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Monday, November 17, 2008

(मत) मुस्‍कराएं कि आप कैमरा पर हैं

गनीमत है कि हम भारतीय सार्वजनिक साईनबोर्डों को बहुत गंभीरता से नहीं लेते वरना कम से कम दिल्‍ली के नागरिकों की मुँह की पसलियों का चटकना तो  तय है, हर माल, सड़क, स्‍टेशन, मैट्रो, चौराहे, दफ्तर, स्‍कूल, कॉलेज, होटल-रेस्त्रां में एक कैमरा हम पर चोर नजर रख रहा होता है। अक्‍सर एक साइनबोर्ड भी लगा होता है कि मुस्‍कराएं, आप कैमरा पर हैं। मैं तो बहुत प्रसन्‍न हुआ जब मैंने सुना कि शीला दीक्षितजी ने कहा है कि जल्‍द ही पूरी दिल्‍ली को वाई-फाई बनाया जा रहा है...बाद में पता चला कि इसका उद्देश्‍य सस्‍ता, सुदर टिकाऊ इंटरनेट प्रदान कराना उतना नहीं है जितना यह कि वाई फाई के बाद सर्वेलेंस कैमरे लगाना आसान हो जाएगा..जहॉं चाहो एक कैमरा टांक दो...बाकी तो वाईफाई नेटवर्क से डाटा पहुँच जाएगा जहॉं चाहिए।

image दुनिया के अन्‍य लोकतंत्रों में भी जहॉं निजता की रक्षा के कानून खासे सख्‍त हैं, वहाँ सर्वेलेंस कैमरों की अति से लोग आजिज हैं। वैसे जाहिर है कैमरे केवल मूर्त प्रतीक भर हैं, सच तो यह है कि हम बहुत तेज गति से एक सर्वेलेंस समाज (हिन्‍दी में इसके लिए क्‍या शब्‍द कहें? अभी नहीं सूझ रहा) में बदलते जा रहे हैं। सावधान कि हम पर नजर रखी जा रही है। कहीं सुरक्षा की जरूरतों के चलते हमारे सार्वजनिक स्‍पेस का चप्‍पा-चप्‍‍पा  इन कैमरों के जद में आ गया है। वहीं कहीं सुविधा, आईटी आदि के नाम पर भी हमारे निजत्‍‍व पर खतरा बढ़ रहा है। कालेज के हमारे परिसर में कईयों कैमरे लगे हैं इसी तरह मैंने ध्‍यान दिया कि मेरे विश्‍वविद्यालय की वेबसाईट पर सैकडों स्‍त्री- पुरुषों के नाम पते व शिक्षा आदि के ऑंकडे डाल दिए गए हैं, लिंक जानबूझकर नहीं दे रहा हूँ ताकि निजता के इस उल्‍लंघन में मेरी हिस्‍सेदारी न हो। 

अधिकांश आधुनिक समाज इन कैमरों को इस तर्क से सह लेते हैं कि सुरक्षा के लिए नेसेसरी-ईविल हैं, या ये भी कि इनसे अपराधी डरें हम क्‍यों। किंतु अनेक शोध बताते हैं  कि एक सर्वेलेंस समाज स्वाभाविक समाज नहीं होता, जब हमें पता होता है कि हम पर निगाह रखी जा रही है तो हम अधिक तनाव में होते हैं तथा अपने व्‍यवहार को निगाह रखने वाले की अपेक्षा के अनुरूप बनाने का प्रयास करते हैं जो अक्‍सर कृत्रिम होता है। मेरे कॉलेज के युवा छात्र अब चिल्‍लाकर, अट्टहास करते हुए गले मिलते नहीं दिखाई देते या बहुत कम दिखाई देते हैं...ये नहीं कि ये किसी कानून के खिलाफ है पर वे जानते हैं कि उन्‍हें देखा जा रहा हो सकता है...इसी प्रकार दिल्‍ली मैट्रो में दिल्‍लीवासियों के जिस व्‍यवहार की बहुत तारीफ होती है उसके पीछे भी कैमरों की अहम भूमिका है, किंतु आम शहरी हर जगह खुद को 'सिद्ध' करता हुआ घूमे तो कोई खुश होने की बात तो नहीं।

खैर चलूँ कालेज का समय हो रहा है, अगर गिनूं तो मैं घर से कॉलेज तक कम से कम 40 कैमरे मैट्रो के 8 कॉलेज के फिर 3-4 सड़क पर और वापसी में भी इतने ही कैमरे...जहन्‍नुम में जाएं सब, हम नहीं मुस्‍कराते भले ही हम कैमरे पर हों।

Saturday, November 15, 2008

टिफिन में अचार बना समय

सही सही गणना करूं तो बात छब्बीस साल पुरानी होनी चाहिए क्‍योंकि याद पड़ता हे कि ये मेरे नए स्‍‍कूल का पहला साल था यानि छठे दर्जे में।tiffin नया स्‍कूल घर से खासा दूर था बस लेनी होती थी, वापस आते आते शाम के सात बज जाते थे इसलिए टिफिन ले जाना शुरू करना पड़ा जिसके मायने थे पिछले सप्‍ताह के दैनिक हिंदुस्‍तान में लिपटे दो परांठे जिसके बीच में या तो कोई सूखी सब्‍जी होती या फिर घर का डाला आम का अचार...वैसे बंदे को इनसे कोई खास तकलीफ नहीं थी..पर एक दिन घर आकर हमने शिकायत की, कि क्‍या मम्‍मी आप रोज ये सब भेज देती हो..बाकी लोग कितने मजे से रोज छोले खरीदकर डबलरोटी के साथ खाते हैं। सुनकर घर में सब हँसे मैं चुप हो गया।

***

सर्दियों की आहट शुरू हो गई है। मेरे बच्‍चों की स्कूल यूनीफार्म बदल गई है,  नेकर और स्‍कर्ट की जगह ट्राउजर्स, फुल स्‍लीव शर्ट उस पर टाई। पर नहीं बदला तो टिफिन। प्‍लास्टिक का ये डिब्‍बा जिसमें एल्‍यूमिनियम फाइल में लिपटा एक परांठा साथ में कोई सब्‍जी। जितना कष्‍ट मुझे बच्‍चे को बेपनाह भारी बस्‍ते लादे देखकर होता है उससे कम इस टिफिन को देखकर नहीं होता। नवम्‍बर-दिसम्‍बर की सर्दी में किस लायक बचेगा ये 'खाना' - तीन घंटे बाद। मैं बेहद ग्‍लानि महसूस करता हूँ क्‍यों ये संभव नहीं है कि स्‍कूल बच्‍चों के खाने गर्म करने की कोई व्‍यवस्‍था करे।

*****

बेटे के साथ उसकी स्‍कूल बस का इंतजार करते हुए मैंने उसे जैसे तैसे फुसलाकर ये पूछा कि यार सच बता कि ये रोज रोज खाना क्‍यों बचा लाते हो, 'फिनिश' क्‍यों नहीं करते। 'क्‍या करूं 'पा' आप लोग रोज रोज इतना 'मुश्किल'  खाना भेजते हो अगर रोटी सब्‍जी जैसा खाना पूरा फिनिश करूं फिर तो सारी 'ब्रेक' खाने में ही खत्‍म हो जाएगी फिर स्किड (कॉरीडोर में दौड़ना और फिर जड़त्‍व के सहारे जूतों के बल फिसलना) कब खेलूंगा।

Tuesday, September 11, 2007

इस नए संस्‍करण में खेल कहॉं है

शास्‍त्रीजी द्वारा प्रस्‍तुत दीपक के लेख में आज कहा ही था कि क्रिकेट में से खेल अब लुप्‍त होता जा रहा है। आज ही T-20 का विश्‍वकप शुरू हुआ है और क्‍या कार्यक्रम है हुजूर- हमें क्रिकेट तो नहीं लगा एक मनोरंजन का वैराइटी प्रोग्राम भर लगा। अपने टीवी से कुछ तस्‍वीरें कैप्‍चर की हैं देखें- भला जेन्‍टलमैनों के 'खेल' ऐसे होते हैं क्‍या -





वैसे कुछ क्रिकेटीय क्षण भी थे। जैसे गेल का शतक-



कुल मिलाकर हमें तो लगता है कि मीडिया के लिए मनोरंजन का तमाशा तैयार करने के लिए खेल हो रहा था। पता नहीं अब प्रभाष जोशी क्‍या लिखेंगे ?

