Friday, August 10, 2007

क्‍यों जरूरी है पॉलीमिक

रिवर्स स्‍वीप सचिन की अपनी ईज़ाद नहीं है पर इसके वे बेहतरीन खिलाड़ी हैं। एक साक्षात्‍कार में उन्‍होंनें इस शाट में अपनी दक्षता के कारण का खुलासा किया कि गली क्रिकेट के दिनों में बाल खोने से बचने के लिए एक नियम होता था कि सीधे हाथ के बल्‍लेबाजों को खब्‍बू बनकर खेलना होता था तथा खब्‍बू बल्‍लेबाज सीधे हाथ से बल्‍लेबाजी करते थे। बचपन के इस अभ्‍यास ने उन्‍हें ऐसी दक्षता दी कि वे रिवर्स स्‍वीप जैसे शाट आसानी से लगा पाते थे। हम किसी रिवर्स स्‍वीप के माहिर नहीं हैं, न तो अक्षरश: न ही प्रतीकात्‍मक रूप से। पर बहस के ककहरे को हमने भी इसी अंदाज में सीखा है।

कालेज के दिनों में हम खुद या कोई मित्र बहसबाज जब कोई विचार पटकते थे, गिराते थे तो वे गुजारिश करते थे कि एक सत्र थेथेरोलॉजी का किया जाए, इसका मतलब होता था कि अपनी राय को तह रखकर बगल में रखो, और विचार के ईमानदार विपक्ष बनकर उन सभी आपत्तियों को यथासंभव ताकत से सामने रखो ताकि विचार की दरारें स्‍पष्‍ट हो जाएं। इस प्रक्रिया का फायदा यह था कि ये गर्म बहस को जन्‍म देती थी और इससे बहस आगे बढ़ती थी। हमारी बौद्धिक ट्रेनिंग किसी संघी बौद्धिक शिविर में नहीं हुई है, न ही नक्‍सली या वामपंथी कैंपों का ही अनुभव है पर वाम लोगों से संघी तर्को का इस्तेमाल कर बहसियाने में गुरेज नहीं हुआ- लोग सांप्रदायिक कहें तो कहें, इसी तरह संघी मित्रों के साथ लोकतांत्रिक तर्कों से लोहा लिया है। बहुत बार बहस आगे बढ़ पाई है। इससे किसी को भ्रम होता होगा... उस पर फिर कभी, यूँ ये बातें गली क्रिकेट के जमाने की हैं। इस तरह की बहस की संरचना पर अपनी बात कह दें- खैर यही वजह है कि जब 'साधुवाद का अंत' दृष्टिगत हुआ तो खुश हुए, मातम नहीं मनाया। साधुवाद टकराव का निषेध करता है और टकराव बिना विकास नहीं हो सकता।

परिभाषा में पॉलिमिक बहसियाने की वह पद्धति है जो असहमतियों में मुखर होती है तथा प्रतिक्रियाओं को जन्‍म देने के इरादे से अपनाई जाती है। शब्‍द का स्रोत प्‍लेटो का रिपब्लिक है जिसमें इस जैसे नाम के पात्र का ऐसा रवैया है। शाब्दिक अर्थ 'युद्ध जैसी' बनता है। इसमें कभी कभी गैर अनुपातिक आत्‍मविश्‍वास भी होता है। जाहिर है इसका प्रवेश किसी भी विमर्श वृत्‍त में तभी होता है जब विमर्श का एक लोकतांत्रिक स्‍पेस निर्मित हो चुका हो।

जैसे कि माना जाता है कि विमर्शों की शुरूआत के लिए पॉलिमिक एक अच्छी विमर्श संरचना है क्‍योंकि वह प्रतिक्रियाओं को जन्‍म देती है, किंतु साथ ही इसकी सीमाएं भी स्‍पष्‍ट हैं, पॉलिमिक चूंकि एक तरफ की बात कहते हैं इसलिए वे संतुलन के मामले में दरिद्र होते हैं।

यह भी तय रहा कि जिस पॉलिमिक संरचना में हम कभी कभी अपनी बात कहते हैं वह ' आदतन' की गई खुराफात नहीं है, अगर कोई उसे खुराफात भी कहे तो भी हम उसे आदतन हो गया, गलती से हो गया कहकर डिस्‍ओन नहीं करते उसकी जिम्‍मेदारी लेते हैं। वैसे हमारी हर बात इस संरचना में कभी कभी ही होती है तथा अक्‍सर कोशिश केवल बात के दूसरे पक्ष को आमंत्रित करना ही होता है और ऐसा हमेशा इतने सकारात्‍मक तरीके से हो पाता हो ये जरूरी नहीं। इस संरचना में ये जोखिम तो हमेशा है ही, लोग अपने तरीके से अपने लहजे में ही बात करेंगे, गली क्रिकेट सबने खेली होती है पर सबके मुहल्‍ले के नियम अलग अलग होते हैं।

3 comments:

नीरज दीवान said...

थेथेरोलॉजी - विचार के ईमानदार विपक्ष बनकर उन सभी आपत्तियों को यथासंभव ताकत से सामने रखो ताकि विचार की दरारें स्‍पष्‍ट हो जाएं।
ये तरीक़ा आज़माया हुआ है। शब्द से परिचय आज हुआ। रिवर्स स्वीप से बुनी भूमिका लेख को गहरे अर्थ दे रही है। साधुवाद स्वीकार करें।

Anonymous said...

अच्छा लगा लेख

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

अरे इस बहस में केवल दो टिपण्णी !!


लीजिये अब तीन करें देते हैं ....... अच्छा लिखा है है ......पता नहीं क्यों इस मामले में अपुन भी आपके इस बहसिया तरीके का समर्थन करता है .....आखिर इससे बहस करने की क्षमता बढ़ती है जो???