Friday, December 23, 2016

ठण्डी कहानी

मग में भाप उड़ाती कहानी सलीके से उड़ेलते हुए वो हसरत से देखती है... सामने जो बागान का सौदागर था, शुगर पॉट आगे खिसकाते हुए सुझाता है डेढ़ चम्मच से मुकम्मल होनी चाहिए कहानी... हम देखेंगे, खुद को कहते सुनती है। चम्मच में झूठ भर वो उड़ेलती है मग में एक टीस्पून, दो, तीन... फिर न जाने ऐसा क्यों होता है कि मग आइसक्रीम कोन हो जाता है कहानी ज़िन्दगी सी ठंडी और झूठ जैसी मीठी हो जाती है।
बागान का सौदागर मन ही मन मुस्कराता है और और जेब में हाथ डालकर जांघिए को खींचकर ठीक करने में जुट जाता है।

Wednesday, November 02, 2016

बेउम्मीदी की उम्मीद में

उम्मीद एक दुधारी शब्द है
ज़िंदा रखता है
लेकिन जीने नहीं देता।
छल के बाद
धोखे और टूटे पुलों के बावजूद
आहटों पर मुड़कर
पीछे देखने को विवश करता है
यही बेशर्म शब्द
लेकिन आगे नहीं देखने देता
स्वीकार कर हर घटित को,
आगे चलने के लिए जरूरी है
कि
उम्मीद को दफ़न किया जाए
या होने दिया छटपटा कर बेदम।

Friday, September 09, 2016

पराए युद्ध के घाव

कम ही लड़ाई हैं जो हम चुनते हैं
बहुधा हमें मिलती हैं
पराई लड़ाइयॉं
जो हम पर थोपी गई थीं
जिरहबख्‍तरों पर अगाध विश्‍वास वाले योद्धाओं ने।
लड़ाइयॉं जिन्‍हें हम जीतना नहीं चाहते
न ही हार से बचने के ही लिए लड़ रहे हैं हम
अपनी कहूँ
खड़ा हूँ इस बॉलकोनी पर अपने ही घर की
जिसे न जाने क्‍यों
कुछ संप्रभु मन घोषित कर चुके हैं
युद्ध का मैदान।
खड़ा हूँ दम साधे बस
सहमे भयभीत (पराजय से नहीं)
वरन
ये जानने कि
अगाध विश्‍वास वाली योद्धा
जब जिरहबख्‍तर उतारेगी
(जीत कर या पराजित, मुझे फर्क नहीं पड़ता)
तो खुद घायल होगी कि नहीं।

Tuesday, August 23, 2016

मेरी वह दोस्त इतने भरोसे की जिससे बात करने में भरोसे पर विचार नहीं करना पड़ता। उस रोज़ किसी वजह से अकेले थे हम उसके घर, यह कोई अलग घटना नहीं थी जिसे महसूस किया जाता। फिर वक़्त हुआ, मैंने कहा अच्छा चलता हूँ दरवाजे के और मुड़ा हाथ अनदेखे ही दरवाजे के लैच की दिशा में बढ़ा.. तब मुझे दिखा,  बस यही क्षण बस यही। मैं सहज ही मुड़ा था लेकिन देखा कि वह चौंकती है और फिर एक,  नहीं आधा ही कदम पीछे होती है। उसके दोनों हाथ इवेसिव भंगिमा में छातियों की और गए थे...ओह। मैं बेहद आहत और हैरत निगाह से देकगता हूँ , सेकण्ड का चौथाई भर ही रहा होगा वो एक अपोलेजेटिक मुस्कान देती है...मैं सोचकर मुस्करा देता हूँ कि कहीं उसे बुरा न लगे। फिर मुझे लगता है कि आखिर यही सब तो उसका कुल हासिल है, पहला रिफ्लेक्स एक्शन खुद को बचाने का... किसी मर्द पर भरोसा न् कर पाना...पर मैं नीचे आ गाड़ी में रो देता हूँ। खुद के अपमान पर शायद नहीं, उसकी जिंदगी पर।  ज़िन्दगी का उसका हासिल 'इनेबिलिटी तो ट्रस्ट'... ज़िन्दगी हमेशा कवच निकालकर ही जीना.. ओह मेरी प्यारी।
उस क्षण मुझे पता था पता होना था कि उस क्षण का वह अ-भरोसा व्याप्त हो पूरी ज़िन्दगी पर छाएगा।  अपने ही इस कवच की कैद... बाद की बस सारी कहानी इस अ-भरोसे के बीज के उगने, वृक्ष हो जाने की कहानी है।

Friday, August 19, 2016

भरोसा कर सकने की क़ाबलियत के मायने

मेरी वह दोस्त इतने भरोसे की जिससे बात करने में भरोसे पर विचार नहीं करना पड़ता। उस रोज़ किसी वजह से अकेले थे हम उसके घर, यह कोई अलग घटना नहीं थी जिसे महसूस किया जाता। फिर वक़्त हुआ, मैंने कहा अच्छा चलता हूँ दरवाजे के और मुड़ा हाथ अनदेखे ही दरवाजे के लैच की दिशा में बढ़ा.. तब मुझे दिखा,  बस यही क्षण बस यही। मैं सहज ही मुड़ा था लेकिन देखा कि वह चौंकती है और फिर एक,  नहीं आधा ही कदम पीछे होती है। उसके दोनों हाथ इवेसिव भंगिमा में छातियों की और गए थे...ओह। मैं बेहद आहत और हैरत निगाह से देकगता हूँ , सेकण्ड का चौथाई भर ही रहा होगा वो एक अपोलेजेटिक मुस्कान देती है...मैं सोचकर मुस्करा देता हूँ कि कहीं उसे बुरा न लगे। फिर मुझे लगता है कि आखिर यही सब तो उसका कुल हासिल है, पहला रिफ्लेक्स एक्शन खुद को बचाने का... किसी मर्द पर भरोसा न कर पाना...पर मैं नीचे आ गाड़ी में रो देता हूँ। खुद के अपमान पर शायद नहीं, उसकी जिंदगी पर।  ज़िन्दगी का उसका हासिल 'इनेबिलिटी टू ट्रस्ट'... ज़िन्दगी हमेशा कवच निकालकर ही जीना.. ओह मेरी प्यारी।
उस क्षण मुझे पता था पता होना था कि उस क्षण का वह अ-भरोसा व्याप्त हो पूरी ज़िन्दगी पर छाएगा।  अपने ही इस कवच की कैद... बाद की बस सारी कहानी इस अ-भरोसे के बीज के उगने, वृक्ष हो जाने की कहानी है।

Sunday, May 01, 2016

दुनिया होने का सच

एक होते हैं शब्द
और होती है शब्दों की दुनिया
जैसे एक होता है प्यार
और होती है प्यार की दुनिया
पर सुनो प्यार होता प्यार..
लेकिन प्यार की दुनिया होती है
झूठ, धोखा और लिसड़ा हुआ स्वार्थ
एक होती है कविता
और होती है कविता की दुनिया
टकराती प्रवंचनाएं, फूहड़ अहम् और छद्म शिखर
सुनो दुनिया
तुम हर सच के साथ ऐसा क्यों करती हो
उसे सच रहने क्यों नहीं देती
क्योंकि एक होता है सच
और होती है सच की दुनिया
जो
और चाहे दुनियाभर का कुछ भी हो
सच नहीं होती।

Monday, April 18, 2016

रैण दो, आपसे न हो पाएगा प्रोफेसर साहब

प्रो. गोपेश्‍वर सिंह हमारे ही विश्‍वविद्यालय में हिन्‍दी के प्रोफेसर हैं। पहले विभागाध्‍यक्ष रह चुके हैं। कल के जनसत्‍ता में उन्‍होंने आलोचना की अधोगति के स्‍यापे में ठीकरा सोशल मीडिया के सर फोड़ा है। विनीत, रवीश और प्रभात जैसे सक्रिय ब्‍लॉगरों को उदाहरण की तरह प्रस्‍तुत करते हुए यह साबित करने की जिद दिखाई है कि सोशल मीडिया के कथित तुरंता होन के चलते गंभीर आलोचना की संभावना खत्‍म हो गई है। मेरी प्रतिक्रिया: 

