Tuesday, December 30, 2008

दोज़ख की जुबान सी जरूरी है ब्‍लॉगिंग

चलिए मान लेते हैं कि शीर्षक ज्‍यादा सनसनीखेज है पर अगर आप हंस के संपादक राजेंद्र यादव के विषय में बात कर रहे हों तो खुद ब खुद सनसनीखेजता आ ही जाती है, का करें कंट्रोल ई नी होता :)।

हिन्‍दयुग्‍म वार्षिकोत्‍सव के लिए  शैलेश का इतने प्रेम से आग्रह था, उनके परिश्रम का पहले ही कायल रहा हूँ  रविवार का पुस्‍तक बाजार भी पड़ोस में था इसलिए न जाने का सवाल नहीं था। लेकिन ये भी सच है कि राजेंद्र यादव को सुनने की भी जबरदस्‍त इच्‍छा थी। वैसे उन्‍हें सुनने के बेतहाशा मौके मिलते हैं, हम विश्‍वविद्यालय के शिक्षक हैं जो बेहद गोष्‍ठीबाज समुदाय होता है लेकिन ब्‍लॉगिंग पर उन्‍हें सुनने का ये पहला मौका था इसलिए छोड़ना नहीं चाहते थे। हिन्‍दयुग्‍म की कविताओं को लेकर हम बहुत उत्‍साही नहीं रहे हैं पर वहॉं पहुँचकर हैरानी व खुशी हुई, खासकर गौरव सोलंकी की कविता पसंद आई...पर ये भी बोनस ही था।

राजेंद्रजी को ब्‍लॉगिंग पर सुनने की विशेष इच्‍छा इसलिए थी कि मुझे लगता हैIMG_1622 कि राजेंद्र यादव मूलत: ब्‍लॉगर हैं, तिसमें भी ट्राल किस्‍म के ब्‍लॉगर। ये अलग बात है कि पहले पैदा हो गए, आफलाइन ही जिंदगी बिता दी (कह तो रहे हैं कि एक मित्र से सीख रहे हैं आनलाइनत्‍व के गुर, पर इस उम्र में अब क्‍या खाक मुसलमॉं होंगे) लेकिन ब्‍लॉगर होना एक मनोदशा है, स्‍टेट आफ माइंड। अगर आप बिंदास बोलते लिखते हो, गहरा सोचते हो, अपने खिलाफ सोचने वाले, बोलने वाले की इज्‍जत करते हो। नाकाबिले बर्दाश्‍त चीजों को बर्दाश्‍त नहीं करते तो आप समझिए कि आप ब्‍लॉगर मैटर से बने हुए हैं अब ब्‍लॉगर देह मिलेगी या नहीं ये तो ऐतिहासिक कारणों पर निर्भर करता है। कई आनलाइन प्रजाति के जीव गैर ब्‍लॉगर व्‍यवहार रखते हैं जबकि बालमुकुंद गुप्‍त जिनके 'शिवशम्‍भू के चिट्ठे' से चिट्ठा शब्‍द ब्‍लॉग का हिन्‍दी प्रतिशब्‍द बनता है वे इंटरनेट की दुनिया से सदी भर दूर होते हुए भी एड़ी से चोटी तक ब्‍लॉगर हैं। बिंदास कहते हैं, विरोध का जज्‍बा रखते हैं..;पाठक से सीधा संवाद करते हैं। राजेंद्र यादव भी यही करते हैं...इसलिए इंटरनेट सीखेंगे तब सीखेंगे ब्‍लॉगर वे अभी से हैं।

उनके कहे को कुछ हिन्‍दी के लिए शर्मिंदगी की बात मानते हैं। मानें और खुश रहें। हमें तो राजेंद्रजी की तीनों ट्रालात्‍मक टिप्‍पणियों में एक शानदार ब्‍लॉगिंग कौशल दिखाई देता है। बिना लागलपेट के कहें तो उन्‍होंने कहा-

  1. वे हिन्‍दी ब्‍लॉगों का स्‍वागत करते हैं क्‍योंकि इससे प्रकाशन के अयोग्‍य रचनाओं के लेखक हंस जैसी पत्रिकाओं के संपादक के कान खाना बंद करेंगे अब इस कूड़े को वे खुद उन्‍हें अपने ब्‍लॉग पर छाप लेंगे।
  2. वे खुद भी जीवन के पड़ाव पर पहुँचकर इंटरनेट- ब्लॉगिंग आदि तामझाम को सीख लेना चाहते हैं क्‍योंकि आखिर दोज़ख की ज़ुबान भी तो यही होगी न।
  3. इंटरनेटी ब्‍लॉगवीरों को नसीहत देते हुए कहा कि तकनीक नई सदी की और विचार सोलहवी सदी के, नहीं चलेगा...नहीं चलेगा। हिन्‍दी को आधुनिक बनाओ तथा मध्‍यकाल तक की हिन्‍दी के साहित्‍य को अजायबघर भेज दो।

पहले बिंदु पर जिसे असहमति हो वे अर्काइव छानें, ब्‍लॉगजगत पहले ही सहमत है कि यहॉं कूड़ा अधिक है। 80 फीसदी तो कम से कम है ही। दूसरे बिंदु पर किसी को आपत्ति का अधिकार है ही नहीं, अब रहा तीसरा बिंदु तो आधुनिकता केवल टपर टपर कीबोर्ड चलाने से आएगी नहीं, यूँ आप आनलाइन हैं लेकिन उवाचेंगे गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष, जाहिर है ये नहीं चलेगा। मध्‍यकालीन सोच व साहित्‍य, स्‍त्री व वंचितवर्गों के प्रति अवमाननात्‍मक है ये स्‍थापित तथ्‍य है, इन्‍हीं आधारों पर इसे अजायबघर में रखे जाने की सलाह दी गई थी। ये प्रतीकात्‍मक है तथा उपयुक्‍त है। दलित यदि तुलसी से तथा स्‍त्री बिहारी से तादात्‍मय महसूस नहीं करते तो उन्‍हें पूरा हक है ऐसा सोचने का। राजेंद्र इनके परिप्रेक्ष्‍य में ही कह रहे थे। सोलहवी सदी के विचार ब्‍लॉगजगत में रोजाना देखने को मिलते हैं, चोखेरबाली पर परिवारवादी, देवीवादी टिप्‍पणियॉं सूंघ लें सती की चिताओं की 'खुश्‍बू' सुंघाई दे जाएगी।

 

कभी न सोचा था कि राजेंद्र यादव के समर्थन में लिखूंगा क्‍योंकि व्यक्तिगत स्‍तर मुझे राजेंद्र यादव पसंद नहीं ये नापसंदगी मन्‍नू भंडारी प्रकरण में उनके पाखंड के कारण है लेकिन निजी नापसंद से उठने की कोशिश न करें तो कैसे चलेगा..आखिर हम भी तो ब्‍लॉगर हैं

Monday, December 29, 2008

ज्‍योतिहीन राह के स्‍पर्शक

सड़के चिकनी हों, फुटपाथ समतल हों ये किसी शहर के विकसित होने के मापदंडों में से माने जाते हैं। ऐसा कम ही होगा जब आप ऊबड़ खाबड़ फुटपाथ देखें और खुशी महसूस करें या गर्व तथा राहत की अनुभूति हो। साफ समतल फुटपाथ ऑंखों को अच्‍छा दिखता है, सुन्‍दर लगता है। पर ये सुन्‍दरता तो देखने की चीज है... जो ज्‍योतिहीन हैं, जिनकी ऑंखे चेहरे पर बने वे दो गड्ढे भर हैं जो जब तब दुखते हैं जिनसे पानी निकलता है जिनके कारण डाक्‍टर के पास भी जाना पड़ता है लेकिन वे किसी काम नहीं आते। मैं अक्‍सर सोचता हूँ कि किसी नेत्रहीन के लिए शहर कैसा होता है ? वह शहर को छू सकता है, सूंघ सकता है स्‍वाद ले सकता है सुन सकता है लेकिन देख नहीं सकता। जबकि हम देख सकने वालों ने शहर को बनाया बसाया ही इस तरह है कि ये केवल देखने के ही लिए है। अपने खुद के अनुभवों पर विचार करें 98 प्रतिशत अनुभव व स्‍मृति केवल दृश्‍यात्‍मक होती हैं।

इसलिए कल जब दिल्‍ली गेट से आईटीओ की ओर चला तो जो दिखा (पुन: दिखा, छूआ नहीं) उसने एक राहत की अनुभूति दी। फुटपाथ की यह खुरदराहट शहर की स्‍िनग्‍धता का प्रमाण थी। शहर के फुटपाथ के स्पर्शक-

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ये अलग बात है कि कहीं कहीं लगता है कि ठेकेदार ने इन्‍हें नेत्रहीनों की सुविधा के लिए लगे स्‍पर्शक न मानकर सजावट की वस्‍तु तरह लगा दिया है। मसलन इस हिस्‍से में देखें-

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वृक्षदेव से बचकर बिना चोट खाए निकलना किसी नेत्रहीन के लिए भाग्‍य की ही बात होगी। शुरुआत में इस तरह कमियों को छोड़ दें तो ये राजधानी के एक जिम्‍मेदार शहर बनने के निशान हैं। विकलांगता के कारण हाशिए पर धकेले गए लोगों के शहर पर बराबरी के हक की घोषणा भी। एक नजर देखकर सराहा तस्‍वीर खींची और चंद कदम ऑंख बंद कर इन स्‍पर्शकों पर चला, मुझे अपना शहर और सुंदर लगा।

Thursday, December 25, 2008

समय से लड़ती घंटाघर की सुइयों के पक्ष में

किसी बुजुर्ग से बात करें या तीस चालीस साल पुराने किसी शहरी उपन्‍यास को पढ़ें, आपको घंटाघर का जिक्र अवश्‍य मिलेगा।  घंटाघर लगभग हर शहर का महत्‍वपूर्ण निशान (लैंडमार्क) हुआ करता था।  सामान्‍यत यह टाउनहॉल की इमारत में होता है तथा इस तरह इसे शहर के बीचोंबीच माना जाता था इसका समय शहर का मानक समय होता था। घडि़यॉं कम घरों में होती थीं तथा कलाई घड़ी एक महँगी चीज थी। पूरा शहर घंटाघर से अपनी घड़ी को मिलाया करता था।  लेकिन समय से अधिक घंटाघर अपने वास्‍तु व शहरी संस्‍कृति का केंद्र होने के कारण अहम थे। यही वजह है कि शहर का हर प्रमुख संस्‍थान अपने स्‍तंभ में घड़ी लगाकर घंटाघर बन जाने की अपनी महत्‍वकांक्षा रखता था। 

फिर देसी विदेशी घड़‍ियों की क्रांति हुई, इतना अधिक कि अब हमारे शहर में तो घड़ी किलो के हिसाब से मिलती हैं। ऐसे में कम से कम समय देखने के उपकरण के लिहाज से घंटाघर का कोई महत्‍व नहीं ही रह जाएगा। ज्ञानदत्‍तजी ने तो घोषित किया ही कि खुद हाथ घडी रिनंडेंट हो गई है। ऐसे में भला शहर भर की घडी की कौन कहे। लेकिन प्रकार्यात्मकता (फंक्‍शैनिलिटी) से परे भी इन घंटाघरों का एक महत्‍व हो सकता है ये याद के मूर्तिमान रूप हैं। कितनी ही यादें इन घंटाघरों से जुड़ी होती है इसलिए भी अरसे तक ये सबसे अहम लैंडमार्क रहे। विदेशों में तो इनकी कलात्‍मकता के ही कारण इन्‍हें सहेजने पर बल रहता है। हमारे शहर के घंटाघरों की बात करें तो टाउनहाल, फतेहपुरी, हरिनगर, मूलचंद, एसआरसीसी आदि कई महत्‍वपूर्ण घंटाघर देखे हैं दिल्‍ली में। जैसे कि  अँधेरे में लिपटा ये मूलचंद अस्‍पताल का घंटाघर जिसे संयोग ठीक तीन साल पहले भी पोस्‍ट किया गया था

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लेकिन घंटाघर नाम से प्रसिद्ध जगह वह है जो जाहिर है घंटाघर कहलाती है। बिरला मिल्‍स के पास। अंग्रेजो के समय यह गैर यूरोपीय पॉश दिल्‍ली के केंद्र में था। हाल में इस घंटाघर का जीर्णोद्धार किया गया है। कम शाम ये ऐसा दिख रहा था।

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Wednesday, December 24, 2008

दीक्षांत : चोगे पहनकर गुलामी खिली है पता चला है

विश्‍वविद्यालयी दुनिया में जो  बातें मुझे असहज बनाती हैं उनमें से एक है-दीक्षांत समारोह जिन्‍हें अंग्रेजी में कॉन्‍वोकेशन कहा जाता है। यानि जब अब परीक्षा आदि की यातना से गुजर चुके हों तब एक वाहियात सा चोगा पहनकर मंच पर पहुँचे उतने ही वाहियात चोगे में कोई गणमान्‍य आपको डिग्री थमाए आप झुककर उसे ग्रहण करें और कृतकृत महसूस करें। पिछले दिनों हमारे कॉलेज ने भी अपना दीक्षांत समारोह आयोजित किया पड़ोसी राज्‍य के एक बेचारे वृद्ध राज्‍यपाल एक एककर चार सौ बाइस चोगेधारियों को डिग्री थमाते रहे। जय रामजी की, हो गया दीक्षांत।

