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Saturday, November 15, 2008

टिफिन में अचार बना समय

सही सही गणना करूं तो बात छब्बीस साल पुरानी होनी चाहिए क्‍योंकि याद पड़ता हे कि ये मेरे नए स्‍‍कूल का पहला साल था यानि छठे दर्जे में।tiffin नया स्‍कूल घर से खासा दूर था बस लेनी होती थी, वापस आते आते शाम के सात बज जाते थे इसलिए टिफिन ले जाना शुरू करना पड़ा जिसके मायने थे पिछले सप्‍ताह के दैनिक हिंदुस्‍तान में लिपटे दो परांठे जिसके बीच में या तो कोई सूखी सब्‍जी होती या फिर घर का डाला आम का अचार...वैसे बंदे को इनसे कोई खास तकलीफ नहीं थी..पर एक दिन घर आकर हमने शिकायत की, कि क्‍या मम्‍मी आप रोज ये सब भेज देती हो..बाकी लोग कितने मजे से रोज छोले खरीदकर डबलरोटी के साथ खाते हैं। सुनकर घर में सब हँसे मैं चुप हो गया।

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सर्दियों की आहट शुरू हो गई है। मेरे बच्‍चों की स्कूल यूनीफार्म बदल गई है,  नेकर और स्‍कर्ट की जगह ट्राउजर्स, फुल स्‍लीव शर्ट उस पर टाई। पर नहीं बदला तो टिफिन। प्‍लास्टिक का ये डिब्‍बा जिसमें एल्‍यूमिनियम फाइल में लिपटा एक परांठा साथ में कोई सब्‍जी। जितना कष्‍ट मुझे बच्‍चे को बेपनाह भारी बस्‍ते लादे देखकर होता है उससे कम इस टिफिन को देखकर नहीं होता। नवम्‍बर-दिसम्‍बर की सर्दी में किस लायक बचेगा ये 'खाना' - तीन घंटे बाद। मैं बेहद ग्‍लानि महसूस करता हूँ क्‍यों ये संभव नहीं है कि स्‍कूल बच्‍चों के खाने गर्म करने की कोई व्‍यवस्‍था करे।

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बेटे के साथ उसकी स्‍कूल बस का इंतजार करते हुए मैंने उसे जैसे तैसे फुसलाकर ये पूछा कि यार सच बता कि ये रोज रोज खाना क्‍यों बचा लाते हो, 'फिनिश' क्‍यों नहीं करते। 'क्‍या करूं 'पा' आप लोग रोज रोज इतना 'मुश्किल'  खाना भेजते हो अगर रोटी सब्‍जी जैसा खाना पूरा फिनिश करूं फिर तो सारी 'ब्रेक' खाने में ही खत्‍म हो जाएगी फिर स्किड (कॉरीडोर में दौड़ना और फिर जड़त्‍व के सहारे जूतों के बल फिसलना) कब खेलूंगा।

Monday, June 25, 2007

एक छोटे भाई की 'शिक्षाशास्‍त्रीय' दिक्‍कतें

जाहिर है आपमें से अधिकांश भारत भारद्वाज को नहीं जानते होंगे, पीएच डी वगैरह करने में एक बुरी बात यह भी होती है कि आप ऐसे कई नामों से परिचित हो जाते हैं जिन्‍हें बिना जाने आपका काम भली भांति चल रहा होता है, बल्कि ज्‍यादा बेहतर चल रहा होता है- खैर, ये भारत भारद्वाज दिल्‍ली में पाए जाते हैं गुप्‍तचर ब्‍यूरो में काम करते हैं ....जाहिर है इनमें से कुछ भी ऐसा नहीं कि आपकी रुचि भारत भारद्वाज में हो – मेरी भी नहीं है। ओर हॉं इन्‍होने ये भी बताया कि हिंदी के नामधारी आलोचक नंदकिशोर नवल इनके बड़े भाई हैं। ये छोटे भाई साहब कभी कभी हंस बगैरह में लिखते हैं और इसी किस्‍म के कामों से अपने छोटे भाई होने का फर्ज निबाहते हैं।

