Wednesday, November 19, 2008

चलो थोड़ा सा 'हुत्थली' हो जाएं

एक किताब पढ़ते-पढ़ते कल अचान‍क यूरेका मूमेंट से साक्षात्‍कार हुआ। ऐसा नहीं कि यह भावना नहीं थी, बिल्‍कुल थी पर इसके लिए शब्‍द नहीं था। 'आज के अतीत' (भीष्‍म साहनी) पढ़ते हुए निम्‍न पैरा पढ़ा-

पंजाबी भाषा में एक शब्‍द है 'हुत्‍थल'। हिन्‍दी में हुत्‍थल के लिए कौन सा शब्‍द है मैं नहीं जानता, शायद हुत्‍थल वाला मिज़ाज ही पंजाबियों  का होता है। मतलब की सीधा एक रास्‍ते पर चलते चलते तुम्‍हें सहसा ही कुछ सूझ जाए और तुम रास्‍ता बदल लो। वह मानसिक स्थिति जो तुम्‍हें रास्‍ता बदलने के लिए उकसाती है, वह हुत्‍‍थल कहलाती है।

मैं गजब हुत्‍थली महसूस करता रहा हूँ। दरअसल महसूस तो करता था पर इस शब्‍द ने अहसास कराया कि जो महसूस करता था वह हुत्‍थल थी।  घर पर बैठे बैठे अचानक करनाल के ढाबे पर परांठे खाने की हुत्‍थल से लेकर,  चलती पढ़ाई और बेरोजगारी के बीच ही हुत्‍थली तरीके से शादी कर लेने तक कई हुत्‍थल हैं जो पूरी की हैं और हर बार अच्‍छा महसूस किया है।  लेकिन उससे भी बड़ी कई हुत्‍थलें हो सकती हैं। मतलब हुत्‍थली ख्‍याल, हुत्‍थल तो वे तब कहलातीं जब उनके उठते ही उनपर अमल शुरू हो गया होता। जैसे किसी रोज अनूप शुक्‍ला की ही तरह साइकल लेकर निकल लेते हिन्‍दुस्‍तान भर से अनुभव बटोरने। या घर से निकलें नौकरी करने और इस्‍तीफा दे आएं,  किसी रात फुटपाथ पर सोकर देखें (दिल्‍ली की एक संस्‍था 'जमघट' नियमित तौर पर ये अनुभव दिलाती है, बेघर लोगों की तकलीफ से दोचार करवाने के लिए),  और भी न जाने कितनी हुत्‍थलें।

हुत्‍थली होने का एक मजा जमे जमाए लोगों की प्रतिक्रिया देखना भी होता है। मुझे याद है कि सरकारी नौकरी में था रास नहीं आ रही थी लगता था कि मैं कर क्‍या रहा हूँ। एक दिन अचानक  इस्‍तीफा दिया स्‍टाफरूम पहुँचा तो लोगों की प्रतिक्रिया बेहद मजेदार थी, कई के लिए ये उनके जीवन दर्शन पर ही चोट था। हालांकि ऐसा कोई इरादा नहीं था, बाद में अफसोस सा भी हुआ कि कोई दूसरी अस्‍थाई नौकरी ही खोज लेता पहले... लेकिन हुत्‍थल तो बस हुत्‍थल ठहरी।  लेकिन हॉं इतना तय है कि हुत्‍थलें न हो तो जिंदगी बेहद नीरस व ऊब भरी हो।

चित्र - यहॉं से साभार

9 comments:

Anonymous said...

वाकई हुत्‍थलें न हो तो जिंदगी बेहद नीरस व ऊब भरी हो!

सतीश पंचम said...

एक नये शब्द से साक्षात्कार हुआ। वैसे हम सभी कभी न कभी हुत्थल के शिकार होते ही हैं, पर ज्यादा हुत्थलबाजी भी ठीक नहीं होती।
अच्छी पोस्ट।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

लक्ष्य के मामले में हुत्थली होना कोई अच्छी बात नहीं साधनों के मामले में हुआ जा सकता है।

संजय बेंगाणी said...

बड़ी हत्थुथाई है यह तो, विषय से हट कर लिख दिया. :)

अभिषेक ओझा said...

नया शब्द पता चला. और आपकी ही तरह हुत्थलई तो सबके जीवन का हिस्सा है !

अनूप शुक्ल said...

हुत्थल असल में यौवन की निशानी है। जिंदादिली की। परसाईजी इसीलिये कहे हैं -इस सबसे अलग बेहिचक बेवकूफ़ी करने की इच्छा का नाम यौवन है।

सागर नाहर said...

ऐसी हुत्थल हमारे मन के कई बार उठी, रास्ता भी बदल दिया पर आज लगता है, कि नाहक ही हुत्थलबाजी की।
:)

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

मैं भी गजब हुत्‍थली महसूस करता रहा हूँ।

bahadur patel said...

achchha to hai lekin aur gahrai se hutthal baji ki jati to dost jyada maja aata. kai logon ne badi-badi hutthalbajiyan ki hai iname premchand,muktibodh,rajkamal choudhary,sharadchandra, aadi kai log hai.aur karo hutthalbaji,badhai.