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Friday, March 16, 2007

मुड़ के देखें Y2K को, उर्फ मिलना पुरानी प्रेमिका से

चूंकि मुखौटेबाजी काफी हो चुकी तो सोचा क्‍यों न देखा जाए कि कुछ पहले जब भविष्‍य की चिंता करते थे तो कैसा होता था। ये लेख मैंने नवम्‍बर 1998 में लिखा था और यह इत्रिका के प्रवेशांक (जनवरी 1999) का संपादकीय बना था। उस समय Y2K की संमस्‍या पर खूब चर्चा होती थी। मित्रो इत्रिका इंटरनेट पर पत्रिका निकालने का मेरा प्रयास था। उस समय यूनीकोड नहीं था और यह लेख भी अमर फांट में था इसे रूपांतर की मदद से यूनीकोड किया गया है।


'वाई २ के साहित्य' समस्या ....

२१वीं सदी का आरंभ केलेंडर बदलने भर से कुछ अलग है। नई सहस्त्राब्दी का आरंभ मानव सभ्यता के लिए एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण क्षण है। कंप्यूटर जगत की सबसे ज्वलंत समस्या तो २१वीं सदी का पहला क्षण स्वयं है। समझा जाता है कि यह क्षण इस क्षेत्र विशेष की प्रगति के समक्ष विशालतम चुनौती है इसे वे वाई २के समस्या कहते हैं । हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री ने इसी संदर्भ में वाई २ के पी.ई. समस्या का उल्लेख किया है अर्थात वर्घ् २००० राजनैतिक-आर्थिक समस्या। आशय है कि नई सहस्त्राब्दी के आगमन को मानव सभ्यता का प्रत्येक क्षेत्र एक संकट के रूप में देखता है। कला विशेषकर साहित्य भी इससे अछूता नहीं है। आशय यह है कि वाई २-के साहित्य एक यथार्थ है और इससे आखें मूँदी नहीं जा सकती।
वैसे तो साहित्य जगत चिंता प्रधान लागों का जमावडा ही होता है उसे वर्तमान और भविष्य की कमीज, पैंट, चाय-कॉफी, खांसी-जुकाम सभी में विघटन के संकेत दिखते हैं लेकिन इधर कुछ दिनों से साहित्य पर मंडरा रहे संकट की बात कुछ अधिक ही की जा रही है। साहित्य की गरिमा, शुचिता, स्वरूप पर मंडरा रहे इस संकट को उत्‍तरआधुनिकता, बाज़ारवाद अपसंस्कृति की शब्दावली में पहचाना जाता है। पर इसे नकारा भी नहीं जा सकता की कुछ बदलाव अवश्य हो रहे हैं यह बात दीगर है कि इसे संकट माना जाए या अवसर।
साहित्य की परंपरा का आरंभ श्रुति परंपरा से होता है फिर लिपि का अविष्कार उसमें एक महत्वपूर्ण मोड़ रहा है । हमारे साहित्य की दृष्टि से एक अत्यंत क्रांतिकारी मोड़ उन्नीसवीं सदी में आया जब छापेखाने का अवतरण हुआ। यह परिवर्तन एक प्रौद्योगिक घटना मात्र नहीं था यह एक बड़ी साहित्यिक घटना भी थी वह इस मायने में कि प्रेस ने साहित्य को प्रसार दिया और इस प्रसार ने लेखक को मुक्ति प्रदान की। सामंत पर उसकी निर्भरता समाप्त हुई और जन से