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Sunday, July 01, 2007

कभी कभी अनहिट, निर्लिंक व टिप्‍पणीशून्‍य भी लिखें- अपने लिए

इधर एक एक कर कई पोस्‍टें आई हैं जो अक्‍सर व्‍यंग्‍य में यह बताने का प्रयास करती हैं कि हिट पोस्‍ट कैसे तैयार हों। हिट होना शायद एक हुनर है जो मंडी की ताकतों पर निर्भर करने वाली चीज है ( इसीलिए तो आलोकजी आजकल हिट पर हिट पोस्‍ट डाल रहे हैं, आखिर वाणिज्‍य के शिक्षक हैं J ) हम इस हुनर में न तो कोई महारत रखते हैं न हमें ऐसी कोई उम्‍मीद है कि चाहें तो भी ये हुनर सीख पाएंगे। जब अपनी किसी पोस्‍ट को अधिक लोग पढ़ते हैं तो अक्‍सर ये तसल्‍ली तो होती है कि चलो लोगों की नजर गई पर यह भी सच है कि अक्‍सर हमें पता होता है कि पोस्‍ट में कोई विशेष दम नहीं था...या तो भीड़तंत्र के बहाव में लिखी (और पढ़ी) गई है या दिन विशेष को लोगों के पास खाली समय था तो उन्‍होंने इस कीबोर्डपीट पर नजरे इनायत डाल दी हैं। इससे तसल्‍ली तो मिलती है पर आनंद...रचना का आनंद जरूरी नहीं कि मिल ही जाए। पोस्‍ट की रचना का आनंद कैसे मिलता है ? इसके कुछ बाहरी मापदंड भी हैं किंतु दरअसल उनकी कोई जरूरत ही नहीं होती आपको रचते ही अहसास हो जाता है कि इसे लिखकर वह आनंद आया जिसकी कुलबुलाहट में रात काली किए फिरते रहे हैं। मसलन मैं अपनी पोस्‍टें देखता हूँ तो टिप्‍पणियॉं, हिट, लिंक किसी भी नजरिए से खास नहीं मानी गई पर ‘...क्‍योंकि भाषा भी एक फ्रैक्‍टल है’ वह पोस्‍ट है जिसने मुझे रचना का संतोष दिया। पर यह भी जरूरी नहीं कि चिट्ठाकार को केवल वहीं पोस्‍ट संतोष दें जिनके अपराध समय लिखता हो- मतलब विवादों से दूर.. जी नहीं। ‘ये धुरविरोधी कौन है ’ बाकायदा एक धुरविरोधी स्‍टैंड लेती पोस्‍ट है तथापि एक जरूरी किस्‍म की पोस्‍ट है।
पर ये आंतरिक किस्‍म की बात को जाने दें तो एक अच्‍छी पोस्‍ट जो ट्राल न हो- थुक्‍का फजीहत में न लिखी हो, उसकी पहचान का क्‍या तरीका हो। एक तरीका तो गूगल-टेक्‍नाराटी का आजमाया हुआ है और हमें सटीक जान पड़ता है- ये है लिंक का। देखें कि पोस्‍ट को कितनी बार और किस किसने लिंक किया है। दरअसल जब कोई किसी को लिंक देता है तो वह उसके लेखन को महत्‍व दे रहा होता है और यदि आप यदि कोई बेहद अक्‍खड़ बकरी की लेंड किस्‍म के लेखक नहीं हैं तो आप सिर्फ खुद को ही फन्‍ने खां नही मानते वरन दूसरों को पढ़तें हैं व उनके लिखे का सम्‍मान करते हैं- ऐसा अक्‍सर आप टिप्‍पणी करके करते हैं। लेकिन यदि कभी आप उससे जुड़े किसी विषय पर लिखते हैं तो जाहिर है कि आप पहले लिखे गए को संदर्भित कर उसे उसका देय सम्‍मान अर्पित करते हैं- ये लिंक इस पोस्‍ट के महत्‍व को रेखांकित करते हैं। लेखक को संतुष्टि व पाठक को गुणवत्‍ता का प्रमाण इन लेखों से मिलता है। इस लिंकों की तुलना सहज ही किसी अच्‍छी किताब के फुटनोटों से की जा सकती है- अगर आपके काम को लोगों के लेखन के फुटनोट में जगह मिलने लगे तो जान जाइए कि अब आप काम का लिखने लगे हैं- ये ब्‍लॉगरोल से भिन्‍न और ज्‍यादा जरूरी लगती है हमें। बलॉगरोल तो आप दोस्‍ती निबाहने के लिए भी डाल लेते हैं पर पोस्‍ट में बिना संदभ्र के दिया गया लिंक झट दिखाई देता है।
हिंदी चिट्ठाकारी में बाकी बिमारियों के अलावा दूसरों के महत्‍व के कम होने में ही मेरा महत्‍व है किस्‍म की गलतफहमियॉं भी हैं। ऐसे कई अवसर दिखाई देते हैं जहॉं केवल सम्‍मान देने के लिए या प्रमाणिकता लाने के लिए नहीं वरन लेखन को सुपाठ्य-सुबोध बनाने के लिए भी यह जरूरी होता है कि लिंक दें वहॉं भी लिंकन से बचने का प्रयास किया जाता है। आशय यह है कि किसी पोस्‍ट की गुणवत्‍ता का अनुमान लगाने में यह तथ्‍य भी सहायक हो सकता है कि उसे कितने लोगों ने लिंक किया है किंतु इस मापदंड के कारगर होने की शर्त यह भी है कि साथी चिट्ठाकार अन्‍य लोगों को पढ़ने व उन्‍हें लिंक देने की जहमत उठाएं।

इसके अलावा टिप्‍पणियॉं व हिट तो पैमाना हैं ही जिनपर पहले ही कई गीगाबाईट लिखा जा चुका है- कहें तो लिंक दूँ। हम तो ये करते हैं कि कोशिश करते हैं कि एक संतुलन बन पाए तो भला। कुछ चिट्ठापाठकों के लिए लिखते हैं तो बीच बीच में कुछ कुछ अपने लिए भी लिख बैठते हैं- लोग पढ़ें और सराहें तो भी ठीक है- वरना खुद को तो आनेद मिला। इसलिण्‍ साथी चिट्ठाकारो सबके लिए लिखो लेकिन कभी कभी सिर्फ अपने लिए भी लिखें।