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Monday, February 09, 2009

हिन्‍दी का ब्लॉग-फेमिनिज्‍म जनाना डिब्‍बा सोच से ग्रस्‍त तो नहीं है

मैं हमेशा से मानता रहा हूँ कि दिल्‍ली जैसे महानगरों में रहने का बड़ा लाभ यह है कि आप पूर्ण गुमनामता का आंनद ले सकते हैं। आप बड़ी तोप हों या छोटी बंदूक बस खुद की नजर में ही होते हैं महानगर भर के लिए आप बस एक चेहरा होते हैं। इसी तरह से आप किसी फन्‍ने खॉं को न जानते हों तो छोटे शहर या गॉंव में आपका काम नहीं चलता...महानगर में आप मजे में जिंदगी काट सकते हैं। तो खैर भले ही हम जानते थे कि मधु किश्‍वर ये हैं...वो हैं पर होंगी। ऐसी पचासों जगह होंगी जहॉं वे हमारे सामने आई होंगी...हमारी बला से।

किंतु इस चोखेरबाली कार्यक्रम में नजरअंदाज करने की सुविधा नहीं थी वे मंच पर थीं और मंच पर बैठे बाकी लोगों से पहले ही परिचय था इसलिए ऐलिमिनेशन के नियम से ही सही इन्‍हें भी पहचाना गया। इनका वक्‍तव्‍य भले ही खूब पॉलिमिकल था, दम भर। और हर पॉलिमिक्‍स की ही तरह आपके पास विकल्‍प नहीं थे... यू लव इट ओर यू हेट इट बट यू कैननॉट इग्‍नोर इट।  चोखेरबालियॉं अपनी रपट दे ही रही हैं बाकी भी देंगी पर हम अपनी बाहरी समझ बता रहे हैं।

मधु ने कहा कि वे ब्‍लॉग नहीं जानतीं चोखेरबाली को नहीं पहचानतीं पर उन्‍हें डर है कि यहॉं का विमर्श कहीं जनाना डब्‍बा न हो। औरत औरत की कहे, औरत की सुने बाकी सब डब्‍बे के बाहर रहें। इससे काम नहीं चलेगा। उन्होंने ये भी कहा कि पश्चिम की बात जाने दें लेकिन हिंदुस्‍तान में स्‍त्री के सवाल पर कोई लड़ाई औरत को अकेले नहीं लड़नी पड़ी मर्द सदा उनके साथ रहे राजा राम मोहन राय से लेकर मानुषी कार्यक्रमों में दरी बिछाने वाले मर्दों तक। मधु बार बार दो संकटों से आगाह करती रहीं... 'जनाना डिब्‍बा सोच' तथा 'विक्टिमहुड की भाषा'

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मतलब ये कि बाहरी समझ वालों के लिए हिन्‍दी ब्लॉग फेमिनिज्‍म के सामने जनाना डब्‍बा बन जाने का संकट है। व्‍यक्तिगत तौर पर मुझे ये आशंका बहुत दमदार भले ही नहीं जान पड़ती पर तब भी एक आशंका तो है ही। उम्‍मीद है ब्‍लॉग के स्‍त्री प्रश्‍न खुद को वृहत्‍तर संदर्भों से भी जोड़ेंगे-  उदारीकरण, मंदी, तेजी, नाटो, पोटा ये सब स्‍त्री प्रश्‍न भी हैं ये समझा जाना चाहिए। 

