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Wednesday, February 18, 2009

आहती जीवों की बन आई है

एक समाचार होले से आया और चुपचाप निकल गया, ब्‍लॉगजगत ने नोटिस तो लिया पर बस ...।  समाचार का संबंध स्‍टेट्समैन के संपादकों की गिरफ्तारी से है। कोलकाता के इस अखबार के संपादकों रवीन्‍द्र कुमार तथा आनन्‍द सिन्‍हा को इसलिए गिरफ्तार किया गया कि उन्‍होंने इंडिपेंडेंट में प्रकाशित एक लेख को अपने अखबार में पुनर्प्रकाशित किया था। जोहन हरी ने अपने लेख 'व्हाई शुड आई रिस्‍पेक्‍ट दीज आप्रेसिव रिलीजंस' में सवाल उठाया है कि हाल के वर्षों में धार्मिक आस्‍थाओं का सम्‍मान करने के नाम पर धार्मिक कठमुल्‍लई पर सवाल उठाने के हक से महरूम करने की साजिश की जा रही है। एक भले लोकतांत्रिक समाज में हर किसी को अपने धर्म में आस्‍था रखने (या न रखने) की आजादी होनी चाहिए। इन समाजों को धार्मिक व्‍यवहारों की आलोचना की भी आजादी होनी चाहिए लेकिन अक्‍सर धार्मिक आस्‍थाओं को चोट न पहुँचाने के नाम पर हम ऊत-बाबली बात बिना आलोचना परीक्षण के फलती रहती है।

हरी की मूल आपत्ति है कि भले ही हर इंसान सम्‍मान का हकदार है पर हर विचार का सम्‍मान करने पर विवश करना गैर लोकतांत्रिक है वे सवाल उठाते हैं कि

All people deserve respect, but not all ideas do. I don't respect the idea that a man was born of a virgin, walked on water and rose from the dead. I don't respect the idea that we should follow a "Prophet" who at the age of 53 had sex with a nine-year old girl, and ordered the murder of whole villages of Jews because they wouldn't follow him.

I don't respect the idea that the West Bank was handed to Jews by God and the Palestinians should be bombed or bullied into surrendering it. I don't respect the idea that we may have lived before as goats, and could live again as woodlice

(प्रत्‍येक इंसान सम्‍मान का हकदार हे लेकिन हर विचार नहीं। मेरे लिए इस विचार का सम्‍मान करना संभव नहीं कि एक कुंवारी ने आदमी को जन्‍म दिया, कोई पानी पर चला तथा मौत के बाद फिर जिंदा हो गया। मैं इस विचार का सम्‍मान नहीं करता कि हम किसी ऐसे पैगंबर का अनुगमन करें जो 53 साल की उम्र में किसी नौ साल की बच्‍ची से संभोगरत हुआ हो तथा जिसने पूरे के पूरे यहूदी गांव को इसलिए कत्‍ल करने का हुक्‍म दिया हो क्‍योंकि वे उसके भक्‍त बनने को राजी नहीं थे।

मैं इस विचार का सम्‍मान नहीं करता कि वेस्‍ट बैंक भगवान ने यहूदियों को सौंपा है तथा फिलीस्‍तीनियों पर बमबारी कर उन्‍हें समर्पण करने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए। मैं इस बात का सममान करने पर राजी नहीं कि हम किसी जन्‍म में बकरी रहे होंगे तथा अगले जन्‍म में घुन बन सकते हैं। )

सेकुलरवाद का अतिवादी अर्थ लेने वाले भारत में इन मूर्खतापूर्ण आस्‍थाओं पर सवाल उठाना और कठिन है। जो लेख इंग्‍लैंड में छपा और अब भी मजे से उपलब्‍ध है उसे केवल पुनर्प्रस्‍ततु करने की सजा के रूप में इन्‍हें गिरफ्तारी सहनी पड़ी। हमेशा की तरह हमारा मानना है कि यदि आस्‍था या ठेस पहुँचाने से बचने की कोशिश में हम धर्म को आलोचना से परे कर देंगे तो स्‍वात घाटी की स्थितियॉं चॉंदनीचौक पर आ पसरेंगी। 

