Saturday, April 14, 2007

खचेढ़ू चिंतामणि - चिटठावीरता का स्‍थाई भाव : चिट्ठोत्‍साह



अरे चाचा ई...ई का कर रहे हो। हमने खचेढ़ू चाचा को खाट की अदवायन को कसते देखा तो हमारे मुँह से बरबस निकला। हमारी हालत वैसे ही हो गई थी जैसे अवैध दुकान पर सील लगते देख मोटे लाला की होती है। मुसलमान को तरक्‍की करते देख मुलायम की होती है, दलित को तरक्‍की करते देख मायावती की होती है। मतलब हर उस सही काम को देखकर उस व्‍यक्ति की होती है जिसकी दुकानदारी उस गलत की ही वजह से चल रही होती है। अब दो दो पोस्‍ट लिखकर खचेढ़ू चाचा के ढीली अदवायन का ब्रांड सेट किए थे। पहले बताया कि ढीली अदवायन जोर के आईडिया बुलाने का मूल मंत्र है। फिर बताया कि ढीली अदवायन पर रखे कंप्‍यूटर तक में चिट्ठाशास्‍त्र के सूत्र रचने की कूवत आ जाती है। अब ये हमारे चाचा उसी ढीली अदवायन को कसे जा रहे हैं... हमारी तो दुकान बढ़ा दी बैठे बैठे। हमने कहा चाचा ऐसे किसी की रोजी को कसना ठीक नहीं बताओं क्‍या बात है- हम समझा लेंगे परमोद भैया को कि कुत्‍ता गू रहने दें गाय का शुद्ध गोबर ही ठीक है आपके लैपटॉप का सहारा बनने के लिए, और कहो तो दर्जनभर उपले खरीदकर रखवा देता हूँ। वे हँसकर बोले क्‍या बच्‍चे इस गढ़ी मेंडू गॉंव में हम किसी परमोद के परभाव में नहीं आते वो तो हम आज हम उत्‍साह में थे इसलिए सोचा इस ससुरी अदवायन को हाथ लगा दें।
उत्‍साह....उत्‍साह, यही तो है चिंतामणि का अगला निबंध। अब हम भी उत्‍साह में भर गए। हमने कहा अरे अदवायन छोडि़ए लैपटॉप टिकाइए और इस उत्‍साह नाम के मनोविकार का विवेचन कीजिए इस अमर्त्‍य चिट्ठालोक की दुनिया में। यानि हे आचार्य खचेढ़ू चाचा लिखिए अपना अगला निबंध हम आपके साथ हैं। बस खचेढ़ू चाचा शुरू हो गए.. पेश है-

उत्‍साह बोले तो दिन में तीन पोस्‍ट, तेईस टिप्‍पणी (दूसरों के चिट्ठों पर), स्‍टेटकाउंटर 24 X 7 खुला। असल दुनिया में जिसे बिफरना कहते हैं चिट्ठाजगत में उसे ही उत्‍साह कहा जाता है। ओर बिफरा हुआ सांड जब गढ़ी मेंडू के यमुना खादर में हांडता है तो वह गाय ही नहीं भैंस, भैंसे, बैल ओर तो और कभी कभी दूसरे सांड पर ही सवार होने की कोशिश करता देखा गया है। इसी प्रकार उत्‍साह वह (दु)साहसपूर्ण आनन्‍द की उमंग है जिसमें एक चिटृठाकार आंखें ओर अंगुलियों की थकान, बैंडविथ और बिजली के खर्च, बीबी और बच्‍चों की नाराजगी..... कुल जमा दुनिया की हर फिकर से अविचलित रह कर बस चिट्ठाकारी करता है, वह तय मानकर चलता है कि उसकी अगली पोस्‍ट अकेले 1500 हिंट लेकर आएगी। शकुलजी (ये नहीं वो...रामचंदर सकुल) पहले ही बता गए हैं कि वीर जिसका स्‍थाई भाव उत्‍साह है वह केवल युद्ध में ही नहीं तुषार मंडित अभ्रभेदी अगम्‍य पर्वतों की चढ़ाई, ध्रुव प्रदेश या सहारा के रेगिस्‍तान का सफर, क्रूर बर्बर जातियों के बीच अज्ञात घोर जंगलों में प्रवेश इत्‍यादि भी वीरता के कर्म हैं। इनमें जिन आनन्‍दपूर्ण तत्‍परता के साथ लोग प्रवृत्‍त हुए हैं वह उत्‍साह ही है।
ध्‍यान से देखें शुक्‍लजी पहले ही बता गए हैं कि चिट्ठाकारी करना अरे वही....... 'क्रूर बर्बर जातियों के बीच अज्ञात घोर जंगलों में प्रवेश ' भी इसमें शामिल है। यहाँ जिस आनंदपूर्ण तत्‍परता से गदा भांजते हैं, संहार करते हैं, ब्‍लॉग बैन करवाते हैं, दूसरे को नीचा दिखाते हैं, जहर उगलते हैं यह कमाल की चिट्ठावीरता है और यह तत्‍परता ही चिट्ठोत्‍साह है।

3 comments:

अनूप शुक्ला said...

चाचा जी बड़े ज्ञान की बातें बता गये हैं!

Anonymous said...

masijivi
aapki rachana dekhee achchhi lageee. aapne mere ko sandesh diya thaa. mai aapse hameshaa aisee rachnaa kee ummeed karoongaa.
deepak raj kukreja
blog-deepak bapu kahin
rajlekh ka hindi chitthaa

Shrish said...

आभास होता है कि चाचा जी का चिट्ठाकारी चिंतन बढ़ता जा रहा है और जल्द ही वे भी परम ज्ञान की अवस्था को प्राप्त होने वाले हैं। उनका ब्लॉग शुरु करवाया या नहीं?