मार्क्‍स - पराजित शत्रु के लिए खिन्‍न मन

कॉलेज स्‍टाफ रूम में अक्‍सर यह मौका मिलता है कि दूसरे विषयों के शिक्षकों से उनके विषय में हो रहे हालिया बदलावों पर चर्चा हो सके। अक्‍सर साफ तौर पर एक कॉमन ट्रेंड दिखाई देता है कि सारी उच्‍च शिक्षा में बदलाव हो रहा है इसकी दिशा सभी विषयों में एक ही है- गहराई से उथलेपन की तरफ। मसलन साहित्‍य के पाठ्यक्रमों में साहित्‍य कम हो गया है और मीडिया, अनुवाद जैसे तत्‍व बढ़ रहे हैं। इसलिए जब आज अपनी एक अर्थशास्‍त्र की साथी शिक्षिका से चर्चा हो रही थी तो मैं इसे खासतौर पर जानने का इच्‍छुक था कि उनके विषय में क्‍या हो रहा है- ऐसा इसलिए कि बाकी विषयों में हो रहे बदलाव खुद अर्थशास्‍त्र के ही दबाव में हो रहे बदलाव हैं  फिर अर्थशास्‍त्र में तो ये बदलाव और साफ नंगई के साथ आ रहे होंगे। यह भी ध्‍यान रखने लायक बात है उच्‍च शिक्षा के पाठ्यक्रम विचारधाराओं की लड़ाई अखाड़े रहे हैं क्योंकि भविष्‍य को प्रभावित करने का सबसे जरूरी मोर्चा इन युवाओं को ही प्रभावित करना है।

तो मैनें पूछा कि आजकल मार्क्‍स कैसे पढ़ा (पाती) हैं आप ? उन्‍होंने रहसयमयी मुस्‍कान से देखा और बोलीं- पढ़ाना ही नहीं पढ़ता। ओह.. क्‍या पाठ्यक्रम में है ही नहीं अब ? हम न जाने क्‍यों चिंतित हो गए- बाद में हमें अपनी चिंता बड़ी चिंताजनक लगी- विश्‍वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान हमने बहुत सी ऊर्जा मार्क्‍सवादियों से बहसियाने में जाया की है-  हमेशा उनसे लड़ते रहे- इसलिए अब यदि मार्क्‍स के नामलेवा नहीं बचें हैं तो हमें खुश होना चाहिए था पर नहीं- अंदर खाते हम इस विचारधारा के कई तत्‍वों के दिली प्रशंसक रहे हैं और इस बात के भी कि बौद्धिक जमात में मार्क्‍सवादियों की उपस्थिति यह सुनिश्चित करती थी कि मुद्दे पर आलोचनात्‍मक दृष्टि से विचार हो सकेगा, इस विचारधारा में लाख कमियॉं हो पर  इसके मानने वालों में विमर्श की एक ट्रेनिंग दिखाई देती रही है। कम से कम हमारे विश्‍वविद्यालय में तो ऐसा ही है।

साथी शिक्षिका ने बताया कि अभी भी मार्क्‍सवाद को पढ़ाया जाता है पर केवल आनर्स में एक पर्चे में, वो भी पिछले साल तक 100 अंक का था अब 50 का हो गया है, उसमें भी विचार इस धारा की कमियों पर अधिक होता है। बाकी विद्यार्थियों को मार्क्‍सवाद का उल्‍लेख एक असफल प्रणाली की तरह किया जाता है। इसके अतिरिक्‍त ये भी कि अब इसकी ही वजह से विद्यार्थियों से आलोचनात्‍मक विश्‍लेषण के सवाल पूछे जाने की बजाय तथ्‍यात्‍मक सवाल पूछे जाते हैं। एक राजनैतिक व्‍यवस्‍था के तौर पर भले ही अब भी कहीं कहीं वामपंथी दिख जाएं पर एक आर्थिक चिंतन के रूप में तो वह पूरी तरह परास्‍त दिखता है खुद चीन में तो खूब नंगेपन के साथ। और सब से बड़ी बात ये कि दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय जैसे संस्‍थानों के पाठ्यक्रमों के निर्धारण को बहुत सी देशी विदेशी ताकतें प्रभावित करती हैं (अर्थशास्‍त्र का पाठ्यक्रम दिल्‍ली स्‍कूल ऑफ इकोनिमिक्‍स  द्वारा तैयार होता है जहॉं का शायद ही कोई शिक्षक होगा जो अमरीकी फैलोशिपों को भोक्‍‍ता न हो)   हम अगली कक्षा के लिए उठें उससे पहले उन्‍होंने मानों सार सामने रखा- पहले मार्क्‍सवाद एक वैकल्पिक व्‍यवस्‍था थी अब केवल एक क्‍लास ऐसाइनमेंट का शीर्षक है।

Friday, September 07, 2007

उनकी विश्‍वसनीयता में सेंध- हमारी ओर से शुद्ध खेद खेद खेद

हमने उमा खुराना प्रकरण पर एक पूरी पोस्‍ट लिखी थी, अब कहानी की असलियत सामने आ गई है- उमा शिक्षिका हैं और हमने राय व्‍यक्‍त की थी कि शिक्षक होने के नाते हम उस शर्मिंदगी में साझा हैं जो उमा के 'आचरण' से उपजती है। तीन-चार दिनों में मामला पलट गया है- हम अपनी गलती को ओन करते हैं तथा इस विषय में अपनी क्षमा याचना व्‍यक्‍त करते हैं- उस पोस्‍ट में कम से कम कुछ वाक्‍य तो ऐसे हैं ही जो उस शिक्षिका को दोषी मान लेने की ध्‍‍वनि लिए हैं।


हम गुमराह हुए- बाकायदा किए गए। पत्रकार बिरादरी ने किए (चलिए बिरादरी नहीं कहते....कुछ पत्रकारों ने किए) सिर्फ हम ही नहीं हुए पूरा देश हुआ। चंद पत्रकारों ने कहा कि शिक्षक इतने पतित हो गए हैं कि धंधा करने लगे हैं- हम झट आत्‍मालोचना के मोड में गए-



जनता में गुस्‍सा है, सरकार में भी और कानून तो जो और जैसे करेगा वो करेगा ही (दिल्‍ली में इम्‍मोरल ट्रेफिकिंग के केसों में कन्विक्‍शन की दर बहुत ही कम है) पर हमें सबसे खतनाक वह चुप्‍पी लगती है जो इस तरह की घटनाओं के बाद शिक्षक समुदाय में आंतरिक रूप से देखने को मिलती है



अब सवाल यह है कि सब जानते हैं कि एक पत्रकार (चैनलों की कार्यप्रणाली जानने वाले मानेंगे कि ये स्टिंग एक पत्रकार भर की हरकत नहीं ही होगी) ने टीआरपी के लिए एक और साथी पत्रकार को वेश्‍या के रूप में अभिनय करने के लिए कहा और नकली स्टिंग में उस अध्‍यापिका को फंसाया गया। पत्रकार मित्र कहें कि इसे क्‍या कहें। उमा के कपड़े फाड़े गए- हम जैसे गैर जिम्‍मेदार लोगों की ही हरकत थी। पर पत्रकारिता की कोई जिम्‍मेदारी बनती है कि नहीं। टी आर पी के लिए पत्रकार अपनी साथी को ही वेश्‍या बना डालेंगे- ये भूख फिर अब कब थमेगी।


हमें लगता है कि स्‍त्री के सम्‍मान का सवाल, छात्र-शिक्षक संबंधों के विश्‍वास हनन का सवाल, पत्रकारिता के मूल्‍यों का सवाल और संभवत चिट्ठाकारिता के दायित्‍व का सवाल इसमें शामिल है। अपने तईं हम पुन: स्‍वीकार करते हैं और पूरी शर्मिंदगी से स्‍वीकार करते हैं कि हम मीडिया रिपोर्टों पर विश्‍वास करने की गलती कर बैठे हमें खेद है।


एक नुमाइशी जुगलबंदी- गीताप्रेस गोरखपुर और विल्‍स इंडिया फैशनवीक

दिल्‍ली आसानी से देश की प्रकाशन राजधानी भी है इसलिए भले ही 'दिल्‍ली पुस्‍तक मेला' अपने आकारादि में विश्‍व पुस्‍तक मेले (यह भी दिल्‍ली में ही होता है) के सामने कहीं न ठहरे तो भी यह ऐसी नुमाइश तो होती ही है कि हम इसके हर बार दर्शक ठहरते हैं। इस बार भी गए। प्रगति मैदान के हाल संख्‍या 9-10-11-12 में जमाए गए जमावड़े़ में कई प्रकाशक नदारद थे तो कुछके स्‍टाल व प्रतिभागिता का स्‍तर काफी कम था। यहॉं तक कि अकादमियॉं आदि भी कम संख्‍या में थीं। पर इसके बावजूद प्रबंध अच्‍छा है जो प्रकाशक हैं उनके पास भी इतना माल तो है ही कि उसके बहुत ही थेड़े अंश को खरीद पाते हैं बहुत सा टालना पड़ता है मन मसोसना पड़ता है खासकर अंगेजी की डालर पाउंड वाली किताबे अपनी पहुँच से बाहर ही लगी- पुस्‍तकालय के ही भरोसे पढ़ पाएंगे। हॉं हिंदी की किताबे अभी भी जम के खरीदी जा सकती हैं। देवनागरी में उर्दू साहित्‍य अब खूब दिख रहा है।

कौन थे दर्शक- घर-परिवार वाले लोग सपरिवार, और थे विद्यार्थी, अध्‍यापक, शोधार्थी सब जाने पहचाने से चेहरे- एक तसल्‍ली के भाव से। किताब किताब पर ठहरकर खिसकते...तसल्‍ली का दुर्लभ सा होता भाव पसरा था।

(2)

अगर आप हॉल 9 से घुसेंगे और किताबों की सारी नुमाइश के बाद निकलेंगे तो आपका निकलना होगा हॉल 12 से और बाहर आते ही उई बाबा रे.... 