मजे की बात ये है कि धर्म का सहारा लेकर आप कितनी भी फूहड़ घोषणाएं करें आप पर सवाल नहीं उठाए जाएंगे नही तो स्‍यापा करेंगे कि हाय हाय हमारी आस्‍थाएं आहत हो गई हैं। फिर आप ग्रहों और नजर टोटकों की 'वैज्ञानिक' व्‍याख्‍याएं करें या खांसी चुकाम के लिए ग्रहो, रत्नों, देवों को जिम्‍मेदार ठहराएं... झट स्‍वीकार कर लिया जाएगा... कोई सवाल नहीं।

Monday, November 17, 2008

(मत) मुस्‍कराएं कि आप कैमरा पर हैं

गनीमत है कि हम भारतीय सार्वजनिक साईनबोर्डों को बहुत गंभीरता से नहीं लेते वरना कम से कम दिल्‍ली के नागरिकों की मुँह की पसलियों का चटकना तो  तय है, हर माल, सड़क, स्‍टेशन, मैट्रो, चौराहे, दफ्तर, स्‍कूल, कॉलेज, होटल-रेस्त्रां में एक कैमरा हम पर चोर नजर रख रहा होता है। अक्‍सर एक साइनबोर्ड भी लगा होता है कि मुस्‍कराएं, आप कैमरा पर हैं। मैं तो बहुत प्रसन्‍न हुआ जब मैंने सुना कि शीला दीक्षितजी ने कहा है कि जल्‍द ही पूरी दिल्‍ली को वाई-फाई बनाया जा रहा है...बाद में पता चला कि इसका उद्देश्‍य सस्‍ता, सुदर टिकाऊ इंटरनेट प्रदान कराना उतना नहीं है जितना यह कि वाई फाई के बाद सर्वेलेंस कैमरे लगाना आसान हो जाएगा..जहॉं चाहो एक कैमरा टांक दो...बाकी तो वाईफाई नेटवर्क से डाटा पहुँच जाएगा जहॉं चाहिए।

image दुनिया के अन्‍य लोकतंत्रों में भी जहॉं निजता की रक्षा के कानून खासे सख्‍त हैं, वहाँ सर्वेलेंस कैमरों की अति से लोग आजिज हैं। वैसे जाहिर है कैमरे केवल मूर्त प्रतीक भर हैं, सच तो यह है कि हम बहुत तेज गति से एक सर्वेलेंस समाज (हिन्‍दी में इसके लिए क्‍या शब्‍द कहें? अभी नहीं सूझ रहा) में बदलते जा रहे हैं। सावधान कि हम पर नजर रखी जा रही है। कहीं सुरक्षा की जरूरतों के चलते हमारे सार्वजनिक स्‍पेस का चप्‍पा-चप्‍‍पा  इन कैमरों के जद में आ गया है। वहीं कहीं सुविधा, आईटी आदि के नाम पर भी हमारे निजत्‍‍व पर खतरा बढ़ रहा है। कालेज के हमारे परिसर में कईयों कैमरे लगे हैं इसी तरह मैंने ध्‍यान दिया कि मेरे विश्‍वविद्यालय की वेबसाईट पर सैकडों स्‍त्री- पुरुषों के नाम पते व शिक्षा आदि के ऑंकडे डाल दिए गए हैं, लिंक जानबूझकर नहीं दे रहा हूँ ताकि निजता के इस उल्‍लंघन में मेरी हिस्‍सेदारी न हो। 

