Monday, April 16, 2007

अंतर्जाल पर हिन्दी चिट्ठे -सुजाता तेवतिया

सुजाता का यह लेख आज जनसत्‍ता में आवरण कथा के रूप में छपा और जगदीशजी ने इसकी छवि भी अपलोड की लेकिन मित्रों को इसे पढ़ने में तकलीफ हो रही थी। तारणहार बने रवि रतलामीजी और उन्‍होंने लेख को यूनीकोडित कर भेजा है। प्रकाशित लेख में इस सामग्री के अतिरिक्‍त कुछ बॉक्‍स आइटम भी हैं कितु अभी तो लीजिए पेश है मुख्‍य लेख-


अंतर्जाल पर हिन्दी चिट्ठे
पूरी एक शताब्दी पीछे चर्चित रहे बालमुकुन्द गुप्त के 'शिवशंभू के चिट्ठे' अब इंटरनेट पर हिन्दी ब्लॉग बन कर धूम मचा रहे हैं। खड़ी बोली गद्य की भाषा का यह आरंभिक स्वरूप जितना रोचक और आत्मीय था, अंतर्जाल पर हिन्दी के चिट्ठे भी वैसे ही रोचक और आत्मीय शैली में अभिव्यक्ति का माध्यम बन गए हैं। अत: इसे हिन्दी की एक नई विधा माना जाए तो अनुचित न होगा। अंतरिक्ष की भांति अनन्त साइबर स्पेस पर ये हिन्दी चिट्ठे हमेशा के लिए दर्ज हो जाने वाली डायरी की तरह हैं।
'वेबलॉग' से 'ब्लॉग' बना और ब्लॉग का हिन्दी शब्द आया 'चिट्ठा' - सर्वप्रथम आलोक जी द्वारा - जो अब लगभग मानक हो चला है। यूँ तो अंग्रेजी चिट्ठाकारी अमेरिका में 1997 से प्रचलित हो चली है लेकिन हिन्दी का यह पहला 'चिट्ठा' 2 मार्च 2003 को प्रकाश में आया। इसे वास्तविक लोकप्रियता हासिल हुई रवि रतलामी के 'अभिव्यक्ति' में छपे लेख से जिसने कई नेट-प्रयोक्ताओं को हिन्दी ब्लॉग बनाने के लिए उकसाया।
कुल जमा 10 वर्ष की ब्लॉग विधा और उसमें भी हिन्दी ब्लॉग की 4 वर्ष की आयु यद्यपि किन्हीं निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए नाकाफ़ी है तथापि यह मानने में कोई संकोच नहीं कि अंतर्जाल पर हिन्दी का प्रचार करने वाली यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण विधा है। अंतर्जाल पर हिन्दी में मिलने वाली सामग्री का सबसे बड़ा भाग ये चिट्ठे हैं जो भविष्य में कीबोर्ड लेखन की इस अद्यतन विधा के परिष्कृत और निरंतर परिवर्तित होने का संकेत देती है।
हिन्दी के इन चिट्ठों में ताज़गी है और कोई एक सामान्य विशेषता, गुण या स्वरूप न होने पर भी इनकी अनगढ़ता और बेबाकी सभी चिट्ठों में सामान्यत: मिलती है। इस चिट्ठाजगत में न विषयों का बंघन है न नियमों की कवायद। पूरी तरह से अनौपचारिक यह विधा हर एक ब्लॉगर या चिट्ठाकार को अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता देती है। यहाँ लोग जूतों से लेकर