जुड़ाव शुरू हुआ। साहित्य के इस सार्वजनीकरण ने साहित्य को संवेदना और रूप दोनों स्तर पर प्रभावित किया । जहाँ नए-नए विषयों पर रचना प्रारंभ हुई वहीं उपन्यास,कहानी, नाटक आदि नई-नई विधाएं साहित्य जगत में उभरीं । आशय यह है कि छापेखाने का अवतरण स्वयं में एक प्रौद्योगिक घटना होते हुए भी साहित्य जगत के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसने पाठक, लेखक परंपरा के रूप में साहित्य को एक नया आयाम प्रदान किया। शब्द की शक्ति खुल कर सामने आई। बीसवीं सदी का अंत साहित्य जगत में एसे ही एक अन्य मोड़ पर है।
राज्य के स्थान पर बाज़ार का केन्द्रिय नियमनकारी शक्ति हो जाना एक राजनैतिक आर्थिक घटना हो सकती है सूचना, संचार और मीडिया के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति एक प्रोद्यौगिक घटना है अवश्य मध्यमवर्ग का विशालतम वर्ग होना एक सामाजिक प्रवृघि है किंतु ये आर्थिक, राजनैतिक सामाजिक और प्रौद्यौगिक परिवर्तन साहित्य से असंपृक्त नहीं है मीडिया के चलते सृजन का सार्वजनिकरण हुआ है। और यह प्रैस द्वारा किए गए सार्वजनिकरण से कहीं अधिक है। आशय यह है कि नई सदी की प्रौद्योगिक, राजनैतिक, आर्थिक स्थितियों में साहित्य को एक नई वाई-२के स्थिति में ला खड़ा किया है। अंतर यह है कि यह परिवर्तन प्रैस की तुलना में अधिक औचक है, सिर पर एकदम सवार है और साहित्य जगत कम से कम हिंदी साहित्य जगत इसके लिए तैयार नहीं है। इसलिए उसे परिवर्तन, यह अवसर संकट जान पड़ता है। चूंकि उघरआधुनिकता का फ़ज़ी लॉज़िक उसे जंजाल जान पड़ता है और और साहित्य का नया सलीका उसे बेतुका जान पड़ता है। शब्द के साथ दृश्य व श्रव्य का जुडाव़ उसे अपसंस्कृति जान पड़ती है । यानि कुल मिलाकर सारा आंगन ही टेढ़ा है ।
वाई २के साहित्य अन्य क्षेत्र की वाई२के समस्या की भांति किसी संधि या संक्रमण काल की सुविधा नहीं देता अत: साहित्य के सुधी कर्मियों को गंभीरता से यह विचार करना कोगा कि प्रलाप एवं विलाप यदि आवश्यक है तो उसे समानांतर चलने दें किंतु उससे भी अधिक आवश्यक है साहित्य जगत को तैयार करना ,बदलती स्थितियों से अनुकूलित करना, और उसमें वह जिजीविषा व प्राणवायु फूंकना जिससे वह ४० चैनलों के दूरदर्शन पर साहित्य की गुंजाइश को खोज सकें इंटरनेट के महासमुंद्र में साहित्य का लाइट-हाउस को चिन्हित कर सकें ताकि साहित्य की यह परंपरा अगली पीढी को संग्रहालयों में नहीं जीवंत एवं अधिक विकसित रूप में मिले जहां वे इस विकास को अपने इतिहास में प्रैस की ही भांति एक अवसर के रूप में जाने समझें जिसका पूरा लाभ हमारी पूरी पीढ़ी ने उठाया

