Showing posts with label saarthi. Show all posts
Showing posts with label saarthi. Show all posts

Sunday, July 08, 2007

शौक से शक करें -- शास्त्री फिलिप

हमारी पोस्‍ट के उत्‍तर में शास्‍त्रीजी ने एक पूरा लेख लिखने का आश्‍वासन दिया था और लीजिए हाजिर है। शास्‍त्रीजी का लेख -


शौक से शक करें -- शास्त्री फिलिप
मसिजीवी ने पिछले दिनों मुझ पर एवं मेरे चिट्ठे
सारथी पर एक लेख लिखा था:
आइए शक करें......क्‍या शास्‍त्रीजी का सारथी एक निजी चिट्ठा है
इस लेख में उन्होंने मेरे चिट्ठे के बारें में एवं मेरे बारे में कई बातें पूछी हैं, एवं उन बातों के जवाब में मैं निम्न बातें पाठकों के ध्यान में लाना चाहता हूं:

1.
सारथी वाकई में मेरा निजी चिट्ठा है, एवं इसको मैं अकेले ही संभालता हूं. यही नही, मेरे अपने 25 और जालस्थल हैं जिनको मैं अकेले ही संभालता हूं. यदि आपको एक पर ताज्जुब हो रहा हो तो 25 सुनकर आप आसमान से गिर पडे होंगे. यदि आपको लगता है कि एक अतिमानव ही अकेले यह सब कुछ कर सकता है तो यह आपकी गलतफहमी है. आप भी यह सब कुछ कर सकते हैं, बशर्ते आप
भी वही सब तय्यारी करें जो मैं ने की है, एवं आप भी वे सब गुर सीख लें जिनका प्रयोग मैं करता हूं.

2. सामान्य से अधिक दक्षता से काम करने के लिये काफी तय्यारी करनी पडती है, जिस के बारे में इस लेख में मैं सिर्फ इशारा मात्र करूंगा. लेकिन सारथी के काफी सारे पाठकों के आग्रह पर मैं "सफलता के गुर" नामक एक लेखन परम्परा अपने चिट्ठे पर चालू करने जा रहा हूं. यदि 100 लोग भी इन बातों में से 10% को अपनायें तो मैं अपने आप को धन्य मानूंगा, क्योंकि मेरा जीवन समाज-सेवा एवं सामाजिक नवीकरण के लिये समर्पित है. सिर्फ 10% जैसी छोटी संख्या मैं इसलिये रख रहा हूं क्योंकि जीवन में
दक्षता बढाने के गुर और तत्व के बारे में हर कोई सुनना पसंद करता है, लेकिन इसके लिये जरूरी कीमत चुकाने के लिये एवं समय देने के लिये बहुत कम लोग तय्यार होते हैं. वे यह भूल जाते हैं कि वे सही निवेश करें तो परिणाम चुकाई गई कीमत से 1000 गुने या अधिक होता है. हम सब कामना करने में व्यग्र, एवं कर्म करने में आलसी हैं.



3. अब मेरे बारे में: पिछले 20 साल से मैं समय-नियंत्रण के बारे में बहुत जागरूक हूं. घर में आज भी टीवी नहीं है. आवश्यक सारी जानकारी एवं खबर अखबार, पुस्तकों एवं जाल से लेता हूं. मित्रों के साथ राजनीति, क्रिकेट, परनिन्दा में समय नहीं बर्बाद करता. हर तरह के अनावश्यक गतिविधि, कार्यक्रम, आदि से दूर रहता हूं. जहां तक हो सके यात्रा रेलगाडी से करता हू, जिससे वह समय पढनेलिखने में बिता सकूं.


