Wednesday, April 11, 2007

खचेढ़ू चिंतामणि उर्फ भाव या मनोविकार

ढीली अदवायन की खाट में यूँ तो कई दिक्‍कतें हैं, मसलन वो आवाज ज्‍यादा करती है, कम आरामदेह होती है...और भी दिक्‍कतें हैं लेकिन सबसे बड़ी दिक्‍कत ये है कि उस पर लैपटॉप ठीक से सीधा रखना मुश्किल होता है। ससुर फिसलकर इस केंन्‍द्र की ओर आ जाता है जो खचेढ़ू चाचा के पैरों पर आ विराजता है। खैर खचेढ़ू चाचा ने इसका सहज सा इलाज ये निकाला है कि गाय के गोबर के एक उपले का मोटा सा टुकड़ा तोड़ा और उसे लैपटॉप के नीचे खोंस दिया हो गया संतुलन कायम। यूँ ये कोई नई तकनीक ई नहीं है ना ही इसका पेटेंट खचेढ़ू चाचा के पास है, धरा पर जब जब भी असंतुलन व्‍यापा है और संतुलन की हानि हुई किसी सूखे गोबर के टुकड़े ने खुद को आधार बनाया है। कभी इस गोबर के टुकड़े को प्रधानमंत्री बनना पड़ा कभी कोई और लैपटॉप संभालना पड़ा, पर ये खचेढ़ू जुगाड़ बार बार इस्‍तेमाल हुआ है। खैर जब हमने खचेढ़ू चाचा को बताया कि चाचा ऊ प्रमोद भैया गाय के गोबर की जगह कुत्‍ता गू के इस्‍तेमाल की बात कर रहे हैं...खचेढ़ू चाचा ने एक भद्दी सी गाली सारे कम्‍यूनिस्‍टों के नाम उगली और 'तेरे ब्‍लॉग पर बेनाम टिप्‍पणीकार दस्‍त करें' की बददुआ दी।

खैर गोबर अवलंबित लेपटॉप पर खचेढ़ू चाचा ने जो लिखा वह चिट्ठाकारी के आचार्य शुक्‍ल को लिखना चाहिए था पर यहॉं तो एक्‍के शकुलजी हैं जो चमरौंधे में ही सर खपा रहे हैं वैसे कविता क्‍या है कि रचना उन्‍होंने की थी पर फिर शेष चिंतामणि की ओर उन्‍हांनें रूचि न दिखाई। इसलिए आचार्य खचेढ़ू चाचा को यह काम करना पड़ रहा है। काम है 'भाव या मनोविकार' का चिट्ठा संस्‍करण हॉं तो पेश है-

भाव बोले तो रेट। और भाव आजकल आसमान पर हैं। पहले एक रुपए के बीस उपले आते थे अब भाव पॉंच रुपए के दस है। पहले टटपूंजी कविता पर पॉंच टिप्‍पणी मिल जाती थीं, अब बिना कत्‍लोगारत किए कुत्‍ता भी नहीं झांकता। वैसे एक दूसरा भाव भी होता है सुख का दु:ख का। पर वे असल दुनिया में होता है, इस यानि चिट्ठाकारी में कोई सुख का भाव नहीं होता सिर्फ दु:ख होता है और उसके भिन्‍न भिन्‍न संस्‍करण होते हैं। दु:ख में ब्‍लॉगिंग सब करैं सुख में करै न कोय। दु:ख का भाव भी कई कई परेशानियॉं लिए हुए है- हिट न होने का दु:ख, टिप्‍पणी न होने का दुख, दूसरे के यहॉं टिप्‍पणी होने का दुख ये दुख वो दुख। ये चिट्ठालोक तो दुख का ही दूसरा नाम है। हॉं इतना जरूर है कि ये दुख भाव संश्लिष्‍ट होकर नाना रूपों में अभिव्‍यक्‍त होता है। ये क्रोध बन सकता है, अगर आपने जीजान से कुछ लिखा और आपके 'मैं हूँ' भाव को ( ले देकर ये ही तो एक पूंजी है ब्‍लॉगर की) किसी ने तरजीह न दी तो आपकी अंगुलिया फड़क उठती है, मॉनीटर से चिंगारियॉं निकलने लगती हैं, प्रोसेसर से धुंआ आप मैं तुझे डस लूंगा या मिट्टी में मिला दूंगा कि तर्ज पर फुंफकारने लगते हैं। या ये दुख जब बढ़ जाए तो ईर्ष्‍या, घृणा, आदि रूपों में भी व्‍यक्‍त हो सकता है। अत: हम कह सकते हें कि चिट्ठा सुख दुख की मूल अनुभूति ही विषय भेद के अनुसार प्रेम, हास, उत्‍साह, आश्‍चर्य, करुणा, घृणा आदि मनोविकारों का जटिल रूप धारण करती है।

7 comments:

अरुण said...

मजा आ गया बस अब आप चाचा खचेडू से लगातार मिलवाते रहियेगा उपले के जुगाड के साथ

अनूप शुक्ला said...

लगता है आप जोशी के हरिया हरक्यूलिस की हैरानी वाली राह पर हैं लेकिन बड़ी बात नहीं कि लोग कहें कि ये भी प्रमोद जी की तरह रवीश कुमार के बीस साल बाद की कथा बयान कर रहे हैं। वैसे कंडे(उपले ) से लैप-टाप उचकाने की बात पढ़कर बरबस मुस्कान आयी। ऐसे- :)

प्रियंकर said...

हमको तो बुझाता है कि ई चाचा खचेड़ू फ़्रायड के पट्ट शिष्य अउर एडलर और जुंग के साथी रहे . केतना बेधक विश्लेषण करते हैं . आत्मा का एक-एक कोश छान कर रख देते हैं . उनका बात-वृत्तांत बताते रहिए .

अतुल शर्मा said...

धरा पर जब जब भी असंतुलन व्‍यापा है और संतुलन की हानि हुई किसी सूखे गोबर के टुकड़े ने खुद को आधार बनाया है
बहुत खूब।
भाव बोले तो रेट
वाह भावों की अद्भुत मीमांसा।

yogesh samdarshi said...

अच्छी लगी आपकी चुहल...

ई-स्वामी said...

बहुतेई बढिया पोस्टियाए हो चिंतानरेश! आपको नई इस्टाईल म हैरान देख कर आत्मा परसन्न हो गई!

masijeevi said...

पसंद करने के लिए मित्रगणों का शुक्रिया।
अरे साहब हरिया हरक्‍यूलिस.. के 'वे विवरण' तो बीभत्‍स का अमर अपार्थिव पूजन हैं हमारे कदमों में उस दिशा की ओर चल सकने की ताकत कहॉं

चिंतानरेश !!! हा हा हा। चिंता करते तो अब तलक बजीरावाद के पुल से छलांग दिए होते पहिले ही कहे थे अइसन। सो चिंता तो बिल्‍कुलै नहीं है अऊर रही नरेश की बात तो

दुनिया नहीं घूरे का ढेर
कि जिस पर बांग दे कोई भी कुक्‍कट
और बन जाए मसीहा।