Tuesday, December 16, 2014

साकी पीए तो बने मधुशाला

मन की बात में मोदीजी ने इस बार नशे को अपना निशाना बनाया है, बहुत निरापद सी बात लगती भी है, नशा अंतत: एक व्यसन है तथा इसके कोई लाभ हमारे जाने हैं भी नहीं। हॉंलाकि यह भी अहम है कि हमें इतिहास का ऐसा कोई कोना ज्ञात भी नहीं है जहॉं नशा मौजूद नहीं था, नही ही हम तारीख के ऐसे किसी मोड़ को ही जानते हैं जब आम लोग नशे की बुराइयों से ऐसे अपरिचित हों कि उन्हें किसी शासनाध्यक्ष द्वारा इसकी जानकारी दिए जाने की जरूरत महसूस हो।

लोग अक्सर शराब से बरबाद हुए घरों के दास्ताँ सुनाते हैं इसे पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता किन्तु मुझे लगता है इसकी वजह यह द्रव्य स्वयं में उतना नहीं है जितना शराब पीने की हमारे यहाँ की प्रचलित व्यवस्था है। स्कूल कॉलेज के होस्टलों की बीयर पार्टियों से लेकर गली मोहल्ले के अँधेरे कोनों की देसी दारु बैठकों तक हमारे यहाँ शराब पीना लगभग पूरी तरह एक मर्दाना स्पेस है बल्कि मर्दवाद की नर्सरी है। शराब के घूँटों के साथ चलने वाली बातें लगभग पूरी तरह स्त्री विरोधी तथा मर्दवादी अहम् को ग्लोरिफाई करने वाली होती हैं ... घर पहुंचकर होने वाली चीखपुकार व हिंसा तथा पत्नी पिटाई शराब के नशे के प्रभाव में शायद कम होती और इस कोचिंग ओवर अ ड्रिंक के नशे में ज्यादा होती है। शराब बुराई है तो किसी को नहीं पीना चाहिए किन्तु यदि इस स्वर्ग को पाना कठिन हो तो शराब पीने की संस्था व स्पेस का डी जेण्डरीकरण किया जाना चाहिए। औरत मर्द को साथ पीने दें ये सिर्फ मर्दों के वेवड़ेपन से कम नुकसानदेह रहेगा। शराब को अँधेरे कोनों से निकालिये भले ही घर में आने देना पड़े।