4. दक्षता बढाने के लिये कहीं भी कुछ भी दिख जाये, मिल जाये, तो आजमा लेता हूं. ठीक लगे तो तो वह मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाता है. बचपन में ही टंकणकला सीख ली, अत: अंग्रेजी में 60 से 90 शब्द प्रति मिनिट वेग से टंकण कर लेता हूं. सौ रुपये के कीबोर्ड के बदले 3500 रुपये का "प्राकृतिक कीबोर्ड" प्रयोग में लाता हूं जो हर तरह से मेरे टंकण को आसान बनाता है. नियमित रूप से जो जानकारी बार बार टंकित करता हूं (जैसे मेरा नाम, पता, जाल पता) उनको एक "क्लिपबोर्ड" तंत्राश में रखता हूं एवं एक से तीन कीस्ट्रोक में दो शब्द से लेकर 100 शब्द तक का मजूमन छाप लेता हूं. बैजू बावरे के समान मैं दक्षता-वर्धन के साधन/तंत्राश तलाशता हूं. (इन में से सारे हिन्दी सक्षम औजार अगले महीने से आप सारथी से प्राप्त कर सकते हैं. अंग्रेजी सक्षम औजार अभी भी आप
http://mustdownloads.com
या http://hi.mustdownloads.com से प्राप्त कर सकते है). व्यायाम करते समय टेपरिकार्डर से भाषण सुनाता रहता हूं. समय की दुहरी कीमत वसूल हो जाती है.

5. अपने आप को चुस्त एवं तंदुरुस्त रखने के लिये मैं नियमित रूप से व्यायाम करता हूं, शाकाहार को जीवन में महत्वपूर्ण मानता हूं, जम कर सोता हूं, एवं रोज इतना पानी पीता हूं कि मेरे आयुर्वेद डॉक्टर को भी हैरानी होती है.

6. हर काम में मैं दूसरों को शामिल करने की कोशिश करता हू. इससे भार घटता है, दक्षता बढती है, एवं इस "सहक्रिया" के कारण इस में भागीदार हर व्यक्ति को परिणाम बहुत अधिक मात्रा में मिलता है. उदाहरण के लिये, मेरे चिट्ठे पर मैं अकसर अन्य चिट्ठाकारों के लेख एवं कवितायें (कडी, टिप्पनी, विश्लेषण सहित) छापता हूं. इससे उनको नए पाठक, अतिरिक्त प्रशंसा, एवं एक नये पाठकसमुदाय से सम्मान मिलता है. लेकिन इससे मुझे कोई नुक्सान नहीं होता, बल्कि इस कारण मेरे चिट्ठे
पर जनोपयोगी जानकारी की मात्रा बढती जाती है एवं पाठक भी बढते हैं. एक नये लेखक/रचनाकार को ढूंढ कर जब मैं उसको सारथी के पाठको के समक्ष प्रस्तुत करता हूं तो वह इस प्रोत्साहन के कारण कहीं से कहीं और पहुंच जाता है. यह आसान काम नहीं हैं क्योंकि हम भारतीय लोग अपना नाम एवं अपने हिस्से की प्रशंसा दूसरों के साथ बांटना पसंद नहीं करते. आधिकतर चिट्ठे अपने जमे जमाये पाठकों के सामने अन्य प्रतिभाओं को लाकर अपनी जमी जमाई "ग्राहकी" खराब करना पसंद नहीं करते. मैं ने इस सोच के विपरीत काम किया, एवं मुझे (कई गुना ब्याज सहित) उसका परिणाम मिल रहा है.

7. और भी बातें हैं जो मैं आप लोगों के समक्ष रखना चाहता हूं. अपनी सफलता के किसी भी कदम को मैं रहस्य नहीं रखना चाहता. लेकिन इस के लिये कई लेख लगेंगे,जो जल्दी ही सारथी पर प्रगट होंगे. ये लेख मैं मसिजीवी को नहीं दूंगा. (उनको एक लेख मुझ पर छापो, एक मुझ से लो का मोलभाव करूंगा. फायद दोनों को है).