नहीं यूँ तो हर एयर कंडीशंड क्षेत्र से बाहर निकलते ही एक गर्म भभका आकर टकराता ही है चेहरे से पर यहॉं मामला दूसरा है। हॉल 7-8-9 हॉल इस हॉल से सटे हॉल हैं और यही है इस साल के विल्‍स इंडिया फैशन वीक  का स्‍थान।



तमाम ज्ञान बघारें, स्‍त्री विमर्श पढें या पढ़ाएं यानि कितने ही चेहरे ओढ़ लें एक बनैला आदमी छिपा ही होता है। किताबों का झोला टांगे बाहर आएं और (शायद समय ऐसा था' शाम के छ: होंगे) अचानक एक के बाद एक मॉडल और डिजाइनर आदि लोग चमचमाते चेहरों और दीप्‍त न जाने किस बात के आत्‍मविश्‍वास के साथ इस रहस्‍यलोक में गुम होते जाएं तो....हम तो अकबका गए।

दो इतनी भिन्‍न दुनिया- किताब की दुनिया वालों को तो पता है कि वो पेज थ्री वाली दुनिया है पर उससे उनका कोई वास्‍ता नहीं। उस फैशन वीक पीढ़ी को तो शायद पता ही नहीं कि ये किताब वाली पीढ़ी का वजूद भी है। पर देखिए मजा कि दोनों को एक दूसरे का पड़ोसी बना दिया। आप दोस्‍त बदलें, दुश्‍मन बदलें पर पड़ोसी नहीं बदल सकते। पुस्‍तक मेले से निकले कुछ लोग जो किन्‍हीं हसरतों से फैशनवीक मंडली की तरफ  देख रहे थे और उन्‍हें बेहद हिकारत से देखा जा रहा था...खूब जुगलबंदी थी। स्‍त्री विमर्श की पैरोकार मित्र ने मुस्‍कराकर हमारी अकबकाहट को देखा और गीताप्रस गोरखपुर से निकली स्‍त्री नैतिकता पर लिखी किताब दिखाते हुए उसकी मूर्खतापूर्ण शिक्षाओं पर अपनी राय देने लगीं।

 

Tuesday, September 04, 2007

काले कन्‍हैया के गोकुल में क्‍यों चाहिए गोरी मेम

भारतीय सुंदरी शिल्‍पा शेट्टी नस्‍लवादी टिप्‍पणी से आहत हुई थी और फिर पौंड्स की बरसात और नस्‍लविरोधी चुंबन से उसका गौरव लौट पाया। पर क्‍या भारतीय खुद एक नस्‍लवादी कौम हैं ?  

जी नहीं मैं कम से कम अभी दलित उत्‍पीड़न की तरफ इशारा करते हुए नहीं कह रहा हूँ वरन एकदम पारिभाषिक संदर्भ में नस्‍लवाद की बात कर हा हूँ यानि एक नस्‍ल या चमड़ी के रंग के आधार पर बेहतरी कमतरी की मानसिकता का सवाल। नस्‍लवाद के सवाल का उपनिवेशवाद और उससे भी पहले गुलामी की प्रथा से गहरा लेना है- इसी क्रम में मालिकों की ऐथिनीसिटी को गुलामों की ऐथिनीसिटी से बेहतर समझा जाने लगा और यह प्रवृत्ति पहले तो बढ़ती गई और फिर बाद में इस मानसिकता का निर्यात अपने उपनिवेशों को  कर दिया गया। इंग्‍लैंड इस नस्‍लवाद की मातृभूमि है और अमरीकी नस्‍लवाद की जननी भी है। लेकिन क्‍या भारत जैसे देश के नागरिक जो खुद इस नस्‍लवाद के शिकार रहे हैं वे क्‍या खुद इसी नस्‍लवादी सोच के शिकार हैं या हो सकते हैं ?

हमारी एक मित्र इस वर्ष की कॉमनवैल्‍थ फैलो चुनी गई हैं और इस फैलोशिप के तहत इंग्‍लैंड रवाना हो रही हैं इस तैयारी के क्रम में ब्रिटिश काउंसिल ने कई ब्रीफिंग सैशन आयोजित किए  और इन्‍हीं में उन्‍हें बताया गया कि यदि आपके खिलाफ कोई नस्‍लवादी भेदभव हो तो क्‍या किया जाना चाहिए... यहॉं तक तो ठीक। पर साथ यह भी बताया कि खुद भारतीय ( इनमें पाकिस्‍तानी व बांग्‍लादेशी भी गिने जाएं) इंग्‍लैंड की कुछ सबसे अधिक नस्‍लवादी कौमों में हैं। आगे उदाहरण देते हुए बताया गया कि किस प्रकार इंग्लैंड के विश्‍वविद्यालयों के कैंपस में गोरे लड़के और लड़कियॉं आपको भारतीय, ईस्‍ट एशियन, अरब, अफ्रीकी आदि लोगों के साथ जोड़े बनाते दिखेंगे पर कभी भारतीयों के जोड़े अफ्रीकी लड़के-लड़कियों के साथ बनते नहीं दिखेंगे। थोड़ा सोचने पर बात एकदम सही लगती है कोई भी न्‍यायप्रिय, समतावादी, देशप्रेमी  आदि आदि एनआरआई विदेश से गोरी मेम तो हो सकता है ले आए लेकिन कोई अफ्रीकी लड़की उसे पसंद नहीं आ पाती। अब नहीं आती तो नहीं आती कोई जबरिया तो इश्‍क करेगा नहीं पर सवाल यह है कि ऐसा होता क्‍यों है।

जवाब ढूंढना कोई बहुत मुश्किल नहीं है। अखबार उठाएं और वैवाहिक विज्ञापनों पर नजर दौड़ाएं फेयर-गोरी चिट्टी बहु चाहिए और अगर हो सके तो लड़की वाले भी गोरे दूल्‍हे को ही वरीयता देंगे। ये अपने आप में नस्‍लवाद न मानकर मेटिंग प्रेफरेंस  कह दिया जा सकता है पर हर कोई जानता है कि गोरे रंग को बेहतर समझे जाने की प्रक्रिया का स्रोत उपनिवेशवाद और नस्‍लवाद में ही है। केन्‍या और नाईजीरियाई विद्यार्थियों को लेकर दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के कैंपस में कैसे कैसे पूर्वाग्रह होते हैं इससे एक विद्यार्थी और अध्‍‍यापक होने के नाते हम खूब परिचित हैं। यह मानसिकता ऐसी छोटी मोटी बीमारी नहीं है कि चार एनआरआई बैठक कर या संकल्‍प कर इसे दूर कर सकें, पहले तो इस स्वीकार का साहस ही दिखाना पड़ेगा कि यदि भारतीय कभी कभी नस्‍लवाद का शिकार होते हैं तो वे खुद भी अक्‍सर नस्‍लवादी व्‍यवहार करते भी हैं और फिर इसकी जड़ तक पहुँचने का भी साहस दिखाना पड़ेगा।

Monday, August 27, 2007

टेक्‍नोफोबिया और बैग-दुपट्टे की दुखद प्रणयलीला

मैट्रो अब दिल्‍ली की लाईफ लाइन बन चुकी है। इसकी कई तकनीक मजेदार हैं और इन्‍होंने दिल्‍ली की सिविक सेंस को काफी प्रभावित किया है। मसलन एक तो लें एस्‍केलेटर्स और दूसरे बात करें ट्रेन के स्‍वचलित दरवाजों की। गैर दिल्‍लीवासियों को बताया जाए कि चूंकि मैट्रो अंडरग्राउंड, भूतल तथा एलीवेटिड तीनों सतर पर चलती है तथा अक्‍सर लोगों को ट्रेनें बदलनी पड़ती हैं अत: यात्रियों को खूब ऊपर नीचे की सीढि़यॉं चढ़नी-उतनी पड़ती हैं अत: मैट्रो ने हर स्‍टेशन पर बहुत से एस्‍केलेटरों की व्‍यवस्‍था की है

- इन बिजली की सीढियों के सार्वजनिक स्‍तर पर इतने बढ़े पैमाने पर उपयोग को इस शहर (और शायद किसी भी भारतीय शहर) ने पहले कभी नहीं देखा था अत: बहुत से लोगों के लिए ये प्रोद्योगिकी तथा टैक्‍नोफोबिया को उभारता स्‍थल होता है। अक्‍सर इन सीढि़यों के पास ऐसे भयभीत लोग खड़े अनिर्णय में खड़े दिखते हैं कि पैर आगे बढ़ाएं कि नहीं- अकसर फिर वे साथ में बनी सामान्‍य सीढि़यों से जाने का निर्णय लेते हैं- बहुधा ये लोग बुजुर्ग होते हैं क्‍योंकि उम्र के बढ़ने के साथ साथ नई तकनीकों को लेकर अविश्‍वास बढ़ता जाता है। कुल मिलाकर होता ये हैं कि युवा लोग तो मजे में एस्‍केलेटर से जाते हैं और बुजुर्ग हॉंफते हॉंफते तीस तीस मीटर या तो सामान्‍य सीढि़यों से चढ़ते हैं या फिर लिफ्ट का लंबा इंतजार करते हैं।

दूसरी तकनीक यानि स्‍वचलित दरवाजे भी कम नहीं है। ट्रेन के ड्राईवर के सामने कैमरे से सीसीटीवी के माध्‍यम से पूरे प्‍लेटफार्म का दृश्‍य रहता है- जब सब उतर चढ़ जाते हैं तो वह अरवाजे बंद करता है, यदि कुछ सामान या कोई व्‍यक्ति टकराता है दरवाजे से तो दरवाजे स्‍वमेव पुन: खुल जाते हैं तथा फिर बंद करने होते हैं- ट्रेन दरवाजे बंद होने पर ही चल सकती है।