Thursday, January 08, 2009

तर्कविरोध के बरक्‍स विचार की बस

हाल में अनुजा की पोस्‍ट की पोस्‍ट पढ़ी थी फिर आज लंदन में चल रहे अनीश्‍वरवादियों के अभियान का भी परिचय मिला। मिलीटेंट नास्तिक नहीं हूँ पर सहानुभूति अनीश्‍वरवादियों के ही साथ रही है जिसकी वजह तार्किकता पर उनकी आस्‍था तथा व्‍यवहार का अधिक लोकतांत्रिक होना रहा है। अनीश्‍वरवादी ईश्‍वर को नहीं मानते इसलिए 'उनका ईश्‍वर' किसी दूसरे के ईश्‍वर से श्रेष्‍ठ नहीं होता, पाप पुण्‍य का हिसाब नहीं रखा जाता जो डरा धमकाकर दलित, स्‍त्री या अन्‍य वंचितों का मातहतीकरण हो सके। ये अलग बात है कि मिलीटेंट किस्‍म के निरीश्‍वरवाद में कभी कभी आस्‍थावादियों के लिए उपहास देखने को मिलता है जो हमें नही रुचता (लेकिन पूरी तरह दावा नहीं कर सकते कि हम इससे मुक्‍त हैं वरना पड़ोस के मंदिर से फिल्‍मी धुनों के आधार पर बने भक्ति गीतों की कर्कशता इतना न चिढ़ाती) कुल मिलाकर हमारा पंथ रहा है कि प्रत्‍येक को अपनी आस्‍था का, जिसमें आस्‍थाहीन भी शामिल हैं, का अधिकार है। हालॉंकि मानवता का इतिहास बताता है कि धर्मों ने क्रूरता को बढ़ावा ही दिया है और अनीश्‍वरवाद ने तार्किकता को।

इस सब के बावजूद अनीश्‍वरवादी सदैव अल्‍पमत में ही रहे हैं इसलिए वे कभी एकजुट हो कोई संप्रदाय नहीं बन सके हैं। ऐसे में लंदन की बसों पर ईश्‍वर में विश्‍वास न होने के आनंद का प्रचार बेहद सुखद महसूस होता है। काश ऐसा कभी अपने शहर में भी हो। यूँ चार्वाक तथा बौद्ध दर्शन मूलत: ईश्‍वर के न होने में ही विश्‍वास करते हैं लेकिन वे आधुनिक समय में इसका ऐसा उत्‍सवीकरण नहीं कर पाते।

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यहॉं इस अभियान के बीज शब्‍द प्रोबेबली (शायद) पर जोर देखें। ईश्‍वरवादियों की तरह त्रिशूल और ऐके सैंतालीस के दम पर 'हम ही ठीक हैं' के स्‍थान पर संदेह की गुंजाइश ही इसे इतना आनंददायी सोच बनाती है। ये बात भी कि यदि ईश्‍वर नहीं है तो वर्तमान जीवन अनूठा तथा खूबसूरत है क्‍योंकि ये अब फिर नहीं आएगा। इसके बरक्‍स लंदन की बस पर ही  ईश्‍वरवादियों के निम्‍न संदेश को देखें-

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आतंकवाद से डरे लोगों को पहले विस्‍फोट की तस्‍वीर से डराया फिर संदेश: ईसा ने कहा कि जो मुझमें विश्‍वास रखता है उसका उद्धार होगा- सवाल है जो ईसा में विश्‍वास नहीं रखता उसका   क्‍या होगा, मतलब मेरा। जवाब है कि नर्क में आग की झील है जिसमें जलना पड़ेगा (मानो ईश्‍वर झील का लाइफ गार्ड हो, और अगर वो इतना ही अच्‍छा है तो कमबख्‍त आग की झील जैसी बुरी तकलीफ देनेवाली चीज बनाई ही क्‍यों...उफ्फ देखा मैं उपहास करने लगा)  इस अभियान का आधिकारिक अंतर्जालस्‍थल ये है तथा एक वीडियो जिसमें वे अपने अभियान के पक्ष को स्‍पष्‍ट कर रहे हैं आप नीचे देख सकते हैं।

 

 

 

Friday, August 10, 2007

क्‍यों जरूरी है पॉलीमिक

रिवर्स स्‍वीप सचिन की अपनी ईज़ाद नहीं है पर इसके वे बेहतरीन खिलाड़ी हैं। एक साक्षात्‍कार में उन्‍होंनें इस शाट में अपनी दक्षता के कारण का खुलासा किया कि गली क्रिकेट के दिनों में बाल खोने से बचने के लिए एक नियम होता था कि सीधे हाथ के बल्‍लेबाजों को खब्‍बू बनकर खेलना होता था तथा खब्‍बू बल्‍लेबाज सीधे हाथ से बल्‍लेबाजी करते थे। बचपन के इस अभ्‍यास ने उन्‍हें ऐसी दक्षता दी कि वे रिवर्स स्‍वीप जैसे शाट आसानी से लगा पाते थे। हम किसी रिवर्स स्‍वीप के माहिर नहीं हैं, न तो अक्षरश: न ही प्रतीकात्‍मक रूप से। पर बहस के ककहरे को हमने भी इसी अंदाज में सीखा है।