यात्रा में था तो कल जनसत्‍ता उपलब्‍ध नहीं था आज पढ़ा है। सोशल मीडिया को लेकर की गई ये कोई पहली गैर जिम्‍मेदार टिप्‍पणी नहीं है। पिछले दस साल में हम जो ब्‍लॉग-इंटरनेट वाले हैं उन्‍होंने उपहास, उपेक्षा,असुरक्षा, ईर्ष्‍या सब चरणों को भुगता है, सो ये टिप्‍प्‍णी तो फिर भी खिसियाहट ज्‍यादा है। तब भी मैंने सोचा था कि पूर्वग्रह छोड़कर प्रो. सिंह के नजरिए को पूरी सदाशयता से समझने कर कोशिश की जाए। किंतु दिक्‍कत ये है कि आलेख में सोशल मीडिया की समझ की एबीसीडी भी नदारद है।
प्रो. सिंह अपनी आधारभूत पूर्वधारणाओं के आधार तक स्‍पष्‍ट कर पा रहे हैं...आलोचना में वर्णित पतन की जिम्‍मेदारी सोशल मीडिया पर कैसे है ? यूनीकोड 2003-04 में दिखता है और ब्‍लॉगेतर हिन्‍दी सोशल मीडिया की उम्र उससे भी कम है यानि सोशल मीडिया की 'छाया' आलोचना पर मात्र 5-7 साल की है तो क्‍या उससे पहले हमें आलोचना का स्‍वर्ण काल चल रहा था ?
एक अहम पूर्वधारण ये भी है हिन्‍दी पब्लिक स्‍फेयर मोनोलिथिक है यानि सोशल मीडिया और शेष आलोचना वृत्‍त में लोग एक ही हैं... अजब जिद है, सारे उदाहरण बताते हैं कि दरअसल सोशल मीडिया के हिन्‍दी वाले (खासकर पाठक) अधिकांशत वे हैं जो अन्‍यथा हिन्‍दी जगत से दूर होते..सोशल मीडिया ने हिन्‍दी के पब्लिक स्‍फेयर को विस्‍तार दिया है। ब्‍लॉगर याद करेंगे कि इस बात को वहॉं बार बार रेखांकित किया जाता था ये हिन्‍दी के यूनीलेखक व यूनीपाठक, छपाई वाले लेखको/पाठकों से अलग हैं तथा बहुत ही थोड़ा हिस्‍सा कॉमन है।
एक आलोचकीय प्रश्‍न यह भी है कि सरजी ये जो कथन है कि 'सोशल मीडिया अभिव्‍यक्ति की भूख मार देती है' इसके लिए कोई संदर्भ, कोई शोध उद्धृत करने की कोई जरूरत क्‍यों नहीं लगी आपको... या जो ठाकुर साहब कहें उसे बस मान लेना पड़ेगा...क्‍योंकि बाकी सब सबूत तो बताते हैं कि इससे हिन्‍दी टेक्‍सट के उपभोग और उत्‍पादन दोनों का विस्‍तार हुआ है।
अब खरी खरी कुछ सुन लीजिए, सरजी कुछ पढ़ा कीजिए, हिन्‍दी में न मिले तो अंग्रेजी का पढ़ लीजिए। हाईपर टेक्‍स्‍ट वहीं नहीं है जो टेक्‍स्‍ट है उसे न पढ़ा वैसे जाता है जैसे छापे के टेक्‍स्‍ट को न लिखा ही वैसे जाता है। यूँ आपको चंद संदर्भ यहॉं दे सकता हूँ किंतु सही तो होगा कि जिन्‍हें तिलंगे कहकर अपमानित कर रहे हैं, खासकर विनीत (Vineet Kumar)को उसे एक बार फोन लगाएं (कोई शर्म की बात नहीं है, ज्ञान जिसके पास हो ले लेना चाहिए) वे आपको चार किताब गिना सकता है उसे पढ़कर आपकी कुछ नजर खुलेगी।
मजे की बात यह है‍ कि आपकी उम्‍मीद तो यह है कि इस सर फुटौवल में आप टेक्‍स्‍ट को हाईपरटेक्‍स्‍ट के सामने ला खड़ा कर पाएंगे और इस धुंधलके में आपको टेक्‍स्‍ट खेमे की सरदारी मिल जाएगी पर है ये गलतफहमी ही। तिस पर मजेदार बात यह है कि जिस पोलिमिकल अंदाज में आपने यह लेख लिखा है वह खुद ही दरअसल सोशल मीडिया तेवर...यानि दरअसल जनसत्‍ता में एक ब्‍लॉग पोस्‍ट पर लिख दी है बस लिंक नहीं दे पाए हैं :)
अब आखिरी बात इसी विश्‍वविद्यालय का ही शिक्षक होने के नाते मुझे शिकायत करनी चाहिए थी कि आपने तो डीयू प्रोफेसरों की इज्‍जत ही मिटा दी..पर अंदर की बात हम आप जानते ही हैं कि हमारी इज्‍जत पिछले कुछ सालों से, खासकर एफवाईयूपी/सीबीसीएस के बाद कुछ रही ही नहीं। तो वो कोई वांदा नहीं। एक सवाल सो साथी जातिखोज शिक्षकों में जरूर कुलबुलाएगा कि ये 'चौहान' भला 'सिंह साहब' पर ढेले क्‍यों भांज रहा है, तो पहली बार साफ कर दूँ मुझे अपनी जाति पता ही नहीं है, जब तक पता नहीं चलती तब तक लोग ठाकुर समझें इस पर आपत्ति न करने की नीति अपनाई हुई है :)


Tuesday, April 12, 2016

आहत व्यासपोथी



आहत व्यासपोथी
============
एक तख्ती की तरह जमाया
पहला मजबूत विश्वास
थोडा ठोका, दबाया
फिर विश्वास की जमायी
अगली तह
परत दर परत
विश्वास की तलछट चट्टान
किसी एक आंधी भरी शाम
ये व्‍यास  पोथी
हो गयी भुरभुरे शब्दों की
भंगुर किताब
एक तह के शब्द नश्तर हो
निचली तह में घुस गए
जंग खायी कील से पंक्चर
बियाबान में खड़ी गाडी सा बेबस भरोसा
भरोसे को रोयेदार होना चाहिए
लचीला
उसको किताबों सा तो बिल्कुल न होना था
बंद एक तरफ/खुला दूसरी ओर
शब्दों से बिंधा अनहद। 

Saturday, April 09, 2016

मन अक्सों के खेत हैं

तुम्हारे आइने से चुराया मुस्कराकर मैंने तुम्हारा थोड़ा सा अक्स सहेजकर बो दिया उसे मन में, मन ही मन में तुम तुम रहीं तुम्हारे पास मेरे पास फूटता पलता तुम्हारा एक अक्स रहा.. फिर एक दिन सारे दर्पणों को किरिचें उड़ा तुम चल पड़ीं अनजान देशों में शिखरों की यात्रा पर देश जिसमें होते नहीं दर्पण लेकिन भीतर वह छतनार हो चुकी तुम हो वैसी, तुम जैसी नहीं यूँ भी मैं तुम्हारे अक्स के ही सहारे था मन अक्सों के ही खेत हैं।

Wednesday, March 30, 2016

संविधान

एक, दो ,तीन...चार सौ अड़तालीस
मेरे भीतर एक क्‍लाउन गिनकर लेता है
हर चुटकुले पर अट्टहास
साश्रु कभी-कभी,
संविधान साला चुटकले की किताब हो गया है।