अधिकांश आधुनिक समाज इन कैमरों को इस तर्क से सह लेते हैं कि सुरक्षा के लिए नेसेसरी-ईविल हैं, या ये भी कि इनसे अपराधी डरें हम क्‍यों। किंतु अनेक शोध बताते हैं  कि एक सर्वेलेंस समाज स्वाभाविक समाज नहीं होता, जब हमें पता होता है कि हम पर निगाह रखी जा रही है तो हम अधिक तनाव में होते हैं तथा अपने व्‍यवहार को निगाह रखने वाले की अपेक्षा के अनुरूप बनाने का प्रयास करते हैं जो अक्‍सर कृत्रिम होता है। मेरे कॉलेज के युवा छात्र अब चिल्‍लाकर, अट्टहास करते हुए गले मिलते नहीं दिखाई देते या बहुत कम दिखाई देते हैं...ये नहीं कि ये किसी कानून के खिलाफ है पर वे जानते हैं कि उन्‍हें देखा जा रहा हो सकता है...इसी प्रकार दिल्‍ली मैट्रो में दिल्‍लीवासियों के जिस व्‍यवहार की बहुत तारीफ होती है उसके पीछे भी कैमरों की अहम भूमिका है, किंतु आम शहरी हर जगह खुद को 'सिद्ध' करता हुआ घूमे तो कोई खुश होने की बात तो नहीं।

खैर चलूँ कालेज का समय हो रहा है, अगर गिनूं तो मैं घर से कॉलेज तक कम से कम 40 कैमरे मैट्रो के 8 कॉलेज के फिर 3-4 सड़क पर और वापसी में भी इतने ही कैमरे...जहन्‍नुम में जाएं सब, हम नहीं मुस्‍कराते भले ही हम कैमरे पर हों।

Friday, December 28, 2007

जमीन के नीचे से केबलचोरी के हुनर का निजीकरण

कम्यूनिस्‍ट नहीं हैं, इस विचारधारा का घणा विरोध किया है इतना कि कई बार तो लोग सिर्फ इस विरोध की बुनियाद पर मानते रहे हैं कि जरूर 'संघी' ही होउंगा। वो भी नहीं हूँ। ये अकेला अंतर्विरोध नहीं है व्‍यक्तित्‍व में अपने और भी ढेरों हैं। दरअसल इस लिहाज से देखा जाए तो सिर्फ ब्‍लागिंग ही एकमात्र जगह हे ज‍हॉं हमारी निभ रही है वरना हर खांचा एक या दूसरी किस‍म की कैडरबद्धता की मांग करता है। ब्‍लॉगिंग में इसलिए चल जाता है कि यहॉं कोई आपसे अंतर्विरोधों से मुक्‍त होने की शर्त नहीं रखता। जिसे अतर्विरोधों से मुक्‍त लोग मिलें वह उनके साथ मिलकर एक अंतर्विरोधों से मुक्‍त दुनिया बसा ले। हमारी सच्‍चाई ये है कि कम्‍यूनिज्‍म का विरोध करते थे पर प्राइवेट की जगह डीटीसी में बैठना पसंद करते थे, पैसा जाए तो सरकारी क्षेत्र में जाए। अब तक लगातार एमटीएनएल का ही फोन लेते रहे हैं जबकि लोग खूब भरमाते रहे हैं कि सरकारी कंपनी है दो धेले की सर्विस नहीं है, लाइनमैन बिना टाई के है वगैरह। एयरटेल की लाइने लैंडलाइन के लिए बिछाई गईं पर हम नहीं माने।

पिछले दिनों एक गड़बड़ हुई, बीस तारीख की बात है, रात को पोस्‍ट  लिखी की सुबह पब्लिश की जाएगी...सुबह देखा तो हो नहीं रही थी। गौर किया तो पाया कि फोन 'डैड' है। 'मौत की घंटी' होती है यहॉं 'घंटी की मौत' हो गई। खैर दो बातों का आसरा था, एक तो ये कि अब जिंदगी फोन पर उतनी नहीं टिकी नहीं होती मतलब लैंडलाइन पर। दोनों वयस्क सदस्यों यानि हम और वे, के पास अपना अपना मोबाइल हैं तो चल जाएगा काम - शाम तक तो ठीक हो ही जाना चाहिए (इधर एमटीएनएल की सेवा काफी सुधरी है, फाल्‍ट रिपेयर के मामले में तो जरूर ही...ऐसा हमें लगने लगा था) सो मोबाइल से शिकायत दर्ज कराई, शिकायत संख्‍या लिखी और इंतजार करने लगे। मिनट बीते, घंटे बीते होते होते दिन बीत गया। अगले दिन भी कोई घंटी नहीं बजी, इंटरनेट नहीं...अब दिक्‍कत होने लगी। तो निकले कि दरियाफ्त्‍ा करें कि पचड़ा क्‍या हे भई। अभी सोसाइटी के गेट पर ही थे कि गार्ड से समाचार मिला कि पूरे सेक्‍टर के फोन बंद हैं- केबल चोरी हो गई है। 

