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Wednesday, July 11, 2007

देबाशीष की पोस्‍ट से उपजे सवाल और अविनाशरहित दिल्‍ली मीट

चिट्ठाजगत की हाल की घटनाओं पर देबाशीष की पोस्‍ट कई मायने में अहम है। एक तो ये तकनीकी लोगों का खासतौर पर नारदीय तकनीकी लोगों के पक्ष को सामने रखती है जो इसलिए जरूरी था कि आमतौर पर इनमें से कुछ तकनीकी लोगों की भाषाई अभिव्‍यकित में बहुत-कुछ या तो अनकहा रह जाता है या ...या समझें कि बात का हलुवा हो जाता है। पोस्‍ट में कई बातें हैं पर जिस बात को हम सबसे अहम मानते हैं वह है इस बात की पहचान कि चिट्ठाकारी में युग परिवर्तन का दौर आ गया है- अविनाश को केंद्रीय भूमिका देकर (मो‍हल्‍लापूर्व व पोस्‍ट मोहल्‍ला) आप आने वाले युग की प्रवृत्तियों की लगभग सटीक पहचान कर रहे हैं, ऐसा मुझे लगता है। हालांकि ऐसे में अविनाश को लोगों द्वारा पुन: अल्‍टीमेटम दिया जाना और बात का लगभग ‘या तो हम रहेंगे या तुम’ तक पहुँच जाना लोगों की इस बदलाव के लिए पूरी तैयारी न होने को ही दिखाता है...खैर तैयार होना ही पड़ेगा...इतिहास यू टर्न नहीं लेता।

इसके साथ ही देवाशीष की पोस्‍ट में नारद के लिए चेतावनी के कई स्वर हैं जिनकी सराहना की जानी चाहिए। पहली बात नारद को लेकर बातें कुछ कुछ गए जमाने की बातों की ही तरह हैं जो ठीक ही है, यदि उनके सुझाए बदलावों पर नारद विचार नहीं करता तो उसका स्‍थानापन्‍न होना तय है। ये नहीं कहा जा रहा कि नारद से उसकी ‘इतिहास में जगह’ को कोई छीन लेगा, वह तो नहीं ही होगा पर ये तो नारद को ही तय करना होगा कि नारद इतिहास की चीज बनना चाहता है कि वर्तमान की। वर्तमान का तकाजा है कि लोगों को जोड़ो न कि उनसे चुन चुन कर मेल मंगाओ।

भाषाई लोग, इसमें केवल पत्रकार ही नहीं हैं हम जैसे भी हैं जिन्‍हें तकनीक भयभीत नहीं करती पर जिनके लिए तकनीक ही सबकुछ नहीं है। हमारा साबका व सरोकार उन तमाम सत्‍ता संरचनाओं से रहता है जो आस पास विद्यमान हैं इसलिए जब कोई तकनीकज्ञ 'ये परिवार सबकी सुनता है’ जैसे सड़ांध मारते जुमले फेंकता है तो इन संरचनाओं के संधुत्‍सु लोगों के कान वैसे ही खड़े हो जाते हैं जैसे किसी खतरनाक ईमेल को देखकर रविजी चौकन्‍ने हो सबको खबर कर देते हैं। क्‍योंकि एक बहुलवादी समाज में सभी पक्षों के प्रति संवेदनशीलता साधना एक जटिल काम है तथा कई बार तकनीकज्ञों का प्रशिक्षण इस मामले में आधा-अधूरा होता है- वे धर्म, परिवार, राष्‍ट्र, जाति, लिंग, क्षेत्रियता आदि में निहित जटिलताओं को समझने में या तो पूरी तरह असमर्थ होते हैं या इन्‍हें वे पूरी तरह महत्‍वहीन लगती हैं (ऐसा नहीं है कि गैर तकनीकज्ञ इस मामले पूरी तरह संवेदनशील होते हैं- पर उसकी कुछ उम्‍मीद अधिक होती है) ये सवाल भले ही किसी नई सुविधा के नामकरण का हो या कडवी बहस या मोहक चुप्‍पी में से एक के चयन का, तकनीकी पक्ष ने लगातार अपनी संवाद व संवेदनशीलता की असमर्थता का खुला विज्ञापन किया है। उदाहरण के लिए जिसे आपने टी आर पी के लिए ही सब शोर मचाने वाला कहा उसके नारद से ही हट जाने के कदम के बाद भी ये स्‍वीकार नहीं आया कि मामला टीआरपी से अलग भी हो सकता है। ऐसा तो नहीं ही होगा कि सभी ऐंजेल सेल्‍स व आईटी में गए होंगे और भाषा के हिस्‍से डेविल ही बचे होंगे।

एक बात जो बहस के तेवर की असहमति से उपजी कड़वाहट से जुड़ी है जो देबाशीष से छूट गई है- जिसकी हठ अविनाश को संवाद के स्थान पर संग्राम की ओर धकेले दे रही है। हर माध्‍यम अपनी भाषा को विकसित करता है तथा उसकी अपनी प्रक्रिया होती है, अन्‍य माध्‍यमों की भाषा यथावत दूसरी जगह रोपी नहीं जा सकती- हिंदी चिट्ठाकारी, जीतू भैया- साधुवाद- जारी रहें- अच्‍छा अच्‍छा- मनोरम- वाह वाह के बीजों से उपजती है, वह बहुत परिपक्‍वता से अविनाश व प्रमोद को पचा लेती है पर राहुल की भाषा...नहीं...क्‍योंकि वह उन सभी संवेदनशीलताओं का अतिक्रमण करता जिनकी दरकार अभी इस माध्‍यम को है। इस भाषा से राहुल प्रतिबंध योग्‍य तो नहीं बन जाता किंतु नजरअंदाज किए जाने योग्‍य जरूर हो जाता है। यही वजह है कि संजय बेंगाणी को कुछ इंच छोटा किए जाने के उनके प्रलाप को हमने देखा, गुस्‍सा भी आया पर उसे टोककर शहादत की प्रसन्‍नता मुहैया कराना उचित नहीं समझा। राष्‍ट्रीय सहारा सुपारी किलरों को पत्रकार बना सकता है तो गुजरात क्‍यों मोदी को मुख्‍यमंत्री नहीं बना सकता। कहना सिर्फ इतना है कि जब अविनाश को सार्थक बहस का वातावरण तैयार करने का श्रेय दिया ही जा रहा है तो ये भी उनकी ही जिम्‍मेदारी बनती है कि स्‍वयं इस वातावरण को चुप्‍पी का वातावरण न बनाएं।
अब लीजिए ये ही देखिए कि चिट्ठाकारी का इतिहास तो देवाशीष प्री-मोहल्‍ला पोस्‍ट-मोहल्‍ला के युग विभाजन से लिख रहे हैं और ये मोहल्‍ले वाले अविनाश हैं कि अभी तक मीट के लिए कन्‍फर्मेशन तक नहीं भेजा- जब इतिहास लिखा जा रहा होगा तब वहॉं किसी भूत-चुड़ैल पर स्‍टोरी लिख रहे होगे- अरे आ जाओ इतिहासपुरुष, ऐसी भी क्‍या नाराजगी। (वैसे भड़ासियों ने कन्‍फर्मेशन भेजा था पर पता नहीं उस फीड को अमित ने क्‍यों एग्रीगेट नहीं किया अपनी सूची में) वैसे सब ठीक ठाक है।