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Tuesday, July 10, 2007

हिंदी ब्‍लागिंग की ग्रेपवाइन कहीं अंडरवर्ल्‍ड तो नहीं बन रही

कामकाज की समझ में ग्रेपवाइन से आशय अनौपचारिक संचार से होता है- मसलन यदि आप एक अफसर हैं तो जो लिखित या मौखिक संवाद आप अपने मातहतों या अफसरों से करते हैं उसके अलावा भी एक पूरी संचार की दुनिया आपके संस्‍थान में चल रही होती है। आपका चपरासी आपके क्‍लर्क के कान में फुसफुसा रहा होता है- कुछ अफवाहें भी चल रही होती हैं वगैरह वगैरह। ये सब अनौपचारिक संचार है, इसके सबूत नहीं होते पर इतना तय होता है कि किसी भी संगठन व में यदि दो या अधिक व्‍यक्ति हैं तो औपचारिक व अनौपचारिक संचार दोनों चलते हैं- ये समानांतर होते हैं। औपचारिक संचार के विपरीत ग्रेपवाइन त्‍वरित होता है, आपसी विश्‍वास पर आधारित होता है तथा औपचारिक संचार के जितना ही, कभी कभी अधिक प्रभावशाली होता है। प्रबंधन की पुरानी विचारधारा मानती थी कि इससे ऊर्जा जाया होती है तथा संगठन के उद्देश्‍यों में बाधा होती है इसलिए ग्रेपवाइन को रोकने की कोशिशें होती थीं। किंतु नवीन प्रबंधकीय विचार इन्‍हें अपरिहार्य मानते हैं तथा इस समानांतर प्रक्रिया को मुख्‍य संचार के पूरक में देखते हैं। गूगल ने तो अपने संगठन में इसे औपचारिक संचार से भी ज्‍यादा अहमियत दी और कहा जाता है कि गूगल की सृजनात्‍मकता का एक बड़ा कारण ग्रेपवाइन का बेहतर इस्‍तेमाल किया जाना रहा है।
अब सवाल यह है कि इसका ब्‍लॉगिंग से क्‍या लेना देना है। जबाव यह है कि दरअसल ब्‍लॉगिंग खुद में ही एक ग्रेपवाइन ही है। कम से कम माना तो यही जाता है। ये अनौपचारिक संचार है, अक्‍सर लोग अपने नाम या बेनाम वे सब कहते हैं जो औपचारिक रूप से कहा नहीं जा सकता। दरअसल ग्रेपवाइन के सभी तत्‍व ब्‍लॉगिंग में पाए जाते हैं इसीलिए कम से कम अंग्रेजी में तो ब्‍लॉगिंग को ग्रेपवाइन ही माना जाता है- छद्मनाम/बेनाम ब्‍लॉगिंग वहॉं स्‍वागतयोग्‍य मानी जाती है तथा सरकारें, मीडिया व खुफिया संगठन, कंपनियॉं सब ही इन ब्‍लॉगों पर व्‍यक्‍त विचारों को लोगों की वास्‍तविक राय मानकर समझने का प्रयास करते रहे हैं। इसीलिए खुद ब्‍लॉगिंग ने भी अपने को अनौपचारिक संचार के रूप में ही विकसित किया है तथा उसमें और एक अनौपचारिक संचार की जरूरत कम महसूस होती है।
लेकिन वह तो अंग्रेजी ब्‍लॉगिंग है- हिंदी की ब्‍लॉगिंग का तेवर अलग है। हिंदी ब्‍लॉगिंग बजाय एक ग्रेपवाइन होने के खुद औपचारिक संचार की भूमिका में आने की कोशिश करती रही है। वह एक प्रवाहमान-फ्लयूडिस संचार होने की जगह एक ठोस पोस्‍चर बनने में अधिक विश्‍वास करती दिख रही है- परिणाम यह है कि उसमें एक ग्रेपवाइन की जगह एक औपचारिक संचार के लक्षण अधिक दिख रहे हैं, लेकिन जैसा कि तय है कि कोई भी औपचारिक संचार बिना समानांतर अनौपचारिक संचार के हो ही नहीं सकता इसलिए यहॉं भी ब्‍लॉगिंग की अपनी एक ग्रेपवाइन खड़ी हो रही है। लोगों आपसे में चैट कर रहे हैं, ईमेल कर रहे हैं और उनसे ही ‘काम चला’ ले रहे हैं, चिटृठे पर तो वे बस 'पोश्‍चर' दिखा रहे हैं, पोजीशन ले रहे हैं। आपसी नेटवर्क तैयार हो रहे हैं और कुछ कुछ पकड़ में आ सकने वाले गुट दिखाई दे रहे हैं। आप अगर कविता/बविता लिखने वाले शख्‍स नहीं हैं तो आप पर होने वाली टिप्‍पणियॉं एक पोजीशन हैं- संचार नहीं। सूत्र और सूत्रधार तैयार हो रहे हैं। ब्‍लॉग तो केवल दिखने वाली बत्तियॉं हो गए हैं जिन्‍हें परिचालित करने वाले सर्किट व बैटरियॉं सतह के नीचे चले गए हैं। केवल बहुत नाराजगी (या सत्‍ता के समायोजन की कोशिश) में ही वह उघड़ के बाहर आ पा रहे हैं, जब कोई अपने ब्‍लॉग पर अचानक पुरानी बातचीत का ब्‍यौरे का हवाला देते हुए कुछ लिख पटकता है। इससे कुछ सफाई पसंद लोगों को लगता है कि अच्‍छा है ब्‍लॉगों पर साफ सुथरी बाते ही दिखाई दे रही हैं- नागवार गुजर सकने वाली बातें ईमेल व चैट के सीवर में बहती रहें पर ऊपर सब साफ साफ दिखाई दे।

