Saturday, September 20, 2008

दिल्‍ली घेट्टो के एनकाउंटर की एक साइडलाइन रिपोर्ट

मैंने एनकाउंटर की टीवी रिपोर्टिंग नहीं देखी थी, उस रिपोर्टिंग की रिपोर्टिंग जो ब्‍लॉग पर हुई उसे जरूर पढ़ा है। मुझे टीवी पर समाचार न देख पाने पर अब कोई मलाल नहीं होता, इस बार भी नहीं हुआ। पर मीडिया की भयानक तौर पर गिर गई साख से हो रही हानि को गहरे तौर पर बाद में अनुभव किया।

सुबह स्‍टाफरूम में प्रवेश किया तो हवा में कुछ बदलाव था, महसूस करने में कुछ देर लगी। चुप्‍पाचुप्‍पी की फुसफुसाहट थी। मेज पर अखबार बिछे हुए थे...खबरों में एनकाउंटर ही छाया था। दरअसल कम से कम 10-12 शिक्षक साथी उसी इलाके से आते हैं जहॉं ये एनकाउंटर हुआ। उनका कहना था कि उस क्षेत्र के निवासियों की साफ राय ये है कि एनकाउंटर फर्जी था। जिन लड़कों को आतंकवादी कहकर मारा गया उन्‍हें दो दिन पहले ही उठा लिया गया फिर वापस लाकर उसका एनकाउंटर किया गया। इस मान्‍यता का स्रोत क्‍या है ये किसी शिक्षक मित्र को नहीं पता पर ये लोग भी इस राय से सहमत लग रहे थे। उनका कहना था कि यदि इंस्‍पेक्‍टर की मौत की घटना नहीं होती तो जामिया नगर में हालत विस्‍फोटक थी, वो तो इस मौत ने लोगों के मन में शक पैदा किया कि हो सकता है कि एनकाउंटर असली हो, पर तब तक तो वे तमाम मीडिया व पु‍लिस की बातों की तुलना में मोहल्‍ले की अफवाहों में ही ज्‍यादा यकीन कर रहे थे।

मुझे इन लोगों की बात सुनकर राष्‍ट्रवाद के दौरे नहीं पड़े, आप चाहें तो मुझे राष्‍ट्रद्रोही करार दे सकते हैं। मुझे स्‍पेशल सेल के पुलिसवाले जॉंबाज राष्‍ट्ररक्षक भी नहीं लगते ये भी सच है। पर मैं उन्‍हें खास दोषी भी नहीं मानता, मुझे लगता है कि वे राज्‍य की लाचारी के प्रतीक हैं, राज्‍य को अपनी वैधता के रास्‍ते में आ गए तत्‍वों का निपटान करने में जब लाचारी महसूस होती हे तो उसे एनकाउंटर करने पड़ते हैं। इसे करने वाले तो औजार भर हैं, तथा उनकी शहादत एक कोलेट्रल डैमेज है। इस सबके बावजूद जामिया नगर के बहुत से लोगों का राष्‍ट्रीय मीडिया तथा प्रशासनिक ढॉंचे की तुलना में सुनी सुनाई बातों पर विश्‍वास कर लेना बेहद अवसादी परिघटना लगा। माना जा सकता है कि पुलिस ने इन आतंकवादियों को गिरफ्तार करने की तुलना में मार डालने का निर्णय लिया होगा ताकि ढिल्‍लू होम मिनिस्‍टर की छवि को धोया जा सके। पर राज्‍य ही नहीं वरन मीडिया पर भी इतने बड़े स्‍थानीय समुदाय का ऐसा अविश्‍वास कि वे बजाय राज्‍य की अपेक्षाकृत वैध संस्‍था के समर्थन में आने के, आतंकवादियों से सहानुभूति रखें ये त्रासद है।

मुझे लगता है कि दशकभर के संप्रदायीकरण ने अब लगभग पूरे समाज में विभाजन की लकीर खींच दी है। राज्‍य व मीडिया ने अपनी वैधता पूरी तरह नहीं तो कम से कम अल्‍पसंख्‍यकों के लिए तो खो ही दी है। मुझे यह भी लगता है कि आने वाले दिनों में और एनकाउंटर देखने को मिलेंगे उससे भी दुर्भाग्‍यपूर्ण यह कि इन एनकाउंटरों का इस्‍तेमाल तंगअक्‍ल कठमुल्‍ले, आतंकवादियों की पैदावार बढ़ाने के लिए करेंगे, और मीडिया ...वो तो खैर केवल ब्रेक से ब्रेक तक की ही दृष्टि रखता है।

12 comments:

अफ़लातून said...

आपके सन्तुलित विश्लेषण से सहमत हूँ ।

Amit Pachauri (अमित पचौरी) said...