Tuesday, March 29, 2016

कैद

मैंने
आइनों को तोड़ा सबसे पहले
चकनाचूर, किरिच किरिच उड़ा दीं
फिर इत्‍मीनान से गढ़ा खुद को
मैं जानती थी हमेशा से
कहा भी मुझे सपनों के उस सौदागर ने
जो बट्टे की मुद्रा में सौदे करता है
मैं जिसे मैंने गढ़ा है
वही मैं हूँ
वही हूँ मैं
मैं हूँ वही
आइनों में कैद न होंउंगी कभी
मैं अपनी गढ़न की कैद में हूँ प्रसन्‍न

Friday, March 18, 2016

आपकी कलैंडरी भारतमाता आपकी है, आप रखिए।

हम भी आपके वाले ही समाज में पैदा हुए इसलिए हमारे मन में भी छवियॉं राजा रविवर्माई कलैंडरों को देख देख मिथकीकृत हुई हैं उसी के आधार पर कहता हूँ कि तनिक ऑंख बंद कर भारतमाता बुदबुदाईए और देखिए आपके मन में कैसी छवि बनती है बहुत संभावना है कि कोई निर्गुण निराकार नहीं वरन नीचे जो संघी भारतमाता है उस किस्म की छवि बनेगी थोड़ा हेरफेर पर वही साड़ी पहनी आभूषणों से भरी शायद शेर, कोई हथियार और हो सकता भगवा (या तिरंगा भी, कोई बात नहीं) झंडा हाथ में लिए। पीछे एक नक्‍शा जिसमें पाकिस्‍तान/बांग्‍लादेश भारत में ही विलीन है।
मैं कलाकार नहीं हूँ इसलिए गूगल से ही तस्‍वीर लेकर रख रहा हूँ किंतु इस राजा रविवर्मा शैली वाली तस्‍वीर के स्‍थान पर कोई हिज़ाब/नकाब वाली, नमाज में झुकी दुआ मॉंगती - भारत माता (या मादरेवतन) की छवि आती तब भी आप इतना ही सहज होते ?
मैं दोनों से ही असहज हूँ क्‍योंकि मेरे लिए भारत इतना सगुणरूप नहीं है लेकिन उसे जाने दें सच यह है कि सिंहवाहिनी भारतमाता की कल्‍पना आप कितना भी शब्दिक मुलम्‍मे चढ़ाएं लेकिन वह है बहुसंख्‍यकवाद ही। औवेसी हो या कोई अन्‍य जब आप उसके प्‍यार (देश से या किसी से भी) करने के तरीके को तय करने की कोशिश करते हैं आप दरअसल बहुसंख्‍यक तानाशाही की आहट लिए होते हैं।

Wednesday, March 16, 2016

कम उदास कविता के लिए

उदास कविता मैं भी लिख सकता हूँ
आज
आज दिन
और आज रात भी
शायद आज के बाद की हर रात
मैं लिख सकता सबसे उदास कविता
पाब्लो नेरुदा।
तुम्हारी तरह मैंने भी उसे प्यार किया था
और कभी कभी उसने भी
हम सब की
कवियों की और कम कवियों की भी
उदासियाँ उपजती हैं
उस बहुत गहरे प्यार से
जो उन्होंने किया था
और कभी कभी उनसे भी किया गया था।
सुनो प्यार
काश तुम कुछ कम उपजाऊ होते
और सुनो
पाब्लो नेरुदा
उसकी बड़ी बड़ी शांत आँखों से
तुम्हारी इस शिकायत में शामिल समझो मुझे
दुनिया को कुछ कम
उदास कविताओं की जरूरत है
हर दिन
हर रात ।
(पाब्लो नेरुदा की कविता 'आज रात...मैं लिख सकता हूँ' को)

Friday, March 11, 2016

संवाद हो, असंवाद हो तो उस पर भी संवाद हो

हम जब प्‍यार में ताजा ताजा पड़े थे कैंपस में तो घंटों साथ रहने का मौका मिलता था, घंटों यानि घंटों... पता नही क्‍या क्‍या बात करते होंगे- स्‍वीकृत युगल थे इसलिए किसी से छिपना छिपाना न था इस हद तक साथ होते थे कि वाशरूम जाने में भी बैग दूसरे को पकड़ाकर जाते थे। दोस्‍त ही नहीं खुद भी हैरान होते थे कि आखिर सुबह से शाम तक करने के लिए बातों के विषय कहॉं से लाते हैं। फिर एहसास हुआ कि हम शायद अच्‍छे संवाद में थे एक दूसरे के कहने से पहले समझ लेते थे इस संवाद को और बेहतर करने की कोशिश भी कर रहे थे, फिर शादी हुई आगे की पढ़ाई, शोध, बच्‍चे और नौकरियॉं इस क्रम में शायद ग्रो भी किया होगा। लेकिन फिर एहसास होना शुरू हुआ कि एक शिकायत अक्‍सर एक-दूसरे से की जा रही है खासकर मेरे खिलाफ कि 'मैं साथी से बात नहीं करता' हमारे जिंदगी में अब तक पेशे पड़ोस प्‍यार की इतनी समानताएं थी कि विषयों की कमी नहीं हो सकती थी पर फिर भी शिकायत थी कि आपस में संवाद उतना नहीं हो रहा है जितने की चाह है, घर बच्‍चे सब्‍जी होमवर्क बिल जैसी मुंडेन गृहस्‍थी वाली बात की बात नही कर रहा हूँ, संवाद की बात कर रहा हूँ। गहरा संवाद जैसा दोस्‍तों से होता है...उठते समय तृप्ति के अहसास वाला।
ये एक दूसरे पर किसी अविश्‍वास से उपजा असंवाद नहीं था, ऊब वाला भी शायद नहीं था विषयों का कम होना हो सकता है हो पर मुझे इसकी वजह नहीं दिखती। आज से तेईस साल पहले जाहिर है जिन विषयों पर बात कर सकते थे आज उनसे ज्‍यादा विषय हैं। ढेर सुख तो बढे़ ही हैं कितने ही दु:ख भी आ जमे हैं जिनपर कितना तो कहा रोया जा सकता है। फिर भी एक अर्थपूर्ण संवाद के लिए तरसते क्‍यों रह जाते हैं हम। मनीषा ने अपनी एक पोस्‍ट में इसे इवोल्‍यूशन के संकट की तरह चीह्नने की कोशिश की है-
''हम दूर हो जाते हैं क्‍योंकि बात ही नहीं कर पाते। न समझ पाते हैं और न समझा पाते हैं। समझने-समझाने की जरूरतें भी सबकी एकसमान नहीं होतीं।''
मुझे यह समझने समझाने से ज्‍यादा वाकई समझने की जरूरत समझाने का संकट ज्‍यादा लगता है। मैं जब अपना संकट समझाने की चेष्‍टा करता हूँ तुम समझती हो मैं कह रहा हूँ - कि तुम नहीं समझ सकती जाने दो, जाहिर है यह अहम पर चोट देने वाली समझ है और इसके बाद तो संवाद की संभावना ही समझो खत्‍म, शायद दोबारा तत्‍काल कोशिश भी मुश्किल और लो फिर ऐसा मौन पसरता है कि क्‍या खाएंगे, क्‍लास कब है बच्‍चों ने होमवर्क किया या नही...बस यही बचता है अगले कितने ही घंटे या दिन। फिर हम समझाते हैं कि देखो हम दु:खी नहीं है कितना सुखी और प्‍यार भरा तो परिवार है। बाकी सब आह भरें ऐसा। फिर कोशिश करते हैं अक्‍सर एक रिक्ति फिर भी जमी रहती है। हम जानते हैं कि हमारा संवाद और संवाद की जरूरत का एहसास निन्‍यानवें फीसदी से बेहतर है पर ये अपने आप में कोई दिलासा देने की तो बात न हुई... संवाद तो वैसी ही जरूरत है जैसी खाने पीने या साथ सोने की। संवाद इसलिए अहम है और किसी पर न हो तो असंवाद पर से ही श्‍ुारू किया जाए।