रसोई, बाथरूम और खान-पान से लेकर सुभाष चंद्र बोस, वर्ल्ड कप क्रिकेट, आरक्षण तक पर लिख सकते हैं और पाठक इन्हें पढ़ते भी हैं। किसी के लिए चिट्ठाकारी शौक है, किसी के लिए अपने मन की भड़ास निकालने का माध्यम तो किसी के लिए समय नष्ट करने का सर्वश्रेष्ठ साधन है। यद्यपि इन चिट्ठों का व्यावसायिक पक्ष भी है और गूगल इन चिट्ठाकारों को एडसेन्स द्वारा धन कमाने के अवसर भी देता है। पर सामान्यत: इन चिट्ठाकारों में धन कमाने की उतनी चाह नहीं जितनी लिखने और खुद को पढ़वाने की चाह है।
बैठे-ठाले का चिन्तन और शौकिया लेखन इन चिट्ठों के नाम और परिचयात्मक वाक्यों में भी झलकता है जो इन्हें निराला बनाता है - जैसे फ़ुरसतिया, निठल्ला-चिन्तन, नोटपैड, कॉफ़ी हाउस, टैमपास, नुक्ताचीनी, वाद-संवाद, गप-शप, ब्लॉगिया कहीं का, खाली-पीली, ठलुआ, मटरगश्ती, मस्ती की बस्ती।
ब्लॉगिंग का माध्यम न केवल देसी हिन्दी प्रेमियों को आकर्षित कर रहा है वरन् प्रवासी भारतीयों को भी बहुत लुभा रहा है। सबसे रोचक तो है कि हिन्दी चिट्ठों के शुरूआती दौर में सामने आने वाले बहुत से चिट्ठाकार विदेश में रह रहे भारतीय ही हैं जो अनायास ही हिन्दी ब्लॉगिंग के इतिहास के साक्षी और निर्माणकर्ता भी हो गए। जितेन्द्र चौधरी, पंकज नरूला, प्रतीक, अनुनाद, रमण कौल इन्हीं आरंभिक बलॉगरों में से हैं।
यहाँ तक कि हिन्दी के तमाम चिट्ठों को संकलित करके एक स्थान पर दिखाने वाली फ़ीड एग्रीगेटर साइट नारद.अक्षरग्राम.कॉम भी इन्हीं के प्रयासों का परिणाम है। नारद न केवल इन चिट्ठों की रोज़ की आवाजाही पर नज़र रखता है वरन् इन चिट्ठों की चर्चा करता है साथ ही साहित्यिक गतिविधियों, ब्लॉगज़ीन ; ब्लॉग मैगज़ीन व काव्य प्रतियागिताओं का भी संचालन समय-समय पर करता है। नियमितता और लोकप्रियता के आधार पर वह इन चिट्ठों की रेटिंग भी करता है।
चिट्ठाकारी की विधा के सभी पहलू बड़े दिलचस्प है जिसमें 'टिप्पणी' एक रोचक भूमिका निभाती है। जैसा कि बहुत से ब्लॉगर मानते हैं कि हिन्दी चिट्ठा लेखन छपास - छपने की इच्छा-पीड़ा का इलाज है उस दृष्टि से यहाँ छप कर न केवल न छपने के दर्द से मुक्ति मिलती है वरन् पाठकों की त्वरित प्रतिक्रियाएँ टिप्पणियों के रूप में पाकर लेखक धन्य हो जाते हैं। लेखन की किसी भी विधा और माध्यम में यह स्थिति संभव नहीं है। ये टिप्पणियाँ न केवल लेखक का उत्साहवर्धन करती है वरन् उसे निरन्तर माँजते रहने में भी कारगर साबित होती है। हालाँकि, कभी-कभी मामला 'एक दूसरे की पीठ खुजाने की तरह' टिप्पणी करने और टिप्पणी पाने वाला भी हो जाता है। ब्लॉग में टिप्पणी का महत्व बताते हुए एक जीतू का कथन है - ''टिप्पणी का बहुत महत्व है, ब्लॉग लिखने में, बकौल शुक्ला जी; रामचंद्र नहीं - अनूप शुक्ला ...