IMG_1578 मैं अकेला नहीं हूँ जिसे ये चोगे असहज बनाते हैं। जेएनयू तो इस परंपरा को मानता ही नहीं है। दरअसल विरोध की वजह परंपरा की औपनिवेशिक जड़ है। कान्‍वोकेशन के मूल में यह है कि विश्‍वविद्यालय अपनी संतुष्टि हो जाने के बाद स्‍नातकों को चर्च तथा राजा के सम्‍मुख पेश किया करता था जो उन्‍हें मंजूरी देते थे तभी ये युवक (सामान्‍यत: युवक ही, युवतियॉं नहीं) स्‍नातक घोषित किए जाते थे। अंग्रेजों की विश्‍वविद्यालयी प्रणाली को स्‍वीकारने के साथ साथ इस परंपरा को भी स्‍वीकार कर लिया गया। एक दीक्षांत जुलूस आता है, डीन एक एक कर स्‍नातकों को पेश करते हैं तथा फिर डिग्री प्रदान की जाती है। जेएनयू के पास सुविधा यह है कि यह स्‍वातंत्र्योत्‍तर बना विश्‍वविद्यालय है अत: वहॉं यह औपनिवेशिक परंपरा नहीं थी वे बच गए। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय जैसे कई विश्‍वविद्यालय इस गुलामी के प्रतीक को ढोए चले जा रहे हैं। खासकर मुझे दिक्‍कत चोगे पहनने से होती है, चोगे चर्च के पदाधिकारियों की वर्दी का प्रतीक होते हैं जबकि हम दम भरते हैं सेकुलरिज्‍म का। व्‍यक्तिगत स्तर पर मुझे परेशानी ये होती है कि हमारे वे शिक्षक साथी जो जेएनयू से हैं हमारा (मतलब हमारे विश्‍वविद्यालय का) खूब उपहास करते हैं कि हम कैसे बेकार की गुलामी को ढोए जा रहे हैं।

दूसरी ओर ये भी सच है कि सजे सजाए चहकते युवक-युवतियॉं अच्‍छे लगते हैं। ये भी कि पूरी विश्‍वविद्यालयी शिक्षा ही औपनिवेशिक विरासत है फिर गुड़ खाकर गुलगुलों से परहेज के क्‍या मायने हैं। वैसे हमने खुद अपनी डिग्री यानि पीएचडी इस नौटंकी से गुजरकर लेने से मना कर दिया था बाद में दो सौ रुपए की अनुपस्थिति फीस देकर दफ्तर से क्‍लर्क के हाथों डिग्री ली थी पर डिग्री रही तो  उतनी ही औपनिवेशिक और हॉं हर डिग्री पर छपा यही होता है कि ये दीक्षांत समारोह में प्रदान की गई। 

Monday, December 22, 2008

दिल्‍ली में आम खपत की कला- 48° C

महानगरों में कला दिन व दिन उच्‍चभ्रू (बोले तो हाईब्रो) होती जा रही है। ऐसे में दिल्‍ली में चल रहा कला उत्‍सव 48 °C एक सुकूनदायी अनुभव है। देश विदेश के नामी गिरामी कलाकारों ने अपनी कलाकृतियॉं दिल्‍लीवासियों के लिए सामने रखी हैं लेकिन चमचमाती कलादीर्घाओं में नहीं वरन सार्वजनिक स्‍थलों पर। बेटिकट। निम्‍न स्‍थलों पर-

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रास्‍ते में पढ़ने वाली दो जगहों पर हम कल जा धमके। ये थीं कश्‍मीरी गेट तथा रामलीला मैदान

कुल जमा छ: कलाकृतियॉं यहॉं प्रदर्शित हैं। सभी कलाकृतियॉं बड़े आकार की हैं। कलाकृतियॉं सुबोध गुप्‍ता, समित बासु, अतुल भल्‍ला, जिनी बॉस, फ्रिसो विटवीन, संजीव शंकर की हैं। इन कलाकृतियों की तस्‍वीरें उनके लिए जो दिल्‍लीवासी नहीं हैं तथा जो दिल्‍लीवासी हैं उन्‍हें चाहिए पास की किसी कलाकृति की सराहना करने के लिए जरूर जाएं।

 

कश्‍मीरी गेट पर सुबोध गुप्‍ता की कृति-

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कश्‍मीरी गेट पर ही अतुल भल्‍ला की कलाकृति 'छबील'

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एक अन्‍य कोण से-

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रामलीला मैदान पर संजीव शंकर की कृति- जुगाड़

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रामलीला मैदान पर ही जिनी वॉस की कृति मिरेकल इन विटवीन

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रामलीला मैदान पर ही फ्रिसो विटवीन की कृति होकस-पॉकस

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एक अन्‍य कोण से-

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Thursday, December 11, 2008

उपराष्‍ट्रपति केवल खेद व्‍यक्त करते हैं आजकल

इधर उधर हांडते हुए अपने उपराष्‍ट्रपति साहब के अंतर्जालीय घर पर जा पहुँचे।  सोचा देखें कि वे आजकल क्‍या कर रहे हैं। बेहद बिजी हैं...अब उनकी हालिया प्रेस रिलीज ही देखिए, पहले पेज पर 5 प्रेस रिलीज हैं सब की सब शोक व निंदा ही कर रही हैं मुंबई, असम, अगरतला, जोधपुर, दिल्‍ली की मौतों पर शोक और बस शोक।

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Wednesday, November 19, 2008

चलो थोड़ा सा 'हुत्थली' हो जाएं

एक किताब पढ़ते-पढ़ते कल अचान‍क यूरेका मूमेंट से साक्षात्‍कार हुआ। ऐसा नहीं कि यह भावना नहीं थी, बिल्‍कुल थी पर इसके लिए शब्‍द नहीं था। 'आज के अतीत' (भीष्‍म साहनी) पढ़ते हुए निम्‍न पैरा पढ़ा-

पंजाबी भाषा में एक शब्‍द है 'हुत्‍थल'। हिन्‍दी में हुत्‍थल के लिए कौन सा शब्‍द है मैं नहीं जानता, शायद हुत्‍थल वाला मिज़ाज ही पंजाबियों  का होता है। मतलब की सीधा एक रास्‍ते पर चलते चलते तुम्‍हें सहसा ही कुछ सूझ जाए और तुम रास्‍ता बदल लो। वह मानसिक स्थिति जो तुम्‍हें रास्‍ता बदलने के लिए उकसाती है, वह हुत्‍‍थल कहलाती है।

मैं गजब हुत्‍थली महसूस करता रहा हूँ। दरअसल महसूस तो करता था पर इस शब्‍द ने अहसास कराया कि जो महसूस करता था वह हुत्‍थल थी।  घर पर बैठे बैठे अचानक करनाल के ढाबे पर परांठे खाने की हुत्‍थल से लेकर,  चलती पढ़ाई और बेरोजगारी के बीच ही हुत्‍थली तरीके से शादी कर लेने तक कई हुत्‍थल हैं जो पूरी की हैं और हर बार अच्‍छा महसूस किया है।  लेकिन उससे भी बड़ी कई हुत्‍थलें हो सकती हैं। मतलब हुत्‍थली ख्‍याल, हुत्‍थल तो वे तब कहलातीं जब उनके उठते ही उनपर अमल शुरू हो गया होता। जैसे किसी रोज अनूप शुक्‍ला की ही तरह साइकल लेकर निकल लेते हिन्‍दुस्‍तान भर से अनुभव बटोरने। या घर से निकलें नौकरी करने और इस्‍तीफा दे आएं,  किसी रात फुटपाथ पर सोकर देखें (दिल्‍ली की एक संस्‍था 'जमघट' नियमित तौर पर ये अनुभव दिलाती है, बेघर लोगों की तकलीफ से दोचार करवाने के लिए),  और भी न जाने कितनी हुत्‍थलें।

हुत्‍थली होने का एक मजा जमे जमाए लोगों की प्रतिक्रिया देखना भी होता है। मुझे याद है कि सरकारी नौकरी में था रास नहीं आ रही थी लगता था कि मैं कर क्‍या रहा हूँ। एक दिन अचानक  इस्‍तीफा दिया स्‍टाफरूम पहुँचा तो लोगों की प्रतिक्रिया बेहद मजेदार थी, कई के लिए ये उनके जीवन दर्शन पर ही चोट था। हालांकि ऐसा कोई इरादा नहीं था, बाद में अफसोस सा भी हुआ कि कोई दूसरी अस्‍थाई नौकरी ही खोज लेता पहले... लेकिन हुत्‍थल तो बस हुत्‍थल ठहरी।  लेकिन हॉं इतना तय है कि हुत्‍थलें न हो तो जिंदगी बेहद नीरस व ऊब भरी हो।

चित्र - यहॉं से साभार

Monday, November 17, 2008

(मत) मुस्‍कराएं कि आप कैमरा पर हैं

गनीमत है कि हम भारतीय सार्वजनिक साईनबोर्डों को बहुत गंभीरता से नहीं लेते वरना कम से कम दिल्‍ली के नागरिकों की मुँह की पसलियों का चटकना तो  तय है, हर माल, सड़क, स्‍टेशन, मैट्रो, चौराहे, दफ्तर, स्‍कूल, कॉलेज, होटल-रेस्त्रां में एक कैमरा हम पर चोर नजर रख रहा होता है। अक्‍सर एक साइनबोर्ड भी लगा होता है कि मुस्‍कराएं, आप कैमरा पर हैं। मैं तो बहुत प्रसन्‍न हुआ जब मैंने सुना कि शीला दीक्षितजी ने कहा है कि जल्‍द ही पूरी दिल्‍ली को वाई-फाई बनाया जा रहा है...बाद में पता चला कि इसका उद्देश्‍य सस्‍ता, सुदर टिकाऊ इंटरनेट प्रदान कराना उतना नहीं है जितना यह कि वाई फाई के बाद सर्वेलेंस कैमरे लगाना आसान हो जाएगा..जहॉं चाहो एक कैमरा टांक दो...बाकी तो वाईफाई नेटवर्क से डाटा पहुँच जाएगा जहॉं चाहिए।

image दुनिया के अन्‍य लोकतंत्रों में भी जहॉं निजता की रक्षा के कानून खासे सख्‍त हैं, वहाँ सर्वेलेंस कैमरों की अति से लोग आजिज हैं। वैसे जाहिर है कैमरे केवल मूर्त प्रतीक भर हैं, सच तो यह है कि हम बहुत तेज गति से एक सर्वेलेंस समाज (हिन्‍दी में इसके लिए क्‍या शब्‍द कहें? अभी नहीं सूझ रहा) में बदलते जा रहे हैं। सावधान कि हम पर नजर रखी जा रही है। कहीं सुरक्षा की जरूरतों के चलते हमारे सार्वजनिक स्‍पेस का चप्‍पा-चप्‍‍पा  इन कैमरों के जद में आ गया है। वहीं कहीं सुविधा, आईटी आदि के नाम पर भी हमारे निजत्‍‍व पर खतरा बढ़ रहा है। कालेज के हमारे परिसर में कईयों कैमरे लगे हैं इसी तरह मैंने ध्‍यान दिया कि मेरे विश्‍वविद्यालय की वेबसाईट पर सैकडों स्‍त्री- पुरुषों के नाम पते व शिक्षा आदि के ऑंकडे डाल दिए गए हैं, लिंक जानबूझकर नहीं दे रहा हूँ ताकि निजता के इस उल्‍लंघन में मेरी हिस्‍सेदारी न हो। 

अधिकांश आधुनिक समाज इन कैमरों को इस तर्क से सह लेते हैं कि सुरक्षा के लिए नेसेसरी-ईविल हैं, या ये भी कि इनसे अपराधी डरें हम क्‍यों। किंतु अनेक शोध बताते हैं  कि एक सर्वेलेंस समाज स्वाभाविक समाज नहीं होता, जब हमें पता होता है कि हम पर निगाह रखी जा रही है तो हम अधिक तनाव में होते हैं तथा अपने व्‍यवहार को निगाह रखने वाले की अपेक्षा के अनुरूप बनाने का प्रयास करते हैं जो अक्‍सर कृत्रिम होता है। मेरे कॉलेज के युवा छात्र अब चिल्‍लाकर, अट्टहास करते हुए गले मिलते नहीं दिखाई देते या बहुत कम दिखाई देते हैं...ये नहीं कि ये किसी कानून के खिलाफ है पर वे जानते हैं कि उन्‍हें देखा जा रहा हो सकता है...इसी प्रकार दिल्‍ली मैट्रो में दिल्‍लीवासियों के जिस व्‍यवहार की बहुत तारीफ होती है उसके पीछे भी कैमरों की अहम भूमिका है, किंतु आम शहरी हर जगह खुद को 'सिद्ध' करता हुआ घूमे तो कोई खुश होने की बात तो नहीं।

खैर चलूँ कालेज का समय हो रहा है, अगर गिनूं तो मैं घर से कॉलेज तक कम से कम 40 कैमरे मैट्रो के 8 कॉलेज के फिर 3-4 सड़क पर और वापसी में भी इतने ही कैमरे...जहन्‍नुम में जाएं सब, हम नहीं मुस्‍कराते भले ही हम कैमरे पर हों।

Sunday, November 16, 2008

भाषा का अपना शतरंजी गणित है

ये पोस्‍ट हमारी 'संडे यूँ ही' के रूप में पढ़ी जाए

खेल पसंद करते रहे हैं पर खुद को खिलाड़ी नहीं कह सकते। क्रिकेट- उक्रेट खेलने तो हर भारतीय बच्‍चे की मजबूरी ही मानिए पर उसके स्‍तर से आप बहुत हुआ तो लपूझन्‍ने के लफत्‍तू की ही याद करेंगे। बैडमिंटन, टेबल-टेनिस जैसे इंडोर खेल स्‍कूल में खेले पर हममें ऐसी किसी प्रतिभा के दर्शन कभी किसी को नहीं हुए जिसके कुचले जाने के नाम पर किसी व्‍यवस्‍था को कोसा जा सके। पतंग में चरखनी पकड़ना अपने लायक काम रहा है और कंचे खेलने में निशाना सधता नहीं इसलिए नक्‍का-पूर और कली-जोट जैसे मैथेमेटिकल खेल ही खेले हैं। बस रहा शतरंज.. यही एक मात्र ऐसा मान्‍यता प्राप्‍त खेल है जिसे हमने किसी मान्‍यताप्राप्‍त स्‍तर तक खेला हो। हालांकि समय व साथियों के अभाव में ये भी अब छूट रहा है...कंप्‍यूटर के साथ खेलने में वो मजा नहीं।

