Thursday, August 28, 2014

मेरी भाषा मेरा राष्‍ट्र है उसे बस एक देश चाहिए- छीनकर लेना होगा।

हमारा देश औपचारिक रूप से द्वि-राष्‍ट्र सिंद्धांत को खारिज करता है। इस सिद्धांत के पनपने और फिर भारत द्वारा खारिज किए जाने के अपने ऐतिहासिक कारण है। स्‍वाभाविक है कि वह सिद्धांत जिसके कारण देश का विभाजन हुआ उसे सिंद्धांतत: स्‍वीकार करना राष्‍ट्र के लिए कठिन है जबकि पाकिस्‍तान के लिए इस सिद्धांत का स्‍वीकार सतना ही स्‍वाभाविक है। एेसे में जब कोई घूरे पर चढ़ा कुक्‍कुट बांग देकर कहे कि भारत में रहने वाला हर भारतीय हिंदू ही है, तो यह पुन: धार्मिक राष्‍ट्रवाद के उभरने की ओर संकेत करता है जो दो-राष्‍ट्र सिद्धांत का मूल आधार है। यानि यह पूर्व धारणा की हिंदू व मुसलमान दो अलग अलग राष्‍ट्रीयताएं है अत: उनके लिए अलग अलग राष्‍ट्र होना चाहिए।
अस्‍तु, हम अपनी नजर उस विभाजन पर डालें जो पाकिस्तान में हुआ उसका सिद्धांत भी एक तरह का दो-राष्‍ट्र सिंद्धांत ही था तथा बंग-मुक्तिवाहिनी की मूल चिंता पाकिस्तान से बंग राष्‍ट्र को अलग करने की थी। याानि भाषा भी एक अलग राष्‍ट्रीयता है तथा वहॉं भी एक अलग राष्‍ट्र होना चाहिए। धर्म की तुलना में आधुनिक समय में भाषिक राष्‍ट्रवाद को अधिक स्‍वीकृति प्राप्‍त हुई है। इसका सबसे स्‍पष्‍ट उदाहरण राज्‍यों के पुनर्गठन का आध्‍धर भाषा को बनाया जाना माना जा सकता है। भारत एक राष्‍ट्र के रूप में इस बात को स्‍वीकार करता है कि भारत की विभिन्‍न 'राष्‍ट्रीय' भाषाएं दरअसल उसकी राष्‍ट्रायताएं है। इनके आधार पर ''राज्‍य'' बनाए गए तथा भारत कहा जाने वाला राष्‍ट्र इन राज्‍यों का ही एक संघ भर है जो गणतंत्रात्‍मक है।  इस बात का विधिक-तकनीकी मतलब मात्र इतना है कि विभिन्‍न भाषिक राष्‍ट्रीयताएं मिलकर एक गणतंत्रात्‍मक ढांचा तैयार करती हैं जो भारत-राष्‍ट्र कहलाता है। ये राष्‍ट्रीयताएं भारत राष्‍ट्र की मातहत संरचनाएं नहीं हैं वरन उसकी स्रोत संरचनाएं है। ये हैं तो भारत है तथा 'किसी भारत' को हक नहीं कि वे इन राष्‍ट्रीयताओं का दमन करे या इन पर राज करे।