पिछले सप्‍ताह चॉंदनीचौक स्टेशन पर एक महिला (अधेड़, आकार नाशपाती पर आप इस वृतांत को  रोचक बनाना चाहें तो कल्‍पना में कमनीयता का समावेश करें) ट्रेन में थी और एक बंधु उतरना चाहते थे, उतरे पर जनाब के बैग की चेन में इन महिला का दुपट्टा जा फँसा- अब वे प्‍लेटफार्म पर और ये ट्रेन में- न वे ट्रेन में वापस आएं न ये ही ट्रेन से उतरें और बैग है कि दुपट्टे को छोड़ नहीं रहा। ट्रेन के सपीकर उवाच रहे हैं ' यात्री कृपया दरवाजों से हटकर खड़े हों'    बैग और दुपट्टे का प्रणय जारी था और दरवाजे लगे बंद होने हम सब दर्शक दम साधे देख रहे हैं कि हैं अब क्‍या होगा- कोई इन महिला को सलाह दे रहा है कि वे उतर जाएं तो कोई उन साहब से ही वापस चढ़ आने की गुजारिश कर रहा है :) :) दरवाजे साहब के बैग और हाथ से टकराकर वापस खुले और फिर बंद होने को आए तब अंतत: उन्‍होंने बिना इस बात की परवाह के कि उस दुपट्टे का कया होगा उसे पूरी ताकत से खींचा और छेददार दुपट्टा छोड़कर तथा उसका एक अंश, स्‍मृति के रूप में अपने बैग की चेन के मुँह में दबाए अपने रास्‍ते चले- तब जाकर दरवाजे बंद हो पाए और दर्शकों के लिए इस शो का पटाक्षेप हुआ। 

Tuesday, August 21, 2007

क्‍या भारतीय कम्‍यूनिस्‍ट चीनी हितों के लिए काम कर रहे हैं

अमरीका से रिश्‍तों में गर्माहट हो इससे हमें मनमोहन सिंह टाईप खुशी नहीं होती और इस न्‍यूक्लियर डील पर प्रतिक्रिया किए बिना हमारा काम चल रहा था पर हाल की वाम नौटंकी ने चिढ़ा दिया है। हमारा जन्‍म ही 1962 के युद्ध के 10 साल बाद हुआ था पर फिर भी हमें ये बात कुढ़न पैदा करती है कि वाम के लोगों ने उसउस युद्ध में भारतीय पक्ष का खुला समर्थन करने से इंकार कर दिया था- लेकिन असल नग्‍न नृत्‍य हम तो इस बार देख रहे हैं। परमाणु समझौता एक अंतर्राष्‍ट्रीय करार है, ये कोई अंधा प्रेम नहीं है कि कोई पक्ष अपना सर्वस्‍व लुटाने के लिए तैयार हो इसलिए कुछ गिव एंड टेक रहा ही होगा पर हमें वाम की लाइन आव ऐक्‍शन से दिक्‍कत ये है कि वे पूरी तरह से अपने चीनी आकाओं के इशारे पर काम करते दिखाई दे रहे हैं।



हम बल्‍ले बल्‍ले वाले देशभक्‍त नहीं हैं- उकसाऊ इशारों पर तिरंगा लहलहाते हुए वावले हुए नहीं फिरते पर फिर भी इतना तार्किक तो हैं कि मानें कि अगर देश है तो उसके नियामक सिद्धांत इस देश के हितों के अनुसार होने चाहिए किसी लाल-पीले पड़ोसी के लिए नहीं। ऐसा भी नहीं कि दूसरों के इशारों पर नाचते प्राधिकारी हमने देखे नहीं- हमारा प्रधानमंत्री कठपुतली है- राष्‍ट्रपति तो है ही और भी है पर कम से कम इनकी डोर तो इसी देश में ही थी इस परमाणु प्रपंच में तो डोर साफ साफ नाथुला दर्रे के उस ओर से आ रही है। आजकल मीडिया में छप रही खबरें भी साफ साफ प्‍लांट की हुई दिखाई दे रही हैं- इस पक्ष या उस पक्ष के द्वारा पर फिर भी आज के हिंदुस्‍तान टाइम्‍स में प्रकाशित बी रमन के लेख द मंच्‍यूरियन कैंडीडेट को पढें, हो सकता है ये भी सी आई ए की प्‍लांट की गई स्‍टोरी हो पर इस लेख से पहले भी हम यही मान रहे थे कि लेफ्ट के आचरण के पीछे चीनी आकाओं के हितों की रक्षा का भाव है न कि भारत के हित।


Sunday, August 12, 2007

गंगा और रामचरितमानस से मुक्ति का क्रूर प्रसंग

' मैं मानता हूँ कि इस हिंदी प्रदेश की जड़ता, पिछड़ेपन और निष्क्रियता निठल्‍लेपन के लिए जिम्‍मेदार दो चीजें हैं- एक का नाम 'रामचरितमानस' और दूसरे का का नाम 'गंगा' नदी है। ये दो नहीं होते तो शायद हम इनसे उबरने की कोशिश कर लेते'

उपर्युक्‍त कथन किसका हो सकता है इसके अनुमान पर कोई ईनाम नहीं रखा जा सकता- जी सही बूझा...ये हँस के संपादक राजेंद्र यादव के उवाच हैं जो उन्‍होंने स्‍वप्निल प्रजापति के साथ बातचीत में रखे थे और जो वाक के पिछले अंक में प्रकाशित हुए थे (वाक 1, पृ. 28)

इसके पीछे का तर्क पुन: उद्धरण में इस प्रकार है- ' लेकिन गंगा के साथ जो पौराणिकता, जो मिथक जोड़े गए हैं, वे ही गंगा को इस रूप में बनाते हैं। कहीं गंगा विष्‍णु के चरणों से निकल रही है। कहीं शिव के सिर से निकल रही है। मतलब उसमें बहुत से देवताओं को शामिल करने की कोशिश की गई है। कृष्‍ण इसमें शामिल नहीं हैं। इसके महत्‍व में शामिल नहीं हैं। राम तो गंगा के ही हैं। गंगा इन्‍हीं धार्मिकताओं की वजह से है .....गंगा ने निठल्‍ले यानि मात्र खाने पीने वाले, अफीम गांजे का नशा करके पड़े रहने वाले करोड़ो साधुओं की जमात पेदा कर दी है, जो इनके किनारे पर पलते हैं। कहीं पुजारियों के रूप में, कहीं पंडों के रूप में कहीं किसी रूप में। आप जानते हैं कि जो धन परिश्रम से कमाया नहीं जाता, मुफ्त में आता है वह अपराधों का जनक है। कोई अपराध ऐसा नहीं जो यहॉं न होता हो और ये लोग न करते हों' 

इसी प्रकरण में और एक बार राजेंद्र यादव का- 'और रामचरितमानस अपरिवर्तनशीलता का सबसे बड़ा शास्‍त्र है। राम जैसा बनने के लिए आपको दलितों और शूद्रों का वध करना पड़ेगा। गभ्रवती स्‍त्री को घर से भगा देना पड़ेगा'

हिंदी की दुनिया में एक जुमला आजकल कहा जाता है कि 'भई तुलसी के दिन बुरे चल रहे हैं' एक समय था कि आचार्य शुक्‍ल, निराला जैसे रचनाकार तुलसीदास को सर ऑंखों पर बैठा रहे थे (अब ये ब्राह्मणों के रूपों में पहचाने जा रहे हैं) और आजक वर्णवाद व स्त्रीविरोध के प्रतीकों के रूप में।

राजेंद्र यादव की बातों में दम है इससे इंकार नहीं किया जा सकता, प्रतिक्रिया में लिखते हुए हमारे गुरू कृष्‍णदत्‍त पालीवाल जो बकौल खुद के ' ब्राह्मण हैं, पिशाच हैं, नीच हैं- वे कोशिश करते हैं पर कन्विंसिंग नहीं हैं। हम तो बात सामने इस मकसद से रख रहे थे कि देखो भाई हाशियाई विमर्श क्रूर है, किसी को नहीं बख्‍शता। क्‍या बख्‍शना चाहिए ?

Saturday, August 11, 2007

वर्नाक्‍यूलर इंडैम्निटी बांड की शर्मिंदगी से गुजरे हैं कभी ?