जब इस बात को ध्‍यान से देखें कि दरअसल ब्‍लॉगिंग को तो खुद ही वह काम करना था जो ग्रेपवाइन करती है, अब हिंदी ब्‍लॉगिंग में ही एक ग्रेपवाइन खड़ी हो गई है। और उस पर मुश्किल ये कि यह स्‍थापित तथ्‍य है कि ग्रेपवाइन, औपचारिक संचार से ज्‍यादा ताकतवर होती है। बैकचैनल डिप्‍लोमेसी, डिप्‍लोमेसी से ज्‍यादा ताकतवर होती है। आलोक पुराणिकजी का कहना है कि हर वर्ल्‍ड का अंडरवर्ल्‍ड ज्‍यादा मजबूत होता है। इसलिए अब जब औपचारिक व अनौपचारिक संचार के सूत्रधारों के चिट्ठे या टिप्‍पणियॉं दिखती हैं तो अनायास ही दिमाग उसके पीछे के सर्किट व बैटरियों पर चला जाता है- जब कोई ईमेल या चैट या फोन पर कुछ कहने की कोशिश करता है तो आशंका होती है कि कहीं हम भी तो किसी बत्‍ती का सर्किट तो नहीं बनने जा रहे (गनीमत है बैटरी लायक दम हममें नहीं है)

घुघुतीजी दिल्‍ली पहुँच गईं हैं उसने बात हुई- उन्‍होंने कहा कि उनके दामाद को इस बात पर घोर आपत्ति व हैरानी हुई कि किसी अन्‍य के कहने पर उन्‍होंने अपनी पोस्‍ट व कमेंट डिलीट कर दिए क्‍योंकि यह झुकना उनके व्‍यक्तित्‍व के अनुरूप नहीं था। मुझे याद नहीं कि घुघुतीजी यह बात अपने चिट्ठे पर कहीं लिख पाई या नहीं। अगर धुरविरोधी के चिट्ठे को हम आत्‍महत्‍या मानते हैं तो जाहिर है घुघुतीजी की उस पोस्‍ट का मिटना हत्‍या है जो हिंदी चिट्ठाजगत के अंडरवर्ल्‍ड द्वारा की गई।

Monday, June 18, 2007

ई-स्‍वामी जी मेरी एक और फिकर का जिकर सुनें

चलें अब आगे देखें...होनी को कौन टाल सकता है। :(

चिट्ठाजगत में मारकाट है और जैसा प्रत्‍यक्षा ने कहा कि टुमारो भी कुछ खास बेटर प्रतीत नही हो रहा। पर समय तो आगे की ही ओर चलेगा...इसलिए आगे की ओर ही देखें। पहले बार बार कहा जा रहा था कि मेल भेजकर दिखाओ अब आशंका हो रही है कि लोग मेल भेज भेजकर न कहने लगे कि हमें हटाओ....तब क्‍या होगा...उस पर ही विचार करने का इरादा है।

मिश्राजी ने पोस्‍ट लिखकर समझाया बाते पहले से पता थीं- ये भी कि ये ऐसे कही भी जाएंगी, उस पर भी आएंगे फिर कभी, पर फिलहाल उस बात को लें जो सबसे जरूरी है और ये कही अनामदासजी के चिट्ठे पर ई-स्‍वामी ने, मेरी आज की पोस्‍ट की प्रेरणा वहीं से है। खुद को वे कोडिंग-प्रोग्रामिंग से कमाने खाने वाला कहते हैं और इशारा करते हैं कि तकनीकी मामला हो तो हम निपट लें पर ये तर्क-कुतर्क-विरोध-प्रतिरोध-राजनीति-भावना-भाषा के पचड़े निपटाने में दूसरों को पहल करनी चाहिए। अच्‍छा लगा ई स्‍वामीजी कि आपने यह कहा। तकनीकी-गैर तकनीकी के घालमेल ने इस मामले का संभालने के कई अवसर गंवाने पर विवश किया ऐसा मुझे लगता है। पर चूंकि पीछे नही आगे देखना है इसलिए उस सब को याद नहीं करूंगा, कुछ और याद करूंगा। दो महीने हुए एक पोस्‍ट लिखी थी जिसपर संजयजी व ई-स्‍वामी ने (काम मत कर/काम की फिकर कर/फिकर का जिकर कर) जैसी राय दी थी, उस पोस्‍ट में कहा था-

.... संपादकीय विवेक की कैंची (जो कम से कम शुरूआती दिनों में इन पुराने चिट्ठाकारों के हाथ में ही रहने वाली है) से घाव करने पड़ेंगे। दूसरा प्रभाव विवाद शमन भूमिका पर पड़ने वाला है। नए चिट्ठाकार जिन्‍हें विवाद सफलता की सीढ़ी दिखते हैं उन्‍हें सलाहें नागवार गुजरेंगीं और एकाध बार अंगुलियाँ जलाने के बाद वरिष्‍ठ अंगुलिया विवादों के ताप से दूर रहने लगेंगी यूँ भी संपादकीय गमों से कम ही अवकाश होगा इनके पास।

कल्‍पना कुछ बाद के लिए की थी लेकिन जल्‍दी हो गया और कतई खुश नही हूँ कि मेरी आशंका (या फिकर का जिकर) सही साबित हुआ।

