Thursday, May 08, 2008

लघु कथा फिल्‍म : इस मीडिया विधा का स्‍वागत करें

क्‍या इसे नवीन विधा माना जाए? कहना कठिन है, लघु फिल्‍में पहले भी बनती रही हैं। छोटी फिल्‍में जो छोटे आयोजनों में दिखाई जाती हैं तथा अक्‍सर वृत्‍तचित्र की कोटि की होती हैं। लघु कथा फिल्‍में खर्च के लिहाज से महंगी होती है तथा उनपर रिटर्न काफी नहीं होती। लेकिन हाल में फिल्‍म उत्‍पादन की कीमत बहुत कम हुई है तथा इंटरनेट फिल्‍म डिलीवरी का लोकप्रिय जरिया बना है। अब छोटी छोटी कथा फिल्‍में बनाई जा रही हैं- व्‍यक्तिगत प्रयासों के तहत, ये इंटरनेट के ही लिए बन रही हैं। मुझे यह हिन्‍दी फिल्‍म यूट्यूब पर हाथ लगी। फिल्‍म की विषयवस्‍तु से बहुत आनंदित नहीं हुआ लेकिन विधा के तौर इस आकार और कोटि की फिल्‍म ऐसी लगी है जिसे बनाने की चेष्‍टा हम ब्‍लॉग भी कर सकते हैं। देखें चैक व मेट

निर्देशक : आशीष

 

 

 

Wednesday, May 07, 2008

हिन्‍दी में लिखें अंग्रेजी से पाठक लाएं- दोनों हाथों में लड्डू

हाल के दिनों में कई शानदार चीजें हो रही हैं।  सबसे महत्‍वपूर्ण तो लगा गूगल द्वारा हिन्‍दी से अंग्रेजी अनुवाद की सुविधा दिया जाना। जैसा कि आलोक ने बताया और हमने भी जॉचा कि अनुवाद मशीनी है और जाहिर है मशीनी जैसा ही है- उससे कविताओं के अनुवाद कर पाने की उम्‍मीद करना बेमानी है पर साधारण वाक्‍यों को ठीक ठाक अनूदित कर लेता है। ध्‍यान रहे कि हमारी सरकार भी सालों से माथापच्‍ची कर ही रही थी कि कम से कम सरकारी पत्रों के अनुवाद का औजार विकसित कर सके- किया भी पर कभी जनसाधारण में लोकप्रिय नही बनाया जा सका।

भाषायी अंतरण इंटरनेट के लिहाज से बहुत ही अहम बात है। खासकर भारत जैसे देश में जहॉं पूरा शिक्षित वर्ग कम से कम दो भाषाओं का जानकार है। अगर चिट्ठाकारी के लिहाज से देखें तो हम पाते हैं हिन्‍दी की चिट्ठाकारी की सीमा अब तक ये रही है कि एक निश्चित समुदाय है- पाठक, लेखक आदि सभी स्‍टेकहोल्‍डर इसी बंद समुदाय से हैं- हमारे पास आवारा पाठक नहीं हैं। मतलब ऐसे लोग जो बस घूमने के लिए इंटरनेट पर निकले... और वाह ये तो बड़ा अच्‍छा चिट्ठा है पढ़ा जाए। ऐसा अंग्रेजी के साथ होता है। और ऐसा भी नहीं है कि हिन्‍दी की सामग्री को खोजते लोग नहीं है- बस सर्च, कंटेंट, अंतरण के बीच समन्‍वय नहीं रहा है। एक जायजा लेने के लिए  देखें गूगलएनालिटिक्‍स में हमारे पिछले 11000 से कुछ अधिक विजिट (20 दिन में) के स्रोत क्‍या हैं-