अगर आपको कभी बैंक लोन लेना पड़ा हो , बीमा पॉलिसी लेनी पड़ी हो या किसी हाई कोर्ट या सर्वोच्‍च न्‍यायालय में कोई कागज दाखिल करना पड़ा हो- तथा अगर आप हिंदी में हस्‍ताक्षर करने वाले जीव हों तो आपको बेहद अपमानजनक प्रक्रिया से गुजरना पड़ा होगा- इस प्रक्रिया का नाम है- 'वर्नाक्‍यूलर इंडैम्निटी बांड' यानि गुलामों की भाषा विषयक दायित्‍वमुक्ति का करार।




अब हम लाख खुद को प्रगतिशील व रैशनल घोषित करें पर राष्‍ट्रवाद का इतना कीड़ा तो हममें भी है (और सच कहें हमें कोई शर्मिंदगी नहीं) कि हमें ये बात बेहद चुभती है कि ये देश है किसका... अगर अपनी भाषा में लिखने/बोलने पर हम जाहिल मान लिए जाते हैं और हमें लिख कर देना पड़ता है (गवाह के साथ) की हमें हमारी औकात वाली भाषा में समझा दिया गया है हजूर। हमारे नाम के सामने डा. लिखा था, हमारी बैंक सेल्‍स एजेंट बेचारी पत्राचार से बीए थी, खिसियाते हुए पर्चा आगे करती है- सर क्‍या करें रूल्‍स ऐसे हैं- गलत हैं पर पुराने चले आते हैं- हम भी पूरी व्‍यवस्‍था की खीज भला उस बेचारी पर क्‍यों निकालें पर अगर कहें कि अपमानित महसूस नहीं किया तो झूठ होगा।


न्‍यायपालिका की भाषा बिना किसी तैं पैं के अंग्रेजी है- संविधान नाम की वह किताब जो संविधान सभा नाम के जमावड़े ने लिखी जिसमें भाषा को लेकर आत्‍मविश्‍वास की गहरी कमी थी, उससे यही उम्‍मीद की जा सकती थी। हम कोई सिद्धांत नहीं गढ़ रहे, बुरे अनुभव को साझा कर रहे हैं, पर सब बुरा ही बुरा नहीं हो रहा भाषा के मोर्चे पर। हिंदी राष्‍ट्रवाद की कैद से आजाद हो रही है, और गनीमत है कि हो रही है। हिंदी जब एक भाषा की तरह जीने की राह छोड़कर राष्‍ट्र या संस्कृति का बोझा ढोने वाली डांगर बनती है तो वह बहुत कुछ से वंचित होती है। वह दूसरी देशी-विदेश भाषाओं से अठखेलियॉं करने का अवसर गंवाती है, कभी कभार संसर्ग या संभोग के उन अवसरों से भी वंचित होना पड़ता है जिनसे भाषा गाभिन होकर सृजन करती है। केवल हाल में मीडिया के उफान व बाजार की जरूरतों के चलते हिंदी 15 अगस्‍तों और 14 सितम्‍‍बरों से मुक्‍त होती दिख रही है और - आई एम लविंग इट :)


Friday, August 10, 2007

ताजा कीवर्ड विश्‍लेषण

हमारे स्‍टेटकाउंटर के अनुसार इस चिट्ठे तक हाल में सर्च इंजनों के माध्‍यमों से पहुँचे लोग दरअसल निम्‍न चीजों को तलाशते हुए पहुँचे थे।

मसिजीवी

hi.mustdownloads.com

कामसूत्र

mentapan

tube telgu

parishram poem in hindi

masijeevi

hindi sahitya ko sune

suno nigam

हैरी पॉटर इन

रिपुदमन

logamela

8220⢜र

nukta

megha patkar

manohar shyam joshi

नये हिदी लेखक

dhanolty

जो स्याही की सह

un hee lee

ka´ek

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क्या चल रहा है

क्‍यों जरूरी है पॉलीमिक

रिवर्स स्‍वीप सचिन की अपनी ईज़ाद नहीं है पर इसके वे बेहतरीन खिलाड़ी हैं। एक साक्षात्‍कार में उन्‍होंनें इस शाट में अपनी दक्षता के कारण का खुलासा किया कि गली क्रिकेट के दिनों में बाल खोने से बचने के लिए एक नियम होता था कि सीधे हाथ के बल्‍लेबाजों को खब्‍बू बनकर खेलना होता था तथा खब्‍बू बल्‍लेबाज सीधे हाथ से बल्‍लेबाजी करते थे। बचपन के इस अभ्‍यास ने उन्‍हें ऐसी दक्षता दी कि वे रिवर्स स्‍वीप जैसे शाट आसानी से लगा पाते थे। हम किसी रिवर्स स्‍वीप के माहिर नहीं हैं, न तो अक्षरश: न ही प्रतीकात्‍मक रूप से। पर बहस के ककहरे को हमने भी इसी अंदाज में सीखा है।

कालेज के दिनों में हम खुद या कोई मित्र बहसबाज जब कोई विचार पटकते थे, गिराते थे तो वे गुजारिश करते थे कि एक सत्र थेथेरोलॉजी का किया जाए, इसका मतलब होता था कि अपनी राय को तह रखकर बगल में रखो, और विचार के ईमानदार विपक्ष बनकर उन सभी आपत्तियों को यथासंभव ताकत से सामने रखो ताकि विचार की दरारें स्‍पष्‍ट हो जाएं। इस प्रक्रिया का फायदा यह था कि ये गर्म बहस को जन्‍म देती थी और इससे बहस आगे बढ़ती थी। हमारी बौद्धिक ट्रेनिंग किसी संघी बौद्धिक शिविर में नहीं हुई है, न ही नक्‍सली या वामपंथी कैंपों का ही अनुभव है पर वाम लोगों से संघी तर्को का इस्तेमाल कर बहसियाने में गुरेज नहीं हुआ- लोग सांप्रदायिक कहें तो कहें, इसी तरह संघी मित्रों के साथ लोकतांत्रिक तर्कों से लोहा लिया है। बहुत बार बहस आगे बढ़ पाई है। इससे किसी को भ्रम होता होगा... उस पर फिर कभी, यूँ ये बातें गली क्रिकेट के जमाने की हैं। इस तरह की बहस की संरचना पर अपनी बात कह दें- खैर यही वजह है कि जब 'साधुवाद का अंत' दृष्टिगत हुआ तो खुश हुए, मातम नहीं मनाया। साधुवाद टकराव का निषेध करता है और टकराव बिना विकास नहीं हो सकता।

परिभाषा में पॉलिमिक बहसियाने की वह पद्धति है जो असहमतियों में मुखर होती है तथा प्रतिक्रियाओं को जन्‍म देने के इरादे से अपनाई जाती है। शब्‍द का स्रोत प्‍लेटो का रिपब्लिक है जिसमें इस जैसे नाम के पात्र का ऐसा रवैया है। शाब्दिक अर्थ 'युद्ध जैसी' बनता है। इसमें कभी कभी गैर अनुपातिक आत्‍मविश्‍वास भी होता है। जाहिर है इसका प्रवेश किसी भी विमर्श वृत्‍त में तभी होता है जब विमर्श का एक लोकतांत्रिक स्‍पेस निर्मित हो चुका हो।

जैसे कि माना जाता है कि विमर्शों की शुरूआत के लिए पॉलिमिक एक अच्छी विमर्श संरचना है क्‍योंकि वह प्रतिक्रियाओं को जन्‍म देती है, किंतु साथ ही इसकी सीमाएं भी स्‍पष्‍ट हैं, पॉलिमिक चूंकि एक तरफ की बात कहते हैं इसलिए वे संतुलन के मामले में दरिद्र होते हैं।

यह भी तय रहा कि जिस पॉलिमिक संरचना में हम कभी कभी अपनी बात कहते हैं वह ' आदतन' की गई खुराफात नहीं है, अगर कोई उसे खुराफात भी कहे तो भी हम उसे आदतन हो गया, गलती से हो गया कहकर डिस्‍ओन नहीं करते उसकी जिम्‍मेदारी लेते हैं। वैसे हमारी हर बात इस संरचना में कभी कभी ही होती है तथा अक्‍सर कोशिश केवल बात के दूसरे पक्ष को आमंत्रित करना ही होता है और ऐसा हमेशा इतने सकारात्‍मक तरीके से हो पाता हो ये जरूरी नहीं। इस संरचना में ये जोखिम तो हमेशा है ही, लोग अपने तरीके से अपने लहजे में ही बात करेंगे, गली क्रिकेट सबने खेली होती है पर सबके मुहल्‍ले के नियम अलग अलग होते हैं।

Wednesday, August 08, 2007

आवरण पेज के बहाने एक नई बहस का पूर्वाभास

पुस्‍तकें कहती हैं बहुत कुछ, इसे शायद कहने की जरूरत ही नहीं। पर पुस्‍तक में भी सबसे पहले संदेश देता है उसका आवरण पृष्‍ठ, बोले तो कवर पेज। इधर एक नई तिलमिला देने वाली चर्चा का पूर्वाभास आज हुआ। आलोक राय (अमृत राय के पुत्र और प्रेमचंद के पोते और फिलहाल दिल्‍ली में अंग्रेजी के प्रोफेसर) की पुस्‍तक हिंदी नेशनलिज्‍म ने हिंदी के इतिहास पर पुनर्विचार को 'इन थिंग' बना दिया था। आज कॉलेज में जाने माने पत्रकार व समाज विज्ञानों में हिंदी के जमे हुए शोधक अभय कुमार दुबे आंमंत्रित थे- अवसर था, भीष्‍म साहनी स्‍मारक व्‍याख्‍यान। अभय 'हिन्‍दी और हिन्‍दी राष्‍ट्रवाद' विषय पर बोले और अपनी उस सैद्धांतिकी को प्रस्‍तुत किया जो हिंदी में आउटसाइडर (शब्‍द उन्‍हीं का) चिंतन करने वाले अंग्रेजींदा लोगों की सैद्धांतिकी का उत्‍तर देती है। उन्होंने श्रमसाध्‍य शोधों के आधार पर आलोक राय, आदित्‍य निगम, बसुधा डालमिया, कृष्‍ण कुमार, फ्रंचेस्‍का ओरसीनी, अनिरुद्ध देशपांडे आदि का एक प्रोवोक करता क्रिटीक पेश किया। इन सबके विषय में जानकारी उसे पचा लेने और उससे टकरा लेने के बाद प्रस्‍तुत की जाएगी पर फिलहाल केवल आलोक राय की पुस्‍तक के कवर पेज का विश्‍लेषण देते हैं पर पहले देखें इस पुस्‍तक का मुखपृष्‍ठ-