बिना टिप्पणी का ब्लॉग उजड़ी माँग की तरह होता है। जिसकी जितनी टिप्पणियाँ उसके उतने सुहाग।''
एक सबसे रोचक पहलू इन चिट्ठों की भाषा और शैली है। रचनात्मकता की कई छटाएँ यहाँ देखने को मिलती है। यहाँ भाषा आभिजात्य, शुद्धता और मानक भाषा से आतंकित हुए बिना अपना स्वरूप निर्मित करती है। इस दृष्टि से ये हिन्दी चिट्ठे भाषा की नई भंगिमा लिए है। ये हिन्दी भाषा की नई प्रयोगशाला है। शब्दों की नई टकसाल हैं और टकसाल भी ऐसा जिसमें व्याकरण के नियमों की जकड़बंदी और पांडित्य का माहात्म्य नहीं है। यहाँ भाषा आम हिन्दुस्तानी की मातृभाषा है, बोलचाल की भदेस बोली है। यहाँ अंग्रेजी के हिन्दी पर्याय संस्कृत कोश में ढूँढने के बजाय खुद गढ़े जाते हैं और विद्यमान शब्दावली को इंटरनेट के अनुसार विकसित और परिष्कृत किया जा रहा है। यहाँ बात करते-करते लोग बिहारी, मैथिली, भोजपुरी, पंजाबी के शब्दों और अभिव्यक्तियों पर उतर आते हैं। चिट्ठाकार, चिट्ठाकारिता, चिट्ठा जगत, चिट्ठोन्मुक्त जैसे शब्द तो प्रचलन में है ही साथ ही आधिपत्य की तर्ज पर ब्लॉगपत्य, पोस्ट करने के लिए पोस्टियाना, टिप्पणी देने के लिए टिप्पियाना, टिप्पणी की इच्छा रखना - टिप्पेषणा आदि शब्दों का इस्तेमाल यहाँ बेरोक-टोक होता है। यहाँ कुबेरनाथ राय की पंक्तियाँ 'भाषा बहता नीर...' सही साबित होती लगती है। 'ब्लॉगित' हिन्दी जनों के 'लिंकित' मनों; एक शोध् ब्लॉग का नाम भी यह इंगित करती है कि भाषा निरन्तर प्रवाहमान है।
रोचक तथ्य यह भी है कि हिन्दी चिट्ठा जगत ने न केवल छपास पीड़ित, अनगढ़ लेखकों को आकर्षित किया है वरन् हिन्दी पत्रकारिता व मीडिया जगत से भी कई हस्तियों को लुभाया है। मोहल्ला, कस्बा, मुम्बई ब्लॉग्स ऐसे ही पत्रकारों के ब्लॉग है जो मीडिया लेखन के तयशुदा एजेंडों से मुक्त होकर स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं। फ़िर भी, अंतर्जाल के हिन्दी चिट्ठाजगत में यह निरालापन है कि सुगढ़, सुविचारित और अनुभवी लेखन यहाँ स्तुत्य तो हैं लेकिन लोकप्रिय होने की शर्त नहीं है। बल्कि आम बातों के आम ब्लॉग, साधरण बातें, व्यंग्य और बहसें यहाँ अधिक लोकप्रिय हैं।