ScreenHunter_01 May. 07 09.39

'हमारे' का मतलब यहॉं हिन्‍दी ब्‍लॉग रिपोर्टर है। इसकी अधिकांश सामग्री अलग अलग हिदी ब्‍लॉगों की सामग्री की संक्षिप्‍त समीक्षा ही होती है। यानि ब्रिज ब्‍लॉगिंग। इस अनुभव के बाद (जिसमें कमाई का अनुभव  भी शामिल है, हमारा पहला एडसेंस चेक रास्‍ते में है)  हमारा मानना है कि सर्च आकर्षित करने के लिए अपनी भाषा को खिचड़ी बनाने (और भाषा के साथ सांस्‍कृतिक बलात्‍कार करने से) कहीं अच्‍छा है कि अंग्रेजी की सर्च को किसी अन्‍य ब्रिज ब्‍लॉग पर आकर्षि‍त किया जाए तथा वहॉं से ट्रेफिक को अपने ब्‍लॉग पर भेजा जाए। अपने तईं हम ये काम हिन्‍दी ब्‍लॉग रिपोर्टर से कर ही रहे हैं। चूंकि भले ही ब्‍लॉग रिपोर्टर हिन्‍दी पर ही आधारित है पर चूंकि अंग्रेजी में  है इसलिए ब्‍लॉगवाणी या अन्‍य एग्रीगेटरों पर दिखाई नहीं देता है, आप इच्‍छुक हो तों उसकी फीड यहॉं सब्‍सक्राइब कर सकते हैं अथवा अपना ईमेल पता नीचे लिखें

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यदि आपने अभी कोई दमदार पोस्‍ट लिखी है तो आप एग्रीगेटरों के माध्‍यम से सैकड़ों पाठकों तक तो पहुँचेंगे ही पर वे तो बंधुआ पाठक हैं वही हिन्‍दी की गली वाले। नए पाठकों तक पहुँचने का एक रास्‍ता हम बताते हैं। इस नई पोस्‍ट का 200 शब्‍दों में अंगेजी में एक परिचय लिखें इसमें अपनी पोस्‍ट का लिंक भी दें और shabdashilp <dot> contribute <dot> blogger <dot> com पर ईमेल कर दें। आपकी पोस्ट हिन्‍दी ब्‍लॉग रिपोर्टर पर आएगी और हिन्‍दी पोस्‍ट का अंग्रेजी विज्ञापन सैकड़ों नए पाठकों तक पहुँच जाएगा और सर्च इंजिनों तक भी। यदि इस चिट्ठे के पेजरेंक को लेकर कोई भ्रम है तो कृपया इस पोस्‍ट को देखें। जब सारी दुंनिया blog by Amitabh खोज/लिख रही हो तो सर्च में पहले नंबर पर आना हंसी खेल नहीं है। तो देर किस बात की है- हिन्‍दी में लिखें अंग्रेजी से पाठक लाएं- दोनों हाथों में लड्डू।

Saturday, May 03, 2008

लीजिए इस वीडियो से जानें कि हमें क्‍यों गलिआया जा रहा है

कल से यशवंत तथा कई और भड़ासी हमें गलिया रहे हैं (वे कब नहीं गलियाते, किसे नहीं गलियाते) ये तब है जबकि हम खूब जानते हैं कि कम से कम हमारे और यशवंत के बीच ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ है कि आप हमें गालियों दो हम तुम्‍हें (हम नहीं कह रहे हैं कि यशवंत व अविनाश के बीच ऐसा कोई समझौता है)। पर ये थोक गालियॉं क्‍यों आ रही हैं ? जाहिर है कि एक वजह तो आदत है और दूसरी है कल NDTV पर हुई चर्चा। आप में से कुछ ने चर्चा देखी थी बाकी क्रिकेट मैच देख रहे होंगे। हम भी चर्चा में नहीं होते तो मैच ही देख रहे होते। खैर हमें बताया गया था कि चर्चा हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग पर होगी किंतु हमें ऐसा कोई भ्रम न था हम ताड़ चुके थे इसलिए जाते ही पूछा कि अमिताभ के ब्‍लॉग का ही मामला है न ...खैर हमें बताया गया कि हॉं वही और ये कि क्‍या ब्‍लॉग भड़ास है। अपनी भड़ास मसले पर हमेशा से राय रही है कि भड़ास ब्‍लॉगिंग का एक स्‍वाभाविक सोपान है जिसे मटिआया नहीं जा सकता, नहीं जाना चाहिए- ये भी कि भड़ास तत्‍व की स्‍वाभाविक एंट्रापी आकार बढ़ने पर पोजीटिव हो जाती है तथा वह अस्थिर हो जाता है। हमले भड़ासत्‍व को मजबूत बनाते हैं जबकि उसके प्रति सहज होना उसकी जरूरत को खुद ब खुद कम कर देता है। इसी किस्‍म की राय हमने वहॉं भी रखी थी(इससे कहीं कम मौका मिला इसलिए इससे कम स्‍प्‍ाष्‍ट रूप में कह पाए)।

आप इन वीडियो में इस चर्चा को देख सकते हैं-







ब्रेक के बाद