मुझे दो चोरियॉं बहुत ही हैरान करती रही है और ये दिल्‍ली के सरकारी तंत्र की मोस्‍ट अमेजिंग कटैगरी की चोरी हैं- एक तो है अस्‍पताल से 'एक्स-रे' चोरी होना दूसरा है जमीन के नीचे से टेलीफोन के केबल चोरी होना।STREET1 क्या बात है...चोर भी कमाल के- मरीज रपट का इंतजार कर रहा है और साहब उसका एक्सरे ही ले उड़े क्‍यों... बताते हैं कि रासायनिक क्रिया से उस फिल्‍म से कुछ काम की धातुण्‍ निकलती हैं। और दूसरा रहा कि और भी मजेदार जमीन को खोदकर केबल को काटकर चोरी करने वाला चोर। कंबख्‍त को पता है कि कहॉं खोदने से सीवर का पाइप नहीं केबल निकलेगी और इतनी देर तक एन सड़क पर अगले खुदाई करेंगे तार निकालेंगे ये भी सिर्फ उससे निकलने वाले तांबे औ रांगे जैसे पदार्थों के लिए। बड़े जुगाड़ु और मेहनती चोर हैं भई।  

यह समझने के लिए आपको कोई शरलॉक होम्‍स होना जरूरी नहीं हे कि ये दोनों ही चोरियॉं कर्मचारियों की मिली भगत से ही हो पाती हैं। इनसे चोर का फायदा तो बहुत कम ही होता है पर सरकार और आम व्‍यक्ति (मरीज या फोन उपभोक्‍ता की असुविधा के रूप में)  का नुक्‍सान बहुत अधिक होता है।

हम रोजाना कई कई बार पता कर रहे थे हर बार बताया गया कि दिन रात काम जारी है, 3-4 दिन लगेंगे। सिफी के परचे घर घर पहुँचने लगे थे, कि उनका इंटरनेट कनेक्शन लो, अंतत: हम खुद उस खुदी साईट पर पहुँचे कि भैया बताओ इरादा क्‍या है। 7-8 मजदूर कड़कड़ाती ठंड में लगे हुए थे, लाइनमैन व सुपरवाइजर भी थे मैंने लाइनमैन से पूछा तो उसने बिना लाब लपेट के बताया जी ये प्राइवेट कंपनी (एयरटेल) आ गई है उसकी ही कारस्‍तानी है। ठेकेदार को खरीद लिया है कि हमारे केबल काटे ताकि लोगों को गुस्‍सा आए वे फोन कपनी बदल लें। 'साब ये कंपनियॉं बरबाद करने पर उतारू हैं' वैसे इस नए बदलते केबल से निकल स्‍क्रेप को ये मजदूर वहीं एक कबाड़ी को बेच रहे थे।

उफ्फ अंतर्विरोध पीछा नहीं छोड़ते, घोषणा ये कि बाजार में प्रतियोगिता होती है जो खुद ही उपभोक्‍ता को लाभ देती है पर बाजार में कोई नैतिकता नहीं...। निजी क्षेत्र लाभ के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के विकारों को हथिया लेता है। हममें से राष्‍ट्रवाद का कीड़ा पूरी तरह से निकलने को तैयार नहीं इसलिए परेशानी सहकर भी सार्वजनिक क्षेत्र से सद्भाव मिटता नहीं। क्‍या करें...कया बनें कुछ्छे नहीं बूझता। और हॉं हम एक आरटीआई जरूरै फाइल करेंगे (एमटीएनएल सरकारी है वहीं इस तरह सूचना मांगी जा सकती है प्राइवेट में नहीं)

