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Wednesday, December 19, 2007

अबे जंगली इंडियन तेरा गूस तो पक गया

 

 

लीजिए एक कार्टून देखें

indian

 

जी हमें बिलकुल मालूम है कि अमरीका में जब कहते हैं इंडियन, तो उसका मतलब भारतीय नहीं होता। पर उसके बावजूद हमें इस कार्टून में बहुत कुछ चिढ़ाने वाला लगता है। आप क्‍या कहते हैं ?

यूँ तो एक सीधे सीधे संस्‍कृति के तत्‍वों का मामला है,  कि भैया वहॉं यानि अमरीका में अपने समाज के एक तबके को लेकर जो दरअसल अमरीका का असल मालिक तबका है, यानि मूल अमरीकी लोग उन्‍हें लेकर वे क्‍या सोचा जाता है। केवल एक मुहावरे की वक्रता (गूस इज़ कुक्‍ड, का मतलब मुहावरे के रूप में होता है कि बज गया बैंड तुम्‍हारा) से हास्‍य के लिए पूरे समुदाय का मजाक...ये ठीक कैसे हो सकता है।

पर हमें मिर्च क्‍यों लगीं- सीधी वजह है कि ये कार्टून किसी बदतमीज बुश के अमरीका में नहीं छपा है। ये बाकायदा हमारे देश में स्‍टेट्समैन के दिल्‍ली संस्‍करण में कल छपा है, दरअसल पूरे देश में छपा है। सवाल सीधा है कि क्‍या हमारे अपने देश में भी 'इंडियन' का मतलब मैं मूल अमरीकी लगाऊं, क्‍या स्‍टेट्समैन का संपादक ये चाहता है, क्‍यों। जब इस देश की संस्‍कृति की निर्मिति में इस कार्टून की व्‍यंजना ही समाप्‍त हो जाती है तो इसे इस रूप में छापकर ये एहसास करवाने की क्‍या जरूरत है कि हमारे देश के नाम से वहॉं जंगलीपन व्‍यंजित होता है। जब ये कठपुतली संपादक वहॉं के अपने आकाओं से कोई सामग्री पाते हैं तो उसे छापने से पहले वो बिल्‍कुल उस पर विचार नहीं करते। ध्‍यान रहे कि मूल अमरीकी संदर्भ में लेने पर भी ये कार्टून उस संप्रदाय के लिए बाकायदा नस्‍लवादी कहा जाएगा।

Friday, August 03, 2007

एक अच्‍छी बाढ़ सबको पसंद है

मेगासेसे सम्‍मान के लिए चुने गए विचारक-पत्रकार पी साईंनाथ ने अपनी पुस्‍तक 'एवरीबॉडी लव्‍स ए गुड ड्राउट' में भारत के कुछ सबसे गरीब जिलों के अध्‍ययन से कई सच खोजे हैं जो हमारे नेता, पत्रकार व नौकरशाह पहले से जानते हैं। हम भी जानते व मानते हैं- हर संकट एक अवसर होता है। पर इसका मतलब हम मानते थे कि हर संकट व्‍यक्तित्‍व के लिए अवसर हाता है निखरने का। पर हम अहमक थे, दरअसल हर संकट- देश पर, समाज पर, पड़ोसी पर गोया खुद को छोड़कर किसी पर भी आया संकट एक अवसर होता है अपने वर्तमान व भविष्‍य के संकटों से सुरक्षा का इंतजाम कर लेने का।
अब बाढ़ को ही लें, हर साल इस बाढ़ का आना कितना जरूरी है यह केवल हमारे नेता और नौकरशाह ही समझ सकते हैं- अब पत्रकार भी समझने लगे हैं- पत्रकार को साथ ले, चना चबैना साथ रख नेता लोग हवाई सर्वेक्षण करते हैं, पत्रकार लोग इस अमेजिंग सीन का आनंद लेते हैं- अब कलमघिसाई से तो बहुत हुआ तो देकन एयरलाईन का मजा मिल सकता है पर ये तो चार्टर प्‍लेन के मजे हैं। और अगर आपके साथ परम नौटंकीबाज रेलमंत्री हुए तो 'हाऊ डेयरिंग' ये आपको बाकायदा हाईवे पर लैंडिंग का आनंद भी दिला देंगे। हे संतोषी माता जैसन बाढ़ तुम उस मंत्री को दिख्‍खई वैसन सब को दिखाए- जै माता की।



पर सच्‍चे राजू भैया तो नौकरशाह हैं। बाढ़ की असली मलाई तो नौकरशाह और नेता काटेंगे जब इस बाढ़ से राहत का काम शुरू होगा- होगा का मतलब ये न मान लें कि वाकई कोई राहत वाहत शुरू होगी- मतलब बस इतना कि खजानों से राहत के लिए पैसा निकलेगा- इस एकाउंट में जाएगा उस सूटकेस में जाएगा बहुत मंहगाई है भई। और कंपीटिशन भी कौन कम है- लालूजी हो आए बिहार के ऊपर, पासवानजी भी हो आए, नीतीश भी गए होंगे- आसान काम है क्‍या- इतने नेता ऊपर मंडराते हैं कि लगता है कि कहीं ऊपरै जाम न हो जाए ट्रेफिक। अब तो चाहिए कि कुछ फंड वंड का इंतजाम कर इन बाढ़ प्रभावित इलाकों में एयर ट्रेफिक कंट्रोल की टावरें बनाई जाएं। ताकि हवाई सर्वेक्षणों में सुविधा रहे।

वैसे बाढ़ सबके लिए आनंद लाती है- नेता, नौकरशाह पत्रकार तो चलो भौतिक कारणों से खुश होते हैं और बच्‍चे जो बच जाएं वो इस बात से खुश हो जाते हैं कि इस बहाने नौका विहार का आनंद मिलता है, स्‍कूल नाम की कोई चीज हो तो उससे छुट्टी मिलती है। बड़े इसलिए खुश हैं कि गंगा/यमुना/ब्रह्मपुत्र मैया या जो भी मैया हो वह घर आकर दर्शन देती है। तो कुल मिलाकर ये कि बाढ़ मैया को हम कोई पसंद करता है- एवरीबॉडी लव्‍स ए गुड फ्लड