शतरंज मजेदार खेल है सिर्फ इसलिए नहीं कि ये शारीरिक  ताकत और संसाधनों पर कम निर्भर है वरन इसलिए भी कि समाज, उम्र, लिंग के भेदों की जो ऐसी तैसी ये खेल करता है कम ही खेल ऐसा करने का दम भर सकते हैं। एक अन्‍य वजह इस खेल को पसंद करने की यह है कि खेल मूर्त राशियों पर निर्भर नहीं है पूरी तरह से अमूर्त है। मैं कक्षा में भाषा की प्रकृति सिखाने के लिए शतरंज के खेल की मिसाल ही देता रहा हूँ। कैसे लकड़ी का एक टुकड़ा एक मूल्‍य हासिल कर लेता है और उस मूल्‍य के हिसाब से व्‍यवहार करता है (अगर गोटी खो जाए तो किसी छोटे पत्‍थर या बोतल के ढक्‍कन को भी वही मूल्‍य दिया जा सकता है तब वह उस वजीर या हाथी जैसा व्‍यवहार करेगा)  यानि व्‍यवस्‍था (जैसे कि भाषा) में अर्थ किसी शब्‍द विशेष का नहीं है वरन वह तो व्‍यवस्‍था प्रदत्‍त है, इस नहीं तो उस ध्‍वनि-गुच्‍छ को दिया जा सकता है (क्‍या फर्क पड़ता है, प्रेम की जगह लिख दो किताब)

खैर उम्‍मीद है आप कुछ काम की बात पाने की उम्‍मीद में नही पढ़ रहे हैं, इसे 'संडे यूँ ही' ही मानें। लीजिए हाल की वर्ल्‍ड चैंपियनशिप का वह मैच जिसमें वी. आनंद, व्‍लादिमीर क्रेमनिक से हारे थे, वैसे चैंपियनशिप आनंद ने जीती थी-

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अधिकांश प्रेक्षकों का मानना था कि 26. Rab1 चाल में आनंद ने गलती की है। पूरा गेम आप इस लिंक पर देख सकते हैं

 

Saturday, November 15, 2008

टिफिन में अचार बना समय

सही सही गणना करूं तो बात छब्बीस साल पुरानी होनी चाहिए क्‍योंकि याद पड़ता हे कि ये मेरे नए स्‍‍कूल का पहला साल था यानि छठे दर्जे में।tiffin नया स्‍कूल घर से खासा दूर था बस लेनी होती थी, वापस आते आते शाम के सात बज जाते थे इसलिए टिफिन ले जाना शुरू करना पड़ा जिसके मायने थे पिछले सप्‍ताह के दैनिक हिंदुस्‍तान में लिपटे दो परांठे जिसके बीच में या तो कोई सूखी सब्‍जी होती या फिर घर का डाला आम का अचार...वैसे बंदे को इनसे कोई खास तकलीफ नहीं थी..पर एक दिन घर आकर हमने शिकायत की, कि क्‍या मम्‍मी आप रोज ये सब भेज देती हो..बाकी लोग कितने मजे से रोज छोले खरीदकर डबलरोटी के साथ खाते हैं। सुनकर घर में सब हँसे मैं चुप हो गया।

***

सर्दियों की आहट शुरू हो गई है। मेरे बच्‍चों की स्कूल यूनीफार्म बदल गई है,  नेकर और स्‍कर्ट की जगह ट्राउजर्स, फुल स्‍लीव शर्ट उस पर टाई। पर नहीं बदला तो टिफिन। प्‍लास्टिक का ये डिब्‍बा जिसमें एल्‍यूमिनियम फाइल में लिपटा एक परांठा साथ में कोई सब्‍जी। जितना कष्‍ट मुझे बच्‍चे को बेपनाह भारी बस्‍ते लादे देखकर होता है उससे कम इस टिफिन को देखकर नहीं होता। नवम्‍बर-दिसम्‍बर की सर्दी में किस लायक बचेगा ये 'खाना' - तीन घंटे बाद। मैं बेहद ग्‍लानि महसूस करता हूँ क्‍यों ये संभव नहीं है कि स्‍कूल बच्‍चों के खाने गर्म करने की कोई व्‍यवस्‍था करे।

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बेटे के साथ उसकी स्‍कूल बस का इंतजार करते हुए मैंने उसे जैसे तैसे फुसलाकर ये पूछा कि यार सच बता कि ये रोज रोज खाना क्‍यों बचा लाते हो, 'फिनिश' क्‍यों नहीं करते। 'क्‍या करूं 'पा' आप लोग रोज रोज इतना 'मुश्किल'  खाना भेजते हो अगर रोटी सब्‍जी जैसा खाना पूरा फिनिश करूं फिर तो सारी 'ब्रेक' खाने में ही खत्‍म हो जाएगी फिर स्किड (कॉरीडोर में दौड़ना और फिर जड़त्‍व के सहारे जूतों के बल फिसलना) कब खेलूंगा।

Friday, November 14, 2008

मेरा पंचिंग बैग, मेरी दीदी

कभी कभी विज्ञापन भी ताजगी से भर सकते हैं। मुद्रा विज्ञापन ऐजेंसी इन दिनों यूनियन बैंक ऑफ इंडिया का एक कैंपेन देख रही है। 'आपके सपने सिर्फ आपके नहीं है'। इसी क्रम में 'दीदी' विज्ञापन भी देखने को मिला। बहुत बौद्धिकता झाड़नी हो तो हम इसे रिश्‍तों का बाजारीकरण वगैरह कहकर  स्‍यापा कर सकते हैं पर मुझे यह विज्ञापन आकर्षक लगा। अक्‍सर बहनों के आपसी प्रेम पर रचनात्‍मक ध्‍यान कम जाता है, शायद इसलिए कि इस रिश्‍ते में आर्थिक, सामाजिक व अन्‍य दबाब अन्‍य रिश्‍तों की तुलना में इतने कम हैं कहानी में ट्विस्‍ट कम होता है और इसी वजह से ये रिश्‍ता इसकी गर्माहट और आनंद भी नजरअंदाज हो जाता है।

विज्ञापन हिन्‍दी व अंग्रेजी दोनों में है। अखबार में हिंदी में देखा था पर उसे स्‍कैन करने पर बहुत साफ नहीं दिखा इसलिए  हिन्‍दी की पंक्तियों को टाईप कर छवि अंग्रेजी विज्ञापन से दी जा रही है जो इंटरनेट से ही मिली है।

 

 

 

 

शायद मैं कभी न जान पाउं कि उसने क्‍या क्‍या किया मेरे लिए

जैसे कि वो छोटी छोटी चीजें

बस में मेरे लिए सीट रोकना

तस्‍मे बॉंधना, मेरी गलती अपने ऊपर लेना

कितने साल गुजर गए. फिर भी जब वो पास होती है

तो मैं बन जाती हूँ एक बच्‍ची दुनिया से बेखबर

वो है मेरी दोस्‍त. मेरा पंचिंग बैग. मेरी दीदी.

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Thursday, November 13, 2008

काहे क़ाफ की परियों से एक मुलाकात

अरसे बाद आज ऐसा हुआ कि दिन भर में ही एक किताब खत्‍म की। और हॉं आज छुट्टी का दिन नहीं था यानि कॉलेज जाना पढ़ाना फिर घर आकर बच्‍चों की देखभाल, उन्‍हें पढ़ाना, खिलाना ताकि पत्‍नी कॉलेज जाकर पढ़ाकर आ सकें- ये सब भी किया फिर भी वह किताब जो सुबह आठ बजे मैट्रो की सवार के दौरान शुरू की थी, शाम सात बजे समाप्‍त हो गई है। ये एक उपलब्धि सा जान पड़ता है। ऐसा लग रहा है मानो एक लंबी यात्रा पूरी कर घर वापस पहुँचा हूँ।  कल कॉलेज के पुस्‍तक मेले से कुछ किताब खरीदी थीं, इनमें से एक है असग़र वजाहत की - चलते तो अच्‍छा था। ये पुस्‍तक असगर की ईरान-आजरबाईजान की यात्रा के संस्‍मरण हैं।

asgar wajahat travelogue

कुल जमा 26 संसमरणात्‍मक लेख हैं जो 144 पेज की पुस्‍तक में कबूतरों के झ़ु़ड से छाए हैं जो तेहरान जाकर उतरते हैं और पूरे ईरान व आजरबाईजान में भटकते फिरते हैं अमरूद के बाग खोजते हुए। तेहरान के हिजाब से खिन्‍न ये लेखक 'कोहे क़ाफ' की परियों से दो चार होता है और ऐसी दुनिया का परिचय हमें देता है जिसकी ओर झांकने का कभी हिन्‍दी की दुनिया को मौका ही नहीं मिला है। मध्‍य एशिया पर राहुल के बाद किसी लेखक ने नहीं लिखा, राहुल का लिखा भी अब कम ही मिलता और पढ़ा जाता है।

यात्रा संस्‍मरण पढ़ना जहॉं आह्लाद से भरते हैं वही ये  अब बेहद लाचारगी का एहसास भी  देते हैं, दरअसल अब विश्‍वास जमता जा रहा है कि संचार के बेहद तेज होते साधनों के बावजूद दुनिया का एक बहुत बड़ा हिस्‍सा शायद कभी नहीं देख पाउंगा। देश का ही कितनाहिस्‍सा अनदेखा है, दुनिया तो सारी ही पहुँच से बाहर प्रतीत होती है। 

 

पुस्‍तक का विवरण :  चलते तो अच्‍छा था, असगर वजाहत, राजकमल प्रकाशन 2008, पृष्‍ठ 144, कीमत- 75 रुपए।

Wednesday, November 12, 2008

जब भीष्‍म साहनीजी ने मुझे झाड़ पर चढ़ाया

आज कॉलेज में छोटा लेकिन भावुक सा कार्यक्रम था। यह था भीष्‍म साहनी पुस्‍तक मेले की शुरूआत। इस पुस्तक मेले के बहाने कॉलेज के नए-पुराने साथियों ने भीष्‍म साहनी को याद किया तथा कई ने अपने संस्‍मरण भी सुनाए। दरअसल हमारा कॉलेज जो दिल्‍ली कॉलेज के नाम से जाना जाता था और अब ज़ाकिर हुसैन कॉलेज है इससे भीष्‍मजी का गहरा नाता रहा है। अपने रिटायर होने तक भीष्‍मजी इसी कॉलेज में अंग्रेजी के शिक्षक थे। उनकी अधिकांश रचनाएं इसी कॉलेज के पुस्तकालय में लिखी गई हैं जिनमें तमस भी शामिल है।  मैं खुद 1990-93 में इस कॉलेज का विद्यार्थी था किंतु भीष्‍मजी इससे पहले ही रिटायर हो चुके थे।

आज के कार्यक्रम को बौद्धिक के स्‍थान पर भावनात्‍मक रखने का सचेत निर्णय लिया गया था, इस अवसर पर प्रो. कल्‍पना साहनी जो रूसी भाषा की विदुषी हैं को इस नाते बुलाया गयाbhishma sahni था कि वे भीष्‍मजी की सुपुत्री हैं। इसी प्रकार राधेश्‍याम दुबे भी अतिथि थे, उल्‍लेखनीय है कि श्री दुबे भीष्‍‍मजी के आत्‍मीय मित्र रहे हैं, भीष्‍मजी ने अपनी आत्‍मकथा 'आज के अतीत से', श्री दुबे को ही समर्पित की है। कार्यक्रम में कई आत्‍मीय प्रसंग सुनने को मिले जो भाव विभोर कर पा रहे थे। मजे की बात है कि कॉलेज के मित्र अपने साथी को बेहद विनम्र तथा संजीदा शख्‍स के रूप में याद कर रहे थे जबकि श्री दुबे ने बताया कि भीष्‍मजी दरअसल विनोदी तथा टांग-खींचू थे ये अलग बात है कि वे इतनी आहिस्‍ता से ऐसा किया करते थे कि उल्‍लू बने शख्‍स को बहुत बाद में पता चलता था।

मैं  इस बात पर चुपचाप मुस्करा उठा। मुझे याद आया कि किस प्रकार जब मैं कॉलेज का छात्र था तथा हिन्‍दी साहित्‍य सभा में भी कुछ कुछ था तो तय हुआ कि भीष्‍मजी को बुलाया जाए, उनका अपना कॉलेज रहा था वे बहुत खुशी खुशी आए। कार्यक्रम का संचालन मेरे जिम्‍मे था.. वाद विवाद वगैरह अपने काम रहे थे इसलिए मंच पर पहुँच ये शब्द और वो शब्‍‍द हमने गिराए, उसके बाद भीष्‍मजी का भाषण हुआ। कार्यक्रम समाप्‍त हुआ। हमें लगा हम छा गए हैं जबकि सच ये था कि तब तक तमस और एकाध कहानी के अलावा हमने भीष्‍मजी के बारे में कुछ खास पढ़ा न था। जब विदा करने गए तो बेहद नम्र और सौम्‍य सी मुस्‍कान में उन्‍होंने नाम लेकर कहा कि भई आपकी हिन्‍दी बहुत अच्‍छी है, सच कहूँ तो मुझसे भी अच्छी है। वाह वाह मैं तो जैसे सातवें आसमान पर था.. सुनो मेरी हिन्‍दी भीष्‍मजी से अच्छी है ... खुद उन्‍होंने कहा... वाह। झूठ नहीं कहूँगा कि मैं कई साल तक इस वाक्‍य को बेहद गंभीरता से लेता रहा। वो तो बाद में उनके बारे में जानकर पता चला कि उर्दू से पढ़ा ये व्‍यक्ति जिसने संस्‍कृत गुरूकुल से पढ़ी, अंग्रेजी का विद्वान अध्‍यापक‍, हिन्‍दी का इतना बड़ा लेखक, रूसी व कई और भाषाओं का ज्ञाता चुपचाप मुझ बालक के अकारण अपनी भाषा पर भारी शब्‍दों का बोझा लादने की हमारी प्रवृत्ति पर हल्‍के सा व्‍यंग्‍य मारकर हमें उल्‍लू बना गया था जिसे समझने में ही हमें कई साल लग गए। कोई शक नहीं कि मैं राधेश्‍याम दुबे जी से सहमत हूँ कि भीष्‍मजी के हाथों उल्‍लू बने शख्‍स को बहुत बाद में पता चलता है कि उसके साथ क्‍या हुआ। 

Monday, November 10, 2008

ये मेरा भय यह तेरा भय

जब छपास में सनराइज ने तनख्‍वाह के देर से मिलने के भय की अभिव्‍यक्ति की तथा ज्ञानदत्‍तजी ने ऐसे भय की अनुपस्थिति पर संतोष जाहिर किया तो हम सहसा ही अपने भयों के विश्‍लेषण में जुट गए। हमें भी लगातार तनख्‍वाह के मिस हो जाने की भय सताता है जबकि मोटे होने, अकेले होने, बुढ़ापे से भय नहीं लगता। मजे की बात ये है कि अ‍ब तक जो नौकरी बजाई है उसके दौरान कम ही ऐसा हुआ है घर सिर्फ हमारी तनख्‍वाह पर निर्भर रहा हो। कुल मिलाकर ज्ञानदत्‍तजी जैसी सुरक्षा बनी रही है तब भी तनख्‍वाह न मिलने के भय से डरना हम अपनी ही जिम्‍मेदारी मानते रहे हैं।

