Saturday, August 11, 2007

वर्नाक्‍यूलर इंडैम्निटी बांड की शर्मिंदगी से गुजरे हैं कभी ?

अगर आपको कभी बैंक लोन लेना पड़ा हो , बीमा पॉलिसी लेनी पड़ी हो या किसी हाई कोर्ट या सर्वोच्‍च न्‍यायालय में कोई कागज दाखिल करना पड़ा हो- तथा अगर आप हिंदी में हस्‍ताक्षर करने वाले जीव हों तो आपको बेहद अपमानजनक प्रक्रिया से गुजरना पड़ा होगा- इस प्रक्रिया का नाम है- 'वर्नाक्‍यूलर इंडैम्निटी बांड' यानि गुलामों की भाषा विषयक दायित्‍वमुक्ति का करार।




अब हम लाख खुद को प्रगतिशील व रैशनल घोषित करें पर राष्‍ट्रवाद का इतना कीड़ा तो हममें भी है (और सच कहें हमें कोई शर्मिंदगी नहीं) कि हमें ये बात बेहद चुभती है कि ये देश है किसका... अगर अपनी भाषा में लिखने/बोलने पर हम जाहिल मान लिए जाते हैं और हमें लिख कर देना पड़ता है (गवाह के साथ) की हमें हमारी औकात वाली भाषा में समझा दिया गया है हजूर। हमारे नाम के सामने डा. लिखा था, हमारी बैंक सेल्‍स एजेंट बेचारी पत्राचार से बीए थी, खिसियाते हुए पर्चा आगे करती है- सर क्‍या करें रूल्‍स ऐसे हैं- गलत हैं पर पुराने चले आते हैं- हम भी पूरी व्‍यवस्‍था की खीज भला उस बेचारी पर क्‍यों निकालें पर अगर कहें कि अपमानित महसूस नहीं किया तो झूठ होगा।


न्‍यायपालिका की भाषा बिना किसी तैं पैं के अंग्रेजी है- संविधान नाम की वह किताब जो संविधान सभा नाम के जमावड़े ने लिखी जिसमें भाषा को लेकर आत्‍मविश्‍वास की गहरी कमी थी, उससे यही उम्‍मीद की जा सकती थी। हम कोई सिद्धांत नहीं गढ़ रहे, बुरे अनुभव को साझा कर रहे हैं, पर सब बुरा ही बुरा नहीं हो रहा भाषा के मोर्चे पर। हिंदी राष्‍ट्रवाद की कैद से आजाद हो रही है, और गनीमत है कि हो रही है। हिंदी जब एक भाषा की तरह जीने की राह छोड़कर राष्‍ट्र या संस्कृति का बोझा ढोने वाली डांगर बनती है तो वह बहुत कुछ से वंचित होती है। वह दूसरी देशी-विदेश भाषाओं से अठखेलियॉं करने का अवसर गंवाती है, कभी कभार संसर्ग या संभोग के उन अवसरों से भी वंचित होना पड़ता है जिनसे भाषा गाभिन होकर सृजन करती है। केवल हाल में मीडिया के उफान व बाजार की जरूरतों के चलते हिंदी 15 अगस्‍तों और 14 सितम्‍‍बरों से मुक्‍त होती दिख रही है और - आई एम लविंग इट :)


4 comments:

Mired Mirage said...

मैने इसे पढ़ लिया है ।
क्या हिन्दी में यह कहने से चलेगा ?
घुघूती बासूती

Isht Deo Sankrityaayan said...

भाई मेरे! मुझे पहले नहीं पता था. अभी-अभी जाना है आप ही से. इस पर तुरंत जनहित याचिका दायर करने की तैयारी की जानी चाहिए. क्या ख़्याल है?

Udan Tashtari said...

आप कह रहे हैं तब जाना. इष्टदेव जी बात से पूर्णतः सहमत हूँ. यह बदलाव आवश्यक है.

Amit said...

इस बांड के बारे में तो मुझे भी नहीं पता था!! :(