हमने उमा खुराना प्रकरण पर एक पूरी पोस्ट लिखी थी, अब कहानी की असलियत सामने आ गई है- उमा शिक्षिका हैं और हमने राय व्यक्त की थी कि शिक्षक होने के नाते हम उस शर्मिंदगी में साझा हैं जो उमा के 'आचरण' से उपजती है। तीन-चार दिनों में मामला पलट गया है- हम अपनी गलती को ओन करते हैं तथा इस विषय में अपनी क्षमा याचना व्यक्त करते हैं- उस पोस्ट में कम से कम कुछ वाक्य तो ऐसे हैं ही जो उस शिक्षिका को दोषी मान लेने की ध्वनि लिए हैं।
हम गुमराह हुए- बाकायदा किए गए। पत्रकार बिरादरी ने किए (चलिए बिरादरी नहीं कहते....कुछ पत्रकारों ने किए) सिर्फ हम ही नहीं हुए पूरा देश हुआ। चंद पत्रकारों ने कहा कि शिक्षक इतने पतित हो गए हैं कि धंधा करने लगे हैं- हम झट आत्मालोचना के मोड में गए-
जनता में गुस्सा है, सरकार में भी और कानून तो जो और जैसे करेगा वो करेगा ही (दिल्ली में इम्मोरल ट्रेफिकिंग के केसों में कन्विक्शन की दर बहुत ही कम है) पर हमें सबसे खतनाक वह चुप्पी लगती है जो इस तरह की घटनाओं के बाद शिक्षक समुदाय में आंतरिक रूप से देखने को मिलती है

अब सवाल यह है कि सब जानते हैं कि एक पत्रकार (चैनलों की कार्यप्रणाली जानने वाले मानेंगे कि ये स्टिंग एक पत्रकार भर की हरकत नहीं ही होगी) ने टीआरपी के लिए एक और साथी पत्रकार को वेश्या के रूप में अभिनय करने के लिए कहा और नकली स्टिंग में उस अध्यापिका को फंसाया गया। पत्रकार मित्र कहें कि इसे क्या कहें। उमा के कपड़े फाड़े गए- हम जैसे गैर जिम्मेदार लोगों की ही हरकत थी। पर पत्रकारिता की कोई जिम्मेदारी बनती है कि नहीं। टी आर पी के लिए पत्रकार अपनी साथी को ही वेश्या बना डालेंगे- ये भूख फिर अब कब थमेगी।
हमें लगता है कि स्त्री के सम्मान का सवाल, छात्र-शिक्षक संबंधों के विश्वास हनन का सवाल, पत्रकारिता के मूल्यों का सवाल और संभवत चिट्ठाकारिता के दायित्व का सवाल इसमें शामिल है। अपने तईं हम पुन: स्वीकार करते हैं और पूरी शर्मिंदगी से स्वीकार करते हैं कि हम मीडिया रिपोर्टों पर विश्वास करने की गलती कर बैठे हमें खेद है।