कारण कुछ कुछ ई स्‍वामी पहचान रहे हैं अब चुनौतियॉं जितनी तकनीकी हैं उससे अधिक गैर तकनीकी, भाषा, या संपादकीय विवेक की हैं- मसलन कल की चुनौती है (शायद आज ही की है) कि उन चिट्ठों का भी एग्रीगेशन किया जाए जिनकी कोई रूचि नहीं है कि नारद में वे रहें कि हटा दिए जाएं, या जो ईमेल भेज चुके हैं- अपनी तो स्‍पष्‍ट राय है कि नारद को पंजीकरण की आवश्‍यकता पर पुनर्विचार करना चाहिए- यानि नारद खुद उन चिट्ठों का भी एग्रीगेशन शुरू करे जिन्‍होंने कोई आवेदन नहीं दिया है। ऐसा क्‍यों- इसलिए कि अगर वैचारिक असहमति, व्‍यावसायिक कारण, जानकारी के अभाव, आलस्‍य, जिद, राजनीति या कोई अन्‍य कारण से किसी चिट्ठाकार को यह लगता है कि उसे नारद की जरूरत नहीं है तो इससे स्‍वमेव यह सिद्ध नहीं होता कि नारद या हिंदी चिट्ठाकारी को भी उस चिट्ठे की जरूरत नही है। हो सकता है कि इस बेरूखी के बाद भी फीड लिए जाने से चिट्ठाकार को नागवार गुजरे पर इस पक्ष को साफ समझ लिया जाए कि सार्वजनिक चिट्ठे की फीड किसी की बपौती नहीं हैं- खुद चिट्ठाकार की भी नहीं। चिट्ठे पर क्‍या लिखा जाए यह तो चिट्ठाकार ही तय करेगा लेकिन यदि चिट्ठा सार्वजनिक है (यानि यदि वह पासवर्ड सुरक्षा के साथ केवल परिजनों व मित्रों के लिए नहीं लिखा गया है) तो उसे कौन पढ़े इसे तय करने का अधिकार चिट्ठाकार को नहीं है। चिट्ठापाठक होने के नाते हर सार्वजनिक फीड पर सर्वजन का अधिकार है। इससे एग्रीगेटर इनक्‍लूसिव बनेगा। यदि सुनो नारद पर कुछ मेल आ गई हैं तो उन पर तैश में आकर स्‍वीकृति देने से पहले जिम्‍मेदार लोग कृपया फॉर बेटर टुमारो उन्‍हें झट तथास्‍तु न कर दें तकनीकी मजबूरी हो तो अलग बात है पर संभव हो तो कोडिंग/प्रोग्रमिंग वाले उस तकनीकी मजबूरी को भी सुलट लें :)

Friday, April 27, 2007

ब्‍लॉगराइनों की व्‍यथा........नारद पर बजर गिरे

हमारे पुराने घर के पड़ोस में एक मास्‍टराईन रहती थीं, अब थीं तो वह सामान्‍य गृहिणी ही पर चूंकि उनके पति प्राईमरी स्‍कूल मास्‍टर थे इसलिए उन्‍हें मास्‍टराईन की पदवी सहज ही हासिल हो गई। कस्‍बों की तो यह रीत रही ही है और लिंग बदलों के सवाल के जवाब में सालों से लिखा आता आ रहा है कि मोची- माचिन, धोबी-धोबन, डाक्‍टर- डाक्‍टरनी (डाक्‍टराइन) .... इस तर्ज पर ब्‍लॉगर पत्‍नियॉं हुईं ब्‍लॉगराइन। तो मित्रो आज की कथा ब्‍लॉगराइनों की व्‍यथा है। वे ब्‍लॉगराइनें जो खुद तो ब्‍लॉगियाती नहीं है पर चूंकि उनके पति ब्‍लॉगियाते हैं इसलिए भुगतती हैं। नोट पैड ने विवाह के शोषण पर लिखा तो डिस्‍क्‍लेमर लगाया कि उन्‍हें ही दु:खी न मान लिया जाए..और यूँ भी आजकल तो डिस्‍क्‍लेमर ‘इन थिंग’ हो गए हैं। इसलिए साफ बता दें कि ये हमारी या हमारी पत्‍नी की व्‍यथा नहीं है क्‍योंकि हमारी गत तो और बुरी है। एक ही उल्‍लू काफी होता है बरबादे गुलिस्‍तां करने को यहॉं तो सभी ब्‍लॉगर हैं....पर वो फिर कभी। आज तो शुद्ध ब्‍लॉगराइनों पर लिखा जाए।

यूँ तो ब्‍लॉगराइनें भी मनुष्‍य प्रजाति की ही प्राणी होती हैं और यह वृत्ति उन्‍होंने अपनी पसंद से नहीं चुनी होती वे इस दुनिया में धकेल दी गईं होती हैं। उनके पिताओं ने या खुद उन्‍होंने तो अच्‍छे खासे खाते पीते और जिंदा इंसानों को चुना था पर बुरा हो उस आलोक जो ये लिख मारा।