8. मसिजीवी के लेख के शीर्षक पढ कर बहुतों को लगा के वे मेरी आलोचना कर रहे हैं. ऐसा नहीं है. उनके लेख का चरमोत्कर्ष उनके आखिरी वाक्यों में है जहां उन्होंने कहा है: "हम तो मानते हैं कि शास्‍त्रीजी के रूप में कोई दैवीय पुरूष, शायद खुद ईसामसीह हिंदी के उत्‍थान के लिए हमारे बीच हैं". प्रिय
मसिजीवी, प्रिय पाठकगणों, मैं इस योग्य नहीं कि मुझे इतने उन्नत आसन पर बैठाया जाये. मैं तो सिर्फ ईसा का चरणसेवक मात्र हूं, जो "सारथी" के द्वारा ईसा के निम्न निर्देशन का पालन करने की कोशिश कर रहा हूं: "अपने पडोसी से अपने समान प्रेम करो. जो तुम मेरे नाम में उनके लिये करोगे, मैं मानूंगा कि वह तुम ने मेरे लिये -- अर्थात अपने स्वामी ईसा के लिये -- किया"

9. मसिजिवी ने अपने लेख के अंत में लिखा, "हमें उनका पूरा समर्थन करना चाहिए- कम से कम मैं तो करता ही हूँ। इसलिए इसे सिर्फ निजी चिट्ठा न माना जाए उससे कहीं ‘अधिक’ मानकर पढ़ा जाए।"

प्रिय मसिजीवी, आप से 2500 किलोमीटर दूर स्थित मुझ एक पराये व्यक्ति के कार्य को देख कर आप ने इस तरह से जो प्रोत्साहन दिया है उस के लिये आपको मेरा शत शत नमन !!

पुनश्च: सारथी चिट्ठे के पास बहुत सर्वर-स्थान है. आप में से कोई भी व्यक्ति हिन्दी या हिन्दुस्तान के विकास को प्रोत्साहित करने के लिये किसी भी प्रकार की रचना सारथी पर छपने के लिये भेजें तो उसका स्वागत होगा. सम्पादन हम कर लेंगे. क्रांतिकारियों एवं हिन्दुस्तान के प्राचीन एवं अधुनिक महान नायकों की जीवनियों में आजकल हमारी विशेष रुचि है।

Friday, July 06, 2007

आइए शक करें......क्‍या शास्‍त्रीजी का सारथी एक निजी चिट्ठा है

चिट्ठाकार मित्र ने कहा कि भई मसिजीवी तुम बड़े संशयजीवी हो- हम मान गए। संशयजीवी हैं थोड़ा भदेस होकर कहें कि शकजीवी हैं- इसलिए जिन्‍हें लगता है कि शक करना बेहद बुरी बात है वे बिला शक दाहिने ऊपरी कोने पर बना X का निशान दबाए और निश्‍शंक जीवन जीएं :) हम इस बुरे काम को करेंगे- इसलिए नहीं कि बहुत बुरे हैं पर इसलिए कि काम बुरा है और कोई और इसे करना नहीं चाहता- और हम इसलिए कर रहे हैं कि है तो बुरा, पर जरूरी है- कोई न करेगा तो हो नहीं पाएगा- नहीं हुआ तो बुरा होगा। चूंकि लोग शक करने को बुरा मानते हैं इसलिए जो शक करते हैं वे तक इसे कहते नहीं- कहेंगे तो लोग (कम से कम जिन पर शक किया गया वे तो) बुरा मानेंगे और फिर इंडीब्‍लॉगीज तो मिलने से रहा। लेकिन ब्हिसल बलोअर बनना एक कठिन काम है इसलिए भी कि इसमें गलत सिद्ध होने की गुंजाइश होती है- और इस जोखिम को लेने का साहस कर रहे हैं- अब देखा जाएगा। इससे पहले हम अविनाश, मोहल्‍ला, धर्म, नारद आदि पर शक जाहिर कर चुके हैं और निश्‍शंक/निर्द्वंद्व बिरादरी के कोप का भाजन बन चुके हैं- अब ये भी सही।