Saturday, March 05, 2016

खटमलों की कसम आपको कुछ समझ नही आ रहा

ज्ञानदद्दा अब पेंशनयाफ्ता होकर गॉंव में रह रहे हैं बड़े अधिकारी हैं मैं खुद सरकारी नकरी में हूँ इसलिए साफ अनुमान लगा सकता हूँ कि सीनियर एडमिनिस्‍ट्रेटिव ग्रेड से रिटायर होने पर लगभग कितनी पेंशन मिलती होगी। पर ये सब बातें बदतमीजी ही कही जानी चाहिए आखिर पेंशन व्‍यक्ति का हक है कोई खैरात नही है। बस ज्ञानजी को समझना चाहिए कि अगर लाखों की पेंशन खैरात नहीं है तो सिर्फ पॉंच हजार की फैलोशिप और इस किस्‍म की छोटी मोटी मदद जो शोधार्थी पाते हैं यह भी उनका हक है खैरात नहीं। यह सब कहने की नौबत इसलिए आई कि ज्ञानजी ने कन्‍हैया कुमार समझाईश देते हुए यह स्‍टेटस लिखा-
छड्ड पुत्तर। अपनी पढ़ाई पूरी कर। काम धाम कर मां बाप का हाथ बटा। अठ्ठाईस साल की उमर हो गयी। कब तक टेक्सपेयर्स के बल पर मिली स्कॉलरशिप की रोटियां तोड़ चौधराहट करेगा।

ज्ञानजी जैसे वरिष्‍ठ ही नही सरकार और उसके मंत्री भी अब अचानक अभिभावकीय मुद्रा में आ गए हैं। ये कन्‍हैया इस उम्र तक पढ़ाई क्‍यों कर रहा है, जा मॉं बाप का ध्‍यान रख, पढ़ाई में मन लगा किस्‍म के चौपट तर्क रखे जा रहे हैं। एक तो वयस्‍कों को बच्‍चा समझकर व्‍यवहार करने की हमारी सामाजिक ग्रंथि का इलाज आवश्‍यक है।
 दूसरा वो कह रहा है कि कैंपस में खटमल हैं तो उसका भी व्‍यवस्‍थागत विश्‍लेषण होना चाहिए उसे 28 की साल की उम्र में यह बात और इसका महत्‍व पता है आप इस उम्र में पहुँचकर शोध में लगे युवाओं की रोजगार की स्थिति के लिए उसे ही जिम्‍मेदार बनाने पर तुले हैं। उसकी सुपरवाइजर बाकायदा घोषणा कर बात चुकी हैं कि वह गर्व करने लायक शोधार्थी है पर न जी, आप भले ही उसका शोधविषय भी न जानते हों उसे नकारा सिद्ध करने पर तुले हैं।

मैं दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में ही पढ़ाता हूँ और जानता हूँ कि इस समय शोध में लगे लाेगों को नौकरी मिलने में कितना वक्‍त लग रहा है और हॉस्‍टलों के खटमल की कसम इसकी वजह ये शोधार्थी नहीं है, सरकारें इतनी शोषक हो गईं हैं कि वे नहीं चाहतीं कि शोधार्थी गरिमा के साथ शिक्षण का या कोई शोध का रोजगार पा सकें। कितने गेस्‍ट एडहॉक अपनी शादी करना, बच्‍चे पैदा करना यहॉं तक कि निर्भय होकर किताब या लेख लिखना तक टालते हैं कि नौकरी पर फर्क पड़ेगा।
अभी इसमें इस बात को शामिल नहीं कर रहा हूँ कि 28 वर्षीय सुवक को इस बात की आजादी होनी चाहिए कि नहीं कि वह अपने भविष्‍य के बारे में खुद फैसला करे, उसे देश समाज को महत्‍व देना है या अपने निजी जीवन को, यह फैसला आप उसके लिए करने पर इतना उतारू क्‍यों हैं।
अब टेबल टेनिस की तरह आपका घटिया तर्क आप पर ही वापस फेंक रहा हूँ कि इसी तर्ज पर अब बुढऊ हो रहे मोदीजी को घर परिवार पत्‍नी के लिए कुछ करना चाहिए था कि शाखाओं में ध्‍वजप्रणाम में जिंदगी लगाानी चाहिए थी ?

कलम की आड़ में

हंसने की नहीं,
मरने की नहीं
करने की भी नहीं
नहीं मुझसे और कोई उम्मीद न रखो
कि मेरे हाथ में कलम है।

लड़ने की नहीं
अड़ने की नहीं
धरने की भी नहीं
नहीं मुझसे और कोई उम्मीद न रखो
कि मेरे हाथ में कलम है।

कलम को मैंने बना लिया है
अपना ढाल हथियार और मोर्चा सब
शब्दों की नहीं
भाव की नहीं
त्रास की नहीं
सच की नहीं
अपने कुछ की भी नहीं
नहीं मुझसे और कोई उम्मीद न रखो
कि मेरे हाथ में कलम है।

Tuesday, March 01, 2016

है ये भी एक नैपकिन विवाद ही, जरा ज्‍यादा बड़ा है

हो नहीं सकता कि आपको नारद याद न हो। हिन्‍दी का पहला ब्‍लॉग एग्रीगेटर था और सही मायने में हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को एक समुदाय बनाने का श्रेय इसी मंच को जाता है। नारद के वक्त में कई विवाद भी हुए थे उनमें से एक विवाद आज के वक्‍त में सहज याद आता है। हमलोग इसे नैपकिन विवाद के रूप में याद करते हैं। एक पत्रकार ब्‍लॉगर राहुल ने दोस्‍त संजय बेंगाणी को गंदे नैपकिन जैसी किसी संज्ञा से पुकारा था...बात कई लोगों को नागवार गुजरी उन्‍होंने जिनमें हम खुद भी शामिल थे इस भाषा की आलोचना की, यहॉं तक सब ठीक था लेकिन फिर इसका अगला चरण आया जब लोगों ने गुहार लगाई कि इस गुनाह के लिए, राहुल के ब्‍लॉग को नारद से हटा देना चाहिए माने बैन कर देना चाहिए। अनेक तर्क दिए गए अधिकतर खाप पंचायती तर्क थे माने कि इससे माहौल बिगड़ता है, सजा देना जरूरी है आदि। हम तब भी इस बैन के खिलाफ थे..खूब बहस मुबाहिसा हुआ, बैन हुआ...होते होते नारद चूंकि बैनवादियों के ही प्रभाव में रहा अत: स्‍व-बैनत्‍व को स्‍वत: प्राप्‍त हुआ। उसने अपनी भूमिका अदा की थी सो अहम है पर लोकतंत्र की कसौटियों पर हारने से वह हार गया। इस एक विवाद भर के कारण नहीं पर कारणों में से एक यह भी रहा।
यह विवाद मुझे क्‍यों आज याद आ रहा है इसे समझना इतना भी कठिन नहीं है। हम लगभग एक किस्‍म के नैपकिन विवाद के ही वक्‍त में हैं। इस बार 'गंदा नैपकिन' नहीं कहा गया, 'भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी' कहा गया है। मसला एक एग्रीगेटर का नही एक पूरे विश्‍वविद्यालय का है बल्कि कहिए कि पूरे देश का है। नारद को ढहने दिया जा सकता था, बंद होने दिया जा सकता था... ऐसे लोग थे जो एक नारद के बंद होते ही (दरअसल पहेल ही) ब्‍लॉगवाणी खड़ा कर सकते थे। पर जेएनयू के बंद/बर्बाद होने से पहले या बाद में एक और एक और जेएनयू खड़ा करने का बूता फिलहाल किसी में नहीं है। देश के बंद/बर्बाद होने पर की तो कल्‍पना ही सिहरा देने के लिए काफी है। लेकिन यकीन कीजिए कि जेएनयू विवाद अपनी प्रकृति में नेपकिन विवाद से अलग नहीं है। इसका एक मजेदार प्रमाण ये भी है कि पुराने ब्‍लॉगर याद करेंगे तो मानेंगे कि उस समय के बैनवादी और आजकल के 'शटडाउन जेएनयू' वाले भी दरअसल एक ही हैं। अवसर चेतने का है, अतीत से सबक लेने का है।