अब जरा विचार करें कि ''भारत बनाम इंडिया'' की जो बहस उठाई जाती है वो क्‍या है। मूलत: इस बहस की स्‍थापना है कि भारत के अवसरों, संसाधनों व निर्णयन पर इस तबके का कब्‍जा है जो ''इंडिया'' से व्‍यक्‍त होता है। इसकी पहचान के बाकी मानकों के अतिरिक्‍त सबसे महत्‍वपूर्ण यह है कि ये खुद को अंग्रेजी में व्‍यक्‍त करता है तथा उसके साथ ही अपनी पहचान को देखता है। यं पुन: एक भाषिक राष्‍ट्रीयता ही है। किसी भी प्रकार के निर्णयन में भारतीय राष्‍ट्रीयताओं का दमन कर उनपर एक भिन्‍न राष्‍ट्रीयता का आरोपण उस आपसी समझदारी का  सीधा उल्‍लंघन है जो इन भाषिक राष्‍ट्रीयताओं ने भारत की निर्मिति में अपनाई थी ऐसे में सहज स्‍वाभाविक अपेक्षा होनी चाहिए कि ये भाषिक राष्‍ट्रीयताएं अपने राष्‍ट्र का स्‍वयं निर्माण करें, राष्‍ट्र वे पहले से हैं बस उनके देया पर कब्‍जा किसी और का है उसे आजाद कराने का सवाल है।
भारतीय भाषाओं के लिए संघर्ष करने वाले एक मित्र अक्‍सर ये उदाहरण देते हैं कि हमारा देश लाख अहिंसावादी करार दिया जाए सच्‍चाई ये है कि वह सुनता तभी है जब कोई हथियार उठाए। सिखों का उदाहरण लें हम जीभर उन पर चुटकले गढकर..उनका उपहास करते रहे किंतु जब वे अपने राष्‍ट्र के लिए बंदूके उठाकर खड़े हुए तो कुछ कुर्बानियॉं गईं, आंतकवादी करार दिया गया, दमन कर दिया गया तथापि देश ने नरसंहार भी किया किंतु ये भी सच है कि मुख्‍यधारा में उनके लिए जगह तब ही बन पाई जब वे इस ''अखंडता'' के लालीपॉप से परे देख पाए। भाषिक राष्‍ट्रीयता अभी उस मुकाम पर पहुँची नहीं है लेकिन अंग्रेजियत के हाथो दमन व अपमान अब उस शिखर पर पहुॅच रहा है कि कुछ बलिदान देना पड़ेगा कुछ सजाएं भी दी जानी होंगी। ऐसे हर राष्‍ट्र को खारिज किए जाने की जरूरत है जो उन राष्‍ट्रीयताओं का अपमान करता है जिनसे वह बनता है। यह भी अहम है ये अंग्रेजी को हटाकर हिन्‍दी बैठाने की लड़ाई नहीं हो सकती, जैसे गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज बैठाना आजादी नहीं है। भारतीय भाषिक राष्‍ट्रीयताओं को मिलकर अंग्रेजी-राष्‍ट्रवाद के खिलाफ संघर्ष करना होगा। सीसैट/सेना की अफसरशाही/उच्‍च न्‍यायपालिका कई मोर्चे हैं जीत का रास्‍ता एक ही इंकलाब।