दरअसल सबके भय एक से नहीं होते, सट्टेबाज के लिए सेंसेक्‍स का 5000 पर पहुँच जाना, भय की अति है हमारे लिए ये मात्र एक संख्‍या है जो 13882 से ज्‍यादा सुंदर प्रतीत होती है, कितना अच्‍छा हो सेंसेक्‍स हमेशा 5000 या नीचे रहे..फिगर कमजोर हो तो सेक्‍सी लगती है और बिना सेक्‍स के क्‍या सेंसेक्स।   

भय के भी पदसोपान होते हैं। इनकी भी एक लैंगिक निर्मिति होती है। उदाहरण के लिए मेरी स्‍टीरियोटाईप समझ का कोना कहता है कि तनख्‍वाह का समय पर न मिलना एक ऐसा भय है जो अपनी प्रकृति में ठीक वैसे ही मर्दाना महसूस होता है जैसे कि चेहरे पर झुर्रियों का दिखने लगना एक जनाना सा भय है। इससे पहले कि कोई चोखेरबाली आपत्ति दर्ज करे हम कहे देते हैं कि आपत्ति के मामले में हम आत्‍मनिर्भर हैं, हम पहले ही कह चुके हैं कि भय की ये लैंगिक समझ स्‍टीरियोटाईप्‍ड है। 

Saturday, November 08, 2008

अपने छात्रों के थूक से लिसड़े चेहरे के मेरे डर

एस ए आर जीलानी हमारे विश्‍वविद्यालय के ही अध्‍यापक हैं बल्कि वे दरअसल उसी कॉलेज में अरबी भाषा पढ़ाते हैं जिसमें मैं हिन्‍दी, केवल समय का अंतर है। मैं प्रात: काल की पारी के कॉलेज में हूँ जबकि जीलानी सांध्‍य कॉलेज में हैं। वरना कॉलेज की इमारत, इतिहास, संस्‍कृति एक ही हैं। स्‍टाफ कक्ष के जिन सोफों पर सुबह हम बैठते हैं शाम को आकर वे बैठते हैं। सेमिनार रूम, गलियारे सब एक ही तो हैं। विश्‍वविद्यालय परिसर के जिस संगोष्‍ठी कक्ष में डा. जीलानी के मुँह पर थूक दिया गया उनसे बदतमीजी की गई उसमें जाकर बोलना सुनना हमारा भी होता रहता है। गोया बात ये है कि कल से हमें लग रहा कि बस ये संयोग ही है कि जीलानी का मुँह था, हमारा भी हो सकता था।

जीलानी हमारे मित्र नहीं है, जब से उन पर जानलेवा हमला करवाया गया था तबसे सुरक्षा की सरकारी नौटंकी के चलते वे संयोग भी कम हो गए थे कि वे सामने पड़ जाएं तो दुआ-सलाम हो जाए पर इस सबके बावजूद हमें कतई नहीं लगता...कि वे हमसे अलग हैं। हम इस थूक की लिजलिजाहट अपने चेहरे पर कँपकँपाते हुए महसूस कर रहे हैं। कक्षा में कभी कोई विद्यार्थी (हमारे भी और जीलानी के भी..छात्र तो एकसे ही हैं न) हमसे असहमत होकर कभी अटपटा, या थोड़ा अधिक उत्‍साह या कक्षा की गरिमा से इधर उधर सा विचलित होता हुआ कह बैठता है तो हम हल्‍का सा चुप हो जाते हैं, ऑंख उसकी ओर गढ़ा सा कर देखते भर हैं..कभी नही हुआ कि उसे महसूस न हो जाए कि असहमति ठीक है पर वे इस तरह नहीं बोल सकते। बात को गरिमा से ही कहना होगा। पर अब कल क्‍या होगा...मुझे गोदान पढ़ाना है मुझे लगता है कि राय साहब व होरी एक ही तरह मरजाद के मिथक के शिकार भर हैं...लेकिन अगली पंक्ति के सौरभ को लगता है कि दोनों को एकसा नही माना जा सकता ..एक शोषक है दूसरा शोषित। पर आज मुझे डर लगता है मैंने अपनी बात कही..उसे पसंद नहीं आई तो अब वो कहीं..मुझ पर थूक तो नहीं देगा न। जीलानी साहब  के मुँह पर तो थूक दिया न, सौरभ न सही कोई और विद्यार्थी था क्‍या फर्क पड़ता है।

जीलानी और हममें कोई बहस नहीं हुई पर मैं उनकी विचारधारा से सहमति नहीं रखता...अगर बहस होने की नौबत आती तो अपनी बात कहता, उनकी सुनता..शायद असहमत ही र‍हते पर...बात करते। अब उनसे बात नहीं कह सकता...मेरी बात दमदार लगी तो अपनी सौम्‍य सी मुस्‍कान के बाद कहेंगे कि अगर इस बात से मैं सहमत नहीं हुआ तो क्‍या आप भी मुझ पर थूकेंगे।

जिन्‍हें ये राष्‍ट्र की समस्‍या लगती है लगे...मेरे लिए नितांत निजी कष्‍ट है मुझसे मेरे ही कार्यस्‍थल पर आजाद होकर काम करने के, बच्‍चों को पढ़ाने का हक मुझसे इस लिजलिजे थूक ने छीन लिया है।

Sunday, October 19, 2008

शानदार ऑफर- कार्ड खुरचो...मूर्ख बनो

अरसे तक मेरे पास क्रेडिट कार्ड नहीं था, कोई एकाध ही अवसर रहा होगा कि कोई कठिनाई हुई हो मतलब जिंदगी आसान ही थी। फिर गूगलएप्‍स से एक डोमेन लेने की जरूरत पड़ी तब लगा कि घर भर में एक क्रेडिट कार्ड तो होना ही चाहिए। जॉंच परखकर सरकारी बैंक का कार्ड लिया। अब तक कोई धोखा-धड़ी भी नहीं हुई बिल समय से आया और भरा गया इसलिए कोई पेनल्‍टी की भी नौबत नहीं। एकाध बार फालतू के फोन आए...सर अमुक अमुक प्रोडक्‍ट लेंगे क्‍या.. हमने प्‍यार से डपट दिया कि डू नॉट डिस्‍टर्ब रजिस्‍ट्री में नाम दर्ज है, सो फोन आने भी बंद। 

पिछले महीने बिल के साथ आफरों के कार्ड के साथ एक स्‍क्रैचकार्ड था कि आप को अमुक इनाम मिला है, हैंडलिंग चार्ज दें और मंगा लें...हमने इग्‍नोर कर दिया। अब आज फिर बिल आया इस बार के स्‍क्रैच कार्ड में खुरचा तो बताया गया कि वाह.. आपने 3990 रुपए की लुई क्‍वार्टज घड़ी जीत ली है। एकदम मुफ्त, ( बस हैंडलिंग चार्ज 590 रुपए) माथा ठनका... आज तक किसी लाटरी में चवन्‍नी तक नहीं निकली, अब तो नहीं पर बचपन में चूरन गोली वाले की ठेली पर लाटरी खरीदी ही हैं। मामला ललचाऊ लग रहा था, एकठो घडी खरीदने का मन भी था (मन से क्‍या होता हे हिम्‍मत होनी चाहिए, पैसा भी) सोचा चलो इस बार फ्रेंच घडी पहनकर इतराया जाए। स्‍क्रैच कार्ड पर गौर फरमाएं।

SBI offer

एसबीआई बैंक सरकारी है, कार्ड से हमारा पुराना अनुभव भी ठीक ठाक ही था पर गूगल की शरण में जाना ठीक समझा..पहले खोज परिणाम से पता चला कि लुई नाम के ब्रांड की घडी कम से कम डेढ हजार डालर की है। फिर एवीए मर्कें‍डाइजिंग, एसबीआई कार्ड के साथ खोजा तो हाथ लगा कंज्‍यूमर कंप्‍लेंट का यह पेज..ओत्‍तेरेकी ये तो पक्‍की जालसाजी है। यह घड़ी सौ-पचास रुपए की हाथ लगेगी....नकली। मजे की बात यह है कि एसबीआई कार्ड को लपेटे में नहीं लिया जा सकता क्‍योंकि उनका कहना है कि ये आफर तो मार्केटिंग कंपनी के हैं हमें इनसे कोई लेना देना नहीं, और ये भी कि हमारी घड़ी की कीमत अगर हम 3990 /-  कह रहे हैं तो बस है। खोजने से पता चला कि जेटलाइन एयरवेज, स्‍टैंडर्ड चार्टेड बैंक की तरफ से भी ऐसे ही प्रस्ताव बहुत से लोगों को चूना लगा चुके हैं। हमें खुशी है कि फुदककर इनाम मंगाने से पहले हमने गूगलसर्च मार लिया और 590 रुपए का चूना लगने से बच गया। हालांकि ये सवाल बरकरार है कि कानूनन ये बड़ी कंपनियॉं कैसे ग्राहक को चूना लगा सकती हैं और भरोसे का जो नुकसान इन कंपनियों का होता है उसकी ये कोई कीमत नहीं लगातीं।

Tuesday, October 07, 2008

चौप्‍टा- तुंगनाथ- चंद्रशिला से वापसी की हाजिरी में चंद तस्‍वीरें

जैसा कि अनूपजी ने बताया कि हम ताजा ताजा हाथ लगी छुट्टियों का भरपूर लाभ लेने फिर पहाड़ों की ओर पलायन कर गए थे, मानो फिर लौटना ही न पड़ेगा।

ऐसे ही मास्टर मसिजीवी सपरिवार छुट्टी मिलते ही निकल लिये सैर सपाटे को। छुट्टी मिलते ही लोग बाहर इसलिये निकल लेते हैं ताकि लौटकर कह सके -जो सुकून घर में है वो और कहीं नहीं। जब वो निकले तो हमें दे गये चर्चा का जिम्मा।

खैर.. गुरुत्‍वाकर्षण का नियम है कि गई चीज लौटती है। हम भी लौटे हैं। लिए ढेर सी यादें। इस बार रुख किया था भारत का स्विट्जरलैंड कहे जाने वाले चौप्‍टा की ओर। काश विजय गौड़ जी की तरह कह पाता कि सैलानी की तरह नहीं अपने हिस्‍से की तरह पहाड़ को देखा। कह सकता हूँ पर ईमानदार कथन नहीं होगा हॉं ड्राइविंग का आनंद खूब लिया और पहाड़ की खूबसूरती का भी।अस्‍तु.. हमारा रास्‍ता रहा .दिल्‍ली .. कोटद्वार - लैंसडाऊन (बाईपास किया)- खिरसू- खांकरा- ऊखीमठ- चौप्‍टा- तुंगनाथ- चंद्रशिला शिखर- देवरियाताल- ऊखीमठ- देवप्रयाग-कौडियाला-ऋषिकेश- दिल्‍ली

कई बातें हैं कहने की, पर फिलहाल वापसी की हाजिरी भर लगा रहे हैं। इन चंद तस्‍वीरों के स्‍लाइडशो के साथ।

 

 

 

Monday, September 29, 2008

यौन-व्यापार का यह अध्‍याय

यह आकर्षक विजिटिंग कार्ड पड़ोस के मॉल की पार्किंग में इस तरह छोड़ा गया था कि इस पर नजर पड़े। आकर्षक हैंडमेड पेपर पर छपे इस विजिटिंग कार्ड पर कोई पता नहीं था पर फोन नंबर था जिसे मैंने हटा दिया है।

playboy

हमें लगता था कि ये फाइव स्‍टार संस्‍कृति की चीजें हैं पर छनते छनते ये अब मध्‍यवर्गीय जगहों तक पहुँच गई लगती हैं।

 

Saturday, September 20, 2008

दिल्‍ली घेट्टो के एनकाउंटर की एक साइडलाइन रिपोर्ट

मैंने एनकाउंटर की टीवी रिपोर्टिंग नहीं देखी थी, उस रिपोर्टिंग की रिपोर्टिंग जो ब्‍लॉग पर हुई उसे जरूर पढ़ा है। मुझे टीवी पर समाचार न देख पाने पर अब कोई मलाल नहीं होता, इस बार भी नहीं हुआ। पर मीडिया की भयानक तौर पर गिर गई साख से हो रही हानि को गहरे तौर पर बाद में अनुभव किया।

सुबह स्‍टाफरूम में प्रवेश किया तो हवा में कुछ बदलाव था, महसूस करने में कुछ देर लगी। चुप्‍पाचुप्‍पी की फुसफुसाहट थी। मेज पर अखबार बिछे हुए थे...खबरों में एनकाउंटर ही छाया था। दरअसल कम से कम 10-12 शिक्षक साथी उसी इलाके से आते हैं जहॉं ये एनकाउंटर हुआ। उनका कहना था कि उस क्षेत्र के निवासियों की साफ राय ये है कि एनकाउंटर फर्जी था। जिन लड़कों को आतंकवादी कहकर मारा गया उन्‍हें दो दिन पहले ही उठा लिया गया फिर वापस लाकर उसका एनकाउंटर किया गया। इस मान्‍यता का स्रोत क्‍या है ये किसी शिक्षक मित्र को नहीं पता पर ये लोग भी इस राय से सहमत लग रहे थे। उनका कहना था कि यदि इंस्‍पेक्‍टर की मौत की घटना नहीं होती तो जामिया नगर में हालत विस्‍फोटक थी, वो तो इस मौत ने लोगों के मन में शक पैदा किया कि हो सकता है कि एनकाउंटर असली हो, पर तब तक तो वे तमाम मीडिया व पु‍लिस की बातों की तुलना में मोहल्‍ले की अफवाहों में ही ज्‍यादा यकीन कर रहे थे।