Wednesday, April 25, 2007

बुर्के में ज्योतिहीन आँखें....और नेत्रहीन का वैष्णोंदेवी दर्शन

कॉलेज का मास्‍टर हूँ और एक मायने में छुट्टियाँ चल रही हैं- एक मायने में इसलिए कि दरअसल चल तो रहे हैं इम्तिहान, पर पढ़ाई नहीं हो रही इसलिए पढ़ाना नहीं है। इसलिए जहाँ विद्यार्थी एक यातना से गुजर रहे हैं वहीं अध्‍यापक कभी कभी जाकर इम्तिहान में ड्यूटी बजाकर आ जाते हैं यानि इनविजीलेशन। आज भी था...चौकीदारी करने गए कोई नकल ना करे...आगे पीछे से न देखे। अक्‍सर लोगों को बहुत चाट काम लगता है..तीन घंटे चुपचाप। कुछ भी बोलो तो फुसफुसाकर...एक रहस्‍यमयी यातनामयी चुप्‍पी। पर ऐसा साथी लोग कहते हैं..मेरी राय फर्क है। मेरी प्रोफाइल पर नजर डालें वर्षों से वहॉं लिखा है कि अकेले चलना मुझे पसंद है और यही तो करना होता है इस चौकीदारी में। तीन घंटे मंद-मंद चलता रहता हूँ और दिमाग मंद-तेज चलता रहता है।

आज भी वही कर रहा था। जिस कॉलेज में हूँ वहाँ काफी विद्यार्थी मुसलमान हैं जिनमें कुछ छात्राएं बुर्के में भी आती हैं, अब इस पर अलग से नजर नहीं जाती, सामान्‍य ही लगता है, गणित, विज्ञान, साहित्‍य पढ़ती बुर्के वाली छात्राएं। रसोई और सौंदर्य पर अपनी राय हम व्‍यक्‍त कर चुके हैं ऐसे में जाहिर है कि वस्‍तुनिष्‍ठ रूप से हमारी राय बुर्के के पक्ष में नहीं है पर सुनीलजी की उस राय से भी सहमत हैं कि हम उनकी आजादी की परिभाषा तय नहीं कर सकते।

खैर...जिस कमरे में चौकीदारी करनी थी वह मुख्‍य प्रवेश के निकट था तभी एक परिचित का हाथ थामे एक छात्रा जिसने बुर्का पहना था लेकिन नकाब नहीं था वह गुजरी। उसके एकाध कदम आगे निकल जाने के बाद ध्‍यान दिया कि वह दरअसल नेत्रहीन थी। मैं हतप्रभ था...नहीं ऐसा नहीं कि नेत्रहीन विद्यार्थियों या बुर्के वाली छात्राओं को पढ़ाना मेरे लिए कोई नई बात है वरन इसलिए कि एक ही छात्रा को इन दो रूपों में देखना मुझे असहज बना रहा था। जो खुद देखने में असमर्थ है...देखना क्‍या है इससे अपरिचित है वह खुद को न दिखने देने के लिए इतना सजग क्‍यों। देखना बुरा भी हो सकता है..देखने से वंचित ये कैसे सोचता होगा। ओर भी बहुत कुछ इस दोहरे वंचन पर सोचा.... पर वह छात्रा क्‍या सोचती होगी यह नहीं पता। ....और भी, ये कि नेत्रहीन के लिए खुद को संभलना ही क्‍या कम था कि बुरका भी लाद लिया। धर्म वगैरह की क्रूरता भी मन में आयी।

फिर याद आया अपना नजदीकी मित्र नरेश। नेत्रहीन है, पढ़ता-पढ़ाता-लिखता है...कम्‍यूनिस्‍ट टाईप है पर आस्तिक है हमारे उलट। नजदीकी है इसलिए बिना आशंका के कह पाते हैं कि यार एक बात बताओ ये वैष्‍णो देवी जाकर क्‍या भाड़ भूंजते हो..क्‍या ‘दर्शन’ करते हो, जिधर मर्जी मुँह करके हाथ जोड़ लो....नेत्रहीन का तो हो गया दर्शन। पर उनका धर्म नाम की सत्‍ता संरचना में विकलांगता के हाशियाकरण की अपनी समझ है...हम भी जोर नहीं देते।