Wednesday, March 14, 2007

....क्‍योंकि हर पाठ उत्‍पाद है।

मैं इस कथन के निहितार्थ और चिट्ठाकार मित्रों की संभावित प्रतिक्रिया से वाकिफ हूँ। आप पढ़ेंगे और हँसेंगे- अमाँ ये मसिजीवी बिला शक अहमक है, पूछों कि पाठ उत्‍पाद कब नहीं था। तुलसी कबीर की ग्रंथावलियां बिकती हैं और राजकमल के महेश्‍वरी लाला मानें या न मानें पर ठीक ठाक बिकती हैं। स्‍कूल के पाठ और पाठ्यपुस्‍तक बिकती हैं। अरे जनाब पाठशालाएं तक बिक जाती हैं ऐसे में पाठ का उत्‍पाद होना कौन सी नई बात है। भैये मसिजीवी, इतनी छोटी समझदानी के ही बूते मौलिक चिट्ठाशास्‍त्र की बातें करने चले थे ?
इन सब प्रतिक्रियाओं की आशंका के बावजूद मैं कहूँगा कि हम इसे समझें इस पर विचार करें.....फिर भले ही फालतू लगे तो इस पर कुछ न करें।
शिल्‍पा ने इशारा किया है। वैसे भी पहले से ही यह दिखाई दे रहा था कि भारतीय भाषाओं की सामग्री की माँग लगातार बढ़ने वाली है और उसके अनुपात में सामग्री का सृजन नहीं हो रहा है। चिट्ठाकार पेशेवर होने की दिशा में इसलिए नहीं सोच पा रहे हैं कि वे मानते हैं कि पर्याप्‍त पाठक नहीं हैं इसलिए ब्‍लॉग को मोनेटाइज करने यानि उस पर एड चेपने से कोई खास फायदा होने वाला नहीं। इसलिए इंतजार करो और मजे लो (वेट एंड वाच)। लेकिन ठहरिए ये इंतजार खुद हिंदी के लिए बेहद नुकसानदेह हो सकता है। वो इसलिए कि यदि पर्याप्‍त सामग्री के अभाव को हिंदी का सच स्‍वीकार कर लिया गया तो हम उस ‘कटेंट एक्‍सप्‍लोजन’ से वंचित रह जाएंगे जिसके मुहाने पर हम खड़े हैं। याहू, गूगल दोनों को सामग्री चाहिए वो उन्‍हें मिल नहीं रही। आप खुद ही जरा काम की सामग्री हिंदी में खोजने की कोशिश कर देखिए। मुझे रोमन में Linguistic Identity के लिए परिणाम मिला




जबकि देवनागरी में जो 116 पृष्‍ठ मिले भी उसमें से भी अधिकतर हिंदी के न होकर मराठी के थे। यहॉं तुलना करना न उद्देश्‍य है न उससे कुछ हासिल होने वाला है। यहॉं कहना सिर्फ इतना है कि जो भी सामग्री हम तैयार कर रहे हैं उसे और अधिक प्रासंगिक बनाएं। साथ ही यह भी समझें कि ऐसा करना केवल हिंदी की सेवा जैसा पुनीत रिटोरिक ही नहीं है बल्कि ऐसा करने में पेशेवर समझदारी है। क्‍योंकि यदि माँग है और आपूर्ति पर्याप्‍त नहीं तो फिर कम से कम अर्थशास्‍त्र के नियमों के अनुसार तो कीमत बढ़नी चाहिए। पर अविनाश बेहतर जानते हैं कि अर्थशास्‍त्र के नियम जो ‘आम’ का भला करते हों अक्‍सर काम करते नहीं दिखाई देते (वरना मँहगाई का लाभ किसानों को मिलता दिखना चाहिए था)। पर तय यह ही है कि माँग व पूर्ति के इस अंतर का लाभ उठाना जरूरी है इसलिए भी कि इससे हिंदी की बढ़ोतरी भी होगी।
यह सोचने पर कि ये कैसे किया जा सकता है मुझे लगता है कि रेवेन्‍यू जनरेशन के भिन्‍न मॉडल की परिकल्‍पना की जानी चाहिए। यानि बजाए उस मॉडल के जो गूगल एडसेंस साईट मालिकों से वयवहार में लाता है हमें चाहिए कि सामूहिक रूप से अपनी सामग्री उस मॉडल के आधार पर ऑफर करें जो गूगल एडसेंस अपने विज्ञापनदाताओं से काम में लाता है। मैंने इस पर थोड़ा बहुत सोचा और नोटपैड खुरचा है पर याहू/गूगल वालों तक अपनी पहँच नहीं। नारद की व्‍यवसायिकता को लेकर एक साझी समझ है इसलिए उससे पहल के लिए कहना कठिन है वरना नारद एक अलग कंपनी लांच कर ऐसा कर सकता था। कुल मिलाकर ये कि हम जी तोड़ कोशिश करें कि नए सर्विस प्रदाताओं को पर्याप्‍त सामग्री मिलती रहे और हिंदी के सामग्री रचियताओं को बाजिव कीमत।