मुझे इन लोगों की बात सुनकर राष्‍ट्रवाद के दौरे नहीं पड़े, आप चाहें तो मुझे राष्‍ट्रद्रोही करार दे सकते हैं। मुझे स्‍पेशल सेल के पुलिसवाले जॉंबाज राष्‍ट्ररक्षक भी नहीं लगते ये भी सच है। पर मैं उन्‍हें खास दोषी भी नहीं मानता, मुझे लगता है कि वे राज्‍य की लाचारी के प्रतीक हैं, राज्‍य को अपनी वैधता के रास्‍ते में आ गए तत्‍वों का निपटान करने में जब लाचारी महसूस होती हे तो उसे एनकाउंटर करने पड़ते हैं। इसे करने वाले तो औजार भर हैं, तथा उनकी शहादत एक कोलेट्रल डैमेज है। इस सबके बावजूद जामिया नगर के बहुत से लोगों का राष्‍ट्रीय मीडिया तथा प्रशासनिक ढॉंचे की तुलना में सुनी सुनाई बातों पर विश्‍वास कर लेना बेहद अवसादी परिघटना लगा। माना जा सकता है कि पुलिस ने इन आतंकवादियों को गिरफ्तार करने की तुलना में मार डालने का निर्णय लिया होगा ताकि ढिल्‍लू होम मिनिस्‍टर की छवि को धोया जा सके। पर राज्‍य ही नहीं वरन मीडिया पर भी इतने बड़े स्‍थानीय समुदाय का ऐसा अविश्‍वास कि वे बजाय राज्‍य की अपेक्षाकृत वैध संस्‍था के समर्थन में आने के, आतंकवादियों से सहानुभूति रखें ये त्रासद है।

मुझे लगता है कि दशकभर के संप्रदायीकरण ने अब लगभग पूरे समाज में विभाजन की लकीर खींच दी है। राज्‍य व मीडिया ने अपनी वैधता पूरी तरह नहीं तो कम से कम अल्‍पसंख्‍यकों के लिए तो खो ही दी है। मुझे यह भी लगता है कि आने वाले दिनों में और एनकाउंटर देखने को मिलेंगे उससे भी दुर्भाग्‍यपूर्ण यह कि इन एनकाउंटरों का इस्‍तेमाल तंगअक्‍ल कठमुल्‍ले, आतंकवादियों की पैदावार बढ़ाने के लिए करेंगे, और मीडिया ...वो तो खैर केवल ब्रेक से ब्रेक तक की ही दृष्टि रखता है।

Saturday, September 13, 2008

दिल्‍ली के ये बम मीडिया के लिए सौदा हैं

ये पोस्‍ट बेहद गुस्‍से में लिखी गई है, विवेक की उम्‍मीद न करें।

दिल्‍ली में इस वक्‍त कुछ बम विस्‍फोट हो रहे हैं। लोग मारे जा रहे हैं' ये दुकानदारी का समय है चैनलों के लिए। जिस पैमाने पर गैर जिम्‍मेदाराना रिपोर्टिंग अभी चल रही है, उसके बिना पर तो खुद इन चैनलों पर आतंकवाद फैलाने का मुकदमा चलना चाहिए। मौके पर खड़े पत्रकार शोर सुनते ही शोर मचा रहे हैं नेशनल मीडिया में कि मानव बम मिला ... कमबख्त मुड़कर जॉंच भी नहीं रहे कि खबर है या अफवाह... दो ही मिनट बाद गुब्‍बारे वाला बच्‍चा- मानव बम नहीं .. सबसे अहम गवाह हो जा रहा है। मुझे तो लगता है कि मीडिया वालों से तो कहीं ज्‍यादा जिम्‍मेदार व पेशेवर खुद वे आतंकवादी हैं जिन्‍होंने बम प्‍लांट किए। उनका काम है आतंक फैलाना और वे वहीं कर रहे हैं। लेकिन ये कम्‍बख्‍त पत्रकार व चैनल क्‍या इनका काम भी आतंक फैलाना है..अगर नहीं तो वे क्‍यों ये कर रहे हैं।  कोई इन्‍हें बंद करो नहीं तो ये देश में आग लगवा देंगे- 

एक बानगी देखें-

 

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Thursday, September 11, 2008

बढ़ी सब्सिडी- सरकारी पैसे से बनें हाजी

वैसे ऐसा लिखने में चट से संघी करार दिए जाने का जोखिम है पर कम्‍यूनिस्‍ट करार व संघी करार दिए जाने का जोखिम हम पहले भी उठाते रहे हैं, एक बार और सही। आज की खबर है कि सरकार ने हज के लिए सब्सिडी फिर से बढ़ा दी है- बावजूद बेपनाह बढ़ गए ईंधन के दाम व किराए के हज करने वालों को वही बारह हजार देना होगा बाकी सरकार टैक्सपेयर्स की जेब से भरेगी। और हॉं इस बार और ज्‍यादा लोगों को हाजी होने का पुण्‍य दिलाने का ठेका सरकार ने लिया है। वैसे हमें मुसलमानों पर अधिक पैसा खर्च करने से दिक्‍कत नहीं है, सच्‍चर समिति से भी नहीं थी पर तीर्थयात्रा के लिए सब्सिडी हमें एक सबसे ऊत काम लगता है। शिक्षा, प्रवेश, पढ़ाई, वजीफा ठीक है पर क्‍योंकि ये प्रकाश की ओर ले जाने वाले कदम हैं पर धर्म के नाम पर हजारों खर्च करना वो भी अपनी मेहनत के नहीं खैरात के...ये तो ठीक नहीं। यूँ भी एक मुसलमान दोस्‍त ने बताया कि नियमत: जब ऐसा कोई व्‍यक्ति हज करता है जो खुद उसकी कीमत अदा न करे तो इसे धर्म में वर्जित किया गया है। खैर किताब कुछ भी कहती हो पर हमारा मानना है कि इस तरह के टंटे मुस्‍िलम समुदाय के आत्‍मसम्‍मान  के विरुद्ध हैं जिसका विरोध खुद इस समुदाय को भी करना चाहिए।

 

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Friday, August 29, 2008

हिन्‍दी को हिन्‍दी-प्रेम की बैसाखियों से आजाद करने के लिए ब्‍लॉगवाणी को वोट दें

tata_nen_logo चिट्ठाचर्चा में अनूपजी ने दिखाया और हमने देखा, अच्‍छी खबर है।पहली चर्चा में वे ब्‍लॉगवाणी को भूल गए थे, उन्‍होंने केवल देबूदा के पॉडभारती के लिए सिफारिश की पर अगली पोस्‍ट में फिर से साफ कर दिया गया है कि ब्‍लॉगवाणी भी इस कतार में है। फिलहाल इसका रैंक 5 है, कल तक 9 था। हम चाहते हैं शाम तक पहला हो जाए।  हिन्‍दी तो बाजार में अपनी पहचान जमा ही रही है पर ये घटना हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की है। टाटा की मुहर और इंटरनेट पर हिन्‍दी उपक्रम की पहचान वाकई अहम बात है। यूँ भी कई दिन से वोटिंग शोटिंग का खेल इधर हुआ नहीं है। तो चलो जुट जाएं हिन्‍दी को शिखर पर देखने के लिए। पूरा तरीका मैथिलीजी ने अपनी पोस्‍ट में साफ कर दिया है। देखें और वोट दें- कम से कम दो वोट तो आप डाल ही सकते हैं- एक टाटा नैन से रजिस्‍टर करके इंटरनेट पर और दूसरा फोन से एसएमएस से।

हमने सोचा था कि इसे दिल का मामला मानकर, जैसा मैथिलीजी ने कहा हिन्‍दी के इस मुकाम तक पहुँचने की तरह देखेंगे और वोट देंगे तथा देने के लिए कहेंगे। पर सोचें ये तो फर्जीवाड़ा हुआ, आखिर हमसे एक ऐसे नए उपक्रम को चुनने का आग्रह है जो दमदार शुरूआती व्‍यावसायिक उपक्रम है और हम दिल के नामपर वोट दे रहे हैं। ठीक है हमें जीजान से पसंद है ब्‍लॉगवाणी, पर तब भी एक बार जॉंचे कि एक उपक्रम के रूप ब्‍लॉगवाणी कितनी संभावनाएं समेटे है। ऐसा इसलिए भी करें कि इस नजरिए से देखने पर आपको और गर्व की अनुभूति होगी। 

हिन्‍दी की चिट्ठाकारी का समुदाय निरंतर बढ़ रहा हे अत: ये विज्ञापन व आय की संभावनाएं लिए है तथा मजेदार बात ये है कि गूगल एडसेंस द्वारा हिन्‍दी ब्‍लॉगों को बेसहारा छोड़ देने को हमारे अपने एग्रीगेटर ने अवसर की तरह लिया लगता है। टाटा नैन के इस सवाल के जबाव में कि वाकी सब तो ठीक पर ये बताओ कि रोकड़ कैसे कमाओगे, सिरिल साफ करते हैं-

How does the business make money?

We plan to introduce a shopping portal in our website and use our 1600 strong blogger network to advertise, bloggers will be given a commission against sales.

:

It has Marathi and Hindi blogging now, but soon it will be available in all the Indian languages, and also in English. The aim is to becoming the number one community for Indian bloggers.

तथा यह भी-

Just want to put in my two words that the blogger-affiliation scheme is not the only way to earn from a website like blogvani. We'll be exploring the full plethora of options including conventional ones like advertising too.

वाकई .. तो इसका मतलब है कि हमें जल्‍द ही ब्‍लॉगवाणी पर लिस्‍ट होने के लिए, ज्‍यादा से ज्‍यादा लिखने के लिए पैसा मिला करेगा। ये बात तो अच्‍छी लागै है। :)) उससे भी अच्छी बात ये कि हिन्‍दी सिर्फ 'हिन्‍दी प्रेम' की बैसाखी पर नहीं अपने पैरों पर चलेगी। हिन्‍दी प्रेम के भरोसे रहने में बुराई ये है कि तब ये कल्‍याण खाते के आसरे हो जाती है तथा इसमें त्‍याग का दर्प भी आ जाता है फिर क्‍या होता है, पुराने ब्लॉगर जानते हैं कि उसका हश्र क्‍या होता है।   इसलिए आपसे अनुरोध है कि हिन्‍दी को बैसाखी से आजाद कर अपने कदमों चलाने के लिए ब्‍लॉगवाणी को वोट दें। यदि आप एक वोट पहले ही हिन्‍दी-प्रेम के नाम पर दे चुके हैं तो एक और दें- इस बार हिन्‍दी की आर्थिक आत्‍मनिर्भरता के लिए।

Monday, August 11, 2008

ये है सैम-इंडिया मेरी जान

जुगाड़ और रचनात्मकता हम भारतीयों के यूएसपी हैं। पश्चिमी उत्तरप्रदेश की जुगाड़गाड़ी हो यी वाशिंग मशीन का इस्तेमाल थोक में लस्‍सी बनाने के लिए करने की जुगत- हम हैरान करने से नहीं चुकते। ऐसी ही हैरानी से कल दो-चार  हुए जब एन पिज्‍जाहट के  बरोबर में पूरी लकदक के साथ उसका देसी जबाव देखा। ये था समोसा जी अपना बेचारगी भरा समोसा पर पूरे आत्‍मविश्‍वास के साथ। दिल्‍ली की एक सबसे मशहूर समोसे की दुकान पूंचकुइयॉं वालों के समोसे की है जो पिछले साठ सालों से समोसे खिलाने का दावा करती है। उसकी ही एक दुकान पर हमें ये देखने को मिला..IMG_0976

जी आपने सही पढ़ा सैमबर्गर- जिसका हैमबर्गर के बर्गर से गहरा नाता हे पर हैम से बिलकुल नहीं। हैम की जगह है सैम...बोले तो समोसा। समोसे के सैम हो जाने से हमारा परिचय बिट्स पिलानीIMG_0977 में हुआ था वहॉं समोसों को इंजीनियर-विद्यार्थी सैम कहते हैं। इन्‍हीं सैम को सैम विशेषज्ञों ने बर्गर के साथ गठबंधन कर सैमबर्गर तैयार किए हैं। ये दो वैरिएंट में पाए जाते हैं। आलू सैमबर्गर व पनीर सैमबर्गर।

  चित्र के बाद बताने की जरूरत नहीं कि बर्गर-बन में समोसा, चीज़, सलाद रखने से तैयार होने वाला सैमबर्गर वाकई दमदार चीज था। उबाऊ बर्गरों से तो बेहतर था ही। हॉं तेल इसमें काफी था। पर दाम बेहद कम हैं और इस दुकान ने पास के पिज्‍जाहट का तेल कर रखा है।

तो ये हे अपना सैमइंडिया।

 

 

अभी देखा की लाल्‍टू ने कुछ शानदार पोस्‍टें अपने ब्‍लॉग पर लिखी हैं। किसी वजह से न पढ़ पाए हों तो आप इन पोस्‍टों तक इन लिंकों से पहुँच सकते हैं-

खोजते रहो, हर जगह होमो सेपिएन्स
वॉट हैव वी डन

Thursday, August 07, 2008

एक डायरी नोट के साए में सहमा बचपन

बिटिया पढ़ना अभी सीख ही रही है इसलिए जो संदेश उसकी स्‍कूल डायरी में नत्‍थी किया गया था उसकी इबारत से अनजान थी। पर उसमें लिखे संदेश का मर्म उस तक पहुँचा दिया गया था। कक्षा में उसकी अध्‍यापिका ने कक्षा को समझाया था कि किसी भी व्‍यक्ति से कोई टॉफी, चाकलेट या किसी तरह का गिफ्ट न लें। गंदे लोग इसमें बॉम्‍ब रख सकते हैं आदि आदि। डायरी का संदेश इस तरह है-

notice

 

दरअसल तीन दिन पहले की अखबारों की रिपोर्ट थी कि अब दिल्‍ली में आतंकवादियों का अगला निशाना स्‍कूल हो सकते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस ने स्‍कूलों को आगाह किया है कि वे सुरक्षात्‍मक उपाय करें। स्‍कूलों पर आतंकी हमला, सिहरन पैदा करने वाली आशंका है। नन्‍हें खिलखिलाते बच्‍चों को कोई निशाना भला कैसे बना सकता है। पर ये बात कहते हुए भी हमें पता है कि बात बेतुकी है। इन ताकतों पर कोई तर्क काम नहीं करता। पर सच कहें कि इस डायरी-नोट की छाया में बच्‍चे को स्‍कूल भेजते रूह कांपती है। इतना लंबा चौड़ा स्‍कूल हजारों बच्‍चे, हजारों स्‍कूल बैग, बीसियों स्‍कूल बस, टिफिन, खेल का सामान और ये सब तो बस एक ही स्‍कूल में, ऐसे सैकड़ों स्‍कूल है शहर भर में- ऐसे डायरी नोट की आशंका में बेचैन होने वाला पिता मैं अकेला तो नहीं। अब अगर कोई शैतान तय कर ही ले तो उसके लिए क्‍या मुश्किल है एक बम को सरका देना .... उफ्फ।

