Thursday, February 11, 2016

कीवर्ड कविता

आलीशान डेटा सेंटरों के सर्वर
उछालते हैं
चंद फूहड़ असंगत शब्द
ट्रेंड्स-
मल्लिका शेरावत, उगाड़ी, डीवार्मिंग
नारायण खेद, वुशू , सन्नी लियोन
मानो समस्यापूर्ति एल्गारिदम्स की
गूगल कवि पहेली सुलझाता
हगता है एक कीवर्ड कविता
लिंक, इमोटिकॉन्स, एसईओ, सीएसएस से लैस
आलोचक कब के फना हुए
पेजरैंक में भला क्यों पिटेगी
कीवर्ड कविता

Wednesday, February 10, 2016

हाट की कविता

शब्दों के हाट से उसने
चंद शब्द मोल लिए
बदले में दिया थोड़ा सा खुद को
हाट के कारीगर को सौंपे वे शब्द
उसने गढ़ दी कविता
मेहनताने में दिया थोड़ा और खुद को
कविताओं को लिए टोकरी में फिर
वो खुद जा बैठा हाट में
खुद जो खुद से थोड़ा कम था
हाट की कविता के बदले
अब वो लेता है न जाने क्या
खुद लेकिन पूरा फिर से नहीं होता

Friday, February 05, 2016

चुस्कियोँ की राहजनी

कायदे से होना तो नहीं चाहिए
कुछ तय चाय के प्यालों का
न घट पाना
ऐसा भी क्या है कि
कविता का विषय हो जाए
उम्र की ढलती सांझ पर ली जानी थी चंद चुस्कियॉं
शिखरों की यात्राओं के हाथोँ हुई
ये राहजनी
ऐसा भी गिने जा सकने लायक गुनाह नहीं
थी मेरी यही कुल पूंजी, तो हुआ करे।

Wednesday, February 03, 2016

अनाथ शब्द

बियावान में भटकते
आकाशगंगाओं परे जाते
सरहदों की बाड़ के कॉंटों में उलझे
हिमस्खलनोँ के नीचे दबे
हर टूटे पुल से लटके
अपने सभी अनाथ शब्दों को
जिनकी मोमदार रस्सी से
निरपराधों को लटकाया गया
मैं एतद द्वारा इन्हें बुलाता हूँ अपनी गोद
स्वीकार करता हूँ इनका स्वामित्व
प्रस्तुत हूँ
तारीखी इंंसाफ के लिए।
क्योंकि दुनिया का कोई शब्द
त्रिशंकु नहीं होना चाहिए
चुप्पियों के ब्रह्मांड
बनने से कहीं पहले रोकने जरूरी हैं

Sunday, January 31, 2016

अन्‍ना कैरेनिना को मैंने नहीं मारा

हत्‍यारों की सूची
जो टँकी है चौराहे के नोटिस बोर्ड पर
उसमें मेरा भी है नाम।
हैरान हूँ मैं क्‍योंकि मैं जानता हूँ बिला शक
कि मैंने नहीं मारा था गाँधी को।
उस उदास रामदास को भी
हाथ तौलकर चाकू मैंने नहीं घोंपा था।
यूँ हत्‍याएं अब तमगा हो गई हैं
जो बायो डाटा में काबिले जिक्र हों
और जिनसे मिलें तरक्‍की
इसलिए
मुझे हत्‍यारा होने के अंजाम की फिक्र उतनी नहीं
जितनी मुझे चिंता है
हलाक को जानने की।
कितनी ही हत्‍याओं का गवाह मै
चीह्नता रहा
हर बार खुद को ही
अगले शिकार के रूप में
अब सुना मैं हत्‍यारा हो गया
नोटिस का मजमून कहता है मैंने मारा है
वक्त की सात नदियाँ
जमीं के सात पहाड़ पार
नीले सर्द होंठों वाली
अन्‍ना कैरेनिना को
सुनो
अन्‍ना कैरेनिना
मैं लेविन न ब्रांकी
आत्महत्या न भी मानो उसे तब भी
मेरे पास न तर्क न पैरवीकार
कहने का कुछ लाभ नहीं
पर फिर भी
सुनो मेरे प्‍यार
तुम्‍हारे होंठों की कसम
वो मैं नहीं था।

