Showing posts with label पत्रकारिता. Show all posts
Showing posts with label पत्रकारिता. Show all posts

Wednesday, July 14, 2010

पेड न्‍यूज ??

जनसत्‍ता के मुख्‍यपृष्‍ठ पर आज एफई बैंकिंग पुरस्‍कारों से जुड़ी ये खबर है-

js1 

दिक्‍कत खबर को पढ़ने से पेश आती है क्‍योंकि खबर ये बताने में असफल रहती है कि पुरस्‍कार आखिर मिला किसे... कुछ और ध्‍यान से पढ़ने से पता लगता है कि खबर केवल पुरस्‍कार आयोजन को प्रोमोट करने के लिए है (क्‍यों न हो एफई यानि फाइनेंशियल एक्‍सप्रेस खुद एक्‍सप्रेस समूह का ही तो प्रकाशन है) असली चेहरा खबर के शेष को पढ़ने से साफ होता है-

js1 001

खबर के नीचे समारोह के प्रायोजकों के लोगो ???

वाल सिर्फ इतना कि ये 'खबर' कोई खबर है या केवल प्रोमोशन....

Friday, September 07, 2007

उनकी विश्‍वसनीयता में सेंध- हमारी ओर से शुद्ध खेद खेद खेद

हमने उमा खुराना प्रकरण पर एक पूरी पोस्‍ट लिखी थी, अब कहानी की असलियत सामने आ गई है- उमा शिक्षिका हैं और हमने राय व्‍यक्‍त की थी कि शिक्षक होने के नाते हम उस शर्मिंदगी में साझा हैं जो उमा के 'आचरण' से उपजती है। तीन-चार दिनों में मामला पलट गया है- हम अपनी गलती को ओन करते हैं तथा इस विषय में अपनी क्षमा याचना व्‍यक्‍त करते हैं- उस पोस्‍ट में कम से कम कुछ वाक्‍य तो ऐसे हैं ही जो उस शिक्षिका को दोषी मान लेने की ध्‍‍वनि लिए हैं।


हम गुमराह हुए- बाकायदा किए गए। पत्रकार बिरादरी ने किए (चलिए बिरादरी नहीं कहते....कुछ पत्रकारों ने किए) सिर्फ हम ही नहीं हुए पूरा देश हुआ। चंद पत्रकारों ने कहा कि शिक्षक इतने पतित हो गए हैं कि धंधा करने लगे हैं- हम झट आत्‍मालोचना के मोड में गए-



जनता में गुस्‍सा है, सरकार में भी और कानून तो जो और जैसे करेगा वो करेगा ही (दिल्‍ली में इम्‍मोरल ट्रेफिकिंग के केसों में कन्विक्‍शन की दर बहुत ही कम है) पर हमें सबसे खतनाक वह चुप्‍पी लगती है जो इस तरह की घटनाओं के बाद शिक्षक समुदाय में आंतरिक रूप से देखने को मिलती है



अब सवाल यह है कि सब जानते हैं कि एक पत्रकार (चैनलों की कार्यप्रणाली जानने वाले मानेंगे कि ये स्टिंग एक पत्रकार भर की हरकत नहीं ही होगी) ने टीआरपी के लिए एक और साथी पत्रकार को वेश्‍या के रूप में अभिनय करने के लिए कहा और नकली स्टिंग में उस अध्‍यापिका को फंसाया गया। पत्रकार मित्र कहें कि इसे क्‍या कहें। उमा के कपड़े फाड़े गए- हम जैसे गैर जिम्‍मेदार लोगों की ही हरकत थी। पर पत्रकारिता की कोई जिम्‍मेदारी बनती है कि नहीं। टी आर पी के लिए पत्रकार अपनी साथी को ही वेश्‍या बना डालेंगे- ये भूख फिर अब कब थमेगी।


हमें लगता है कि स्‍त्री के सम्‍मान का सवाल, छात्र-शिक्षक संबंधों के विश्‍वास हनन का सवाल, पत्रकारिता के मूल्‍यों का सवाल और संभवत चिट्ठाकारिता के दायित्‍व का सवाल इसमें शामिल है। अपने तईं हम पुन: स्‍वीकार करते हैं और पूरी शर्मिंदगी से स्‍वीकार करते हैं कि हम मीडिया रिपोर्टों पर विश्‍वास करने की गलती कर बैठे हमें खेद है।