यह कवर पेज पार्थिव शाह ने डिजाइन किया है।


अपने ताजा लेख 'अंगेजी में हिंदी' के खंड इतिहास की उलटयात्रा/पहला पड़ाव' में इस कवरपेज का विश्‍लेषण करते हुए अभय लिखते हैं .....अपने इस तर्क पर जोर देने के लिए संभवत: लेखक की सहमति से पुस्‍तक के आवरण पर त्रिपुंड और रूद्राक्षधारी दो ब्राह्मणों का चित्र छाप दिया गया है जिसकी पृष्‍ठभूमि में सींखचों वाला एक शटर है। उसके भी पीछे भारतेंदु हरिश्‍चंद्र और सरस्‍वती के टिकटाकार चित्र हैं। मतलब साफ है । हिंदी और सरस्‍वती सांखचों के पीछे पंडितों के पहरे में कैद है। जो हिंदी बाहर है और पंडितों के नेतृत्‍व में चल रही है वह मुरझा गई है, मर गई है या मरने वाली है।


वाकई आवरण पृष्‍ठों के सही पाठ भी लेखक की नीयत/कुनीयत को बेनकाब करते हैं। अभय ने अपने आलेख में इस अभिजनवादी सो की खूब बखिया उधेड़ी है। लेख 'वाक' के नवीनतम अंक में है- मिले तो जरूर पढें।


Sunday, August 05, 2007

क्‍यों बेबात सामने पड़ जाती हो - बेचारों को बार बार बलात्‍कार करना पड़ता है

अगर आपको लगता है कि ये ऊपर लिखा शीर्षक कोई ऐसा संवाद है जो केवल किसी नाटक में खलनायक ने किसी को बोला होगा तो जरा थमें। इन शब्‍दों में तो नहीं पर दिल्‍ली पुलिस ने ये शिकायत उत्‍तर-पूर्व की लड़कियों से की है। जी वही जिन्‍हें दिल्‍ली के मुखर्जी नगर व कैंप इलाके में बसे दिल्‍ली वासी जिनमें बिहार उत्‍तर प्रदेश के छात्र-छात्राएं भी शामिल हैं 'चिंकीज' के नाम से पुकारते हैं। जो पता नहीं क्‍यों दुपट्टे वाले सूट नही पहनतीं, हमेशा ऐसे कम वाले कपड़े पहनती हैं कि बेचारे भोले-भाले घरबारी मर्दों को उनका गाहे बगाहे बलात्‍कार करना पड़ता है। पता नहीं से ऐसा क्‍यों करती हैं- दिल्‍ली पुलिस भी यह समझ नहीं पा रही है और उसने बाकायदा एक पुस्तिका निकालकर अब इन 'चिंकीज' को ये सलाह दे डाली है कि वे अपने आप को सुधार लें।


सभी ब्‍लॉगर दिल्‍ली में नहीं रहते इसलिए थोड़ा पृष्‍ठभूमि स्पष्‍ट कर दी जाए। दिल्‍ली भारत का एक शहर है और इसकी राजधानी है। इस राजधानी वाले भारतवर्ष नामक देश में मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, असम, त्रिपुरा, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर जैसे राज्‍य हैं जिनकी संस्‍कृति के सभी तत्‍व जरूरी नहीं कि दिल्‍ली जैसे हों- उनका पहनावा, भोजन व दूसरी बातें कुछ अलग हैं, हो सकती हैं। तो इस राजधानी दिल्‍ली में जैसा कि हर शहर में होती है, एक पुलिस है जिसने अनुभव किया कि यहॉं पर इन क्षेत्रों के से शिक्षा व कामकाज के लिए दिल्‍ली आने वाली स्त्रियों से बलात्‍कार व छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ी हैं इसलिए दिल्‍ली पुलिस ने इन महिलाओं के लिए सुरक्षा की सलाहों वाली एक पुस्तिका जारी की है।



यहॉं तक तो सब ठीक ठाक है पर गड़बड़ खुद इस पुस्तिका की सामग्री में है। पुस्तिका एक तरह से महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की जिम्‍मेदारी एक तरह से खुद इन महिलाओं पर ही डाल देती है। मसलन वह सलाह देती है कि आप ऐसे नहीं वैसे कपड़े पहनें- ये एक पुराना जुमला है कि लड़कियों के इस तरह के कपड़े पहनने की वजह से उनके खिलाफ अपराध होते हैं- सभी जानते हैं कि ये अपराधी को बचाना और शिकार को अपराधी ठहराना है। दिल्‍ली में पूरी तरह ढंकी महिलाओं, बच्चियों, बेटियों, पड़ोसिनों से बलात्‍कार किया जाता रहा है।



यही नहीं पुलिस ये भी सलाह देती है कि आप अपनी रसोई में बैंबू शूट्स, अखुनी जैसे पकवान न पकाएं क्‍योंकि इसकी गंध से लोग परेशान होकर आपके खिलाफ अपराध कर सकते हैं। यह सलाह सिर्फ इतना बताती है कि खाकी वरदी पहनने भर से यह तय नहीं हो जाता कि आप संवेदनशील हो जाएंगे।


वस्‍तुत: यह केवल पुलिसिया समझ में संवेदनशीलता का अभाव ही नहीं है यह मुख्‍यधारा संस्‍कृति की अन्‍य संस्‍कृतियों के प्रति घोर अवहेलना भी है। गनीमत है कि पुलिस ने यह सलाह नहीं दी कि अपराध होने पर भी थाने जाने से बचें कहीं वहीं किसी पुलिसवाले को आपका बलात्‍कार न करना 'पड़ जाए'


हिंदू में कल्‍पना शर्मा ने दिल्‍ली पुलिस की इस पुस्तिका पर अपनी टिप्‍पणी देते हुए व्‍यंग्‍य में कुछ काम बताए हैं जो इन 'चिंकीज' को करने से बचना चाहिए-



  1. रात में अकेले बाहर मत जाओ- इससे पुरुषों को बढ़ावा मिलता है

  2. किसी भी समय अकेले बाहर मत जाओं - कुछ पुरुषों को किसी भी हालत में बढ़ावा मिलता है

  3. घर पर मत रहो - घुसपैठिए या रिश्‍तेदार बलात्‍कारी हो सकते हैं

  4. कम कपड़ों में बाहर मत जाओ- इससे पुरुषों को बढ़ावा मिलता है

  5. किसी कपड़े में बाहर मत जाओ- किसी कपड़े से पुरुषों को बढ़ावा मिलता है

  6. बचपन से बचें- कुछ बलात्‍कारी बच्चियों को देखते ही उत्‍तेजित हो जाते हैं

  7. वृद्धवस्‍था से बचें- कुछ बलात्‍कारी ज्‍यादा उम्र की औरतें अधिक पसंद करते हैं

  8. पिता, दादा, अंकल व भाइयों से बचें- ये युवा स्त्रियों के बलात्‍कार में अधिक लिप्‍त पाए गए रिश्‍तेदार हैं

  9. पड़ोस के बिना रहें- वे अक्‍सर बलात्‍कारी पाए जाते हैं

  10. विवाह न करें- विवाह में किया गया बलात्‍कार वैध है

  11. बचने का सबसे सही रास्‍ता है - तुम गायब हो जाओं

Saturday, August 04, 2007

आपकी नेकनीयती सरमाथे पर कुछ सलाहें अंग्रेजी वालों को भी दें।

रचना हिंदी और अंग्रेजी में ब्‍लॉग में लिखती हैं, अंग्रेजी में शायद पहले से लिखती हैं और हिंदी में भी खूब लिख रही हैं, अगर पोस्‍टों की संख्‍या को मापदंड माना चाहे तो चिट्ठाजगत के धड़ाधड़ पैमाने के अनुसार उन्‍होंने हाल में 10 दिनों में 29 पोस्‍टें लिखी हैं। उनकी पंचलाइन ही है -हिंदी को आगे लाए जाने के लिये इंग्लिश का बहिष्कार ना करके उसका उपयोग करें तो ज़्यादा बेहतर होगा

मुझे यह कार्यसूची रूचती है, वे पहली नहीं हैं हमारे ज्ञानदत्‍त जी तो इसके पहले से ही बड़े पैरोकार रहे हैं, इतने कि वो कई बार जानबूझकर केवल उकसाने भर के लिए अपनी पोस्‍ट में रोमन में लिखी अंग्रेजी का इस्‍तेमाल करते रहे हैं। आप नहीं ही पूछेंगे कि हमें कैसे पता कि ये उकसाने के लिए लिखा गया है, अरे भई हमसे बेहतर कौन पहचानेगा कि उकसाने के लिए लिखना क्‍या होता है- क्‍यों अनूपजी ? :)