कालेज के दिनों में हम खुद या कोई मित्र बहसबाज जब कोई विचार पटकते थे, गिराते थे तो वे गुजारिश करते थे कि एक सत्र थेथेरोलॉजी का किया जाए, इसका मतलब होता था कि अपनी राय को तह रखकर बगल में रखो, और विचार के ईमानदार विपक्ष बनकर उन सभी आपत्तियों को यथासंभव ताकत से सामने रखो ताकि विचार की दरारें स्‍पष्‍ट हो जाएं। इस प्रक्रिया का फायदा यह था कि ये गर्म बहस को जन्‍म देती थी और इससे बहस आगे बढ़ती थी। हमारी बौद्धिक ट्रेनिंग किसी संघी बौद्धिक शिविर में नहीं हुई है, न ही नक्‍सली या वामपंथी कैंपों का ही अनुभव है पर वाम लोगों से संघी तर्को का इस्तेमाल कर बहसियाने में गुरेज नहीं हुआ- लोग सांप्रदायिक कहें तो कहें, इसी तरह संघी मित्रों के साथ लोकतांत्रिक तर्कों से लोहा लिया है। बहुत बार बहस आगे बढ़ पाई है। इससे किसी को भ्रम होता होगा... उस पर फिर कभी, यूँ ये बातें गली क्रिकेट के जमाने की हैं। इस तरह की बहस की संरचना पर अपनी बात कह दें- खैर यही वजह है कि जब 'साधुवाद का अंत' दृष्टिगत हुआ तो खुश हुए, मातम नहीं मनाया। साधुवाद टकराव का निषेध करता है और टकराव बिना विकास नहीं हो सकता।

परिभाषा में पॉलिमिक बहसियाने की वह पद्धति है जो असहमतियों में मुखर होती है तथा प्रतिक्रियाओं को जन्‍म देने के इरादे से अपनाई जाती है। शब्‍द का स्रोत प्‍लेटो का रिपब्लिक है जिसमें इस जैसे नाम के पात्र का ऐसा रवैया है। शाब्दिक अर्थ 'युद्ध जैसी' बनता है। इसमें कभी कभी गैर अनुपातिक आत्‍मविश्‍वास भी होता है। जाहिर है इसका प्रवेश किसी भी विमर्श वृत्‍त में तभी होता है जब विमर्श का एक लोकतांत्रिक स्‍पेस निर्मित हो चुका हो।

जैसे कि माना जाता है कि विमर्शों की शुरूआत के लिए पॉलिमिक एक अच्छी विमर्श संरचना है क्‍योंकि वह प्रतिक्रियाओं को जन्‍म देती है, किंतु साथ ही इसकी सीमाएं भी स्‍पष्‍ट हैं, पॉलिमिक चूंकि एक तरफ की बात कहते हैं इसलिए वे संतुलन के मामले में दरिद्र होते हैं।

यह भी तय रहा कि जिस पॉलिमिक संरचना में हम कभी कभी अपनी बात कहते हैं वह ' आदतन' की गई खुराफात नहीं है, अगर कोई उसे खुराफात भी कहे तो भी हम उसे आदतन हो गया, गलती से हो गया कहकर डिस्‍ओन नहीं करते उसकी जिम्‍मेदारी लेते हैं। वैसे हमारी हर बात इस संरचना में कभी कभी ही होती है तथा अक्‍सर कोशिश केवल बात के दूसरे पक्ष को आमंत्रित करना ही होता है और ऐसा हमेशा इतने सकारात्‍मक तरीके से हो पाता हो ये जरूरी नहीं। इस संरचना में ये जोखिम तो हमेशा है ही, लोग अपने तरीके से अपने लहजे में ही बात करेंगे, गली क्रिकेट सबने खेली होती है पर सबके मुहल्‍ले के नियम अलग अलग होते हैं।