Saturday, January 30, 2016

कीला काटी

कविता में नहीं इसे तो गद्य में ही लिखना होगा, कविता में लिखता हूँ जब खुद को खोने के लिए लिखना होता है, खुद को खोने के लिए। कभी कभी मुझे कविता लिखना बचपन का किल्‍ला काटी का खेल सा लगता है, अबूझ खेल था और मैं उसका अबूझ खिलाड़ी था। इसमें होता ये है था कि दो दल अलग अलग जगहों पर एक तय वक्‍त तक लकड़ी के कोयले या खडि़या से छोटी छोटी लाइनें डालते थे खूब छिपाकर, फिर वकत पूरा हो जाने पर दूसरा दल उन्‍हें खोजकर काट देता था, जो वो खोज नहीं पाते थे, उन्‍हें ही गिनकर जीत हार का फैसला किया जाता था। मैं अजीब खिलाड़ी इसलिए था कि मैं खूब छिपाकर ये कीलें बनाता लेकिन जब दूसरा दल नहीं भी खोज पाया होता था तब भी मैं बताता ही नहीं था कि उस कोने में, वहॉं उस ईंट के नीचे भी अपने खजाने को छिपा रखा है मैंने... जीत के लिए नहीं था मेरा खजाना। कविताएं भी ऐसे ही हैं खूब छिपाकर लिखता हूँ..लिखते हुए किसी को दिख जाए तो लगता है चोरी पकडी गई... लिखने के बाद भी लगता बस लिखना भर हो गया न। दरअसल लिखने से खुद को उसमें छिपा देने जैसा लगता है कभी आड़े वकत जब मैं खुद को मिल नहीं रहा होउंगा तो इस पाले में आकर अकेले अपनी खडि़या की खींची कीलों सी रेखाओं में अपने कीला काटी में खुद को पाने की कोशिश करुंगा।

Tuesday, January 19, 2016

मैं वहाँ नहीं था

मैं वहाँ नहीं था
जब ढो रहा था वो अपना सलीब
मैं वहां नहीं था
आखिर क्यों नहीं था मैं वहां
उसके हत्यारे पूछते हैं।
जब सबसे कमज़ोर थी तुम
खोजती थीं मुझे
तब मैं वहां नहीं था
आखिर क्यों नहीं था मैं वहां
कातर तुम्हारी चुप्पियाँ पूछती हैं
दर्द के ग्लेशियर पिघलकर
जब बन प्यार की नदी
आ टकराये थे तराई के पत्थरों से
तब मैं वहां नहीं था
पूछते हैं बेबस झूले वाले पुल
मैं था क्यों नहीं वहां
मैं वहां नहीं था
क्योंकि मैं था यहीं
पथरायी प्रतीक्षा में
प्रतीक्षा में थिर हो
जम जाना
शायद कुछ न हो जाना है।
वहां न होना
कुछ न होना ही है

Sunday, January 17, 2016

रचने ही होते हैं पुतले

सिर्फ तमाशा नहीं है
पुतलों को फूंकना
धूं धूं फुंकते देखना
हर वक़्त को
हर देश को
हर मन को चाहिए होते हैं पुतले
कि दुश्मन के बिना
बहुत मुश्किल है
अनचाहे सवालों को दफन करना
नेस्‍तनाबूद कर पाना
भीतर उगते
प्रवंचनाओं के किलों को।
नफरत संग्रहणीय हो जाए तो
प्‍यार के पुतलों का दहन
रोजमर्रा जरूरत हो जाता है।