आज लगा कि ये भी बुरका ही तो है।

Wednesday, April 18, 2007

हमारे देसी भुट्टे और विकास मीनार से लटकी ग्रीनपीस

ग्रीनपीस की हाल के कुछ महीनों में भारत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिशें साफ दिखाई दे रही हैं। अभी पिछले ही दिनों में दिल्‍ली की विकास मीनार से लटक लटक कर लोगों ने एक बैनर टॉंगा और ये बैनर टंगाई का अनुष्‍ठान ही बाकायदा प्रेस को बुला बुला कर दिखाया गया। दूसरों देशों में खूब चलता होगा लेकिन इनकी आईडिया का बल्‍ब हमें तो कुछ खास नहीं रूचा। अरें भई हमारे यहॉं डेढ़ सौ की दिहाड़ी पर मजदूर दिन भर इमारतों से लटके रहते हैं कोई ध्‍यान नहीं देता....पर यहॉं ग्रीनपीस का मामला था प्रेस पहँच ही गई।




वैसे सच कहें तो हमें तो मल्‍टी नेशन एन.जी.ओ. जो हैं वे बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों ही की तरह बहुत खतरनाक किस्‍म का कुचक्री गोरखधंधा लगता है।

इसी ग्रीनपीस की कल की एक प्रेस विज्ञप्ति ने थोड़ी आशा भी पैदा की, ये कोई हमारा अंतर्विरोध नहीं है बस इतना है कि अब इस पैंतीस की उम्र में उतने सिनीकल नहीं रह गए हैं। जिनसे सिद्धांतत: असहमति है उसके भी अच्‍छे कर्मों को धतकरम कह कर मटिया नहीं देते हैं। इस प्रेस रिलीज के अनुसार सूचना के अधिकार के मार्फत ग्रीनपीस ने केंद्रीय सूचना आयोग से अपने पक्ष में फैसला हासिल किया है जिसके कारण अब जैव प्रोद्योगिकी विभाग को बायोटैक कंपनियों के शोधों की उन सूचनाओं का खुलासा आम लोगों के सामने करना होगा जिनमें इन कंपनियों के उत्‍पादों के नुकसानदेह प्रभावों को दर्ज किया गया है। जब से हमारी मार्केट के भुट्टे वाले ने केवल अमेरिकन कार्न को हीबेचना शुरू किया है हम तो तभी से पिनके पड़े हैं अब इस खबर ने फिर से बता दिया है कि जेनेटिकली इंजीनियर्ड कार्न बेहद नुकसानदेह है। सावधान....
अंग्रेजी में पूरी प्रेस विज्ञप्ति यहां पढें

Sunday, March 25, 2007

निठारी के बाल-बोटी कबाब और मेरी बिटिया का चिकेन

कहा गया कि मसिजीवी व्‍यक्तिगत स्‍वतंत्रता के पक्षकार हैं, मुझे खुद भी यही लगता रहा है कि अपने व्‍यवहार को तय करने की आजादी हर शख्‍स को होनी चाहिए और अपने क्रियाकलापों की जिम्‍मेदारी भी उसकी ही होती है। इसलिए लोगों की खानपान, साफ-सफाई, वेशभूषा आदि पर टिप्‍पणी करने और नाक-भौं सिकोड़ने से यथासंभव बचता हूँ। और अपने विषय में ऐसे ही व्‍यवहार की उम्‍मीद भी करता रहा हूँ। दरअसल हमने तो एक ब्‍लागर की प्रोफाइल में ‘पत्‍नी द्वारा बाथरूम में वाइपर लगाने के लिए विवश किए जाने’ से व्‍यक्‍त परेशानी अपनी श्रीमतीजी को दिखाकर बताया कि देखो हम ही ऐसे नही हैं- इस तरह की टोका टोकी से परेशान और भी हैं।