हम शास्‍त्रीजी के चिट्ठे ‘सारथी’ पर विचार करना चाहते हैं- क्‍योंकि मैं इससे बेहद प्रभावित हुआ हूँ। शास्‍त्रीजी जिन्‍होंने भौतिकी, देशीय औषधिशास्त्र, और ईसा के दर्शन शास्त्र में अलग अलग विश्व्वविद्यालयो से डाक्टरेट किया और वे पुरातत्‍व जैसे विषय में एक और डाक्‍टरेट में लीन हैं- वे हिंदी के विकास में आगे आए हैं, आए क्‍या हैं बहुत पहले से हैं तो इससे ज्‍यादा प्रसन्‍नता की बात भला क्‍या हो सकती है। उनका अध्‍ययन विविध है और चूंकि ये गगरी भरी हुई है इसलिए बेबात छलकती नहीं है- ये नहीं कि बात बात पर खम ठोंके कि हमने इस भाषा के लिए ये कर दिया वो कर दिया- देखो फार्च्‍यूनर घर पर खड़ी है और हम हिंदी की ही खातिर इस देश की गंदी सड़कों पर आ रहे हैं। शास्‍त्रीजी का काम वाकई सराहनीय काम है। इतने श्रमी व अध्‍यवसायी व्‍यक्ति पर उनके आराध्‍य ईसा की कृपा भी खूब रही है (उनके आराध्‍य से किसी हिंदू मंच, सुमन सौरभ या ऐसे किसी और नमस्‍ते सदा वत्‍सले को परेशानी हो तो हो हमें किसी ईश्‍वर से वैसे भी कोई लेना देना होता नहीं – और ईश्‍वर भी अक्‍सर इतने समझदार निकलते हैं कि सोचते हैं कि ये भला(?) आदमी हमें परेशान नहीं करता तो हम ही क्‍यों इसे परेशान करें) तो खैर प्रभुकृपा से सारथी जी के चिट्ठे ने जो इतनी सारी सामग्री उपलब्‍ध कराई है उसके कारण उन्‍हें बेतहाशा सम्‍मान व हिट भी मिल रहे हैं- उनके अनुसार उन्‍हें रोज 1000 लोग पढ़तें हैं जबकि हिट 5000 से ज्‍यादा हैं। बहुत अच्‍छे.....पर


पर शक इसीसे शुरू हो गया। क्‍या सारथी वाकई एक निजी चिटृठा है- सारथी का संयोजन, प्रबंधन बहुत से मामलों में हमारे मंच नारद से कहीं बेहतर है- मेल छोडिए आप टिप्‍पणी भी कीजिए तो आपके पास झट से ईमेल से जबाव पहुँच जाता है। 100000 से ज्‍यादा वितरित प्रतियों वाली ईपुस्‍तक के लेखक शास्‍त्रीजी पुरातत्‍व पर डाक्‍टरल शोध करते हुए हर चिटृठा पढ़ लेते हैं- इतने ट्रेफिक को मैनेज कर लेते हैं- हरेक को उत्‍तर दे देते हैं- इतने सारे टूलोंकी समीक्षा कर पाते हैं- अमरीकी विश्‍वविद्यालय के मानद कुलपति के दायित्‍व निवाह ले जाते हैं- अपने अराध्‍य के प्रति के उपासना दायित्‍व पूरे कर लेते हैं- अन्‍य अनुशासनो के प्रति अपने अकादमिक दायित्‍व भी पूरे कर लेते हैं....
कुछ कुछ दैवीय हो रहा है बंधु। हमारा शक है कि सारथी कोई निजी चिटृठा नहीं है। अशोक चक्रधर के चिट्ठे की ओर संकेत करते हुए पंकजजी ने बताया

अभी हिन्दी चिट्ठाजगत में एक बडे व्यंग्यकार और कवि का ब्लोग भी दिख रहा है. कुछ दिन पहले उनकी सेक्रेटरी का मेल आया था सहायता के लिए. :) यानि वे खुद ब्लोग नही लिखते, शायद ही देखते हों!!

लेकिन हमारा शक शास्‍त्रीजी को लेकर ऐसा नहीं है। हम तो मानते हैं कि शास्‍त्रीजी के रूप में कोई दैवीय पुरूष शायद खुद ईसामसीह हिंदी के उत्‍थान के लिए हमारे बीच हैं- हमें उनका पूरा समर्थन करना चाहिए- कम से कम मैं तो करता ही हूँ। इसलिए इसे सिर्फ निजी चिट्ठा न माना जाए उससे कहीं ‘अधिक’ मानकर पढ़ा जाए।