Friday, November 28, 2014

परिवार (शाला) भंग कर दो

आप किसी विचार या सरणी में यकीन रखते हों तो जरूरी नहीं कि  उसकी हर केनन से सहमत ही हों।  मसलन समाज में स्‍त्री अधिकारों का सवाल मुझे अहम लगता है इससे मेरा जुडा़व तथा सहमति भी है। स्‍त्री विमर्श में घरेलू श्रम को उत्‍पादक मानने की एक बेहद लोकप्रिय धारा है। इनका मानना है कि घरेलू स्त्रियॉं (हाउसवाईव्‍स) को काम नहीं करती नहीं माना जाना चाहिए.. फिर इसके पक्ष और अनेक सिद्धांत भी हैं जैसे उनके द्वारा सुबह से शाम तक किए जाने वाले कामों का आर्थिक  मूल्‍य लगाकर ये सिद्ध किया जाता है कि देखिए इस काम को कामकाजी स्त्रियों से तुलना करके देख लें वगैरह वगैरह। इसके ही समानांतर परिवार संस्‍था का महिमामंडन व इसके लिए हाउसवाईव्‍स का त्‍याग वगैरह भी गिनाया जाता है। ये सारे तर्क खारिज किए जा सकने वाले नहीं हैं न ही किसी के घर पर रहकर परिवार का पालन करने की पसंद (च्‍वाइस) या मजबूरी को उसके अपमान या शोषण का आधार बना सकने की कोई वकालत ही कर रहा हूँ। अपने ही परिवार व पास पड़ोस के अनुभवों के आधार इसे भी स्‍वीकार करता हूँ कि हाउसवाइफ होना बिना मेहनत का काम नही है।  किन्‍तु...
और ये किंतु एक बड़ा किंतु है। किंतु ये कि ये घरेलू श्रम अक्‍सर स्‍त्री विरोधी तथा स्‍थापित संस्‍थाओं को मजबूत करने में अधिक इस्‍तेमाल होता है। परिवार और पितृसत्‍ता के जितने भी मानक हैं उनमें से किसी से भी टकराने के लिए जिन औजारों की जरूरत है वे इन स्त्रियों के पास आसानी से उपलब्‍ध नहीं हो पाते। घरेलू स्त्रियॉं 'बाय च्‍वाइस' घरेलू हैं ये भी अधिकतर एक भ्रम ही होता है क्‍योंकि सजग रूप से इन विकल्‍पों पर बराबरी के साथ कभी विचार हमारी परिवार संरचनाओं में संभव ही नहीं होता... शिक्षा, अवसर या आत्‍मविश्‍वास की कमी, पति के पास पहले से रोजगार का होना  और सबसे बड़ा- बच्‍चों का होना अक्‍सर वे बेरिएबल होते हैं जो स्त्रियों को घरेलू बनाते हैं और फिर इनसे जूझते जूझते इन स्त्रियों के साथ ठीक नहीं होता है  जो काफ्का की कहानी मेटामारफोसिस के पात्र के साथ होता है यानि एक तरह का काम करते करते आप खुद ही कायांतरित होकर वेसा ही कुछ बन जाते हैं- काफ्का का पात्र खुद कॉ‍करोच बन जाता है। इसी पर आधारित 'एक चूहे की मौत' में ये और सजीवता से व्‍यक्‍त होता है जब चूहेमारी करते करते ख्‍ूहेमार खुद चूहा बन जाता है। आशय यह है कि हो सकता है कि कुछ सपने पाले युवती को लगे कि बस पति का शुरूआती जिंदगी में साथ देने के लिए अभी घरेलू कामकाज सही पर फिर धीरे धीरे यही जीवन रेगुलेरिटी में आता है तथा यही घरेलू स्‍पेस ही इसका मानसिक स्‍पेस भी बन जाता है और फिर सीमा और पहचान भी। सोच का दायरा फिर वही हो जाता है तथा चूंकि यह स्‍पेस बेहद जेंडर्ड स्‍पेस है अत: उसकी सोच भी न केवल इसी दायरे में बंद होती जाती है बल्कि जाने अनजाने सारी ताकत इसे दृढ़ करने में लगती है।  मेरा परिवार, मेरे बच्‍चे, मेरी रसोई मेरा घर...  यकीनन इनमें भी खबू ताकत व श्रम लगते हैं तथा इन्‍हें अगर भुगतान करके करवाया जाए तो धन भी लगेगा किंतु जब घरेलू स्‍त्री इनमें श्रम व जीवन लगाती है तो यह श्रम परिवार को समतामूलक बनाने में नहीं लग रहा होता, ये इस मायने में उत्‍पादक भी नहीं होता कि अर्जन व व्‍यय की समता ला सके सबसे खतरनाक ये कि यह लगभग सदैव चली आ रही स्‍त्री विरोधी संरचनाओं को पुष्‍ट करने तथा इसे अगली पीढ़ी में स्‍थानांतरित करने में अहम भूमिका अदा करता है। कामकाजी व घरेलू महिलाओं के बीच की कटुता व संघर्ष जो चहुँ ओर सहज दिखाई देती है इसका ही उदाहरण है।  (मॉंओं  के)  लाड़ प्‍यार में पाली गई संतानों का अधिकाधिक डिपेंडेंट होना तथा ज्‍यादा 'पुरुष' या 'स्‍त्री' टाईपबद्ध होना भी इसका ही परिणाम है।

स्‍त्री के घरेलूश्रम की आ‍र्थिक गणना करने से कुछ नहीं होगा या तो इसे मोनेटाइज करना होगा... यानि वाकई काम को आउटसोर्स किया जाए कोई और पेशेवर तरीके से इसे करे तथा इसके भुगतान का जिम्‍मा साथ कमाकर किया जाए, दूसरा तरीका यह है कि यदि घर के ही लोगों में इसका वितरण होना है तो काम को पूरी तरह डीजेंडर्ड किया जाए तथा बराबर बॉंटा जाए ये तभी संभव है जब बाहर के काम को भी इसी तरह बॉंटा जाएगा। आसान भाषा में कहें तो स्‍त्री शोषण की मूल भूमि परिवार की संरचना है तथा स्‍त्री के घरेलू रहते इसे पुनर्संरचित किया ही नहीं जा सकता है। घरेलू स्त्रियॉं इस गैरबराबरी को बनाए रखने के लिए पितृसत्‍ता का सबसे मजबूत औजार हैं।  सबसे अहम है कि घरेलू कामकाम को ग्‍लोरिफाई करने से बचा जाए। स्‍पेस डीजेंडरिंग जिसमें मेंटल स्‍पेस शामिल है की शुरूआत घर की जिम्‍मेदारी (व कब्‍जा) सिर्फ औरतों को न देने से ही हो सकती है। परिवार की स्त्रियों का कामकाजी होना कोई अपने आप में पितृसत्‍ता का घोषणापत्र नहीं है किंतु इसका अभाव पितृसत्‍ता का विजयघोष अवश्‍य है। 