बहुत निंदनीय बात है कि ऐसे वीर और निडर पुलिसकर्मी के भारत माता के प्रति बलिदान होने के बाद भी स्थानीय आबादी के एक समूह ने जिस तरह पुलिस कार्रवाई पर आपत्ति जताई और यहां तक कि मुठभेड़ को फर्जी करार देने की कोशिश की और यह सब भी पूरे देश के समक्ष टी. वी. पर । इसकी जितनी निंदा की जाए बहुत कम है । हम सभी लोगों को एकजुट होकर ऐसी राष्ट्र विरोधी मानसिकता की हर सम्भव कड़ी निंदा करनी चाहिए । नहीं तो देश के सच्चे सपूत को श्रद्धांजली पूरी नहीं होगी ।

शर्मा जी हमें गर्व है आप पर । ईश्वर आपकी दिव्यात्मा को शान्ति व सद्गति प्रदान करे ।
सनातन हिंदू धर्म की जय । उत्तरांचल की पावन भूमि की जय । भारत माता की जय । राष्ट्र की जय ।

जितेन्द़ भगत said...

आपकी बात सही है- सरकारी रवैया और आम जनता की सोच के बीच द्वैत कि‍सी गहरे संकट के सूचक हैं।

अभिषेक ओझा said...

जो भी हो एक पुलिस वाले की जान गई... वो फेक नहीं है, बाकी क्या कहें !

Anil Pusadkar said...

aap sahi kah rahe hain,lekin vibhajan ki rekha kisi ek ghatna ya ek din ke ghatnakram ka parinaam nahi hai.ye sach hai ki media apni vishwasniyata khota jaa raha hai aur uske aane ke baad ya kahen ki trp ki bhook me badle uske aakramak ravayye ne sthiti aur kharab ki hi to galat nahi hoga,ye bhi utna hi sach hai ki police aur netaon ki sakh giri hai magar uske sath-sath muslim samaj bhi chapet me aaya hai,iska matlab ye nahi hai sara samaj sandeh ke dayre me hai,magar kuch logo ki harkat aur kuch logfon ki fitrat inhe mushkil me daal rahi hai

Nitish Raj said...

आपको ये भी बता दूं कि हां चार रोज पहले दो लड़कों को जामिया से उठाया भी गया था। पर क्या २००० और २००१ को हम भूल गए हैं जब कि वहां पर खुले तौर पर सिमी को संरक्षण मिला हुआ था। क्या आज तक जामिया के पास कभी भी ब्लास्ट हुआ? और याद रखिए कि अगले दो चार यदि ब्लास्ट होते हैं तो एक यहां पर भी होगा इसके पीछे बहुत ही बड़ी राजनीति चलती है। हम लोग तो वो देखते हैं जो कि कुछ आला लोग दिखाना चाहते हैं पर सच कुछ और भी है।
पर हां मैं नहीं चाहता कि मेरे देश में और कभी धमाके हों और नहीं चाहता कि दिल्ली पर कभी भी नापाक इरादे कोई जाहिर कर सके।

अजित वडनेरकर said...

जामिया जैसे इलाकों में एनकाऊंटर की नौबत ही नहीं आऩी चाहिए...
कहीं धमाके न हों...लोग कट्टरता से उबरें ...किसी भी किस्म की कट्टरता से..

संजय बेंगाणी said...

एनकाउंटर करवाया ताकी दो लोगो को भगाया जा सके, एक पुलिस वाले को मारा जा सके? जो आरोप मोदी पर लगते है वैसे ही सोनिया (पुलिस शिवराज की शिवराज सोनिया के मातहत है) पर लगाए जा सके? बात हजम नहीं होती.

हमें आतंकियों की मासुमियत पर विश्वास है मगर अपनी सरकार पर नहीं!!!! :)

अनुनाद सिंह said...

बहुत अच्छी 'रचना' की है।

Amit Pachauri (अमित पचौरी) said...

पिछले कुछ दिनों में मुस्लिम धार्मिक नेताओं का सामने आकर टी वी पर आतंकवाद की निंदा करना व निर्दोष के मरने को धर्म विरुद्ध बताया जाना अत्यन्त सराहनीय कदम है।

Sanjeev said...

जब हर कोई जज की भूमिका निभाने लगेगा तो यही होना है। भारतीय मीडिया वामपंथी प्रभाव में है और महज खबर देने के बजाय उसके सही या गलत होने की व्याख्या करने में ही व्यस्त है।

सतीश सक्सेना said...

टीवी पर पहले सिर्फ़ समाचार ही देखता था अब वह भी बंद करने पड़े , गैर जिम्मेवाराना तरीके से भांडों की भांति चीखना देख कर उबकाई सी आती है ! इस विषय पर और लिखियेगा....