सिख दिल्ली में एक खाती-पीती प्रभावशाली कौम है और यूँ भी सिख बिरादरी टेंशन न लेने वाली बिरादरी है। खूब मेहनत करते हैं कमाते हैं और शान से जीना पसंद करते हैं। शान से जीने का मतलब ही है अच्छा पहना, अच्छा खाना, अच्छा पीना। अब हाल में दिल्ली सिख गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी के निर्देश जारी हुए हैं जिसके तहत सिख समुदाय को विवाह गुरूद्वारों में ही करने होंगे तथा शाम को होने वाले विवाह समारोहों पर कड़े प्रतिबंध लागू किए गए हैं- न तो मांसाहारी भोजन न ही शराब। लो कल्लो बात... ये भी भला क्या सिख शादी।।
कारण यह बताया जा रहा है कि ऐसा करने शादियों को कम खर्चीला बनाया जा सकेगा
जिससे कन्या भ्रूण हत्या तथा औरतों पर हो रहे अत्याचारों को कम किया जा सकेगा।
अब ये इतने 'पवित्र' उद्देश्य हैं कि लगता है कि वाह धर्म तो समाज सुधार की महत भूमिका में आ गया है, कितनी अच्छी बात है। अब कैसे कोई खिलाफ बोले पर हमें फिर भी बात कुछ जम नहीं रही, कुछ वर्ष पहले ऐसा ही फरमान जम्मू कश्मीर में सरकार की तरफ से भी जारी किया गया था। भले ही हम इसके उद्देश्यों को इतना बुरा नहीं मानते और हमें ये भी लगता है कि फिजूलखर्च विवाहों को थामा जाना चाहिए पर धर्म या राज्यों की इसमें क्या भूमिका होनी चाहिए ?
राज्य या धर्म जब ऐसी नियामक भूमिकाओं में आने लगें कि वे अपने धर्मावलंबियों की जीवन शैलियों को नियंत्रित करने लगें तो ये आधुनिक समाजों के लिए हितकर बात नहीं है- वैसे यह सिर्फ आधुनिक समाजों के ही लिए कहा जा रहा है वरना मध्ययुगीन समाज में तो जीवन का प्रत्येक पक्ष ही धर्म ही नियंत्रित करता था। पर आधुनिक समाजों को ये नियंत्रण व्यक्ति के ही हाथ में रहने देने चाहिए हॉं कभी कभी राज्य को ये नियंत्रण हस्तगत करने पड़ सकते हैं पर राज्य एक प्रक्रिया से वैधता हासिल करता है किंतु धर्म इस मामले में एक गैर जबावदेह संस्था है इसलिए भले शुभेच्छा से ही सही, उसे ऐसा करने से परहेज करना चाहिए। और तनिक इस बात पर भी विचार करें कि सिख शादी अगर बोटी-बोतल के बिना होगी तो क्या खाक होगी। अगर कुछ प्रतिबंध जरूरी ही था तो कह देते कि सिख शादी वधु के बिना होगी - फिर भी चल जाता- पर अच्छा खाना न हो, पीण वास्ते कुछ न हो- ऐ वी कोई गल ओई।