लेकिन जब फलक को थोड़ा विस्‍तार देते हैं तो लगता है कि बचपन पर ऐसी तलवारें तो पूरी दुनिया में हैं। फिलीस्‍तीन, अफगानिस्‍तान या इराक के बच्‍चे जिन्‍हें कोई स्कूल या तो नसीब नहीं और है तो भी उनके सुरक्षित से सुरक्षित स्‍कूल हमारे स्‍कूलों से ज्‍यादा असुरक्षित हैं। खुद हमारे देश के कई हिस्‍से वर्षों से इस हिंसा के शिकार हैं। सुना है इराक में बच्‍चे उन मैदानों में खेलते हैं जिनमें बारूदी सुरंगे होने की आशंका है। जब अनुराधा ने कहा कि भगदड़, आतंकवाद आदि घटनाओं को देखने का एक नजरिया औरतों जैसे हाशिए के वर्गों पर उसके प्रभाव के आकलन का भी है तो लोगों को ये अति लगा। पर हम जोर देकर कहते हैं कि आतंकवाद हो, दुर्घटनाएं या फिर प्राकृतिक आपदाएं इनकी मार होती सबके लिए बुरी ही है किंतु ये मार सब पर बराबर नहीं होती।

काश हम बच्‍चों को सहमा देने वाले डायरी नोट्स की छाया से मुक्‍त बचपन दे पाएं।

Wednesday, August 06, 2008

ब्‍लॉगिंग आग्रह की वस्‍तु है

बीमा कंपनियों के विज्ञापनों से शहर आच्‍छादित है। चहुँ ओर मौत और बुढ़ापे का भय बिखरा है। इतना दो तुम्‍हारे अपने इतना पाएंगे...अस्पताल जाना पड़ा तो बिल हम चुकाएंगे... और अंत में पुच्‍छल्‍ला ये कि 'बीमा आग्रह की वस्‍तु है' (इंश्‍योरेंस इज़ अ मैटर ऑफ सालिसिटेशन)। भाषिक प्रयुक्तियॉं बेचैन करती हैं सो हमने पड़ताल की तो पता लगा कि ये कानूनी शब्‍दावली है जिसका अर्थ है कि बीमा को बीमा कराने का इच्‍छुक व्‍यक्ति अधिकार की तरह नहीं मांग सकता। यह तभी किया जा सकता है जब इच्‍छुक कहे कि मेरा बीमा कर दो और बीमा कंपनी कहे कि हम आपका बीमा करना चाहते हैं...दोनों राजी तभी बीमा होगा। ये नहीं कि बोर्ड टंगा देखा और हो गया बीमा। तो इस तरह बीमा आग्रह की वस्‍तु है।

पर भई बीमा तो बीमा है कि नोट-शोट का मामला है। पर ये ब्‍लागिंग कैसे आग्रह की वस्‍तु है। है न.. अगर आप हाल फिलहाल की पोस्‍टें पढें तो आपको भी लगेगा। हमने पढ़ा कि किसी ने पोस्‍ट लिखी कविता या कहानी (या जिस विधा की मान लें उस विधा की रचना थी) एक अन्‍य को मजाक की सूझी उसने उसी तर्ज पर एक और लिख डाली। व्‍यंग्य तो खैर नहीं था विनोद ही था पर शुद्ध विनोद तो शुद्ध घी हो गया है, मिलता ही कहॉं है। करने वाला विनोद भी करे तो सुनने वाला उसे व्‍यंग्‍य ही मानता है। अगला बिफर पड़ा, तुम दो कौड़ी के पाठक मैं प्रसाद, प्रेमचंद- अगले ने कहा कि मेरा ब्‍लॉग आग्रह की वस्‍तु है जिसे मैं चाहता हूँ वो पढ़े बाकी मेरा वक्‍त बर्बाद न करें।    वैसे जब लोगों को पता चला कि 'वक्त बर्बाद न करें' एक गांरटीशुदा जुमला हो गया है तो कृपया वक्‍त बर्बाद करें की भी गुजारिश हुई :))

तो भैया अब  ब्‍लॉगिंग, हम लिखें-दुनिया पढे नहीं रह गई :))। अब इसे सैडिस्टिक प्‍लेज़र कहना चाहें तो कहें पर हमें तो ये विवाद बड़ा मोहक सा लगा। वैसे हम साफ बता देना चाहते हैं कि हमारा ब्‍लॉग पढना कतई आग्रह की वस्‍‍तु नहीं है। जो चाहे पढे- रिक्‍शावाला, झल्‍लीवाला या सामानवाला सबका स्‍वागत है। 

 

(बहुत दिनों बाद किसी के फटे में टांग अड़ा रहे हैं, हमें डर लगा कि जैसे पिछले दिनों पंगेबाज पर आरोप लगा कि बस नाम के ही पंगेबाज रह गए हैं, कहीं हमारी भी इमेज न बिगड़ चुकी हो)

Friday, July 11, 2008

मंझली पीढ़ी के बाप की कमर और बस्ते का बोझ

कुछ खाते पीढि़यों के हिसाब से चलते हैं। मसलन बहु को सास ने तंग किया तो बदले में बहु जब सास बन जाएगी तो अपनी बहू को तंग करेगी। पूरी पीढ़ी बीतेगी तब जाकर उधार चुकेगा- अगली पीढ़ी की बहु टेढ़ी निकली तो बेचारी मंझली पीढ़ी वाली मारी गई- पहले सास ने सताया बाद में बहू सताएगी। ये सब भूमिका इसलिए कि हमें लगता है बहुत से मामलों में हमारी पीढ़ी बस यही मंझली पीढ़ी है। जब बालक थे तो पिता की पीढ़ी को लगता था कि हमारी पीढ़ी के बेटे बेहद नालायक हैं, थोड़ा बड़े हुए खुद बाप बने तो बच्‍चों की पीढ़ी को लगता है (कहा तो नहीं पर लगता जरूर है) कि बडे नालायक बाप हैं। अब उन्‍हें कैसे समझाएं कि वो हम पर नालायक होने का आरोप अब नहीं लगा सकते क्‍योंकि अपने हिस्‍से के नालायकी के आरोप हमने तब भुगत लिए थे जब हमारी बारी थी और कायदा ये कहता है कि अब आरोप लगाने की बारी हमारी है।

खैर...अगर आप सोच रहे हैं कि सुबह सुबह इतना ज्ञान हमें कहॉं सो हो गया तो आसान सा तरीका समझाते हैं...15 किलो का वजन अपने पर लादें आपके भी ज्ञान चक्षु खुल जाएंगे। बच्‍चे को स्‍कूल बस तक छोड़ने बस स्‍टाप तक गए थे, वो तो खाली हाथ, लडि़याती आवाज में जानना चाह  रहा था कि हम बीएमडब्‍ल्‍यू क्‍यूं नही ले लेते (हम तो खैर कभी न पूछ पाए कि पिताजी साइकल के टूटे पैडल को ठीक क्‍यों नहीं करवा लेते) जबकि हम उसके भयानक भारी बस्‍ते के बोझ के नीचे कराह रहे थे। तभी हमने सोचा कि जब हम छोटे थे तब तो हमारी पीढ़ी के बच्‍चे अपने बस्ते खुद उठाया करते थे, हमारे ही नहीं पास पड़ोस के भी किसी बाप को हमने बालक का बस्‍ता उठाए नहीं देखा था... तो मतलब ये कि पिछली पीढ़ी में भी हमने बस्‍ता उठाया और अब भी उठा रहे हैं- कुल मिलाकर हम भी मंझली पीढ़ी की बहु हुए न। तब भी कमर दुखी अब भी हम दु:खी। कथित  ज्ञान के इस बस्‍ते की बिडंबना ही यह है कि जो एक बार इसे उठाता है वह दु:खी ही रहता है।

पहली बार नहीं है कि मंझली पीढ़ी के बाप इस कराह से गुजर रहे हैं..अनादि काल से होता रहा है। दरअसल खुद की निगाह में तो हर पीढ़ी मंझली पीढ़ी होती है। बेचारा राम- बाप के पास तीन तीन बीबीयॉं थीं, बुढ़ापे की लपलपाहट में जवान बीबी की बात में आया और रामजी गए चौदह साल के लिए जंगल में..लेकिन अगली पीढ़ी ने कहॉं  मानी उसकी बात.. वो तो तैयार थे धनुष उनुष लेकर मां का बदला लेने को। बेचारे राम आक्‍खी जिंदगी एक बीबी के लिए भी तरसते रह गए। दरअसल जैसे जैसे समय बहता है वह हर किसी को किसी न किसी लिहाज से तो मंझलेपन की त्रासदी में डालता ही है। जाति आधारित शोषण, स्‍त्री शोषण, आरक्षण, पोलिटिकल करेक्‍टनेस के बाकी मोर्चे किसी को भी देख लो मंझली पीढ़ी ही कीमत चुकाती दिख रही है।

Thursday, July 10, 2008

ये लीजिए आईएईए से नाभकीय समझौते का मसौदा

अभी कल तक जिन कागज पत्रों को भारत विदेशमंत्री यह कहकर दिखा नहीं रहे थे कि कमअक्‍ल भारतीयों को दिखाना ठीक नहीं है जबतक अमरीकी आका नहीं कहेंगे नहीं दिखाएंगे वह 24 घंटे बीतते न बीतते सबके सामने है। यदि आपने अब तक न पढ़ा हो तथा इच्‍छुक हों तो मसौदा इस लिंक पर उपलब्‍ध है-

भारत- आईएईए ड्राफ्ट सेफगार्ड्स

image

 

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Saturday, July 05, 2008

विषयों के गिरते उठते बाजार भाव

हमने कभी शेयर बाजार में दमड़ी का निवेश नहीं किया पर इसका कोई सैद्धांतिक कारण नहीं है सीधी सी वजह है कि गांठ में फालतू दमड़ी रही ही नहीं इसलिए निवेScreenHunter_01 Jul. 05 07.01श नहीं खर्च करते हैं। इसके बावजूद शेयरों के भाव उठने गिरने से जो ग्राफ बनता हे उसे देखने में अच्‍छा लगता है। वो संतरी रंग का आरेख ऊपर उठता और फिर गिरता दीखता है कितना अच्‍छा खेल है। जिसके ढेर पैसे लगे होते होंगे उनके दिल की धड़कन भी ऊपर नीचे होती होगी हमें तो वो बादलों में बन रही आकृति सा लगता है, इसलिए नीचे गिरता सा दिखता है तो मन करता है कि वाह क्‍या भारत के नक्‍शे के नीचे की आकृति बन रही है, गिरते गिरते पूरे कन्‍याकुमारी तक पहुँचे तो मजा आए।

ये बाजार भाव केवल शेयरों के ही ऊपर नीचे नहीं होते वरन कुछ ऐसी मदों के भी होते हैं जिनसे हमें बहुत फर्क पड़ता है। मसलन हिन्‍दी को ही लीजिए। कई सालों से बारहवीं पास करके आए बच्‍चें को बीए में प्रवेश देते रहे हैं। वो गर्व या चिंता से अपनी अंकतालिका हमें थमाते हैं और हम उसे परामर्श देते हैं -अरे आपके तो हिन्‍दी इलेक्टिव में 80 हैं- हिन्‍दी आनर्स ले लो अच्‍छा करोगे। वो करेले के सूपपान का सा कड़वा मुँह बनाता है.. न जी न हम तो बीए पास ही लेंगे- हिन्‍दी आनर्स नहीं, संस्‍कृत भी नहीं..अरबी नहीं फारसी नहीं और बांग्‍ला तो कतई नहीं (हमारे यहॉं यही भाषाएं पढ़ाई जाती है पर विश्‍‍वास है कि अन्‍य भारतीय भाषाओं की हालत इनसे बेहतर नहीं ही होगी)। अंगेजी आनर्स मिलेगा नहीं ... साल दर साल यही दोहराया जाता है। भारतीय भाषाओं का बाजार भाव का आरेख  हर बार अरब सागर  से शुरू होता है और कन्‍याकुमारी जाकर रुकता  हे फिर ऊपर नहीं चढ़ता। जब हम विद्यार्थी हुआ करते थे तो विज्ञान इस दुनिया के टिस्‍को व रिलायंस होते थे, अब पता नहीं कि शेयर बाजार में टिस्‍को की हालत कैसी है पर दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में तो बीएससी के ग्राहक गायब हैं। बस बीकाम या बीए अर्थशास्‍त्र ही हैं जो चुम्बक की तरह सारे मलाई खींच ले जाते हैं। हिन्‍दी को छाछ भी मिल जाऐ तो गनीमत। ऐसे में बंगाली-उर्दू- संस्‍कृत को क्‍या मिलता होगा इसका अनुमान आप सहज ही लगा सकते हैं। इतना जान लें कि पहली ही कट आफ में लिखकर टांग दिया गया है कि अरेबिक, फारसी व बंगाली में हर व्‍यक्ति के लिए दाखिला खुला है।

वैसे अनुभव ये भी बताता है कि हिन्‍दी ने खुद को बेहतर पोजिशन कर लिया है अब 50 प्रतिशत पर नहीं 60 प्रतिशत पर प्रवेश मिलता है। दरअसल बहुत से विद्यार्थियों खासकर ठीकठाक चेहरे मो‍हरे वाली लड़कियों को लगने लगा है कि टीवी पत्रकार बनने के लिहाज से हि‍न्‍दी ली  जा सकती है (यूँ भी पत्रकारिता में  भूत चुड़ैल, सनसनी आदि ही तो करना है कौन महान योग्‍यता चाहिए ) ऐसे में पूरे साल में दो विद्यार्थी भी ऐसे मिल जाएं जो साहित्‍य पढ़ने के इरादे से बीए में आए हों तो हम निहाल हो जाते हैं।

Tuesday, July 01, 2008

एडसेंस की हिन्‍दी को पूर्ण-विदाई !!