नमस्ते।
क्या आप हिन्दी देख पा रहे हैं?
यदि नहीं, तो यहाँ देखें।

हाँ भैया हम तो देख पा रहे हैं पर क्‍या तुम देख पा रहे थे कि ये लिखकर तुम कितने घरों की बरबादी का सामान लिख रहे हो। मुआ मरद सुबह से शाम तक नौकरी पीट कर आता है और घर में घुसते ही बिना कमीज उतारे, जूते रैक में रखे सीधा कंप्‍यूटर की ओर लपकता है, कंप्‍यूटर ऑन करके बाथरूम में घुसता है ताकि जब तक वापस आए कंप्‍यूटर ऑन हो जाए और फिर गिटर पिटर शुरू।
....हम तो खरीदी हुई लौंडी हो गई हैं अरे इससे तो बाहर कोई चक्‍कर वक्‍कर ही चला लेता कम से कम घर में तो हमारा होता। ओर फिर तब तो तमाम दुनिया की सहानुभूति हमारे साथ होती। अब सारी दुनिया समझती है कि कितना शरीफ आदमी है सर झुकाए मोहल्‍ले भर से गुजरता है किसी की तरफ ऑंख उठाकर देखता तक नहीं- अब कौन बताए कि देखेगा क्‍या खाक चलते चलते तक तो दिमाग नारद पर अटका होता है...मन मस्तिष्‍क ऑनलाइन होता है टिप्‍पणियॉं सोची जा रही होती हैं स्‍माइली लग रही होती हैं...हाय मॉं मेरे ही साथ ऐसा होना था। ओर यह प्रोषित पतिका विरहिणी जार जार रोती है। वह अचानक त्रिलोचन की चम्‍पा बन जाती है-


चम्‍पा काले पीले चिट्ठे नहीं चीन्‍हती...
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नारद पर बजर गिरे


इस चिट्ठा प्रेरित विरहावस्‍था का आलम यह है कि पति पर अब धमकियों का असर नहीं होता...मायके चले जाने को वह अवसर की तरह लेता है और लौटने पर उसके चिट्ठे का टैंपलेट बदला हुआ होता है...कई जुगाड़ी लिंक उसने जॉंच लिए होते हैं, उसके गूगलटॉक में कई नए चिट्ठेकार जुड़ गए होते हैं। पत्‍नी मन मसोसका अगली बार मायके न जाने की प्रतिज्ञा करती है। इस विरहावस्‍था में वह विरह की दसो दशाओं से गुजरती है।

अभिलाषा- आज जब ब्‍लॉगर आएगा तो उसे ब्‍लॉग नहीं मैं याद होंगी, या काश आज तीन घंटे बिजली न रहे।
चिन्‍ता- कहीं मुआ रास्‍ते में ही किसी साईबर कैफे में न घुस गया हो।
स्‍मृति- उसे याद आते हैं वे रात दिन....जब कोई कंप्‍यूटर न था, नारद न था...बस मैं थी और तू था।
गुणकथन – वह बहुत संवेदनशील था, प्‍यार करता था मतलब जो कुछ वह प्रोफाइल में लिखता है चिट्ठों में बताता है पहले सच में वह ऐसा था।
उद्वेग – सौतन कंप्‍यूटर के पास रखे होने के कारण ए.सी. की हवा भी लू के समान प्रतीत होती है।
प्रलाप - हाय।। इस नारद को, आलोक को, चिट्ठे को मेरी हाय लगे...नारद पर बजर गिरे
उन्‍माद – आज...आज या तो इस घर में मैं रहूँगी या ये कंप्‍यूटर....(फिर इसका मतलब समझ में आ जाता है कि कंप्‍यूटर का विरहिणी कुछ बिगाड़ नहीं पाएगी इसलिए शांत हो जाती है)
व्‍याधि – अब क्‍या होगा...इस चिंता में ब्‍लॉगराइन बिस्‍तर पकड़ लेती है- कमबख्‍त ब्‍लॉगर इस पर भी साथी बलॉगर से राय लेकर ही कुछ करने का विचार करता है।
जड़ता – अब ब्‍लॉगर के आने की घंटी बजती है, बलॉगराइन पर कोई असर नहीं होता वह सुख दुख से दूर हो गई है।
मरण- इसका वर्णन निषिद्ध है वरना ये भी संभव है।

तो हे चिट्ठाकारो।। जागो अपने अमर्त्‍य चिट्ठाजीवन में ब्‍लॉगराइन के प्रति इतने निष्‍ठुर न हो जाओ। वैसे है तो ये हमारी धूर्त ब्‍लॉगिंग ही कि ब्‍लॉगिंग के अनाचार को भी एक पोस्‍ट बना दिया जाए पर क्‍या करें आदत से मजबूर हैं।

Saturday, April 14, 2007

खचेढ़ू चिंतामणि - चिटठावीरता का स्‍थाई भाव : चिट्ठोत्‍साह



अरे चाचा ई...ई का कर रहे हो। हमने खचेढ़ू चाचा को खाट की अदवायन को कसते देखा तो हमारे मुँह से बरबस निकला। हमारी हालत वैसे ही हो गई थी जैसे अवैध दुकान पर सील लगते देख मोटे लाला की होती है। मुसलमान को तरक्‍की करते देख मुलायम की होती है, दलित को तरक्‍की करते देख मायावती की होती है। मतलब हर उस सही काम को देखकर उस व्‍यक्ति की होती है जिसकी दुकानदारी उस गलत की ही वजह से चल रही होती है। अब दो दो पोस्‍ट लिखकर खचेढ़ू चाचा के ढीली अदवायन का ब्रांड सेट किए थे। पहले बताया कि ढीली अदवायन जोर के आईडिया बुलाने का मूल मंत्र है। फिर बताया कि ढीली अदवायन पर रखे कंप्‍यूटर तक में चिट्ठाशास्‍त्र के सूत्र रचने की कूवत आ जाती है। अब ये हमारे चाचा उसी ढीली अदवायन को कसे जा रहे हैं... हमारी तो दुकान बढ़ा दी बैठे बैठे। हमने कहा चाचा ऐसे किसी की रोजी को कसना ठीक नहीं बताओं क्‍या बात है- हम समझा लेंगे परमोद भैया को कि कुत्‍ता गू रहने दें गाय का शुद्ध गोबर ही ठीक है आपके लैपटॉप का सहारा बनने के लिए, और कहो तो दर्जनभर उपले खरीदकर रखवा देता हूँ। वे हँसकर बोले क्‍या बच्‍चे इस गढ़ी मेंडू गॉंव में हम किसी परमोद के परभाव में नहीं आते वो तो हम आज हम उत्‍साह में थे इसलिए सोचा इस ससुरी अदवायन को हाथ लगा दें।
उत्‍साह....उत्‍साह, यही तो है चिंतामणि का अगला निबंध। अब हम भी उत्‍साह में भर गए। हमने कहा अरे अदवायन छोडि़ए लैपटॉप टिकाइए और इस उत्‍साह नाम के मनोविकार का विवेचन कीजिए इस अमर्त्‍य चिट्ठालोक की दुनिया में। यानि हे आचार्य खचेढ़ू चाचा लिखिए अपना अगला निबंध हम आपके साथ हैं। बस खचेढ़ू चाचा शुरू हो गए.. पेश है-