यद्यपि हिन्दी के जाने-माने ब्लॉग्स अभी लगभग 500 ही हैं जबकि अंग्रेजी के हज़ारों ब्लॉग्स हैं। फ़िर भी नित नए ब्लॉग्स हिन्दी में सामने आ रहे हैं और रोज़ाना नारद पर रजिस्टर हो रहे हैं। अत: आने वाले कुछेक वर्षों में यह चिट्ठा जगत अनंत विस्तार पाएगा, नारद विस्तार पाएगा या नए फ़ीड एग्रीगेटर सामने आएँगे इसमें संदेह नहीं। इस लेख का भी यही उद्देश्य समझा जाए। एकमात्र जो समस्या रह जाती है वह तकनीक का है। हिन्दी के पहले चिट्ठे पर आलोक जी ने भी यही लिखा था 'नमस्ते! क्या आप हिन्दी देख पा रहे हैं। यदि नहीं तो यहाँ पर देंखे।' माने यह कि कीबोर्ड पर हिन्दी लेखन और अन्य तकनीकी जानकारियाँ एक बड़ी बाधा है लोकप्रियता के रास्ते में। नारद, वर्डप्रेस, ब्लॉगस्पाट, गूगल सहित कई अन्य ब्लॉगर इस संबंध में सहायता करते हैं कि 'हिन्दी कैसे लिखें'। फ़िर भी समस्या अभी व्यापक है क्योंकि अंग्रेज़ी में लिखने वालों को यह नहीं पूछना पड़ता कि ''अंग्रेज़ी में कैसे लिखें?'' साथ ही यह भी कि हिन्दी चिट्ठाकारिता की दुनिया अभी काफ़ी सीमित है। हिन्दी चिट्ठा जगत से बाहर बहुत कम ब्लॉगरों की पहुँच है। अधिकांश केवल नारद पर दिख कर और टिप्पणी पाकर संतुष्ट हो जाते हैं। यदि हिन्दी ब्लॉगिंग की लोकप्रियता के ऊँचे प्रतिमान छूने हैं तो अधिक व्यापक होना होगा। चार वर्षीया हिन्दी चिट्ठाकारिता इस बुलंदी को छूने के लिए आरंभिक तैयारी की अवस्था से गुजर रही है।
यद्यपि विषयों की कोई प्रतिबंध या नियमावली यहाँ नहीं है तथापि कई मुद्दों पर विविधता कम ही मिलती है। फ़ैशन, फ़िटनेस, सौन्दर्य, यात्रा, पाक कला, टेकनॉलाजी, खेल से जुड़े ब्लॉग अभी नहीं के बराबर है। लेकिन इस विकासमान विधा का स्वरूप इतना शीघ्र तय नहीं किया जा सकता। निरन्तर विविधतामय लेखन का एकमात्र रास्ता है यह।
हिन्दी चिट्ठाकारिता की विधा का स्वरूप क्या होगा? यह हिन्दी के चिट्ठाकार और आने वाला समय ही तय करेंगे और इससे पहले कि मीडिया, विश्वविद्यालय, साहित्य और आलोचना के बड़े-बड़े विद्वान इसे अपनी सुगढ़ भाषा में कोई रूपाकार देने की कोशिश करें उससे पहले ही यह तय करना होगा कि अनौपचारिक लेखन की यह चिट्ठा विधा अपने स्वरूप के मूल और मुख्य गुण यानी बेबाकी, अनगढ़ता, भदेसपने और फक्कड़पने को बनाए रखे। इसे अन्य माध्यमों से अलगाने वाला मुख्य बिन्दु भी यही है जो इन हिन्दी के चिट्ठों में सूखी मिट्टी पर पड़ी फ़ुहार से उठने वाली सोंधी गंध की सी ताज़गी का एहसास दिलाता है।