फिर एक दिन ये बैठे हैं कि अचानक पड़ोस की एक बच्‍ची अपनी दसवीं कक्षा की पाठ्यपुस्‍तक ‘स्‍पर्श’ लेकर पहुँचती है जिसे उसके मॉं बाप ने इन अंकल के पास कबीर के कुछ पदों का अर्थ जानने के लिए भेजा है- पुस्‍तक हाथ में लेते ही इन साहब के दिमाग में प्रियंका और उसकी दोस्‍तों की जूठी की गई खाली बोतले इनके दिमाग में बजने लगती हैं और ये भृतक जासूस अचानक केवल साहित्‍यविद ही नहीं अचानक शिक्षाविद भी बन जाते हैं और इस पाठ्यपुस्‍तक की आलोचना/विवेचना का एक उबकाईपूध्र संसार रचते हैं कि उसके अनुभव के लिए आपको इसे देखना ही होगा- देखें कबीर का संशोधित पाठ-भारत भारद्वाज (जनसत्‍ता 24 जून 2007)

इस सब से मुझे क्‍या आपत्ति है- है और घनघोर आपत्ति है। तीन साल पहले तक मैं एक सरकारी स्‍कूल में हिंदी का अध्‍यापक था यानि इन एनसीईआरटी पाठ्यपुस्‍तकों को पढ़ाया करता था और अब पिछले तीन सालों से अपने स्‍नातक कक्षा के विद्यार्थियों को हिंदी खिक्षण पढ़ा रहा हूँ। इस सबसे पहले दिल्‍ली से ही प्रशिक्षण पाया और शिक्षा में ही शोध-कार्य के क्षेत्र में ही नौकरी भी की। नेम ड्रापिंग से बचना है पर केवल जानकारी केलिए इतना कि साथ काम करने वालों में ही अन्‍यों के अतिरिक्‍त कृष्‍ण कुमार भी थे जो आजकल एनसीईआरटी के निदेशक हैं जिसने ये पाठ्यपुस्‍तकें तैयार की हैं। अत: हिंदी व शिक्षा दोनों का मास्‍टर व विद्यार्थी होने के नाते इतनी समझ तो आ ही गई है कि किसी पाठ्यपुस्‍तक की विवेचना इतना सतही काम नहीं है कि कोई ऐरा गैरा छोटा भैया विषय सूची देखकर इसे अंजाम दे और आगे बढ़ जाए। समस्‍या और बढ़ जाती है जब उनकी आपत्तियों पर नजर डालते हैं- आपत्ति है कि अमुक को पाठ्यक्रम में लिया और अमुक को छोड़ दिया (मसलन वीरेन डंगवाल को लिया और अधिक महत्‍वपूर्ण कवियों को छोड़ दिया) कबीर के अमुक पाठ को लिया अमुक को क्‍यों नहीं लिया, हिंदी की दसवीं की किताब न हुई कवियों की जनगणना हो गई कि कोई छूट न जाए- बच्‍चों की जान ले ले- माटी मरे। पूरे प्रकरण में एक भी शिक्षा शास्त्रीय तर्क नहीं। ज्ञान के इतने सारे अनुशासनों में जितनी दुर्गति शिक्षा विषय की हुई है उतनी शायद किसी को नहीं- एक विषय के रूप में शिक्षा को ऐसी वेश्‍या माना जा सकता है जिसे कोई भी अपने अंक में लपेट लेता है और अपनी घोषित कर देता है।
पिछले साल अपने विद्यार्थियों को लेकर एनसीईआरटी गए और वहॉं ये समढने की कोशिश की कि पाठ्यपुस्‍तकें कैसे बनाई जाती हैं, किस प्रकार चयन को संतुलित बनाने में कमियोंकी गुजाइश होती है। ये भी कि हिंदी के मामले में निदेशक अपनी रूचि के कारण विशेष ध्‍यान देते हैं, फिर भी कमियों की संभावना से मना नहीं किया जा सकता पर ये कमियॉं वे तो नहींही होंगी जिनका उल्‍लेख भारत भारद्वाज ने किया है।
वैसे भारत भारद्वाजजी के इस सद्यजात शिक्षा ज्ञान के ठीक ऊपर इन्‍हीं कृष्‍णकुमार ने अपने स्‍तंभ दृश्‍यांतर में बॉलीवुड अभिनेताओं के भावबोध की भाषा के हिंदी के स्‍थान पर अंग्रेजी हो जाने का विवेचन किया है जो समझ की सूक्ष्‍मता के कंट्रास्‍ट को और भी उभारता है।

जिन रचनाओं के पुस्‍तक में शामिल ने पर उन्‍हें आपत्ति है उनपर एक नजर डालें-