उत्‍साह बोले तो दिन में तीन पोस्‍ट, तेईस टिप्‍पणी (दूसरों के चिट्ठों पर), स्‍टेटकाउंटर 24 X 7 खुला। असल दुनिया में जिसे बिफरना कहते हैं चिट्ठाजगत में उसे ही उत्‍साह कहा जाता है। ओर बिफरा हुआ सांड जब गढ़ी मेंडू के यमुना खादर में हांडता है तो वह गाय ही नहीं भैंस, भैंसे, बैल ओर तो और कभी कभी दूसरे सांड पर ही सवार होने की कोशिश करता देखा गया है। इसी प्रकार उत्‍साह वह (दु)साहसपूर्ण आनन्‍द की उमंग है जिसमें एक चिटृठाकार आंखें ओर अंगुलियों की थकान, बैंडविथ और बिजली के खर्च, बीबी और बच्‍चों की नाराजगी..... कुल जमा दुनिया की हर फिकर से अविचलित रह कर बस चिट्ठाकारी करता है, वह तय मानकर चलता है कि उसकी अगली पोस्‍ट अकेले 1500 हिंट लेकर आएगी। शकुलजी (ये नहीं वो...रामचंदर सकुल) पहले ही बता गए हैं कि वीर जिसका स्‍थाई भाव उत्‍साह है वह केवल युद्ध में ही नहीं तुषार मंडित अभ्रभेदी अगम्‍य पर्वतों की चढ़ाई, ध्रुव प्रदेश या सहारा के रेगिस्‍तान का सफर, क्रूर बर्बर जातियों के बीच अज्ञात घोर जंगलों में प्रवेश इत्‍यादि भी वीरता के कर्म हैं। इनमें जिन आनन्‍दपूर्ण तत्‍परता के साथ लोग प्रवृत्‍त हुए हैं वह उत्‍साह ही है।
ध्‍यान से देखें शुक्‍लजी पहले ही बता गए हैं कि चिट्ठाकारी करना अरे वही....... 'क्रूर बर्बर जातियों के बीच अज्ञात घोर जंगलों में प्रवेश ' भी इसमें शामिल है। यहाँ जिस आनंदपूर्ण तत्‍परता से गदा भांजते हैं, संहार करते हैं, ब्‍लॉग बैन करवाते हैं, दूसरे को नीचा दिखाते हैं, जहर उगलते हैं यह कमाल की चिट्ठावीरता है और यह तत्‍परता ही चिट्ठोत्‍साह है।

Friday, April 13, 2007

टैक्‍नोराटी हिंदी ब्‍लॉगिंग का कर्बला क्‍यों है

टिप्‍पणी चिंतन के प्रत्‍येक पुरोधा ने बताया कि परस्‍पर पीठ खुजाना है, उधार चुकाना है, एक दूसरे को बढ़ावा देना है। देखा जाए तो भला काम है। पर इसी किस्‍म का एक और काम है जो इसी तरह एक दूसरे की पीठ खुजाना है, उधार चुकाना है और भला काम है पर दिक्‍कत है कि अधिक कसाले काम है और कुछ ज्‍यादा सृजनात्‍मकता की मॉंग करता है और वह है परस्‍पर लिंकन। यानि लिंक देना और लिंक लेना। वैसे विवादों से यह सधता होगा पर फिलहाल हम उस पर बात नहीं कर रहे हैं। हम तो इस सवाल पर मगजमारी कर रहे हैं कि ये टैक्‍नोराटी जो इन लिंकन-प्रतिलिंकन की चाल पर नजर रखता है उससे मूल्‍यांकन करता है वो भला इतना हिंदी विरोधी क्‍यों है। एकाध बिरले को छोड़ दें तो अधिकतर चिट्ठों के परिचय में कोयले से भरी मॉंग की तरह सजा होता है - नॉट इन टॉप 100000।


यानि हिंदी चिट्ठे चोटी के 100000 चिट्ठों में भी शुमार नहीं होते। ऐसा क्‍यों भई... कोई तो बताए।
अब उदाहरण के लिए चिटृठा चर्चा पर विचार करें जो अंतत: एक चिट्ठा ही है। एक बेहद लोकप्रिय चिट्ठा है खूब पढ़ा जाता है और खूब लिखा जाता है। अब तक 340 पोस्‍ट लिखी जा चुकी हैं। यदि टैक्‍नोराटी की ही भाषा में बात करें तो यह बहुत से हिंदी चिट्ठाकारों के ब्‍लॉग रोल में भी है। और लिंक- अब क्‍या कहें यह तो है ही लिंक (आऊटवर्ड) देने के लिए और इनवर्ड लिंक भी मिलते ही हैं। लेकिन यदि टैक्‍नोराटी जाकर झांकें तो मिलता है ये-