7 comments:

Mired Mirage said...

बहुत अच्छा लेख है । बधाई ।
घुघूती बासूती

Udan Tashtari said...

यह अच्छा काम किया, मित्र. स्केन कॉपी पढ़ पाना दिक्कतदायी हो रहा था, हांलाकि उसकी अपनी महत्ता है, वो भी आवश्यक था. :)

Raag said...

बढ़िया लेख।

Shrish said...

सुजाता जी को इस बेहतरीन लेख के लिए बहुत-बहुत बधाई।

हालांकि यह अवश्य कहना चाहूँगा कि इतने विस्तृत लेख में हिन्दी चिट्ठाकारी के कुछ अन्य महत्वपूर्ण स्तम्भों देबाशीष दादा, ई-स्वामी आदि का समुचित उल्लेख नहीं हुआ।

धन्यवाद मसिजीवी और रवि जी इस लेख को यूनिकोड में उपलब्ध करवाने के लिए। स्कैन की गई कॉपी से पढ़ना बहुत मुश्किल हो रहा था। आज इस लेख को पढ़कर चैन आया और हाँ यदि हो सके तो इसके साथ वाले अन्य छोटे लेख भी यूनिकोड में उपलब्ध करवाएं।

अब आपको पता ही है कि मुझे अशुद्धि-शोधन और सुझाव देने की भयंकर बीमारी है। खुजली रुक नहीं रही अतः खुजा ही लेता हूँ।

वैसे तो सुजाता जी का लेख हर प्रकार से उत्तम था लेकिन भाषा संबंधी एकाध सुधार/सुझाव निम्न हैं।

"सबसे रोचक तो है कि हिन्दी चिट्ठों के शुरूआती दौर में सामने आने वाले बहुत से चिट्ठाकार विदेश में रह रहे भारतीय ही हैं जो अनायास ही हिन्दी ब्लॉगिंग के इतिहास के साक्षी और निर्माणकर्ता भी हो गए। जितेन्द्र चौधरी, पंकज नरूला, प्रतीक, अनुनाद, रमण कौल इन्हीं आरंभिक बलॉगरों में से हैं।"

अरे भाई प्रतीक फिलहाल हिन्दुस्तान में ही हैं। :)

"नारद न केवल इन चिट्ठों की रोज़ की आवाजाही पर नज़र रखता है वरन् इन चिट्ठों की चर्चा करता है साथ ही साहित्यिक गतिविधियों, ब्लॉगज़ीन ; ब्लॉग मैगज़ीन व काव्य प्रतियागिताओं का भी संचालन समय-समय पर करता है।"

फीड एग्रीगेशन को छोड़कर उपरोक्त सब गतिविधियाँ नारद नहीं अक्षरग्राम परिवार संचालित करता है। नारद तो खुद एक मशीनी साइट है वह केवल फीड एग्रीगेट करता है।

"नारद, वर्डप्रेस, ब्लॉगस्पाट, गूगल सहित कई अन्य ब्लॉगर इस संबंध में सहायता करते हैं कि 'हिन्दी कैसे लिखें'।"

चलो नारद पर तो 'हिन्दी कैसे लिखें' का एक लिंक है लेकिन वर्डप्रैस, ब्लॉगस्पॉट और गूगल कैसे मदद करते हैं जी?

इनकी बजाय आपको सर्वज्ञ, परिचर्चा और चिट्ठाकार समूह का नाम लेना चाहिए था।

Shyam Mathur said...

bahoot hi achcha kaam kiya! Badhaai!Saath mein blogging ki history bhi hooti to theek rahata.
Shyam Mathur

sonane said...

सुजाता जी

आपने बहुत सी चीजों पर प्रकाश डाला है।लेख जितना अच्छा है उसके परिणाम भी उतने ही बेहतर है।प्रकाशन से वंचितों की छपास ब्लाग्स में निश्चित ही पूरी हो जाती है।छपास के परिणामों से जियादा
बेहतर परिणाम ब्लागिंग में मिलते है।यह केवल नये लेखकों के लिए ही नहीं है अपितु अब तो स्थापित लेखक भी इस ओर आकर्षित हो रहे है।मैंने ऐसे कई लेखकों को ब्लाग्स पर देखा है।सामने सामने वे कहते कुछ है लेकिन गुवचुप गुचचुप वे भी ब्लागिंग की ओर बढ़ रहे है। इसलिए कहा जाना चाहिए कि केवल सुधिश पचौरी ही नहीं उनके नामीगिरामी लेखक मित्र भी इसमें शामिल होने का कयाम करते नज़र आ रहे है।मैं उन सबको करीब से जानता हूं।
....कृष्णशंकर सोनाने

Ayush said...

सभी हिन्दी चिट्ठाकारों के लए गोस्ताट्स ने एक मुफ्त ट्राफिक परिसंख्यान टूल लॉन्च किया है --
http://gostats.in