Thursday, October 30, 2014

प्रेम रहे अपनी जगह पर, परिवार किंतु लोचा ही है

इस माह हमने अपने विवाह को बीस साल पूरे हाने के अवसर पर ढेर शुभकामनाएं बटोरीं।  फेसबुक पोस्‍ट यूँ थी - 

बीस बरस हुए आज साथ रहते हुए।। हम कोई आदर्श युगल नहीं हैं, गनीमत है नहीं हैं। ये सीधा सादा कॉलेज रोमांस था जो बहुत थोड़े से ड्रामे के बाद शादी में तब्‍दील हुआ, आज के पैमानों पर कहें तो बोरिंग भी कह सकते हैं। असल कहानी उसके बाद शुरू होती है। मुझ जैसे औघड़ टाईप के साथ रहना निबाह ले जाना खुद मेरे लिए ही मुश्‍िकल होता पर नीलिमा इसे बखूबी कर रही है बीस सालों से। शादी का मसला जब मेरी मॉं के पास पहुँचा तो मुझे कहा गया अभी बच्‍चे हो (कुल जमा साढ़े इक्‍कीस था तब मैं) हम मना थोड़े ही कर रहे हैं जब थोड़ा सेटल हो जाओ कर लेना नीलिमा से ही शादी... हमने कहा कि शादी साथ साथ संघर्ष के लिए करना चाहते हैं, भेाग के लिए नहीं।
शायद ज्‍यादा आदर्शवादी कथन था पर सच है कि पिछले बीस सालों में सबसे आनंद के क्षण, स्‍मृतियों में उकरे हुए क्षण यही संघर्ष के क्षण हैं। एमए/एमफिल/पीएचडी/बेरोजगारी/नौकरी/ब्‍लॉगिंग सब साथ साथ। मेरा सामंती होना कोई ऐसा सीक्रेट नहीं है कि संधान करना पड़े न ही इसे स्‍वीकार कर लेना इसका समाधान है... पर थ्री-इडियट के डायलॉग ''अपने सबसे कमजोर स्‍टूडेंट का साथ मैं कभी नहीं छोड़ता'' की तर्ज पर नीलिमा ने न मेरीे सामंतीयता को नियति मानकर स्‍वीकार किया, न उसके लक्षणों को इंगित करना ही छोड़ा। हमारा प्रेम शायद एक-दूसरे के परिष्‍कार के लिए संघर्ष भर ही है। ढेर शिकायत हैं हमें एक दूसरे से, मुझे लगता है नीलिमा अपनी भाषा, क्षमता, अपेक्षा के साथ कम न्‍याय करती है... वो खिलखिलाकर कहती है हूँ तो तुमसे सुंदर न।।तुम्‍हें लगता है कि मुझे अपने व्‍यवहार में और डेमोक्रेटिक होने की जरूरत है मसलन बाथरूम में वायपर मारने, सामान सही जगह रखने का सलीका सीखने की जरूरत है। अगर मैं बीस साल पहले की तुलना में जरा सा भी बेहतर इंसान हूँ तो इसका पूरा श्रेय नीलिमा को है किंतु अगर वैसा ही ठस हूँ या उससे भी कमतर हो गया हूँ तो ये मेरी अपनी 'योग्‍यता और इनर्शिया' है। हमने साथ साथ संघर्ष में संस्‍थाओं पर सवाल उठाना सीखा है और ये भी कि असल जिंदगी में इन सवालों के उतरने में थोड़ा हेर फेर आगे पीछे होगा ही। धर्म ईश्‍वर नास्तिकता के सवालों तुम कम तल्‍ख हो मैं पैट्रआर्की के सवाल पर हल्‍का व धीमा रह जाता हूँ। यकीन बस इतना कि रास्‍ता हमारा ठीक है सच्‍चा भी शायद। केक, उपहार गहने वाला नाता हमारा है नहीं, हो भी कैसे दोनों की तनख्‍वाह एक ही ज्‍वाइंट एकाउंट में जाती है तुम्‍हारे ही पैसे से तुम्‍हें उपहार देकर काहे बजट खराब करना फिर पसंद भी तुम्‍हारी मुझसे बेहतर है। इसलिए प्‍यार जताना थोड़ा कठिन हो जाता है, पर सुनो मेरे साथ बीस साल रह जाने वाली को बड़ा वाला गैलेन्‍ट्री अवार्ड बनता है, सालगिरह मुबारक साथी।।
 प्रेम की सफाई देनी पड़े ये त्रासद है। पर साफ करना जरूरी है कि विवाह संस्‍था व परिवार संस्‍था के प्रति हमारी अनास्‍था बदस्‍तूर जारी है :)