आज ही गूगल एडसेंस की मेल आई है कि वे एडसेंस की रेफरेल योजना ( AdSense Referrals programme ) को विदा करने वाले हैं। उनकी मेल का अनुवाद है-

ऐडसेंस रेफ़रल कार्यक्रम में भाग लेने के लिए धन्यवाद . हम
अगस्‍त के अंतिम सप्‍ताह में ऐडसेंस रेफ़रल कार्यक्रम को समाप्‍त कर रहे हैं . उस समय के बाद , ऐडसेंस कोड विज्ञापन प्रदर्शित करनप बंद कर देगा

ऐसा वे सिर्फ हिन्‍दी के साथ नहीं कर रहे हैं जैसा कि उन्‍होंने एडसेंस के मामले में किया है वरन वे रेफरेल की व्‍यवस्‍था ही खत्‍म कर रहे हैं। किंतु हिन्‍दी के लिए इसका मतलब ये हुआ है कि एडसेंस के कंटेंट आधारित विज्ञापन तो उन्‍हें मिलने पहले ही बंद हो गए थे जो थेड़ी बहुत कमाई संभव थी वह केवल रेफरेल विज्ञापनों से ही थी। अब रेफरेल विज्ञापन भी बंद हो जाएंगे। पेशेवर हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग का सपना अब और दूर खिसक जाएगा। यदि गूगल से परे सोचकर हिन्‍दी के चिट्ठाकार आगे बढ़ना चाहें तब भी राह आसान नहीं क्‍योंकि कोई भी अन्‍य विज्ञापन प्रदाता अभी भी पर्याप्‍त विज्ञापन जुगाड़ने में सफल नहीं हो पा रही है।

लगता है कि ब्‍लॉगिंग के भरोसे नौकरी छोड़ने का सपना पूरा होने से पहले ही हम रिटायर हो चुके होंगे। :))

Sunday, June 29, 2008

अमरनाथ पर मेरा त्रिशंकु प्रलाप

विचार डूबते हैं उतराते हैं- घात-प्रतिघात करते हैं। आपकी स्थिति को अक्‍सर त्रिशंकु बना देते हैं। मुझे अकसर ईर्ष्‍या होती है सीधे और केवल सीधे देख सकने वाले विचार बंदियों से मसलन- कम्‍युनिस्‍ट और संघी लोगों से। दाएं बाएं की बाते उन्‍हें परेशान नहीं करती- हमें करती हैं। संघियों को गुजरात परेशान नहीं करता और कम्‍युनिस्‍ट नंदीग्राम से दु:खी नहीं होते, हम बावरे ठहरे दोनों पर भिन्‍नाते रहते हैं (पाखंडी हम भी कम नहीं कहे जा सकते क्‍योंकि सिर्फ भिन्‍नाते ही तो हैं, करते क्‍या हैं?) पर उनकी तरह सोचते तो कम से कम एक दुख से तो बच जाते।

आजकल हम बिलबिला रहे हैं अमरनाथ पर। झकास ईश्‍वर-निरपेक्ष व्‍यक्ति हैं। पर कश्‍मीर में हो रहे पाखंड से चिढ़े हुए हैं, इसलिए भी कश्‍मीर की घटनाएं संघी लोगों की बात को सच साबित करने का मसाला दे रही हैं। नहीं होंगे बर्फ की किसी चट्टान में शिव-उव, पर अगर किसी को लगता है कि हैं- तो फिर उसके लिए तो हैं। और अगर किसी की श्रद्धा के लिए आप शहर शहर में हज टर्मिनल बनाने पर उतारू हैं तो बाकि लोगों को भी अपनी मान्‍यता के लिए बर्फ की इस चटृटान तक जाने का हक है और बुनियादी सुविधाएं पाने का भी। क्‍यों नहीं सरकार तय कर सकती कि वह टू-नेशन थ्‍योरी मानती है कि नहीं- अगर नहीं मानती तो ये उसका दायित्‍व है कि वह घोषित करे कि इन पर्यटकों को सुविधाएं देना उसका दायित्‍व है और वह देगी। ये सच है कि बात अधिक सरलीकृत तरीके से कही गई है तथा कश्‍मीर मुद्दे की पेचीदगियों को नजरअंदाज करती है। किंतु अमरनाथ जैसे जटिल भौगोलिक जगह पर जाने वालों को हगने-मूतने-आराम करने के लिए कुछ जगह चाहिए इस बात को कितना भी जटिल बना लो, व्‍याव‍हारिक सच तो यही रहेगा।

पर ये तो राजनैतिक सवाल है, मैं ज्‍यादा परेशान इस बात से होता हूँ कि कहीं हमारे देश में सेकुलरिज्‍म के विचार को हम लोगों ने अधिक रेडिकल तो नहीं बना दिया है। आश्‍चर्य की बात हे कि खुद को सेकुलर कहने वाले लोग (अगर नास्तिकों को सेकुलर होने की अनुमति तो हो मैं भी इनमें से ही हूँ) अक्‍सर तर्क का अतिक्रमण  करते हैं। अमरनाथ एकमात्र मुद्दा नहीं है वे पहले अनेक बार ऐसा कर चुके हैं। इससे उन लोगों को हवा मिलती है जिनकी दुकानदारी तुष्टिकरण के आरोपों से चलती है।   अमरनाथ का मुद्दा तो चलो ग्‍लोबल वार्मिंग से निबट जाएगा (न रहेगी बर्फ की चट्टान न बजेगी बांसुरी) पर सोच तो लगता है बनी रहेगी।

 

Saturday, June 21, 2008

शौचालय पर बात- भाषा जुटाने की चुनौती

ये बात सद्भाववादियों को उतनी रास नहीं आएगी पर हमें लगता है तो बस लगता है। बात ये कि भाषा में अपना-पराया होता है। भाषा अपनी होती है और वह पराई तो होती ही है। हिन्‍दी अपनी भाषा है और अंग्रेजी पराई। आप रोजी रोटी के लिए भाषाएं सीखते हैं, सीखनी भी चाहिए। ऐसा करने से कई लाभ होते हैं। आप अपने भाषा ज्ञान के आधार पर भाषाओं में प्रकार्यात्‍मक बँटवारा कर लेते हैं। अफसर टाईप लोग अंग्रेजी में डॉंटना पसंद करते हैं भले हैं डँटने वाले को अंग्रेजी  न आती हो (डँटने वाले को पता है उसे डॉंटा जा रहा उसमें समझना क्‍या...डॉंटने वाले को तो पता ही है कि  भई डॉंटना है समझाना नहीं) तो डॉंटने की भाषा, पुचकारने की भाषा, बात-विमर्श की भाषा अलग अलग हो सकती है। अक्‍सर होती है। मुझे इसका शानदार उदाहरण सुरेश चिपलूनकर साहब की ये तीन पोस्‍टें लगती हैं-

  • शवयात्रा, श्मशान और शवदाह के बारे में (भाग-3)
  • शवयात्रा, श्मशान और शवदाह के बारे में (भाग-2)
  • शवयात्रा, श्मशान और शवदाह के बारे में (भाग-1)
  • मुर्दा कैसे फूंकना-पजारना है, इस पर लिखने के लिए अनुभव, हिम्‍मत और भाषा सभी चाहिए। संवेदना के साथ लिखने के लिए अपनी भाषा में लिखा जाना ही बेहतर है। एक अन्‍य लेख आज पढ़ा आज के अंग्रेजी दैनिक हिन्‍दुस्‍तान टाईम्‍स में, इसके विषय में हमें लगता है कि इसे हिन्‍दी में लिखना असंभव न भी हो तो मूर्खतापूर्ण तो होता। इस लेख के  लिए भी संवेदनशीलता की जरूरत है पर अलग किस्म की। दामिनी पुरकायस्‍थ का यह लेख दिल्‍ली की कॉफी शाप्‍स में यूनीसेक्‍स यानि महिलाओं व पुरूषों के निबटने के लिए एक ही शौचालय के चलन के खिलाफ लिखा गया है तथा ग्राफिकल डिटेल्‍स के साथ बताता है कि इससे क्‍या तकलीफ हो सकती हैं।

    toilets

    अगर इसके समतुल्‍य विषय पर हिन्‍दी में लिखा जाना  हो सरोकार एकदम बदल देने होंगे। पहले तो स्त्रियों के लिए शौचालयों की व्‍यवस्‍‍था ही नहीं है शहर में- मुझे नहीं लगता कि राष्‍ट्रमंडल खेल की तैयारियों में जुटी दिल्‍ली को एहसास भी है कि पूरे शहर  में वास्‍तव में इस्‍तेमाल किए जा सकने महिला शौचालयों की बेहद कमी है। 100 रुपए की कॉफी बेचने वाली दुकानें ही ध्‍‍यान नहीं रख रही तो भला किसी और से क्‍या उम्‍मीद की जाए। गॉंधीजी के बाद के बहुत कम लोगों ने इस तरह के हश हश विषयों के राजनीतिक निहितार्थों को समझा है। और अब तो खैर ये एनजीओ के चंगुल में आ गए सरोकार हैं।

    Wednesday, June 18, 2008

    शहर के मूक आहट चिह्नित स्‍थल

    कुछ तस्वीरों से शुरू करते हैं-

    Annie. Defence Colony. Petrol Pump, Delhi

    डिफेंस कालोनी पैट्रोल पंप, नई दिल्‍ली ^

     

    Suparna, New Delhi- Taking it Inside

    कक्षा सात क्‍लासरूम, पब्लिक स्‍कूल, दिल्‍ली^

     

    July, New Delhi

    उत्‍तरी दिल्‍ली का व्‍यस्‍त रास्‍ता^

     

    Mohini. Delhi

    दिल्‍ली ^

     

    STREET SIGNS FOR 'UNSAFE SITES'

    जिस शहर से आप बेतहाशा प्‍यार करते हों उसके बदसूरत चेहरे से भी आप बखूबी परिचित होते हैं। मुझे ये तस्‍वीरें 'ब्‍लैंक न्‍वाइज' अर्थात मूक आहट से मिली हैं। अन्‍यथा शहर की खूबसूरत तस्‍वीरें लगने वाली ये जगहें वे हैं जहॉं कभी न कभी किसी महिला ने यौ‍न प्रकृति की छेड़खानी सही है। महिलाओं से छेड़खानी के खिलाफ सक्रिय इस समूह ब्‍लैं न्‍वाइज  की एक परियोजना है ब्‍लैंक न्‍वाइज जगहों का चिन्हित करने की। यदि आपके साथ कभी छेड़खानी की कोई घटना हुई (क्‍या ऐसी भी कोई महिला है जिसके साथ ऐसा नहीं हुआ) तो पुन: उस स्‍थान पर जाएं तथा उस जगह की तस्‍वीर अपने अनुभव के साथ यहॉं लगाएं इस तरह जगहों के छेड़खानी वाले मानचित्र तैयार होंगे। मैंने अपने शहर की तस्‍वीरें चुन लीं। इस साइट पर कलकत्‍ता, मुंबई, मनाली, पुष्‍कर आदि जगहों की तस्‍वीरें भी हैं ।

    पूरी जानकारी

    http://blog.blanknoise.org/ पर है।

    Sunday, May 25, 2008

    ऐसा कपूत आप ही रखें

    कुछ मित्रों ने फोनकर बधाई दी...मुबारक आपको पला पलाया बेटा मिला है...‍अविनाश। हम भय से कॉंप गए...पता किया, पता चला कि अविनाश ने नीलिमा पर ये टिप्‍पणी की है-

    ScreenHunter_02 May. 25 13.15

    कुपुत्रों का होना एक सबसे बड़ी सजा मानी जाती है...अविनाश के माता-पिता जानें क्‍यों भुगत रहे होंगे पर अविनाश सा कपूत हमें नहीं चाहिए। वैसे अविनाश कोई भाषा को लेकर असावधान व्‍यक्ति नहीं है। जरा यशवंत के एसएमएस की भाषा के विश्‍लेषण को पढें  अविनाश जानते हैं और सही जानते हैं कि 'अपने परिवार का ध्‍यान रखना' का मतलब एक खतरनाक धमकी है। यूँ भी अपने लेखन में एक ए‍क नुक्‍ते का इतना ध्‍यान रखते हैं कि अजीतजी शाबासी देते होंगे। वैसे नुक्‍ते कठपिंगल की पोस्‍ट में भी एकदम सही लगे हैं, ये अलहदा बात है।

    भाषा में इतने सचेत अविनाश पत्रकार, नई पत्रकार स्‍मृति दुबे को सनसनी गर्ल कहें और टोके जाने पर  नीलिमा को भूखा सांड और माताजी जैसी संज्ञाओं से अकारण नवाजने लगें ये पचता नहीं। इन 'मूर्ख' चोखेरबालियों को समझना चाहिए था कि जब इतना बड़ा यज्ञ चल रहा हो तो टोक नहीं लगानी चाहिए। इतनी मुश्किल से मौका मिला है ऐसे में ये कमअक्‍ल 'टोक गर्ल्‍स' मुदृदे को भटका रही हैं। यही कारण है संभवत पहली बार अविनाश ने अपने ब्‍लाग से कोई टिप्‍पणी मिटाई ये टिप्‍पणी नीलिमा ने की थी जिसमें कोई गाली गलौच नहीं थी।

    कुछ अधिक गंभीर नजरिए से देखें तो ब्‍लॉगजगत में वर्चस्‍व की लड़ाई अब इतनी तीखी होने लगी है कि सामान्‍य शिष्‍टाचार तक लोग भूल रहे हैं...असहमति से सम्‍मान इतना कठिन भी नहीं। कोई झट से घोषित कर देता कि साथी ब्‍लॉगर/लेखिका ने बूढे प्रकाशक को साधकर अपनी किताब छपवाई, कोई दोस्‍ती निबाहने के लिए संघर्षरत पत्रकार को 'सनसनी गर्ल' घोषित करने पर उतारू है। और अब सिर्फ इसलिए कि आपको चोखेरबाली अपनी दुकानदारी के मुनासिब नजर नहीं आती इसलिए आप उन्हें भूखा सांड, माताजी और न जाने क्‍या क्‍या कहेंगे। अविनाश... थोड़ा थमो... यशवंत का यह कृत्‍य खुश्‍ा होने की नहीं चीज नहीं है (कि बच्‍चू अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे) वरन खेद की बात है। जैसे तुम्‍हें खेद है कि यशवंत कभी तुम्‍हारे मित्रवत रहा मझे भी ऐसे किसी संबंध का खेद है जो अविनाश से कभी रहे हों।