तो खैर हिंदी और अंग्रेजी के बीच स्वाभाविक वैमनस्‍य का काल्‍पनिक संधान कर उसे पाटने का महत जिम्‍मा अपने ऊपर लेने का काम रचना और ज्ञानदत्‍तो द्वारा अक्‍सर किया जाता रहा है। जबकि सही बात यह है कि चिट्ठाकारी में इसकी शायद कोई जरूरत ही नहीं, क्‍योंकि यहॉं अंग्रेजी विरोध कोई स्‍वाभाविक बीमारी की तरह लोगों के मन में जमा नहीं बैठा है, कम से कम उस तरह तो नहीं ही जैसा कि अंग्रेजी के चिट्ठाकारों में इस 'फिल्‍थी' हिंदी जमात के लिए रहा है। पुराने चिट्ठाकारों को खूब याद होगा कि ब्‍लॉगमेला या इंडीब्‍लॉगीज के आरंभिक संस्‍करणों में ही कैसे अंग्रेजी चिट्ठाकारों ने अपने 'पवित्र' गुबार हिंदी वालों के लिए प्रकट किए थे- बिल्‍कुल नए लोगों को बताया जाए कि एक समय था जब चिट्ठों व चिट्ठाकारों की कमी के चलते पुराने चिट्ठाकारों ने यह सोचा कि उन भारतीय ब्‍लॉगरों तक पहुँचा जाए जो अंग्रेजी में ब्‍लॉग लिखते हैं- इनके ब्‍लॉगों पर हिंदी में टिप्‍पणियॉं करने का बीड़ा कुछ लोगों ने उठाया इसके लाभ भी हुए पर कुछ पवित्रहृदयी अंगरेजों को यह उनके ब्‍लॉगों का अपमान लगा, जरा इस टिप्‍पणी पर गौर फरमाएं-

Thousands of NRIs (inlcuding Hindi speaking people) have got jobs offshore because they speak good english. Thousands of them are working in non hindi states because their beloved Hindi heartland (BIMARU states) have nothing to offer in terms of good jobs.
So what is the problem in expressing your thoughts in english when you earn bread and butter from this language. If a bunch of people want to read and write in their regional language they should keep it confined to their web sites.
By sneaking into greater disopera like BBM or english blog writers, by leaving nice comments at our sites with their URLs pointing to their hindi sites, they want to lure us to read the material written in hindi plagiarized from english blogs.
And dear indiablogger, what a pity, looks like you are pushing some sort of Hindi agenda from your blogger awards too.You have managed to make two jury members who have hindi blogs, you have managed to get 3 sponsors including Microsoft for hindi blogs (except Sidharth Sivasailam )

यहॉं बीबीएम से आशय भारतीय ब्लॉग मेला है। इस तरह की टिप्‍पणियों के जबाव भी दिए गए थे पर इतना तय है कि ये विचार नकचढ़े भारतीय अंग्रेजी ब्‍लॉगरों की काफी प्रचलित राय को व्‍यक्‍त करते हैं जो शायद अब भी काफी बदली नहीं है। एक अर्जित भाषा से उधारी का दर्प हमारी समझ से बाहर रहा है, इसलिए जहॉं कुछ परिचित लोगों के अंग्रेजी चिट्ठों पर हम टिप्‍पणियॉं यदा कदा करते रहे हैं पर इससे ज्‍यादा नहीं। अंग्रेजी व हिंदी सद्भाव के घोषित ऐजेंडे वालों की नीयत पर हमें कोई शक नहीं है पर एक बात उन्‍हें समझनी चाहिए कि वे कोई मौलिक काम नहीं कर रहे हैं, वे कोई आसान काम नहीं कर रहे हैं, और सबसे जरूरी ये कि वे रोग का इलाज रोगी में करने के स्‍थान पर एक स्‍वस्‍थ व्‍यक्ति का इलाज करने सिर्फ इसलिए जुट गए हैं कि यह स्वस्‍थ व्‍यक्ति इलाज करवाने के लिए तैयार है और असल रोगी आपको कोई भाव दे नहीं रहा है। दरअसल प्रिंट या विश्‍वविद्यालयी दुनिया में जो भी हो पर अंतर्जाल की दुनिया में हिंदी के लोग अंग्रेजी भाषा के प्रति दुराग्रह से पीडि़त नहीं है या कम पीडित हैं इसलिए आपकी नेकनीयती सरमाथे पर कुछ सलाहें अंग्रेजी वालों को भी दें।

Friday, August 03, 2007

क्‍या आपको जल्‍द ही गूगल की ओर से मुफ्त मोबाइल मिलने वाला है ?

गूगल आउट ऑफ बाक्‍स परिकल्‍पनाएं करने के लिए जाना ही जाता है। जरा इस बात की कल्‍पना कीजिए कि आपको एक ऐसा मुफ्त (या बहुत कम शुरूआती कीमत तथा मुफ्त मासिक बिल के साथ) मोबाइल फोन उपलब्‍ध करवाया जाए जिसमें कैमरा हो, जीपीआरएस हो जिससे आपको जहॉं आप हैं वहॉं का मानचित्र तत्‍काल मिल पाएगा, वाई फाई तकनीक के हाटस्‍पाट भी उपलब्‍ध कराए जाएंगे--- हॉं भई गूगल ऐसा कर सकता है बल्कि कर रहा है। खालाजी का घर नहीं है वरन स्‍मार्ट बिजनेस समझ है। आपकी तस्‍वीरें, आपकी मूवमेंट का डाटा, आपके मोबाइल नेट का डाटा जिसमें ईमेल व सर्फिंग शामिल है, इन सब से गूगल आपके मोबाइल पर टेक्‍स्‍ट व वॉइस के ऐसे विज्ञापन उपलब्‍ध करवा पाएगा जिनकी आपको जरूरत होगी और इससे गूगल को मिलेंगे नोट, नोट और नोट। इसे कहते हैं बिजनेस और भविष्‍य की समझ जो गूगल दिखा रहा है। हाल में वाल स्‍ट्रीट जर्नल में इस आशय का एक लेख छपा है जो गूगल के इन इरादों का खुलासा करता है। वैसे ऐसा सुविधा संपन्‍न मोबाइल अमरीका व यूरोप में 2008 तक उपलब्‍ध करवा दिया जाएगा फिर बाकी दुनिया का भी नंबर आएगा।



वैसे सभी अमरीकी इस प्रस्‍ताव से बल्‍ले बल्‍ले नहीं कर रहे हैं- सबसे पहले तो सेलफोन कंपनियॉं चीखोपुकार कर रही हैं कि गूगल भी अब माइक्रोसॉफ्ट की तरह मोनोपोलिस्टिक हो रही है और उनका खानाखराब करने पर उतारू है तिस पर ग्राहकों को जबरिया विज्ञापन दिखाने को लेकर भी आपत्ति दर्ज की जा रही है, किंतु चूंकि अभी उतपाद पूरी तरह बाजार में नहीं हैं केवल प्रोटोटाईप ही उतारे गए हैं इसलिए पूरी तरह नहीं मालूम कि अंतिम उत्‍पाद में विज्ञापन देखने व क्लिक करने या न करने की आजादी अब की ही तरह उपभोक्‍ता के पास रहेगी कि नहीं, पर गूगल आमतौर पर इस बारे में समझदारी दिखाता रहा है। इतना जरूर है कि गूगल ने औपचारिक तौर पर अपने मोबाइल पोजेक्‍ट के बारे में गंभीर होने को स्‍वीकार कर लिया है तथा स्‍पैक्‍ट्रम के लिए दावेदारी भी पेश की है- मायने ये हैं कि गूगलफोन अफवाह नहीं वरन घटना है।


Thursday, August 02, 2007

नुक्‍ता चीन्‍हीं

 

दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के बहुत कम कॉलेजों में उर्दू पढ़ाई जाती है, फारसी कुल जमा दो कॉलेजों में और अरबी, फारसी और उर्दू पढ़ाने वाला कॉलेज सिर्फ हमारा है। इससे 'अलग' होने का जो आनंद आता है उसे जाने दें पर इसके कई गंभीर और बेतुके निहितार्थ हैं। पहला तो ये है कि आप लगातार पॉलीटिकल करेक्‍टनेस के पाखंड से दो-चार रहते हैं।  हम ब्लॉगिंग में जो होते हैं उससे ठीक उलट स्थिति इस पाखंड में होती है। समझिए कि हर कोई मैं ज्‍यादा बड़ा अविनाश हूँ का दावा ठोंक रहा होता है। अक्‍सर लोग भूल जाते हैं कि माना उर्दू का सवाल अल्‍पसंख्‍यक से जोड़ा जा सकता है इसलिए उर्दू को समर्थन देने से एकबारगी मान भी लिया जाएगा कि आप 'महान सेकुलर' हैं सिद्ध होता है पर जनाब फारसी और अरबी तो विदेशी भाषाएं हैं, चाहे विदेशी की जो परिभाषा आप तय करें। इन भाषाओं के अपने भाषाक्षेत्र आज भी दुनिया में  हैं इसलिए इन्‍हें इसी आलोक में ही देखा जाना चाहिए। और यह भी कि यदि कोई इन भाषाओं पर बिछ बिछ जाने को जरूरी नहीं मानता तो वह न तो संघी हो जाता है न ही सांप्रदायिक।