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कोई मुर्गा खाए कि मछली या सूअर यह उसका चयन है और होना चाहिए। जाहिर है यही मानकर बड़े हुए, खुद भी शाकाहारी हैं तो सिर्फ इसलिए हुए कि ये हमारे घर का डिफाल्‍ट डिसीजन था, और जब इतने बड़े हुए कि खानपान को बदल सकें तब तक आदत पड़ चुकी थी। इतना जरूर रहा कि माँस खाना या न खाना श्रेष्‍ठता या हीनता का बोधक नहीं लगा। जब वीर सांघवी ने जोर देकर बताया कि कोबे बीफ एक लजीजदार व्‍यंजन है तब भी हम कतई आहत नहीं हुए ऐसे ही जब एक मुस्लिम मित्र ने जब सहज ही गौमाँस के अपने अनुभव बताए तो उन्‍हें कतई यह नहीं लगा कि हम इससे आहत हो सकते हैं...हम हुए भी नहीं।
किंतु क्‍या हमें माँस हमें कोई एक और अन्‍य भोज्‍य पदार्थ लगता है...सच यह है कि नहीं। शायद कोई भी शाकाहारी यदि ईमानदार है तो मानेगा कि माँस न खाने का निर्णय बैंगन पसंद न होने के निर्णय से अलग है। इसमें छिपी अनछिपी नैतिकता शामिल है। भले ही आदमी हम जैसा खुदा निरपेक्ष ही क्‍यों न हो।


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हमारे एक मित्र कहीं अधिक ‘मिलीटैंट शाकाहारी’ हैं पेशे से एक प्रसिद्ध दर्शनशास्‍त्र अध्‍यापक हैं और व्‍यवहार से लोकतांत्रिक। अब ये हुआ डैडली मिक्‍स। हमने जब बताया कि बच्‍चों की प्रोटीन आवश्‍यकता की पूर्ति के लिए हम एकाध बार के. एफ.सी. ले जा चुके हैं तो वे लगभग तुरंत ही चिंहुक उठे। हमने कहा भई वे खुद निर्णय लेंगें मैं तो केवल विकल्‍प उपलब्‍ध करा रहा हूँ। फिर उन्‍हें इस्‍लाम के प्रकृति के मनुष्‍य के लिए होने के का भी वास्‍ता दिया...थोड़ी ही चर्चा के बाद मैनें अचानक अनुभव किया कि मैं तो अपने बच्‍चों के माँस का निवाला निगलने की कुछ कुछ सफाई सा देने लगा था...क्‍यों भला ?


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दर्शन में एंथ्रोपोसेंट्रि शाखा वह मानी जाती है जिसमें चिंतन के केंद्र में मनुष्‍य होता है तथा एक तरह से मनुष्‍य की अन्‍य प्राणी जगत पर श्रेष्‍ठता को न्‍यायोचित माना जाता है। बकौल हमारे दार्शनिक मित्र, इस दर्शन शाखा का पिछले दो-तीन दशकों से बैंड बजा हुआ है। मनुष्‍य को चिंतन के केंद्र से हटाने के बाद ही वन्‍य प्राणी संरक्षण, पशुओं पर अत्‍याचार का विरोध, मानवाधिकार और जाहिर है शाकाहार को चिंतन की जमीन मिल पाती है।.....पड़ोसी मुर्गा खाए-उसका पैसा है और उसकी ही नैतिकता....पर चूंकि हमारा तादात्‍मय मुर्गे की चीख से होता है इसलिए हमें असहज होना चाहिए। वरना निठारी में सुरेंद्र कोली और पंढेर के हाथों बच्‍चों की बोटियों के कबाब बनाकर खाने को भी हमें उनका ‘व्‍यक्तिगत खानपान’ और अपराध का सवाल मानकर छोड़ देना चाहिए (इस तर्क ने मुझे क्रोध और तार्किक असहायता की स्थिति में ले जा खड़ा किया क्‍योंकि वाकई हम केवल मनुष्‍य के माँस को लेकर ही ऐसी वितृष्‍णा क्‍यों अनुभव करते हैं ? ...सिर्फ एंथ्रोपोसेंट्रिज्‍म ही तो है)। बच्‍चों ने माँस केवल चखा है अभी, पसंद नहीं करना शुरू किया, थामूँ तो थम सकते हैं....थाम लूँ क्‍या।