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    Friday, May 23, 2008

    शक्तिशाली पाखाना के बछड़े नहीं है या हार्स का गदहा है

    नहीं समझ आया तो मतलब आप ठीक ही हैं...इसका मतलब नहीं ही है, समझ कैसे आएगा। मामला उस चिरकुटई का है जो चल रही है और हम चाह कर भी उससे दूर नहीं रह पा रहे हैं। बात शुरू हुई बोधि भाई की इस पोस्‍‍ट से पहुँची प्रमोद की इस पोस्‍ट तक और प्रत्‍यक्षा की इस पोस्‍ट तक। अनूप रहते ही है फुरसत में तो हौले से मौज ले गए। दूसरे चरण में बोधि ने जबाव दिया (अभी भी बोधि ब्‍लॉगर से पहले साहित्‍यकार हैं इसलिए हिन्‍दी साहित्‍य की कीचड़ होली से रोक नहीं पाते खुद को) इस चरण का जबाव प्रमोद तो दे चुके हैं बाकी की प्रतीक्षा (नहीं) है।

    हम घुघुतीजी की परेशानी पर मुस्‍कराते रहे हैं जो समझने की कोशिश कर रही हैं कि भई ये चिरकुटई क्‍या बला है साथ ही डर रही हैं कि कहीं जो वे कर रहीं हैं वही तो नहीं :)।

    मूल पचड़ा ये है कि लोकप्रियता व शास्‍त्रीयता का द्वंद्व जो साहित्‍य में अक्‍सर गढ़ा और गढ़ाया (पढ़ा और पढ़ाया भी) जाता है वह कितना कुछ लागू होता है ब्‍लॉगजगत पर। तुर्रा ये कि सारी बातें व चर्चा (या विवाद) की भाषा साहित्यिक शास्‍त्रीयता से ही रही। ब्‍लॉग शास्‍त्रीयता सिरे से गायब। विश्‍लेषण के औजार भी वहीं रहे। ज्ञानदत्‍तजी ने संकेत किया पर कौन सुनता है।

    खैर होरी अपनी दुर्गति का विश्‍लेषण करने बैठता भी है तो अपने मरजाद के ही औजारों से... मारा जाता है बेचारा।

    हमने सोचा कि ब्‍लॉग रिपोर्टर में रिपोर्ट किया जाए...मजाक नहीं है...अजदक..प्रत्‍यक्षा...बोधि के गद्य में कविता वाले विचार  तिसपर हमारी अंग्रेजी विकलांगता...खैर हमारी जो पोस्‍ट बनी वो ये है बांचे।

    चूंकि गूगल ने अनुवाद दोनों सिरों में देना शुरू कर दिया है यानि हिन्‍दी से अंगेजी ही नहीं वरन अंग्रेजी से हिन्‍दी भी। तो सोचा लिखे का हिन्‍दी अनुवाद ही इस पोस्‍ट में ठेल देते हैं पर बाबा रे.. देखो क्‍या अनुवाद निकलकर आया-

    ठीक है , यह एक कठिन हो जाएगा और फिर भी लिखने पढ़ने में मुश्किल है . कई कारणों से केवल एक व्याख्या करने के लिए ... मैंने सोचा शीर्षक उपयुक्त होगा Chirkutayi , Leed , साहित्य और Markhanyi ... ! कठिन अनुवाद करने के लिए मिला है . Google अनुवाद कर सकता है leed अनुवाद करने के लिए गोबर और साहित्य को साहित्य और Markhanayi छोड़ दिया गया है लेकिन chirkutayi बरकरार है , अछूते हैं . शायद रिपोर्ट करने के लिए मुश्किल होता है कि किस तरह हिंदी ब्लॉग पोस्ट कर रहे हैं .. यदि हम विशेष रूप से रिपोर्टिंग Azdak , प्रत्यक्ष , Bodhi ( गुम अभय यहां )
    यह ठीक है इस पोस्ट के साथ शुरू Bodhi से चला गया .. इस से एक है और यह एक प्रमोद से प्रत्यक्ष ... Fursatiya winked यहाँ फिर Bodhi ने कहा ... ... वापस पुनः प्रमोद ने कहा है .
    इससे पहले कि आप इन नीडिंत छोरों में प्राप्त खो दिया है , मुझे बनाने की एक बात स्पष्ट है .. यदि आप कुछ तकनीकी विशेषज्ञ हैं .. विलम्ब फिर उन बोरिंग है . hmm प्राप्त खो दिया है ... ( आप एक संकेत प्राप्त नहीं होगा ) और यदि आप कर रहे हैं जैसे Hindite मुझे ... क्या आप जानते हैं यह क्या चल रहा है .. Chirkutai . हाँ , यदि आप एक या एक उत्साही बॉर्डर लाइन के मामले की तरह Ghughuti बनाने की भावना को समझाते हैं तो यह है कि जब हम Hindite chirkutise हम bullshit ... हिंदी में कम की जा रही है शक्तिशाली पाखाना के बछड़े नहीं है या हार्स का गदहा है , इसलिए यह leed . और इस गदहा पाखाना प्रत्येक खिलाड़ी बैल की तरह व्यवहार करना चाहते हैं और वे अपने सींग तेज कर रहे हैं ... हम इस तरह ही है . : 0 )
    ?.... कुछ भी नहीं मिला था इसलिए मैं ने तुम से कहा था .

    शीर्षक भी इसी से आया..।

    Thursday, May 08, 2008

    लघु कथा फिल्‍म : इस मीडिया विधा का स्‍वागत करें

    क्‍या इसे नवीन विधा माना जाए? कहना कठिन है, लघु फिल्‍में पहले भी बनती रही हैं। छोटी फिल्‍में जो छोटे आयोजनों में दिखाई जाती हैं तथा अक्‍सर वृत्‍तचित्र की कोटि की होती हैं। लघु कथा फिल्‍में खर्च के लिहाज से महंगी होती है तथा उनपर रिटर्न काफी नहीं होती। लेकिन हाल में फिल्‍म उत्‍पादन की कीमत बहुत कम हुई है तथा इंटरनेट फिल्‍म डिलीवरी का लोकप्रिय जरिया बना है। अब छोटी छोटी कथा फिल्‍में बनाई जा रही हैं- व्‍यक्तिगत प्रयासों के तहत, ये इंटरनेट के ही लिए बन रही हैं। मुझे यह हिन्‍दी फिल्‍म यूट्यूब पर हाथ लगी। फिल्‍म की विषयवस्‍तु से बहुत आनंदित नहीं हुआ लेकिन विधा के तौर इस आकार और कोटि की फिल्‍म ऐसी लगी है जिसे बनाने की चेष्‍टा हम ब्‍लॉग भी कर सकते हैं। देखें चैक व मेट

    निर्देशक : आशीष

     

     

     

    Wednesday, May 07, 2008

    हिन्‍दी में लिखें अंग्रेजी से पाठक लाएं- दोनों हाथों में लड्डू

    हाल के दिनों में कई शानदार चीजें हो रही हैं।  सबसे महत्‍वपूर्ण तो लगा गूगल द्वारा हिन्‍दी से अंग्रेजी अनुवाद की सुविधा दिया जाना। जैसा कि आलोक ने बताया और हमने भी जॉचा कि अनुवाद मशीनी है और जाहिर है मशीनी जैसा ही है- उससे कविताओं के अनुवाद कर पाने की उम्‍मीद करना बेमानी है पर साधारण वाक्‍यों को ठीक ठाक अनूदित कर लेता है। ध्‍यान रहे कि हमारी सरकार भी सालों से माथापच्‍ची कर ही रही थी कि कम से कम सरकारी पत्रों के अनुवाद का औजार विकसित कर सके- किया भी पर कभी जनसाधारण में लोकप्रिय नही बनाया जा सका।

    भाषायी अंतरण इंटरनेट के लिहाज से बहुत ही अहम बात है। खासकर भारत जैसे देश में जहॉं पूरा शिक्षित वर्ग कम से कम दो भाषाओं का जानकार है। अगर चिट्ठाकारी के लिहाज से देखें तो हम पाते हैं हिन्‍दी की चिट्ठाकारी की सीमा अब तक ये रही है कि एक निश्चित समुदाय है- पाठक, लेखक आदि सभी स्‍टेकहोल्‍डर इसी बंद समुदाय से हैं- हमारे पास आवारा पाठक नहीं हैं। मतलब ऐसे लोग जो बस घूमने के लिए इंटरनेट पर निकले... और वाह ये तो बड़ा अच्‍छा चिट्ठा है पढ़ा जाए। ऐसा अंग्रेजी के साथ होता है। और ऐसा भी नहीं है कि हिन्‍दी की सामग्री को खोजते लोग नहीं है- बस सर्च, कंटेंट, अंतरण के बीच समन्‍वय नहीं रहा है। एक जायजा लेने के लिए  देखें गूगलएनालिटिक्‍स में हमारे पिछले 11000 से कुछ अधिक विजिट (20 दिन में) के स्रोत क्‍या हैं-

    ScreenHunter_01 May. 07 09.39

    'हमारे' का मतलब यहॉं हिन्‍दी ब्‍लॉग रिपोर्टर है। इसकी अधिकांश सामग्री अलग अलग हिदी ब्‍लॉगों की सामग्री की संक्षिप्‍त समीक्षा ही होती है। यानि ब्रिज ब्‍लॉगिंग। इस अनुभव के बाद (जिसमें कमाई का अनुभव  भी शामिल है, हमारा पहला एडसेंस चेक रास्‍ते में है)  हमारा मानना है कि सर्च आकर्षित करने के लिए अपनी भाषा को खिचड़ी बनाने (और भाषा के साथ सांस्‍कृतिक बलात्‍कार करने से) कहीं अच्‍छा है कि अंग्रेजी की सर्च को किसी अन्‍य ब्रिज ब्‍लॉग पर आकर्षि‍त किया जाए तथा वहॉं से ट्रेफिक को अपने ब्‍लॉग पर भेजा जाए। अपने तईं हम ये काम हिन्‍दी ब्‍लॉग रिपोर्टर से कर ही रहे हैं। चूंकि भले ही ब्‍लॉग रिपोर्टर हिन्‍दी पर ही आधारित है पर चूंकि अंग्रेजी में  है इसलिए ब्‍लॉगवाणी या अन्‍य एग्रीगेटरों पर दिखाई नहीं देता है, आप इच्‍छुक हो तों उसकी फीड यहॉं सब्‍सक्राइब कर सकते हैं अथवा अपना ईमेल पता नीचे लिखें

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    यदि आपने अभी कोई दमदार पोस्‍ट लिखी है तो आप एग्रीगेटरों के माध्‍यम से सैकड़ों पाठकों तक तो पहुँचेंगे ही पर वे तो बंधुआ पाठक हैं वही हिन्‍दी की गली वाले। नए पाठकों तक पहुँचने का एक रास्‍ता हम बताते हैं। इस नई पोस्‍ट का 200 शब्‍दों में अंगेजी में एक परिचय लिखें इसमें अपनी पोस्‍ट का लिंक भी दें और shabdashilp <dot> contribute <dot> blogger <dot> com पर ईमेल कर दें। आपकी पोस्ट हिन्‍दी ब्‍लॉग रिपोर्टर पर आएगी और हिन्‍दी पोस्‍ट का अंग्रेजी विज्ञापन सैकड़ों नए पाठकों तक पहुँच जाएगा और सर्च इंजिनों तक भी। यदि इस चिट्ठे के पेजरेंक को लेकर कोई भ्रम है तो कृपया इस पोस्‍ट को देखें। जब सारी दुंनिया blog by Amitabh खोज/लिख रही हो तो सर्च में पहले नंबर पर आना हंसी खेल नहीं है। तो देर किस बात की है- हिन्‍दी में लिखें अंग्रेजी से पाठक लाएं- दोनों हाथों में लड्डू।

    Saturday, May 03, 2008

    लीजिए इस वीडियो से जानें कि हमें क्‍यों गलिआया जा रहा है

    कल से यशवंत तथा कई और भड़ासी हमें गलिया रहे हैं (वे कब नहीं गलियाते, किसे नहीं गलियाते) ये तब है जबकि हम खूब जानते हैं कि कम से कम हमारे और यशवंत के बीच ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ है कि आप हमें गालियों दो हम तुम्‍हें (हम नहीं कह रहे हैं कि यशवंत व अविनाश के बीच ऐसा कोई समझौता है)। पर ये थोक गालियॉं क्‍यों आ रही हैं ? जाहिर है कि एक वजह तो आदत है और दूसरी है कल NDTV पर हुई चर्चा। आप में से कुछ ने चर्चा देखी थी बाकी क्रिकेट मैच देख रहे होंगे। हम भी चर्चा में नहीं होते तो मैच ही देख रहे होते। खैर हमें बताया गया था कि चर्चा हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग पर होगी किंतु हमें ऐसा कोई भ्रम न था हम ताड़ चुके थे इसलिए जाते ही पूछा कि अमिताभ के ब्‍लॉग का ही मामला है न ...खैर हमें बताया गया कि हॉं वही और ये कि क्‍या ब्‍लॉग भड़ास है। अपनी भड़ास मसले पर हमेशा से राय रही है कि भड़ास ब्‍लॉगिंग का एक स्‍वाभाविक सोपान है जिसे मटिआया नहीं जा सकता, नहीं जाना चाहिए- ये भी कि भड़ास तत्‍व की स्‍वाभाविक एंट्रापी आकार बढ़ने पर पोजीटिव हो जाती है तथा वह अस्थिर हो जाता है। हमले भड़ासत्‍व को मजबूत बनाते हैं जबकि उसके प्रति सहज होना उसकी जरूरत को खुद ब खुद कम कर देता है। इसी किस्‍म की राय हमने वहॉं भी रखी थी(इससे कहीं कम मौका मिला इसलिए इससे कम स्‍प्‍ाष्‍ट रूप में कह पाए)।

    आप इन वीडियो में इस चर्चा को देख सकते हैं-







    ब्रेक के बाद