Tuesday, August 26, 2014

सरहद ही माने तो काहे की आजादी

कल शचीन्‍द्र आर्य ने शिकायत की थी कि भई फेबु पोस्‍ट को ब्‍लॉग पर ला चेपना गलत बात है।  बात थोड़ा सही भी है अभी भी हिन्‍दी के लोग आनलाइन कोई अपार तो हैं नहीं जो हैं वो उधर भी हैं इधर भी ऐसे में दोनों जगह एक ही सामग्री पाठकश्रम के साथ अन्‍याय है। दूसरे ये भी कि ब्‍लॉगिंग व फेसबुकिंग दोनों की प्रकृति एक ही तो है नहीं। लेकिन दूसरा पक्ष भी है- फेबु पोस्‍ट की उम्र बेहद कम होती है कुछ मिनटों से लेकर एकाध घंटा फिर वह आती जाती या डूबती उतराती रहती है। जबकि ब्‍लॉग तुलनात्‍मक रूप से कहीं दीर्घायु होते हैं। इसलिए वे पेास्‍ट जिनके विषय में अगले को लगे कि इसका अचार बनाया जा सकता है उसे ब्‍लॉग के जार में रखकर धूप लगाने में कोई बुराई भी नहीं है। ब्‍लॉग पर डाली गई पोस्‍ट समझिए फिलहान अभिलेख बनाने के लिए हैं। ये जरूर है कि उधर से इधर चेपते समय उसमें लिंक फोटो तथा लेख में कुछ बदलाव या विस्‍तार की गुंजाइश रहनी चाहिए।
आज मुझे अपने इन्‍बाक्‍स में किसी बलूचिस्‍तान हाउस से बलूचिस्‍तान की आजादी के समर्थन में एक ईमेल प्राप्‍त हुई। मुझे कुछ हैरानी हुई, वो इसलिए कि मैं इस मुद्दे से कतई जुड़ा नहीं रहा हूॅ। व्‍यक्तिगत तौर पर मुझे लगा कि इसे किसी न किसी तरह भारत में फैलने फैलाने की छूट मिली रही है क्‍योंकि इतना निकट होते हुए भी मुझे कभी कश्‍मीर की आजादी के समर्थन में या उत्‍तरपूर्व के अलगाववादी (चाहें तो आजादी कह लें) आंदोलनों को इतना खुलकर प्रचार करते नहीं देखा। इस पर मेरी फेबु पोस्‍ट:
यदि आपके इन्‍बॉक्‍स में बिना किसी सदस्‍यता, रुचि आदि के अचानक ''बलूचिस्‍तान की आजादी'' के समर्थन में कोई ईमेल आ टपके जो किसी एक्टिविज्‍म से न उपजी हो वरन पीआर परिघटना लगे तो बलूचिस्‍तान या पाकिस्तान पर तो नहीं किंतु अपने आनलाइन एक्टिविज्‍म पर आलोचनात्‍मक नजर की जरूरत तो है। तो भैया बलूचिस्‍तान हाऊस वालो अगर वाकई पाकिस्‍तान में आपके मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, दमन का आप शिकार हैं तो मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं किंतु अगर किन्‍हीं भारतीय ऐजेंसियों के प्रभाव में आप फूल रहे हों तो जान लीजिए कि हम अपने ही देश के बीसियों समुदायों की इच्‍छा व मानवाधिकारों के लिए कुछ नहीं कर पाए हैं- इरोम शर्मिला आपको बता देंगी हमारे ''राज्‍य'' की हकीकत। व्‍यक्तिगत तौर पर जमीन से उभरे हर सांस्‍कृतिक/अस्मिता संघर्ष को मेरी शुभकामनाएं हैं जो देश कहे जाने वाले आतताई ढांचे से लड़ रहे होते हैं बशर्ते वे ऐसा किसी और देश के बहकावे या भरोसे न कर रहे होते हों। इस लिहाज से सिर्फ बलूचिस्‍तान ही क्‍यों कश्‍मीर, नागालैंड, तिब्‍बत सभी की आजादी के लिए शुभकामनाएं। 


Sunday, August 24, 2014

रूप-क्षय से भय

उम्र के बीतने के साथ एक बड़ी गड़बड़ ये है कि ये अकेले आपकी नहीं बढ़ती और अगर आपने उम्र से बड़ों और छोटों के साथ बराबरी की दोस्ती की दुर्लभ कला नहीं सीखी हुई है तो आप अक्सर उन लोगों के इर्द गिर्द हो जाते हैं जो अापकी ही तरह बढ़ती उम्र के होते हैं। कल की मनीषा की ब्लॉग पोस्ट ने मजबूर किया कि अपने आस पास बढ़ती उम्र से भयाक्रांत चेहरों को याद करूं। पोशाक-पार्लर-प्रसाधन, खुशी या जरूरत के लिए नहीं - डर के कारण। हमने शायद सभी औरतों को ये अहसास करा दिया है कि रूप है तो तुम हो... उन्हें रूप बचाने में लगे रहने दो (सो भी कोई बची रहने वाली चीज़ थोड़े है) - इस तरह  औरतें रूप-क्षय के अपने भय में लड़ने के लिए मॉल दर मॉल पोशाकों के लिए भटकती हैं या फिर पार्लर या शीशे के सामने इस युद्ध के अपने हथियार मांजती हैं... दुनिया उनके ज़ेहन से थोड़ा धुंधला जाती हैा हम पुरुष दुनिया हम अपने लिए बचाए रख सकते हैं।