अब कोई टेकीज में से हमें बताए कि कैसे इतना लोकप्रिय चिट्ठा चर्चा 4 लिंक दिखा पा रहा है ( वैसे नीचे खुद ही 664 लिंक बताता है) और रैंक 10,38,416 जबकि मुझ जैसे कुनाम ब्‍लॉगर तक का रैंक डेढ़-पौने दो लाख के लपेटे में है। पर इसका मतलब ये नहीं कि टैक्‍नोराटी की जरूरत नहीं है। है और बिल्‍कुल है। हमें चाहिंए कि परस्‍पर रुचि के विषयों पर लिखें और यही नहीं वरन बाहर के लोगों की रुचि के विषयों पर ध्‍यान दें ताकि ये जो टैक्‍नोराटी हिंदी ब्‍लॉगिंग का करबला बना हुआ है वहाँ कुछ सुधार हो। वैसे एक मजेदार पोस्‍ट इस लिहाज से मानसजी क‍ि यह पोस्‍ट है जिसमें उन्‍होंनें हर चिट्ठे को गिना दिया है जिससे शायद सबका टैक्‍नोराटी हित सधता हो (शायद इसलिए कि मेरे लिंको की जो सूची टैक्‍नोराटी पर थी उसमें तो इसका उल्‍लेख पता नही क्‍यों नहीं था) या फिर टेक्‍नोराटी फेवरेट एकसचेंज के इस कार्यक्रम पर विचार करें।

Friday, April 06, 2007

हिंदी चिट्ठाकारी का अगला युग

इधर हिंदी चिट्ठाजगत में कुछ वैसा हो रहा है जैसा कि छायावाद के समय हिंदी साहित्‍य में हुआ, यानि अस्तित्‍व के सवाल से मुक्‍त होकर भविष्‍य के लिए निर्द्वंद्व रचनाधर्मिता शुरू हुई। द्विवेदीयुग वाली यह चिंता कि पता नहीं हिंदी (खड़ी बोली) रहेगी कि नहीं, रहेगी तो क्‍या स्‍वरूप रहेगा। इस तरह के सवाल अक्‍सर द्विवेदी युगीन कर्णधारों को दुखी करते थे पर छायावाद जो इन चिंताओं से तैयार जमीन पर ही खड़ा था पर इनसे अप्रभावित व अकुंठ था। उसने भाषा और संवेदना दोनों ही स्‍तर पर स्‍वतंत्रता का परिचय दिया। अब समकालीन हिंदी चिट्ठाकारिता पर सोचें- वह अपना एक निश्चित रूप ग्रहण करती चल रही है और नए चिट्ठाकार इस आशंका से ग्रस्‍त नहीं है कि कल हम हों न हों..। वे पहली दूसरी पोस्‍ट से ही विवादों में हाथ डालते हैं, जमे अधजमे लोगों पर अकुंठ टिप्‍पणी करते हैं, व्‍यंग्‍य करते हैं, पंगा लेते हैं, सवाल उठाते हैं, सफाई माँगते हैं। अच्‍छे संबंध से उन्‍‍हें गुरेज नहीं पर वे इसके लिए वे अतिरिक्‍त प्रयास करते नहीं दिखाई देते न ही उन्‍हें धमकी या धमकावलियों से कोई खास चिंता नहीं होती भाषा के स्‍तर पर भी वे अकुंठ हैं- जूते, जूतियाते हैं, चूतियापा करते हैं, गदा चलाते हैं, पीठ खुजाने, खुजवाने स्‍तर की दैहिकता भी आ ही गई है। कर्णधार भी अब अपना ऐतिहासिक महत्‍व स्‍वीकारते हुए इतिहास वर्णन की ओर अग्रसर हुए हैं। मतलब साफ है कि यदि संकेतों की ओर ऑंखें मूंदने के स्‍थान पर उन पर विचार किया जाए तो कुछ सवाल दिखाई दे रहे हैं -

1- क्‍या हिदीं चिट्ठाकारिता में युग परिवर्तन का समय आ गया है ?
2- नए युग की नई चुनौतियाँ क्‍या हैं ? पुराने चिट्ठाकारों ओर स्‍थापित संरचनाओं के लिए बदलाव से कौन सी नई चुनौतियाँ हाजिर हुई हैं?
3- और सबसे महत्‍वपूर्ण सवाल यह है कि क्‍या हम इस नए बदलाव के लिए तैयार हैं- प्रौद्योगिकीय रूप से, भाषिक रूप से और चिट्ठासमाज की दृष्टि से?

ऊपर के पहले सवाल का जबाव इतना कठिन नहीं, बदलाव के चिह्न इतने स्‍पष्‍ट हैं कि
उनकी अवहेलना करना आसान नहीं। मसलन पिछले सप्‍ताह ही मुक्‍तक समारोह को इसलिए
स्‍थगित करना पड़ा कि सामग्री कि इस अधिकता के लिए हमारा नारद तैयार नहीं था, यूँ
भी रोज पचासेक नई पोस्‍ट के लिहाज से पहले पृष्‍ट पर बना रहना एक संघर्ष हो गया है,
जनसंख्‍या तेजी से बढ़ रही है जाहिर है अहं के टकराव भी बढ़ रहे हैं। बदलाव केवल
संख्‍या का ही नहीं है विषय भी बदले हैं, विवादमूलक विषय से परहेज समाप्‍त हुआ है।