थोड़ा सीधे बात करें- अपने दोनों तरह के मित्र हैं - खूब हैं। एक तो बिहार से दिल्‍ली आए पहली पीढ़ी के लोग जो पत्रकारिता में, और हिंदी या अन्‍य विषयों के शिक्षण में पसरे हुए हैं। रवीश, अविनाश, नीलूरंजन किस्‍म के। इनमें से बहुत सों ने अपने को प्रशिक्षित कर लिया है, खूब जद्दोजहद के बाद पर अब भी वे गाहे बगाहे श को स बोल जाते हैं। दूसरे अन्‍य मित्र हैं जो या तो मूल दिल्‍ली- बोले तो दिल्‍ली-6, यानि पुरानी दिल्‍ली के बाशिंदे हैं या अन्‍य मुसलमान साथी हैं- ये अक्‍सर इन बिहारियों के उच्‍चारण पर ठठ्ठा मार कर हँसते हैं और साथ ही ताकीद करते हैं कि उनके नाम को **** खान नहीं ख़ान(ख़ान यानि नुक्‍ते के साथ)  बोला जाएं क्‍योंकि सही उच्‍चारण ख़ान है। ऐसी की तैसी... हम बिहारी नहीं है भाषा दिल्‍ली की बस्तियों में ही सीखी है पर ये बिंदी वानी हिंदी हमें रास नहीं आती, इससे तो हिंदी का भोजपुरिया जाना हमें ज्‍यादा अच्‍छा लगता है।

हमें जो समझ आता है कि मामले की जड़ हिंदी-उर्दू विवाद में है। पोलिटिकल करेक्‍टनेस के झंडाबरदारों ने ये गलतफहमी चारों ओर फैलाने की खूब चेष्‍टा की है  कि हिंदी और उर्दू दो लिपियों में लिखी जा रही 'एक भाषा' हैं। ऐसा मनवा लेने से एक संप्रदाय को हिंदी का स्‍पेस मुहैया होता है (वैसे अपन को  मुगालता नहीं है, हिंदी का बढ़ा हुआ स्‍पेस राजनैतिक भर है न कि साहित्यिक या भाषा वैज्ञानिक या ऐतिहासिक)  मुस्लिम संप्रदाय  को यह विश्‍वास दिलाना सरल हो जाता है कि आप एलिनिएट अनुभव न करें। हमें इस 'राष्‍ट्रीय एकता' के इन महान प्रयासों से कोई खास परेशानी न होती अगर इसकी कीमत चुकाने की जिम्‍मेदारी हिदी भाषा को न दी जा रही होती। अब वे ध्‍वनियॉं जो हिदी में नहीं हैं (नहीं है का मतलब है कि ये हिदी में स्‍वनिम नहीं है- इनके इस्‍तेमाल से हिंदी में अर्थ का अनर्थ नहीं होता) तथा उनके लिए लिपि में खुद ब खुद इंतजाम नहीं है (नुक्‍ता तो जुगाड़ है) उसे थोपना, और जनाब थोपना ही नहीं ऐसा न करने वालों को अशुद्ध या गलत भी ठहराना- माफ करें हिंदी खुद ही अस्तित्व की लडाई लड़ रही है वह हर वर्ण के नीचे एक अलहदा नुक्‍ते का बोझ नहीं सह सकती। अगर जनाब ***खान रोमन में khan से किसी किस्‍म के अपमान को महसूस नहीं करते,  k के नीचे किसी नुक्‍ते का बोझ नहीं लादते, हमारे राम भी Rama होना सह लेते हैं तो फिर खानसाहब ही हिदी भाषा में नुक्‍ते की जंजीरे डालने पर क्‍यों तुले हैं। एक बात साफ है कि एक भाषा का शब्‍द जब दूसरी भाषा में जाता है तो वह भले ही संज्ञा ही क्‍यों न हो इस भाषा के अनुसार या इसकी लिपि के अनुसार थोड़ा बहुत बदलता है, उसे बदलना चाहिए न कि भाषा पर दबाब बनाना चाहिए कि वह बदले।

जब हम उर्दू बोलते हैं या उसे लिखते हैं, मसलन शेरो शायरी में, तो हम उर्दू की प्रकृति के अनुसार ही व्‍यवहार करते हैं पर जब बात बाकायदा हिंदी की हो तो मानना होगा कि ये दो लिपियों में एक भाषा नहीं है - वरन जैसा नामवर सिंह स्‍थापित करते हैं तथा जिसका संकेत प्रेमचंद ने किया था- ये दो लिपियों में दो भाषाएं हैं। एक पर दूसरे को न लादें। और हॉं ये शुद्धतावादी आग्रह नहीं है हिंदी -उर्दू में आगत निर्गत होना चाहिए, हम समर्थक हैं पर ये दोनो भाषाए अपनी प्रकृति के अनुसार करें।

हिंदी-उर्दू का मसला बर्र का छत्‍ता है, ब्‍लॉग की दुनिया है इसलिए लिख दिया तो लिख दिया देखा जाएगा। :)

Wednesday, August 01, 2007

बिना मुर्ग के सेहराबंदी- ऐ वी कोई गल ओई

सिख दिल्‍ली में एक खाती-पीती प्रभावशाली कौम है और यूँ भी सिख बिरादरी टेंशन न लेने वाली बिरादरी है। खूब मेहनत करते हैं कमाते हैं और शान से जीना पसंद करते हैं। शान से जीने का मतलब ही है अच्‍छा पहना, अच्‍छा खाना, अच्‍छा पीना। अब हाल में दिल्‍ली सिख गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी के निर्देश जारी हुए हैं जिसके तहत सिख समुदाय को विवाह गुरूद्वारों में ही करने होंगे तथा शाम को होने वाले विवाह समारोहों पर कड़े प्रतिबंध लागू किए गए हैं- न तो मांसाहारी भोजन न ही शराब। लो कल्‍लो बात... ये भी भला क्‍या सिख शादी।।

कारण यह बताया जा रहा है कि ऐसा करने शादियों को कम खर्चीला बनाया जा सकेगा जिससे कन्‍या भ्रूण हत्‍या तथा औरतों पर हो रहे अत्‍याचारों को कम किया जा सकेगा।
अब ये इतने 'पवित्र' उद्देश्‍य हैं कि लगता है कि वाह धर्म तो समाज सुधार की महत भूमिका में आ गया है, कितनी अच्‍छी बात है। अब कैसे कोई खिलाफ बोले पर हमें फिर भी बात कुछ जम नहीं रही, कुछ वर्ष पहले ऐसा ही फरमान जम्‍मू कश्‍मीर में सरकार की तरफ से भी जारी किया गया था। भले ही हम इसके उद्देश्‍यों को इतना बुरा नहीं मानते और हमें ये भी लगता है कि फिजूलखर्च विवाहों को थामा जाना चाहिए पर धर्म या राज्‍यों की इसमें क्‍या भूमिका होनी चाहिए ?



राज्‍य या धर्म जब ऐसी नियामक भूमिकाओं में आने लगें कि वे अपने धर्मावलंबियों की जीवन शैलियों को नियंत्रित करने लगें तो ये आधुनिक समाजों के लिए हितकर बात नहीं है- वैसे यह सिर्फ आधुनिक समाजों के ही लिए कहा जा रहा है वरना मध्‍ययुगीन समाज में तो जीवन का प्रत्‍येक पक्ष ही धर्म ही नियंत्रित करता था। पर आधुनिक समाजों को ये नियंत्रण व्‍यक्ति के ही हाथ में रहने देने चाहिए हॉं कभी कभी राज्‍य को ये नियंत्रण हस्‍तगत करने पड़ सकते हैं पर राज्‍य एक प्रक्रिया से वैधता हासिल करता है किंतु धर्म इस मामले में एक गैर जबावदेह संस्‍था है इसलिए भले शुभेच्‍‍छा से ही सही, उसे ऐसा करने से परहेज करना चाहिए। और तनिक इस बात पर भी विचार करें कि सिख शादी अगर बोटी-बोतल के बिना होगी तो क्‍या खाक होगी। अगर कुछ प्रतिबंध जरूरी ही था तो कह देते कि सिख शादी वधु के बिना होगी - फिर भी चल जाता- पर अच्‍छा खाना न हो, पीण वास्‍ते कुछ न हो- ऐ वी कोई गल ओई।




Tuesday, July 31, 2007

फंतासिया नजर शहर पर

शहर को समझना यूँ ही काफी जटिल काम है, कई लोग इसमें खप गए और खपेंगे, हमारी भला क्या बिसात। इसलिए हम जब शहर पर नजर डालते हैं तो कतई राजी नहीं होते कि शहर को अर्बन प्लानरों की नजर से देखें हम तो ठेठ अपनी नजर डालते हैं। इसलिए जब शिवम ने इमारतों वाले शहर के विषय में लिखा कि आत्‍महत्‍या का मसला - सातवें माले से कूद पड़ना- खुदकशी नहीं है ये तो शहर का मिजाज है- किसी शहरी को लग सकता है कि शहर चपटा हो गया है और वह ऊंचाई के आयाम को बिल्‍कुल भूलकर चलता हुआ आगे जा सकता है। ये शहर से बेतरतीबी के लुप्‍त हो जाने की फंतासी है।


यह शहर में जंगल खोजना ही नहीं। ये शहर में बावड़ी खोज लेना भी है जो अंधेरे के हिलोरते जल तक ले जाते हैं

शहर में अंधेरा जल बनता है तो केवल बावड़ी की तरह ठहरा हुआ ही नहीं होता वरन बहुधा वह एक ल‍हराता समुद्र भी होता है- प्रकाश-स्‍तंभों से भरा हुआ।

और काल यहॉं खुद ठहरता है नाप-तौल कर।