलकालीन दिल्‍ली के जीवन का पूरा परिचय केवल इसी संस्‍थान से मिल पाता है। इस कॉलेज ने गालिब और मीर को खुद सुना और अब तक बचा रखा है (वैसे ‘गालिब ने इस कॉलेज में पढ़ाया है’ किवंदती की, असलियत यह है कि उन्‍हें ऐसा कोई प्रस्‍ताव ससम्‍मान दिया ही नहीं गया था किंतु वे इस कॉलेज के उत्‍कर्ष के दिनों में दिल्‍ली में सक्रिय थे और दिल्‍ली नवजागरण का हिस्‍सा हैं जिसका यह कॉलेज केंद्र रहा है।


जहॉं तक मेरे इस कॉलेज से संबंध की बात है...एक सीधा संबंध यह है कि मैं इस कॉलेज में विद्यार्थियों को कबीर, सूर, दिनकर, प्रसाद, रूपिम, स्‍वनिम, वाक्‍य पढ़ाता हूँ। लेकिन उससे भी गहरा संबंध यह है कि ये सब मैंने 1990-93 में इसी कॉलेज में सीखे थे। मदरसा गजिउद्दीन वाली इमारत में पढ़े विद्यार्थियों का अंतिम बैच हमारा ही था, हमने एक साल मजारों और बलुआ पत्‍थर वाली पुरानी इमारत में और शेष दो साल नई चमचमाती सुविधा संपन्‍न इमारत में बिताए थे। और यहीं दिसंबर 1992 में भी मैं छात्र था ओर सीखा कि कैसे गहरी नींव की संस्‍थाए इतिहास के धक्‍कों को सह जाती हैं। यहीं मुझे पता लगा कि 1857 के विद्रोह में पहले विद्रोहियों ने इस कॉलेज के प्रिसीपल व कई शिक्षकों मार दिया (वे अंगेज थे) और गदर के बाद बदला लेने के उपक्रम में अंगेजों ने कॉलेज को ही तहस नहस कर दिया, विद्यार्थियों ओर शिक्षकों को फांसी चढ़ाया गया और कॉलेज को बंद कर दिया गया। कॉलेज फिर उठ खड़ा हुआ।
1947 के विभाजन ने तो कॉलेज को तोड़ ही दिया था, पुरानी दिल्‍ली का कॉलेज था और बहुत से शिक्षक व विद्यार्थी पाकिस्‍तान चले गए और वहॉं के लाहौर कॉलेज को उन्‍होंने चुना। लेकिन तब भी डा. बेग जैसे लोग यहीं रहे और इस कॉलेज ने अपने दरवाजे पाकिस्‍तान से आए शरणार्थियों के लिए खोल दिए। उन्‍हें बिना प्रमाणपत्रों के ही प्रवेश दे दिए गए और पढ़ाई जारी

यह कॉलेज अपनी संस्‍कृति में दिल्‍ली का प्रतिनिधित्‍व कर पाता है क्‍योंकि इसमें विरोधों के समन्‍वय की अद्भुत शक्ति है। इसमें एडवांस्‍ड टिश्‍यू कल्‍चर लैब में प्रयोग करने के बाद छात्राएं सहजता से अपना बुरका पहनती हैं और रिक्‍शे पर सवार हो जाती हैं। हिंदू-मुसलमान प्रेम प्रसंग जितने इस कॉलेज ने देखे हैं उतने तो बॉलीवुड ने भी नहीं। और भी बहुत कुछ है जो इस शहर में है और इसीलिए कॉलेज में भी....कोई हैरानी नहीं कि हमारे शिक्षक श्री भीष्‍म साहनी यहॉं ‘तमस’ लिख पाए क्‍योंकि वह इतिहास ही तो है..और उनके संस्‍थान के हर पत्‍ते और पत्‍थर के पास ये कथाएं थी।



पुरानी इमारत से स्‍थापत्‍य के कुछ नमूने:





खुला प्रांगण, आज भी कॉलेज का छात्रावास इसी इमारत में चलता है और इस ओर खुलता है।


एक पुरानी तस्‍वीर, सामने के गलियारों में आजकल एंग्‍लो अरेबिक स्‍कूल चलता है।


मुख्‍यद्वार पर अंदर से एक नजर


कॉलेज/एंग्‍लो अरेबिक स्‍कूल का मुख्‍यद्वार