सबकुछ किंतु वैसा ही नहीं है। खाप वाले तो नहीं बदले सो नहीं बदले पर जिन्‍हें हम लोकतांत्रिक मानते रहे वे भयानक तौर पर बदले हैं। जिस कचोट में यह पोस्‍ट लिख रहा हूँ उसे शेयर करता हूँ। उस नैपकिन विवाद और बाद की भी अनेक लोकतांत्रिक संघर्षों में जिनके साथ शामिल रहे उनमें से एक हैं। हम आजीवन लोकतांत्रिक मानते रहे। एक मंच के संचालन की अदना सी भूमिका में हैं। आज अचानक देखता हूँ कि इस साझे मंच (लगभग नारद की ही तरह) के सदस्‍यों की सूची से हमें अचानक गायब कर दिया गया। नहीं मंच उनके पिताजी की जागीर नहीं था कितने ही हम साझीदारों ने मिलके ही सींचा था और यहॉं कोई नैपकिन विवाद भी नहीं है। वे अभी भी लोकतांत्रिक होने के ही दावेदारों में हैं। बस फर्क इतना है कि बाकी से ज्‍यादा लोकतांत्रिक होने की होड़ में कुछ को कलम करना जरूरी था। अगर खापवाले और संगठित हुए हैं और जनपक्षीय बेशर्म होने की दिशा में हैं तो मान चलिए कि हम हारने वाली लड़ाई लड़ रहे हैं।

Thursday, February 25, 2016

सदन पटल पर विषय है, मैं खुद नहीं हूँ।

स्मृति ईरानी के भाषण पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाया हूँ न स्टेटस से न कमेंट में ही। कारण साफ है कि पक्ष वाली प्रतिक्रियाएं तो खैर भक्त टाईप हैं ही पर विरोध में आ रही प्रतिक्रियाएं उनसे व्यक्तिगत खुन्नस टाईप ज्यादा दिख रही हैं - एक्ट्रेस है, सास बहु, थिएट्रिकल है आदि...मूलत: उनके औरत होने पर। मुझे भी स्मृति पसंद नहीं कारण ये कि मैं विश्वविद्यालय शिक्षक हूँ और मानता हूँ कि स्मृति के कार्यकाल में शिक्षा के क्षेत्र में नीतिगत अनाचार बढ़ा है पर मेरी उस मान्यता से उनके संसद भाषण का विश्लेषण बहुत सही तरीका नहीं ही है। यदि हम उनके भाषण को सास-बहु, औरताना, हाथ नचाऊ आदि कहकर शेर बनते हैं तो ये बहुत सेक्सिस्ट नजरिया है जान लीजिए। 
पर एक और पक्ष है। डिबेटिंग कम से कम 25 सालों से मेरा पैशन रहा है, पहले एक डिबेटर के रूप में फिर एक शिक्षक के रूप में। उस लिहाज से कह सकता हूँ कि डिबेटिंग के तीनों एम यानि मैटर, मैथड, मैनर से परखें तो साफ है कि उनकी डिबेट सदन को संबोधित नहीं थी उसकी ऑडिएन्स सदन से बाहर थी, मैटर में आपको कमजोर लगेगी, थी भी पर जिन्हें संदेश देना था उनके लिए उसमें मैटर था...मैनर/मैथड के लिहाज से ये कोई एतिहासिक डिबेट नहीं थी औसत थी। हम डिबेटिंग के दिनों में जिन्हें प्रवाहजीवी डिबेटर कहते थे, स्मृति वैसी तो रहीं ही यानि फ्लो, फट्टों और उतार चढ़ाव से प्रभावित करने वाले। यद्यपि मुझसे कोई पूछने नहीं जा रहा पर मैं ज़जमेंट कर रहा होता तो मैटर के 5, मैथड के 5.5 मैनर के 6 कुल तीस में से 16.5 ! प्रोत्साहन पुरस्कार । लेकिन हूटिंग करने वालों को पक्का सदन निष्कासन smile emoticon 
‪#‎smriti‬

एक स्‍त्रैण कविता

कविता से अपनी
कविता से तमाम दुनिया की
मैं हटा देना चाहता हूँ मर्द कविताएं
इनसे नोच लेना चाहता हूँ
(देखा मर्द बिना नोचे कविताएं तक नहीं जन्‍मते)
सारी मर्दानगी
इनमें घोलना चाहता हूँ
खुद को
ऑंसुओं को अपने
हया औ शर्म अपनी
सपने अनदेखे वर्जित
मुझमें जो कुछ जितना कुछ स्‍त्री है
प्‍यार में अपने, पुलक सा
मिला देना चाहता हूँ
कविता-मर्द में ।।
हरेक कविता को मैं बना देना चाहता
स्‍त्रैण जितना हो सके
कैसे कहूँ कि कितना जरूरी हो गया है ये
जब से कविताएं औरतों की
बधिया हुई हैं।

Monday, February 22, 2016

पराजयाकांक्षा




अकेले अंधेरों से युद्ध
आज फिर हारने का है मन।

हैं सवाल दर सवाल, और सवाल चाहिए

आज़ादी की लड़ाई में शामिल होने का अपना रूमान है।  इस लड़ाई में उपस्थिति भले ही चंद लाइक या स्टेटस से ही क्यों न हो क्रांतिकारी होने का भ्रम देती है। मुझे देती है तो माने ले रहा हूँ औरों को भी देती होगी। लेकिन आज़ादी क्या केवल इतने से हासिल होती है।  क्या इसमें आज़ाद करना शामिल नहीं है। मसलन हम सहज ही चाहते हैं कि व्यवस्थाएं और तंत्र तथा दूसरे लोग असहमतियों का सम्मान करें। खासकर हम व्यवस्थाओं से तो असहमतियों के प्रति सम्मानपूर्ण होने की अतिरिक्त अपेक्षा रखते हैं।  कुछ लोगों के असहमति को नारों या कुछ पैंफ्लेट्स से सामने रखने का सवाल हो या कश्मीर आज़ादी की मांग, हम चाहते हैं कि इसे सुना जाना चाहिए, न मानने लायक हो तो भले ही न मानें, पर उन्हें कहने और सुने जाने का पूरा हक़ है भले उनकी बात कितनी ही विचित्र व अस्वीकार्य क्यों न हो।
यहां तक बात एकदम ठीक है ऐसा होना चाहिए। यह भी सच है कि हमारी व्यवस्थाएं फिलवक्त ऐसी हैं नहीं।  सवाल अब ये है कि ऐसा क्यों नहीं ही। जवाब आसान है, ऐसा नहीं है क्योंकि हमने उन पड़ावों को पार किया ही नहीं कि यह लोकतांत्रिकता उन तक पहुँच सके।  व्यक्ति से समाज और उससे ही तंत्र तक मूल्य पहुँचते हैं अन्यथा आप लाख संरचनाएं खड़ा कर लीजिये वे निरर्थक रहती हैं। 
यानि सवाल इतना भर है कि हम खुद कितना लोकतांत्रिक हैं, हम खुद पर सवालों को, खुद से असहमति को कितना स्वीकार व स्वागत भाव देते हैं। यदि हम खुद को अप्रश्नेय मानते हैं लेकिन रोहित वेमुला, कन्हैया, दलित, स्त्री और न जाने किस किस मोर्चे पर तंत्र को आड़े हाथ लेते हैं कि वह असुविधाजनक आवाजों को दबा रहा है तो हम दरअसल पाखंडी हैं।  क्योंकि यदि असहमति के स्वरों पर हमारी प्रतिक्रिया इस बात से तय होती है कि हम सत्ता समीकरण में किस ओर हैं तो ज़ाहिर है दुसरे पक्ष को भी इसी आधार पर आपकी असहमति को दबाने का पूरा नैतिक आधार है।  जब आपकी पत्नी आपके लंपट आचरण पर हल्की सी आपत्ति रखे या कोई सवाल उठाये तो आप उसे किनारे कर लतिया दें, या खारिज कर दें पिछड़ा घोषित कर दें,  या जो आपके बस में हो वो सब करें फिर जब सरकार किसी मुद्दे पर आपके या जनता के साथ ऐसा करे तब उम्मीद करें कि आपके आचरण को व्यक्तिगत मानकर अप्रश्नेय समझा जाए और सरकार के आचरण पर नुक्ताचीनी हो पाये तो आप एक भयंकर भूल कर रहे हैं।
हमने जो परिवार, धर्म, समाज की संरचनाए खड़ी की वे सब और बाद में शिक्षा और राज्य जैसी संरचनाएं जो विकसित हुईं वे सब सवालों को कुफ़्र मानती हैं ऐसे में खुद को इन संरचनाओं के खिलाफ संघर्षरत समझने वाले किसी आसमान से तो आएंगे नहीं वे भी भले बाकी किसी भी ढाँचे पर कितने सवाल उठाने की आज़ादी चाहें खुद पर सवाल नहीं चाहते।  हर सवाल को खारिज करते हैं। ऐसे क्रांतिकारी न्यायवादियों से न्याय को बचाना बेहद जरूरी है।