Wednesday, January 13, 2016

आजादी मेरा ब्रांड- पढने के लिए हिम्‍मत जुटान

किसी भी स्‍त्री की कहानी पढ़ते हुए मुझे डर लगता है खासकर अगर कहानी में कोई सच्‍चाई हो, पुरुषों को स्त्रियों की कहानी से डरना ही चाहिए क्‍योंकि स्‍त्री की हर कहानी एक आरोपपत्र होती है, मुझे तो लगती है अपने पर। Anuradha Saroj की यायावारी आवारगी भी मैं तीन बार में कोशिश करके खरीद सका पहले दो बार राजकमल जाकर वापस आ गया, हिम्‍मत नहीं हुई...तीसरी बार बिटिया (तेरह साल) को साथ ले गया उसीसे खरीदवा ली... अनुराधा के बारे में जितना पता था वो उसे बताया और उसने -वाउ.. से अनुराधा का स्‍वागत किया..मैं भी ऐसा ही ट्रेवल करुंगी का घोष भी। दावे से नहीं कह सकता पर शायद अच्‍छा लगा।
अभी किताब को पढ़ना शुरू करना बाकी था और मुझे पता था ये मुश्किल होने वाला था...औरत की आज़ादी से हम सब डरते हैं। कहना मुश्किल है कि ये मेरा ही भय है कि किसी और के भी साथ ऐसा कुछ होता है लेकिन मुझे ज्ञात से भी भय होता है अज्ञात से दुनिया डरती ही है। मुझे पता था कि अनुराधा ने किताब में यात्रा को आ़जादी का रास्‍ता बनाया होगा और आज़ादी के साथ ही वो सब भी होगा ही सही मायने में औरत को गुलाम बनाता है... ये है तो आरोप जमाने पर ही पर इसी लिए मुझ पर भी है, होना ही चाहिए। मैं इसीलिए किताब पढ़ने से डर सा रहा था,  फिर से अपनी मिष्‍टी का ही सहारा लिया...मिष्‍टी तुमने किताब पढ़नी शुरू की ? आजा़दी मेरा ब्रांड, फेवरेट खोलकर दी... इतनी हिंदी की उसे आदत नहीं पर कोशिश की..लेकिन पेट में तितलियॉं उड़ने पर आकर अटक गई... अब हिम्‍मत का मौका मेरा था...लाओ मैं रीड करता हूँ...फिर मैं पढ़ने लगा... लड़को के साथ सोने के प्रकरण को कब डरपोक बाप 'लड़कों के साथ होना' पढ़ गया मुझे पता ही नहीं चला.. मिष्‍टी अब दूसरे कमरे में चली गई है और मुझे मालूम है कि आजादी का हर लफ्ज मुझ पर एक सवाल है पर मिष्‍टी के लिए जो दुनिया चाहिए उसके लिए जरूरी है कि सवालों से मुँह न मोड़ा जाए... इसलिए किताब पूरी तो पढ़ी ही जाएगी विद पेट में तितलियॉं...
अनुराधा मिष्‍टी की रमोना हो

Tuesday, January 12, 2016

लिखना दरअसल मिटाना है होने को

जब जब लिखता हूँ कुछ
लगता है मिटा रहा हूँ सबकुछ
वह सब मिटता है 
जो मुझे लिखना था दरअसल
मुझे लिखना था मैं, और लिखना था तुम्‍हें
किंतु कविता के ढॉंचें में अँटा नहीं मेरा अहम
कहानी में तुम अकेले आ नहीं पाईं
और पात्रों ने तुम्‍हें तुम रहने न दिया
निबंध औ उपन्‍यास भी थके से लगे पराजित
विधाएं दगा करती हैं
जब तुम पर या कि
खुद पर चाहता हूँ कुछ लिखना।

लिखने की कोशिश
शब्‍दों के दर्प यज्ञ में आहूति है बस
वरना
कविता भी भला सच कहती हैं कभी