Sunday, August 12, 2007

आपका ब्‍लॉग भौत अच्‍छा है- मुजको गपडचौथ डॉट इन....

आपका blog अच्छा है
मे भी ऐसा blog शुरू करना चाहता हू
आप कोंसी software उपयोग किया
मुजको *******डाट इन अच्छा लगा
आप english मे type करेगा तो hindi मे लिपि आएगी

 

पिछले दिनों इस मार्के के संदेश लगभग हर हिंदी चिट्ठे पर दिखे हैं। ये रंजू, मनोज, रानी, .. और न जाने किस किस नाम से किए गए हैं। कोई सर्च मूल्‍य न जुड़ जाए उनके उत्‍पाद में इसलिए उसका नाम तो नहीं लूंगा, उस औजार की तरफ गया भी नहीं क्‍योंकि जो अपने प्रचार में ईमानदार नहीं उसके उत्‍पाद में ईमानदारी की भला क्‍या गुंजाइश।  पर हमारी दिक्‍कत उत्‍पाद से नहीं है, प्रचार की इस बेईमानी से है जिसमें अलग अलग नामों से एक ही संदेश दिया जा रहा है जो प्रचार है। बाजारवाद के  आने का एक मतलब कई लोगों को यह लगता है कि मूल्‍यों की कोई जगह या जरूरत ही नहीं रह गई है, बहुत खुंदक आती है...

पर इस तरह के स्‍पैम कम से कम एक बहुत भरोसा देने वाली बात करते हैं जो इस टैक्‍स्‍ट की क्‍लोज रीडि़ग से उभरता है। टैक्‍स्‍ट जानबूझकर दक्षिण भारतीयों की शैली में हिंदी (और उसकी गलतियॉं) करता है- यह भाव जगाने की कोशिश है कि देखो कोई दक्षिण भारतीय हिंदी में कोशिश कर रहा है, चलो देख आएं- मुझे सद्भाव का यह विश्‍वास राहत देता है। निहित स्‍वार्थ को जाने दें- ऐसे नौसिखिए नहीं हैं कि जाएंगे और उत्‍पाद खरीद/इंस्‍टाल कर बैठेंगे पर कितनी मनोहारी है यह धारणा कि लोगों को लगता है कि हिंदी भाषी दक्षिण भारतीयों की हिंदी विषयक छोटी सी बात से ही आकर्षित होकर खिंचे चले आएंगे- दो भाषाओं के बीच इस सद्भाव से आनंद अनुभव होता है।

2 comments:

Shrish said...

पहले हम भी इस कमेंट को सीरियस लेकर जवाब दे दिए थे, बाद में देखा कि ये तो कई नामों से कई जगह आ रहा है। अब नाम एक होता तो भी हम धोखा खा जाते कि भाई कोई नया बंदा है, स‌बसे पूछ रहा है।

पहले भी कई लोग टिप्पणी में उपरोक्त साइट का नाम बताते देखे गए हैं, अब तो उन पर भी शक होता है।

जब आजकल हमारे पास IME/Keyboard Driver टूल उपलब्ध हैं तो ऎसे ऑनलाइन टूल काहे इस्तेमाल करें।

अप्रवासी अरुण said...

वैसे उनके ओरिजनल कमेंट से आपकी परिमार्जित टिप्पणी ज्यादा मजेदार है।