Tuesday, February 16, 2016

रकीब के पक्ष में तैनाती: महबूब जो न करा दे सो कम

वक़्त कैसे कैसे दिन दिखाता है, किसे पता था कि जिस जेएनयू को सदा रकीबी नज़र से देखा, हर जेएनयू वाले को जब मौका मिला याद दिलाया कि लाख अच्छा हो पर जेएनयू इस शहर के साथ अपने व्यवहार में टापूवादी है। उसी जेएनयू के पक्ष में दम लगाउंगा। मेरे विद्यार्थी कन्फ्यूज़ न हो जाएं इसलिए इस रकीब पर उमड़ते प्यार की सफाई दी जाए। 
मेरा प्यार अपनी इस जान दिल्ली शहर से है सो है उससे कोई बेवफाई नहीं। जेएनयू में टापू रहकर बनने की एक बीमारी रही है माने शहर के दुःख दर्द में फिलॉन्थ्रोपी टाइप या मुद्दे के समर्थन में जेएनयू कैम्पस से शहर की ओर निकलता है कभी कभी पर वो अपनी पहचान को शहर से एकात्म नहीं करता, जैसे चांदनी चौक करता है, मेरा दिल्ली कॉलेज (ज़ाकिर हुसैन) या दिल्ली विश्वविद्यालय करता है। जेएनयू मुनीरका भर को अपनी पहचान में जुड़ने दे तो दे वर्ना वो एक टापू होना ज्यादा पसंद करता है। 
ये न समझें कि इस बेरुखी का मतलब है कि दिल्ली भी उसे तन्हा छोड़ देती है, न जी मेरी महबूबा इस जेएनयू को न केवल भरपूर तवज्जो देती है बल्कि दरअसल उस पर जान छिड़कती है। (तो महबूबा के आशिक़ होने की वजह से जेएनयू हुआ न रकीब) इस तरह यह शहर इस टापू को अपनी पहचान में बाकायदा शामिल मानता है और सच्चाई तो यह है कि जेएनयू को जेएनयू होने, बने रहने देने में इसके दिल्ली में होने की बड़ी भूमिका है और अब यह दिल्ली के लिए भी एक परीक्षा की घडी है कि उसकी इस पहचान पर जो संकट है, उसे यह सहारा दे। चाहे खुद जेएनयू में कितनी ही बेमुरव्वती क्यों न दिखाई हो लेकिन ये दिल्ली की अपनी ग़रज़ है कि वह कुक्कुटों को इस खूबसूरत चमन को बर्बाद न करने दे। 
तो मैं जेएनयू के लिए उतना नहीं अपने महबूब दिल्ली शहर के लिए ज्यादा इस बेचैनी में हूँ। 
लेकिन अब एक सवाल उनके भी लिए जिनका जेएनयू से रकीब का नहीं महबूबा का रिश्ता है, सोचो दोस्तो अगर ऑक्सफ़ोर्ड या कैंब्रिज पर यह हमला होते तो उनके शहर अपने विश्वविद्यालय को तन्हा छोड़ देते क्या? आपने अपने पूरे देश समाज से प्यार किया है लेकिन खुद दिल्ली शहर से वो नाता नहीं बनाया। जब इससे भी ज्यादा नृशंस ताकतों ने दिल्ली कॉलेज को बंद कर दिया था तो यह शहर पूरी ताकत से इसके पक्ष में आ खड़ा हुआ था, दिल्ली की मोहब्बत जेएनयू पर बरकरार है पर इकतरफा मोहब्बत ज्यादा इम्तिहान लेती है, इस शहर की मोहब्बत को लौटाने की जिम्मेदारी लो जेएनयू वालों।

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Thursday, February 11, 2016

कीवर्ड कविता

आलीशान डेटा सेंटरों के सर्वर
उछालते हैं
चंद फूहड़ असंगत शब्द
ट्रेंड्स-
मल्लिका शेरावत, उगाड़ी, डीवार्मिंग
नारायण खेद, वुशू , सन्नी लियोन
मानो समस्यापूर्ति एल्गारिदम्स की
गूगल कवि पहेली सुलझाता
हगता है एक कीवर्ड कविता
लिंक, इमोटिकॉन्स, एसईओ, सीएसएस से लैस
आलोचक कब के फना हुए
पेजरैंक में भला क्यों पिटेगी
कीवर्ड कविता

Wednesday, February 10, 2016

हाट की कविता

शब्दों के हाट से उसने
चंद शब्द मोल लिए
बदले में दिया थोड़ा सा खुद को
हाट के कारीगर को सौंपे वे शब्द
उसने गढ़ दी कविता
मेहनताने में दिया थोड़ा और खुद को
कविताओं को लिए टोकरी में फिर
वो खुद जा बैठा हाट में
खुद जो खुद से थोड़ा कम था
हाट की कविता के बदले
अब वो लेता है न जाने क्या
खुद लेकिन पूरा फिर से नहीं होता

Friday, February 05, 2016

चुस्कियोँ की राहजनी

कायदे से होना तो नहीं चाहिए
कुछ तय चाय के प्यालों का
न घट पाना
ऐसा भी क्या है कि
कविता का विषय हो जाए
उम्र की ढलती सांझ पर ली जानी थी चंद चुस्कियॉं
शिखरों की यात्राओं के हाथोँ हुई
ये राहजनी
ऐसा भी गिने जा सकने लायक गुनाह नहीं
थी मेरी यही कुल पूंजी, तो हुआ करे।

Wednesday, February 03, 2016

अनाथ शब्द

बियावान में भटकते
आकाशगंगाओं परे जाते
सरहदों की बाड़ के कॉंटों में उलझे
हिमस्खलनोँ के नीचे दबे
हर टूटे पुल से लटके
अपने सभी अनाथ शब्दों को
जिनकी मोमदार रस्सी से
निरपराधों को लटकाया गया
मैं एतद द्वारा इन्हें बुलाता हूँ अपनी गोद
स्वीकार करता हूँ इनका स्वामित्व
प्रस्तुत हूँ
तारीखी इंंसाफ के लिए।
क्योंकि दुनिया का कोई शब्द
त्रिशंकु नहीं होना चाहिए
चुप्पियों के ब्रह्मांड
बनने से कहीं पहले रोकने जरूरी हैं

