Wednesday, August 06, 2008

ब्‍लॉगिंग आग्रह की वस्‍तु है

बीमा कंपनियों के विज्ञापनों से शहर आच्‍छादित है। चहुँ ओर मौत और बुढ़ापे का भय बिखरा है। इतना दो तुम्‍हारे अपने इतना पाएंगे...अस्पताल जाना पड़ा तो बिल हम चुकाएंगे... और अंत में पुच्‍छल्‍ला ये कि 'बीमा आग्रह की वस्‍तु है' (इंश्‍योरेंस इज़ अ मैटर ऑफ सालिसिटेशन)। भाषिक प्रयुक्तियॉं बेचैन करती हैं सो हमने पड़ताल की तो पता लगा कि ये कानूनी शब्‍दावली है जिसका अर्थ है कि बीमा को बीमा कराने का इच्‍छुक व्‍यक्ति अधिकार की तरह नहीं मांग सकता। यह तभी किया जा सकता है जब इच्‍छुक कहे कि मेरा बीमा कर दो और बीमा कंपनी कहे कि हम आपका बीमा करना चाहते हैं...दोनों राजी तभी बीमा होगा। ये नहीं कि बोर्ड टंगा देखा और हो गया बीमा। तो इस तरह बीमा आग्रह की वस्‍तु है।

पर भई बीमा तो बीमा है कि नोट-शोट का मामला है। पर ये ब्‍लागिंग कैसे आग्रह की वस्‍तु है। है न.. अगर आप हाल फिलहाल की पोस्‍टें पढें तो आपको भी लगेगा। हमने पढ़ा कि किसी ने पोस्‍ट लिखी कविता या कहानी (या जिस विधा की मान लें उस विधा की रचना थी) एक अन्‍य को मजाक की सूझी उसने उसी तर्ज पर एक और लिख डाली। व्‍यंग्य तो खैर नहीं था विनोद ही था पर शुद्ध विनोद तो शुद्ध घी हो गया है, मिलता ही कहॉं है। करने वाला विनोद भी करे तो सुनने वाला उसे व्‍यंग्‍य ही मानता है। अगला बिफर पड़ा, तुम दो कौड़ी के पाठक मैं प्रसाद, प्रेमचंद- अगले ने कहा कि मेरा ब्‍लॉग आग्रह की वस्‍तु है जिसे मैं चाहता हूँ वो पढ़े बाकी मेरा वक्‍त बर्बाद न करें।    वैसे जब लोगों को पता चला कि 'वक्त बर्बाद न करें' एक गांरटीशुदा जुमला हो गया है तो कृपया वक्‍त बर्बाद करें की भी गुजारिश हुई :))

तो भैया अब  ब्‍लॉगिंग, हम लिखें-दुनिया पढे नहीं रह गई :))। अब इसे सैडिस्टिक प्‍लेज़र कहना चाहें तो कहें पर हमें तो ये विवाद बड़ा मोहक सा लगा। वैसे हम साफ बता देना चाहते हैं कि हमारा ब्‍लॉग पढना कतई आग्रह की वस्‍‍तु नहीं है। जो चाहे पढे- रिक्‍शावाला, झल्‍लीवाला या सामानवाला सबका स्‍वागत है। 

 

(बहुत दिनों बाद किसी के फटे में टांग अड़ा रहे हैं, हमें डर लगा कि जैसे पिछले दिनों पंगेबाज पर आरोप लगा कि बस नाम के ही पंगेबाज रह गए हैं, कहीं हमारी भी इमेज न बिगड़ चुकी हो)

13 comments:

पंगेबाज said...

ब्लागिंग आग्रह की वस्तू है. सरासर गलत ब्लागिंग पंगे लेने की वस्तु है. और ये किसी के आग्रह पर निर्भर नही है , जब हमारी मर्जी होगी तब लेगे. जिससे मेरि मर्जी होगी उससे लेगे . नेट किया जाय ताकी भविष्य मे सनद रहे :)और वक्त जरूरत आप कोट कर सके :)

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

हमे भी लगा की फटे में टिप्पणी अड़ा ही देनी चाहिए.. ब्लॉगिंग पंगा लेने की वस्तु है इस बात से पूर्णतया सहमत हू..

जितेन्द़ भगत said...

आने वाले दि‍नों में ब्‍लॉग पर और कि‍तने पंगे होंगे और कैसे-कैसे होंगे, कौन जानता है !

अंशुमाली रस्तोगी said...

आप लोगों के लिए ब्लॉगिंग चाहे जो हो मगर मेरी निगाह में यह शब्दों और विचारों का स्वतंत्र भाध्यम है। अब यह बात अलहदा है कि हम इसकी स्वतंत्रता को कैसे लेते हैं।

vineeta said...

सच कहा भाई, ब्लॉग्गिंग पंगा लेने और फटे में टांग अडाने की वास्तु है. और हर किसी को अधिकार है कि हर किसी के फटे में टांग फंसा दे. आख़िर विचारों का आदान प्रदान और समाधान-घमासान भी तो इसी से होता है. आप आग्रह करके तो देखिये कितने ब्लोगिये पढ़ते है आपका विचार.

Udan Tashtari said...

बड़े मौके से टांग अड़ाई है वरना तो हमारी नजरों से उतरने ही वाले थे कि अब बंदा काम का नहीं रह गया. जियो भई जियो!!! हा हा.. :)

अनूप शुक्ल said...

ठीक है लेकिन अभ्यास की कमी के कारण टांग ठीक से अड़ नहीं पायी। :)

Mired Mirage said...

ब्लॉगिंग जो भी हो, आपने आकर कुछ लिंक दिखाकर काफी कन्फ्युज़न मिटा दिया। खैर आए तो!.
घुघूती बासूती

मैथिली गुप्त said...

हम तो आपको वाकई मिस कर रहे थे.
बढ़िया टांग अड़ाई है.

शैलेश भारतवासी said...

यह मुझे स्पष्ट नहीं था कि 'बीमा आग्रह की विषय-वस्तु है' का अर्थ क्या है। आप आयें तो पता चला। ब्लॉग को आग्रह की विषय-वस्तु कहना मुझे पसंद आया।

बाल किशन said...

सुंदर और विवाद को बढावा देने वाली एक अच्छी पोस्ट.
:) :) :)
पर अनूप जी की बात से सहमत हूँ.
जरा नियमित रूप से आया कीजिये सरजी.
:) :) :)

amit gupta said...

जो चाहे पढे- रिक्‍शावाला, झल्‍लीवाला या सामानवाला सबका स्‍वागत है।

ऊ सबे तो ठीक महाराज पर यो तो बताओ कि कौन से सामान वाला आपका ब्लॉग पढ़ सके है? और जिसके पास न रिक्शा हो ना झल्ली और ना ही कोई सामान, ऊ का का हुई रहे? :D

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

आपकी यह स्‍वागत पोस्‍ट पढ़ने से पहले से ही मैं आपके ब्‍लॉग पर आना शुरू कर चुका हूं। और झकास पोस्‍ट पढ़ता और खुलकर टिप्‍प्‍पणी करता हूं।


इसी तरह मार्गदर्शन करते रहें।