Monday, November 10, 2008

ये मेरा भय यह तेरा भय

जब छपास में सनराइज ने तनख्‍वाह के देर से मिलने के भय की अभिव्‍यक्ति की तथा ज्ञानदत्‍तजी ने ऐसे भय की अनुपस्थिति पर संतोष जाहिर किया तो हम सहसा ही अपने भयों के विश्‍लेषण में जुट गए। हमें भी लगातार तनख्‍वाह के मिस हो जाने की भय सताता है जबकि मोटे होने, अकेले होने, बुढ़ापे से भय नहीं लगता। मजे की बात ये है कि अ‍ब तक जो नौकरी बजाई है उसके दौरान कम ही ऐसा हुआ है घर सिर्फ हमारी तनख्‍वाह पर निर्भर रहा हो। कुल मिलाकर ज्ञानदत्‍तजी जैसी सुरक्षा बनी रही है तब भी तनख्‍वाह न मिलने के भय से डरना हम अपनी ही जिम्‍मेदारी मानते रहे हैं।

दरअसल सबके भय एक से नहीं होते, सट्टेबाज के लिए सेंसेक्‍स का 5000 पर पहुँच जाना, भय की अति है हमारे लिए ये मात्र एक संख्‍या है जो 13882 से ज्‍यादा सुंदर प्रतीत होती है, कितना अच्‍छा हो सेंसेक्‍स हमेशा 5000 या नीचे रहे..फिगर कमजोर हो तो सेक्‍सी लगती है और बिना सेक्‍स के क्‍या सेंसेक्स।   

भय के भी पदसोपान होते हैं। इनकी भी एक लैंगिक निर्मिति होती है। उदाहरण के लिए मेरी स्‍टीरियोटाईप समझ का कोना कहता है कि तनख्‍वाह का समय पर न मिलना एक ऐसा भय है जो अपनी प्रकृति में ठीक वैसे ही मर्दाना महसूस होता है जैसे कि चेहरे पर झुर्रियों का दिखने लगना एक जनाना सा भय है। इससे पहले कि कोई चोखेरबाली आपत्ति दर्ज करे हम कहे देते हैं कि आपत्ति के मामले में हम आत्‍मनिर्भर हैं, हम पहले ही कह चुके हैं कि भय की ये लैंगिक समझ स्‍टीरियोटाईप्‍ड है। 

7 comments:

अभिषेक ओझा said...

अपने अपने भय अपनी अपनी चिंता ! पर कुछ भय सबमें कॉमन हैं.

ajay kumar jha said...

kamaal hai sir, shabdaavali bhee kam bhaybheet karne walee nahin rahee, maja aa gaya, achha lekh.

वर्षा said...

भय की भी लैंगिक समझ होती है, चोखेरबालियों को अभी तक ये पता नहीं।

संजय बेंगाणी said...

निर्भयता के लिए निश्काम होना पड़ता है. जरूरते नहीं तो भय भी नहीं. कुल मिला कर हमें भय में जीना ही है.

जितेन्द़ भगत said...

जि‍से तन्‍ख्‍वाह मि‍लती है, जब वह इतना भयभीत है, फि‍र लाचार लोगों को कि‍तने प्रकार के भय सताते होंगे:)
और हॉं, लाचार लोगों में दोनों लिंग के प्राणी आते हैं और उनके अपने-अपने भय होते हैं:)

Gyan Dutt Pandey said...

भय में भी जेण्डरीयताहै - यह विचार अपने आपमें पोस्ट ठेलक प्रेरणा है! :-)

amit said...

हमें भी लगातार तनख्‍वाह के मिस हो जाने की भय सताता है जबकि मोटे होने, अकेले होने, बुढ़ापे से भय नहीं लगता।

ऊ का है कि तनख्खवाह नहीं मिलेगी तो मोटे नहीं होंगे, इसलिए उसके न मिलने के डर के सामने मोटे होने का डर गौण हो जाता है। वेतन न मिलने की स्थिति में अकेले हो जाने के चांस अधिक हैं; ऐसा न हो इसके लिए वेतन का मिलना आवश्यक है इसलिए वेतन न मिलने के भय के सामने अकेले होने का भय भी गौण हुआ जाता है। और रही बुढ़ापे की बात तो वह तो दोनो स्थिति में आना ही है, चाहे वेतन मिले या न मिले, बस फर्क इतना है कि वेतन मिलता रहे तो बुढ़ापा आसानी से कट जाएगा, दूसरों से बुढ़ापा छुपाने का भू प्रयत्न कर पाएँगे, लेकिन यदि वेतन न मिला तो ई सब पॉसिबल न होगा!!

लिहाज़ा, वेतन न मिलने का डर आपके बाकी डरों को गौण करे देता है अपने सामने!! :)