Sunday, January 31, 2016

अन्‍ना कैरेनिना को मैंने नहीं मारा

हत्‍यारों की सूची
जो टँकी है चौराहे के नोटिस बोर्ड पर
उसमें मेरा भी है नाम।
हैरान हूँ मैं क्‍योंकि मैं जानता हूँ बिला शक
कि मैंने नहीं मारा था गाँधी को।
उस उदास रामदास को भी
हाथ तौलकर चाकू मैंने नहीं घोंपा था।
यूँ हत्‍याएं अब तमगा हो गई हैं
जो बायो डाटा में काबिले जिक्र हों
और जिनसे मिलें तरक्‍की
इसलिए
मुझे हत्‍यारा होने के अंजाम की फिक्र उतनी नहीं
जितनी मुझे चिंता है
हलाक को जानने की।
कितनी ही हत्‍याओं का गवाह मै
चीह्नता रहा
हर बार खुद को ही
अगले शिकार के रूप में
अब सुना मैं हत्‍यारा हो गया
नोटिस का मजमून कहता है मैंने मारा है
वक्त की सात नदियाँ
जमीं के सात पहाड़ पार
नीले सर्द होंठों वाली
अन्‍ना कैरेनिना को
सुनो
अन्‍ना कैरेनिना
मैं लेविन न ब्रांकी
आत्महत्या न भी मानो उसे तब भी
मेरे पास न तर्क न पैरवीकार
कहने का कुछ लाभ नहीं
पर फिर भी
सुनो मेरे प्‍यार
तुम्‍हारे होंठों की कसम
वो मैं नहीं था।

Saturday, January 30, 2016

कीला काटी

कविता में नहीं इसे तो गद्य में ही लिखना होगा, कविता में लिखता हूँ जब खुद को खोने के लिए लिखना होता है, खुद को खोने के लिए। कभी कभी मुझे कविता लिखना बचपन का किल्‍ला काटी का खेल सा लगता है, अबूझ खेल था और मैं उसका अबूझ खिलाड़ी था। इसमें होता ये है था कि दो दल अलग अलग जगहों पर एक तय वक्‍त तक लकड़ी के कोयले या खडि़या से छोटी छोटी लाइनें डालते थे खूब छिपाकर, फिर वकत पूरा हो जाने पर दूसरा दल उन्‍हें खोजकर काट देता था, जो वो खोज नहीं पाते थे, उन्‍हें ही गिनकर जीत हार का फैसला किया जाता था। मैं अजीब खिलाड़ी इसलिए था कि मैं खूब छिपाकर ये कीलें बनाता लेकिन जब दूसरा दल नहीं भी खोज पाया होता था तब भी मैं बताता ही नहीं था कि उस कोने में, वहॉं उस ईंट के नीचे भी अपने खजाने को छिपा रखा है मैंने... जीत के लिए नहीं था मेरा खजाना। कविताएं भी ऐसे ही हैं खूब छिपाकर लिखता हूँ..लिखते हुए किसी को दिख जाए तो लगता है चोरी पकडी गई... लिखने के बाद भी लगता बस लिखना भर हो गया न। दरअसल लिखने से खुद को उसमें छिपा देने जैसा लगता है कभी आड़े वकत जब मैं खुद को मिल नहीं रहा होउंगा तो इस पाले में आकर अकेले अपनी खडि़या की खींची कीलों सी रेखाओं में अपने कीला काटी में खुद को पाने की कोशिश करुंगा।

Tuesday, January 19, 2016

मैं वहाँ नहीं था

मैं वहाँ नहीं था
जब ढो रहा था वो अपना सलीब
मैं वहां नहीं था
आखिर क्यों नहीं था मैं वहां
उसके हत्यारे पूछते हैं।
जब सबसे कमज़ोर थी तुम
खोजती थीं मुझे
तब मैं वहां नहीं था
आखिर क्यों नहीं था मैं वहां
कातर तुम्हारी चुप्पियाँ पूछती हैं
दर्द के ग्लेशियर पिघलकर
जब बन प्यार की नदी
आ टकराये थे तराई के पत्थरों से
तब मैं वहां नहीं था
पूछते हैं बेबस झूले वाले पुल
मैं था क्यों नहीं वहां
मैं वहां नहीं था
क्योंकि मैं था यहीं
पथरायी प्रतीक्षा में
प्रतीक्षा में थिर हो
जम जाना
शायद कुछ न हो जाना है।
वहां न होना
कुछ न होना ही है

Sunday, January 17, 2016

रचने ही होते हैं पुतले

सिर्फ तमाशा नहीं है
पुतलों को फूंकना
धूं धूं फुंकते देखना
हर वक़्त को
हर देश को
हर मन को चाहिए होते हैं पुतले
कि दुश्मन के बिना
बहुत मुश्किल है
अनचाहे सवालों को दफन करना
नेस्‍तनाबूद कर पाना
भीतर उगते
प्रवंचनाओं के किलों को।
नफरत संग्रहणीय हो जाए तो
प्‍यार के पुतलों का दहन
रोजमर्रा जरूरत हो जाता है।

Wednesday, January 13, 2016

आजादी मेरा ब्रांड- पढने के लिए हिम्‍मत जुटान

किसी भी स्‍त्री की कहानी पढ़ते हुए मुझे डर लगता है खासकर अगर कहानी में कोई सच्‍चाई हो, पुरुषों को स्त्रियों की कहानी से डरना ही चाहिए क्‍योंकि स्‍त्री की हर कहानी एक आरोपपत्र होती है, मुझे तो लगती है अपने पर। Anuradha Saroj की यायावारी आवारगी भी मैं तीन बार में कोशिश करके खरीद सका पहले दो बार राजकमल जाकर वापस आ गया, हिम्‍मत नहीं हुई...तीसरी बार बिटिया (तेरह साल) को साथ ले गया उसीसे खरीदवा ली... अनुराधा के बारे में जितना पता था वो उसे बताया और उसने -वाउ.. से अनुराधा का स्‍वागत किया..मैं भी ऐसा ही ट्रेवल करुंगी का घोष भी। दावे से नहीं कह सकता पर शायद अच्‍छा लगा।
अभी किताब को पढ़ना शुरू करना बाकी था और मुझे पता था ये मुश्किल होने वाला था...औरत की आज़ादी से हम सब डरते हैं। कहना मुश्किल है कि ये मेरा ही भय है कि किसी और के भी साथ ऐसा कुछ होता है लेकिन मुझे ज्ञात से भी भय होता है अज्ञात से दुनिया डरती ही है। मुझे पता था कि अनुराधा ने किताब में यात्रा को आ़जादी का रास्‍ता बनाया होगा और आज़ादी के साथ ही वो सब भी होगा ही सही मायने में औरत को गुलाम बनाता है... ये है तो आरोप जमाने पर ही पर इसी लिए मुझ पर भी है, होना ही चाहिए। मैं इसीलिए किताब पढ़ने से डर सा रहा था,  फिर से अपनी मिष्‍टी का ही सहारा लिया...मिष्‍टी तुमने किताब पढ़नी शुरू की ? आजा़दी मेरा ब्रांड, फेवरेट खोलकर दी... इतनी हिंदी की उसे आदत नहीं पर कोशिश की..लेकिन पेट में तितलियॉं उड़ने पर आकर अटक गई... अब हिम्‍मत का मौका मेरा था...लाओ मैं रीड करता हूँ...फिर मैं पढ़ने लगा... लड़को के साथ सोने के प्रकरण को कब डरपोक बाप 'लड़कों के साथ होना' पढ़ गया मुझे पता ही नहीं चला.. मिष्‍टी अब दूसरे कमरे में चली गई है और मुझे मालूम है कि आजादी का हर लफ्ज मुझ पर एक सवाल है पर मिष्‍टी के लिए जो दुनिया चाहिए उसके लिए जरूरी है कि सवालों से मुँह न मोड़ा जाए... इसलिए किताब पूरी तो पढ़ी ही जाएगी विद पेट में तितलियॉं...
अनुराधा मिष्‍टी की रमोना हो