अगर पुराने चिट्ठों के पुरालेख खंगाले जाएं तो हमें विवादों को लेकर अलग दृष्टि दिखाई देती है, अब विवाद श्रृंखलाबद्ध होते जा रहे हैं तथा एक ऐसेट की तरह देखे जाते हैं। विवादों को छोड़ भी दें तो भी राजनैतिक या अन्‍य विषयों पर तीखी
चिट्ठाकारी खूब दिख रही है। अभी भी महत्‍व तो व्‍यंग्‍य विधा का खूब बना हुआ है पर इसके विषयों में भी वैविध्‍य आ रहा है। शिल्‍प के स्‍तर पर बदलावों की आहट तो और भी स्‍पष्‍ट है- आडियो, वीडियो का पठ्य से योग बढ़ रहा है जो चिट्ठाकारिता की प्रकृति पर अपनी छाप छोड़ने के लिए आतुर है।

मुक्‍तक समारोह का स्‍थगन वह पहली चुनौती है जो नए युग की चिट्ठाकारिता के सामने आई है। यूँ भी कविता अब चिट्ठाकारिता की अहम विधा नहीं रह गई है। हमारे संसाधनों की सीमितता नारद के सामने हैव्‍स और हैव नॉट्स के सृजित हो जाने की चुनौती पेश कर रही है। पहले रेटिंग की जरूरत नहीं थी पर अब उसके बिना काम नहीं चल पा रहा, शायद अभी लेवल आदि के आधार पर कई सारे (उप)मुखपृष्‍ठ बनाकर इस समस्‍या को कुछ दिन तक सुलझाया जा सकता है यानि कविताओं का नारद, आपबीती का नारद, व्‍यंग्‍य का नारद और समाचार का नारद आदि पर अंतत: नारद को इस विशाल आकार के आगे संपादकीय भूमिका में आना पड़ेगा और यकीन जानिए वही घटना प्रीफेस टू लिरीकल बैलेड्स या पल्‍लव की भूमिका बनेगी या कहें युगांतरकारी होगी।
संपादकीय विवेक के आने का मतलब होगा कुछ पोस्‍टों को अन्‍यों की तुलना में चुनना वैसे मुझे लगता है कि इस स्थिति के लिए अनुमानत: 1000 चिट्ठों की जरूरत होगी लेकिन 1 से 500 में जितना समय लगा है 500 से 1000 में शायद उसका 10% ही लगेगा यानि से आसन्‍न स्थिति है दूरस्‍‍थ नहीं। चुनौतियॉं केवल स्‍थापित संरचनाओं यानि नारद, परिचर्चा आदि के ही सामने नहीं पुराने चिट्ठाकारों के भी सामने हैं- अब हर नए चिट्ठाकार के पास पहुँच उसे शाबासी के लिए पहुँचना संभव नहीं रह पाएगा उलटे संपादकीय विवेक की कैंची (जो कम से कम शुरूआती दिनों में इन पुराने चिट्ठाकारों के हाथ में ही रहने वाली है) से घाव करने पड़ेंगे। दूसरा प्रभाव विवाद शमन भूमिका पर पड़ने वाला है। नए चिट्ठाकार जिन्‍हें विवाद सफलता की सीढ़ी दिखते हैं उन्‍हें सलाहें नागवार गुजरेंगीं और एकाध बार अंगुलियाँ जलाने के बाद वरिष्‍ठ अंगुलिया विवादों के ताप से दूर रहने लगेंगी यूँ भी संपादकीय गमों से कम ही अवकाश होगा इनके पास।

अब सवाल रहा तैयारी का, संभव है अपरिवक्‍व सोच हो मेरी पर मुझे लगता है कि हम उतना तैयार नहीं हैं। तैयारी की अकेली कवायद जो मुझे दिखी वह है नए लोगों को जोड़ने की कोशिश- श्रीश सवर्ज्ञ देख रहें हैं कुछ नए चर्चाकार भी जुड़े हैं पर माफ कीजिए जब ‘ज्ञान’ की आँधी आएगी तो ये प्रयास मोह के तंबू के समान सिद्ध होंगे।
पहली आशंका तो यह है कि चिट्ठाकारी में मात्रात्‍मक विस्‍फोट होगा शनै: शनै: होने वाला बदलाव नहीं होगा। उदाहरण के लिए हिंदी प्रचार के एक छोटे से समूह से मैं जुड़ा हूँ और हमारी पहलकदमी से अगले सत्र में यानि अगस्‍त में दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के रचनात्‍मक लेखन, हिंदी कंप्‍यूटिंग और हिंदी पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए उनके कॉलेज में ही
कार्यशालाएं लगाकर हिदी ब्‍लॉग बनवाने की योजना है यानि एक-दो सप्‍ताह में 150-200 नए हिंदी ब्‍लॉग।

दूसरी ओर जरा एक अप्रैल वाले मजाक में छिपे खतरे पर विचार करें, उस पोस्‍ट की टिप्‍पणियों में ओर खुद पोस्‍ट में ही निहित है कि हम खतरे को महसूस करते हैं जब कोई साधन संपन्‍न यहाँ कब्‍जे की नीयत से आएगा तो हम अपना लाव लश्‍कर संभालेंगे तब तो लड़ लिए। मुझे लगता है कि हम अपनी नारद की अव्‍यवसायिकता के प्रण में थोड़ी लोच लानी चाहिए और नारद खुद ना सही पर एक मातहत
कंपनी लांच कर संसाधनों को जुटाना शुरू कर सकता है, अंतत: चिट्ठाकारी बाजार में घट रही परिघटना है। ‘सरस्‍वती’ की भूमिका से उसे निकल आना चाहिए और कुछ कुछ ‘हँस’ की भूमिका में आना चाहिए। ये विचार बेहद कच्‍चे और अस्‍वीकार्य हो सकते हैं पर कम से कम इतना तो रेखंकित करते ही हैं कि इन्‍हें खारिज कर इनके स्‍थान पर इनसे बेहतर विचार रखने की जरूरत है।

