Sunday, August 12, 2007

गंगा और रामचरितमानस से मुक्ति का क्रूर प्रसंग

' मैं मानता हूँ कि इस हिंदी प्रदेश की जड़ता, पिछड़ेपन और निष्क्रियता निठल्‍लेपन के लिए जिम्‍मेदार दो चीजें हैं- एक का नाम 'रामचरितमानस' और दूसरे का का नाम 'गंगा' नदी है। ये दो नहीं होते तो शायद हम इनसे उबरने की कोशिश कर लेते'

उपर्युक्‍त कथन किसका हो सकता है इसके अनुमान पर कोई ईनाम नहीं रखा जा सकता- जी सही बूझा...ये हँस के संपादक राजेंद्र यादव के उवाच हैं जो उन्‍होंने स्‍वप्निल प्रजापति के साथ बातचीत में रखे थे और जो वाक के पिछले अंक में प्रकाशित हुए थे (वाक 1, पृ. 28)

इसके पीछे का तर्क पुन: उद्धरण में इस प्रकार है- ' लेकिन गंगा के साथ जो पौराणिकता, जो मिथक जोड़े गए हैं, वे ही गंगा को इस रूप में बनाते हैं। कहीं गंगा विष्‍णु के चरणों से निकल रही है। कहीं शिव के सिर से निकल रही है। मतलब उसमें बहुत से देवताओं को शामिल करने की कोशिश की गई है। कृष्‍ण इसमें शामिल नहीं हैं। इसके महत्‍व में शामिल नहीं हैं। राम तो गंगा के ही हैं। गंगा इन्‍हीं धार्मिकताओं की वजह से है .....गंगा ने निठल्‍ले यानि मात्र खाने पीने वाले, अफीम गांजे का नशा करके पड़े रहने वाले करोड़ो साधुओं की जमात पेदा कर दी है, जो इनके किनारे पर पलते हैं। कहीं पुजारियों के रूप में, कहीं पंडों के रूप में कहीं किसी रूप में। आप जानते हैं कि जो धन परिश्रम से कमाया नहीं जाता, मुफ्त में आता है वह अपराधों का जनक है। कोई अपराध ऐसा नहीं जो यहॉं न होता हो और ये लोग न करते हों' 

इसी प्रकरण में और एक बार राजेंद्र यादव का- 'और रामचरितमानस अपरिवर्तनशीलता का सबसे बड़ा शास्‍त्र है। राम जैसा बनने के लिए आपको दलितों और शूद्रों का वध करना पड़ेगा। गभ्रवती स्‍त्री को घर से भगा देना पड़ेगा'

हिंदी की दुनिया में एक जुमला आजकल कहा जाता है कि 'भई तुलसी के दिन बुरे चल रहे हैं' एक समय था कि आचार्य शुक्‍ल, निराला जैसे रचनाकार तुलसीदास को सर ऑंखों पर बैठा रहे थे (अब ये ब्राह्मणों के रूपों में पहचाने जा रहे हैं) और आजक वर्णवाद व स्त्रीविरोध के प्रतीकों के रूप में।

राजेंद्र यादव की बातों में दम है इससे इंकार नहीं किया जा सकता, प्रतिक्रिया में लिखते हुए हमारे गुरू कृष्‍णदत्‍त पालीवाल जो बकौल खुद के ' ब्राह्मण हैं, पिशाच हैं, नीच हैं- वे कोशिश करते हैं पर कन्विंसिंग नहीं हैं। हम तो बात सामने इस मकसद से रख रहे थे कि देखो भाई हाशियाई विमर्श क्रूर है, किसी को नहीं बख्‍शता। क्‍या बख्‍शना चाहिए ?

5 comments:

Anonymous said...

बुढ़ापे में भी जवान लड़कियों का स्तन पकड़ लेने वाला राजेन्द्र यादव रामचरित मानस और गंगा पर अंगुली तो उठायेगा ही.

Isht Deo Sankrityaayan said...

चार्ल्स शोभराज अगर चंद्र शेखर आज़ाद को गली दें तो आप क्या करिएगा?

Anonymous said...

baat me dam to hain

vishu said...

rajendra yadav apane baap ko baap nahi maan raha hai jo ki insaniyat ke naam par ek badnuma dhabba hai.

Balasubramaniam said...

रामचरितमानस लगभग एक हजार साल से अपने बलबूते पर समस्त उत्तर भारत में हिंदी भाषियों का सिरमौर बनी हुई है। उस पर अनेक आक्षेप-विक्षेप हुए हैं, पर जिस तरह हाथी के चलने पर कुत्ते भौंकते हैं, पर हाथी परवाह नहीं करता, उसी तरह रामचरितमानस भी इन बेकार की बहसों में न पढ़ते हुए लोगों की कंठ-हार बनी हुई है।

बात अपनी परंपरा से जुड़े रहने का है। सरल रास्ता है सुदीर्घ परंपरा को समझने की जेहमत में न पड़ते हुए उसे खारिज कर देने का रास्ता, यानी यादव जी का रास्ता। अधिक कठिन रास्ता है उसे ग्रहण करने का, उससे अपने मतलब की बातें ढूंढ़ निकालने का।

रामचरितमानस के समय जो परिस्थितियां थीं, लगभग वे हीं आज के आम आदमी के सामने हैं - गरीबी, अकाल, शोषण, धार्मिक उन्माद, शासन की उदासीनता, बीमारियां, कुस्वास्थ्य, कुशिक्षा, आदि। रामचरितमानस इन सब समस्याओं से एक समाज के संघर्ष का दस्तावेज है। चूंकि हमारी भी समस्याएं वे ही हैं, हम रामचरितमानस से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

रामचरितमानस में जिस रामराज्य का वर्णन है, वह तुलसी के समाकालीन स्थिति का ठीक उल्टा है। रामराज्य की यह कल्पना एक तरह से तुलसी द्वारा अपने युग की कमियों पर की गई एक करारी टिप्पणी है।

और सब जानते ही हैं कि तुलजी गजब के समन्व्यवादी थे, आज के विभाजित भारत में उनकी इस अंतर्दृष्टि का भी बहुत महत्व है।

तुलसी और रामचरितमानस कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे, हां, यादव जी को जरूर दो-चार सालों में लोग भूल जाएंगे।

इसलिए कोई चिंता की बात नहीं है।