Tuesday, January 12, 2016

लिखना दरअसल मिटाना है होने को

जब जब लिखता हूँ कुछ
लगता है मिटा रहा हूँ सबकुछ
वह सब मिटता है 
जो मुझे लिखना था दरअसल
मुझे लिखना था मैं, और लिखना था तुम्‍हें
किंतु कविता के ढॉंचें में अँटा नहीं मेरा अहम
कहानी में तुम अकेले आ नहीं पाईं
और पात्रों ने तुम्‍हें तुम रहने न दिया
निबंध औ उपन्‍यास भी थके से लगे पराजित
विधाएं दगा करती हैं
जब तुम पर या कि
खुद पर चाहता हूँ कुछ लिखना।

लिखने की कोशिश
शब्‍दों के दर्प यज्ञ में आहूति है बस
वरना
कविता भी भला सच कहती हैं कभी

Monday, January 04, 2016

मैं तीसरा पराजित पक्ष हूँ

तुम्‍हारा सच
तुम्‍हारा झूठ
तुम्‍हारी तलवार
तुम्‍हारी ढाल
तुम्‍हारी ध्‍वजा
तुम्‍हारी यलगार
दुर्ग तुम्‍हारे
युद्धनाद तुम्‍हारे
विजय तुम्‍हारी
विजित तुम्‍हारे
संदेश तुम्‍हारे
तुम्‍हारे हरकारे

तुम्‍हारे इस एकाकी समर में,
मेरा प्रेम
तीसरा पराजित पक्ष भर है।
वो न बिगुल है न हथियार
वो युद्ध-संधियों की इबारत में भी
नहीं है दर्ज।

इस पक्ष का
यह संख्‍यावाचक विशेषण भी
मेरा चुनाव नहीं है
पराजय मेरा कुल हासिल है
इस विक्षत बेगाने युद्ध में।

तुम्‍हारी देह पर
वैजयंती से सजे युद्धघाव तक
मुझे ही आहत करते हैं
रहे तीसरे पक्ष के अनदेखे घाव 
किंतु वे दर्ज  होते नहीं
यद्धों के इतिहास में।

Saturday, January 02, 2016

कॉंच के बुतों के ऑंसू

बहुत मुश्किल है
साफ रहना लेकिन बुत न होना
कॉंच के बुतों के इस शहर में
पारदर्शी नहीं
नफरत से भरे होते हैं ये बुत
सामने हों भले कि ये देखते हैं आपके आरपार
गोकि
आपका होना ही है अस्वीकार
रोको लेकिन
नहीं बहने चाहिए
कॉंच के बुतों के खारे ऑंसू
नमक सच को धुंधला करता है।

Friday, January 01, 2016

'क्‍लेमिंग द स्‍पेस': किंतु क्‍लेमोपरांत स्‍पेस वही रहता कहॉं है ?

'क्‍लेमिंग द स्‍पेस' उदार लोकतंत्र का एक बेहद चलता मुहावरा है हम इसके अक्‍सर पक्षधर रहे हैं। मसलन जब दिल्‍ली बलात्कार कांड के बाद स्त्रियों ने क्‍लेमिंग द अरबन स्‍पेस की मुहिम चलाई या फिर दलित व अन्‍य वंचित वर्गो द्वारा उन स्‍पेसों को क्‍लेम करने की बात होती है जो परंपरागत रूप से वर्चस्‍व प्राप्‍त वर्ग के पास रहे हैं तो यह क्‍लेमिंग द स्‍पेस इतनी जायज लगती है कि हम जीभर इसका समर्थन करते हैं भाषा में भी और सड़कों पर भी। इसी तरह स्‍पेस क्‍लेम या रीक्‍लेम करने की कवायद में जो अपने हक के लिए संघर्ष करने छटपटाहट छिपी है वह काम्‍य ही जान पड़ती है।
लेकिन स्‍पेस क्‍लेम करने की हर कवायद सदैव ऐसी ही छटपटाहट से भरी जरूरी नहीं। कभी कभी याद आता है कि कैसे स्‍कूल में जब सीट साझा करने वाले पक्‍के दोस्‍त से कुट्टी होती थी तो डेस्‍क पर अपना हिस्‍सा क्‍लेम करना मुझे एक सबसे मुश्किल कामों में से लगता था, मैं दरअसल सीट छोड़कर कहीं पीछे अगर मिल जाए तो अकेला बैठना ज्‍यादा पसंद करता था। माने जो हमारे स्‍पेस पर जम कर बैठा आतताई है उससे अपना स्‍पेस लड़कर लेने में जो उदात्‍तता है वो इस क्‍लेमिंग द स्‍पेस में हर जगह मौजूद हो जरूरी नहीं।
फिर स्‍पेस उतना भौतिक बचा भी नहीं तो नहीं। मसलन वर्चुअल स्‍पेस को लो, फेसबुक पर हमारी वॉल कितना हमारा स्‍पेस है कितना वह उन मित्रों उनके लाइक कमेंट उनकी वॉल आदि से मिलकर बनी एक समन्वित शै है यह वँटवारा कितना तो मुश्किल है। हमारा ब्‍लॉग हमारी पोस्‍टों से बनता है कि ढेर कमेंट्स और पुरानी पोस्‍टों के इतिहास से यह तय होना कठिन है ऐसे में कोई अपने वर्चुअल स्‍पेस को क्‍लेम करने में कितने दूसरे स्‍पेसों तक अपनी चेष्‍टा को पहुँचाता है इसका निर्धारण आसान नहीं है।
यह सब कहने का मतलब मात्र इतना है कि स्‍पेस पर दावा ठोंकने से पहले हमें यह जरूर समझना चाहिए कि कोई भी स्‍पेस सिर्फ हमारा नहीं होता हम उसे कितना भी निजी स्‍पेस क्‍यों न मानते हों। स्‍पेस की अपनी भी एक स्‍वायत्‍तता होती है तथा एक संतुलन भी। क्‍लेम्‍ड स्‍पेस इस दावे से पहले जो होता है वह इस दावे के बाद ठीक वही नहीं रह जाता। मसलन दोस्‍त और मेरी साझा डेस्‍क का संतुलन जो पहले था वह जब पूरी तरह दोस्‍त के 'कब्‍जे' में आ जाता है तो वही नहीं रह जाता जैसा हमारे संयुक्‍त दावे में हुआ करता था। अब अगर डेस्‍क पर दावे के वक्‍त यह ध्‍यान ही न रखा जाए कि जिस पर दावा किया जा रहा है वह मिल जाने भर से वह रह ही नहीं जाएगा जो अब है तो फिर ऐसे दावे का क्‍या लाभ।
मेरा जंतर आसान है अगर स्‍पेस पर क्‍लेम व्‍यक्तिगत रूप से अपने लिए है तो मुझे ये स्‍पेस क्‍लेम करने की क्रिया फूहड़ जान पड़ती है जबकि अगर स्‍पेस व्‍यक्तिगत रूप से अपने लिए नहीं बल्कि यह एक व्‍यापक जाति का स्‍पेस है तो दमभर इस पर दावा जरूर करना चाहिए। इसी तरह कोई व्‍यक्ति या समूह आपके जायज स्‍पेस से अपदस्‍थ करे तो भले आप डटें लेकिन अगर कोई अपना साझे स्‍पेस पर दावा ठोंके तो उस पर जिद करना निरर्थक है। मैं सालों तक जिस दोस्‍त के साथ स्‍कूल में बैठा उससे हर लड़ाई के बाद चुपचाप अलग जा बैठने का लाभ यह था कि फिर  से कुट्टी से अब्‍बा होने पर न कभी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा न माफी मॉंग लेना इतना मुश्किल हुआ।