Tuesday, March 13, 2007

आइए रचें हिंदी का मौलिक चिट्ठाशास्‍त्र

इधर चिट्ठाकार मित्रों में अलग अलग अनुपात में एक आचार संहिता के लिए उत्‍साह देखने में आया है। कुछ मित्र मसलन सृजन, अमिताभ आदि मिशनरी रूप से इसके पक्षधर हैं तो कुछ असमंजस में ही सोच रहे हैं कि मोहल्‍ला प्रकरण के आलोक में शायद ये जरूरी है। चूँकि मौन को स्‍वीकृति मानने की नाजायज सी परंपरा सागर शुरू कर चुके हैं इसलिए मुझे लगा कि जो मानसिक कवायद हमने की है उसे साझा किया जाए। अविनाश और अन्‍य लोगों से जो छुटपुट चर्चा रविवार को हुई थी उसमें और अन्‍यथा भी मुझे अक्‍सर लगा है कि हिंदी चिट्ठाकारी के लोग स्‍वयं को चिट्ठाशास्‍त्र (ब्‍लॉग थ्‍योरी) से अलगा कर एक नई दुनिया बना रहे हैं।



यह ठीक है कि उपलब्‍ध चिट्ठाशास्‍त्रीय प्रतिमान हिंदी चिट्ठाकारी की प्रवृत्ति का पूरा ढाँचा व्‍याख्‍यायित करने में असमर्थ हैं किंतु इसका समाधान अपना मौलिक चिट्ठाशास्‍त्र गढ़ना है न कि उससे निरपेक्ष हो जाना। ऐसा करना सारे चिट्ठा जगत को गिफ्टरैप कर बरास्‍ता अविनाश इलैक्‍ट्रानिक मीडिया को भेंट कर देने जैसा होगा। हम कितना भी नकारें हमें मानना होगा कि कि चिट्ठाजगत को बाकी मीडिया वाले चिट्ठा उद्योग की तरह देखते हैं अत: उससे दो दो हा‍थ करने के लिए हमें अपना चिट्ठाशास्‍त्र चाहिए ठीक वैसे ही जैसे कि साहित्‍य को अपना स्‍वरूप निश्चित करने के लिए साहित्‍यशास्‍त्र चहिए होता है।

ऐसा तुरंत क्‍यों जरूरी है ?
इसलिए कि चिट्ठाकारी को ‘एक तरह की डायरी’, मीडिया ऐक्‍सटेंशन, छपास रोगियों का अभयारण्‍य आदि प्रचारित कर इसके स्‍वतंत्र रूप पर प्रश्‍नचिह्न लगाने की कवायद खूब आसानी से दिखाई दे रही है। ‘लो चलो हम सिखाते हैं’ के भाव से लोग टीवी की दुनिया से आ रहे हैं और महमूद फारूकी जैसे मित्र जाने अनजाने इस ‘बेचारे’ चिट्ठाजगत पर जो कृपा कर रहे हैं बिना इसे जाने समझे वे ऐसा इसलिए कर पा रहे हैं कि वे आँखों में आँखें डाल कह पा रहे हैं कि हिंदी चिट्ठाकारी क्‍या है यह खुद हिंदी चिट्ठाकारी को ही नहीं पता। वे इसलिए ऐसा कर पा रहे हैं कि अपने जैविक विकास में चिट्ठाकारी ने जो अपना विशिष्‍ट रूप हासिल किया है वह खुद को उस सैद्धांतिकी से नहीं जोड़ पाया है जो ब्‍लॉगिं‍ग ने पिछले दस वर्षों में खड़ी की है। ब्‍लॉग शोध की प्रवृत्ति शायद ऐसा करने की दिशा में एक सही कदम हो पर अभी तो एक ‘शायद’ मुँह बाए खड़ा है।

क्‍या सैद्धांतिकी इस औपनिवेशिक सोच को रोक पाएगी जिससे खतरा झांक रहा है ?

हाँ, जरूर। एक बार दम भर इस ओर देखें आप पाएंगे कि चिट्ठाशास्‍त्र मुख्‍यधारा हिंदी जगत का मातहत या छोटा भाई नहीं है। वह खुद एक मुकम्‍मल संरचना है। यह बोध चमत्‍कार करने में समर्थ है।

चलिए मान लिया कि चिट्ठाशास्‍त्र जरूरी है पर कौन रचेगा इसे, समय की तो कमी है ही साथ ही हम साइबर कैफै चलाने वाले हैं, ऐकाउटेंट हैं, साफ्टवेयर वाले हैं ये सैद्धांतिकी का काम हम कैसे करें?

इसी लिए जरूरी है कि ये काम हम करें, कोई सुधीश पचौरी, कोई नामवर, कोई राजेंद्र यादव इसे करने बैठ जाए इससे पहले जरूरी है कि हम इसे निष्‍पादित करें। क्‍योंकि हम जो है उसके जैविक विकास से इसके सिद्धांत निकालेंगे, कृत्रिमता से मुक्‍त। विश्‍वविद्यालयी एप्रोच से चिटठाकारी का भला संभव नहीं, ये अपने अनुभव से कह रहा हूँ मान लीजिए। बाकी रही आचार संहिता की बात तो कितनी भी बना लो ये तो नूह्हें चाल्‍लेगी।