Thursday, August 28, 2014

मेरी भाषा मेरा राष्‍ट्र है उसे बस एक देश चाहिए- छीनकर लेना होगा।

हमारा देश औपचारिक रूप से द्वि-राष्‍ट्र सिंद्धांत को खारिज करता है। इस सिद्धांत के पनपने और फिर भारत द्वारा खारिज किए जाने के अपने ऐतिहासिक कारण है। स्‍वाभाविक है कि वह सिद्धांत जिसके कारण देश का विभाजन हुआ उसे सिंद्धांतत: स्‍वीकार करना राष्‍ट्र के लिए कठिन है जबकि पाकिस्‍तान के लिए इस सिद्धांत का स्‍वीकार करना ही स्‍वाभाविक है। एेसे में जब कोई घूरे पर चढ़ा कुक्‍कुट बांग देकर कहे कि भारत में रहने वाला हर भारतीय हिंदू ही है, तो यह पुन: धार्मिक राष्‍ट्रवाद के उभरने की ओर संकेत करता है जो दो-राष्‍ट्र सिद्धांत का मूल आधार है। यानि यह पूर्व धारणा की हिंदू व मुसलमान दो अलग अलग राष्‍ट्रीयताएं है अत: उनके लिए अलग अलग राष्‍ट्र होना चाहिए।
अस्‍तु, हम अपनी नजर उस विभाजन पर डालें जो पाकिस्तान में हुआ उसका सिद्धांत भी एक तरह का दो-राष्‍ट्र सिंद्धांत ही था तथा बंग-मुक्तिवाहिनी की मूल चिंता पाकिस्तान से बंग राष्‍ट्र को अलग करने की थी। याानि भाषा भी एक अलग राष्‍ट्रीयता है तथा वहॉं भी एक अलग राष्‍ट्र होना चाहिए। धर्म की तुलना में आधुनिक समय में भाषिक राष्‍ट्रवाद को अधिक स्‍वीकृति प्राप्‍त हुई है। इसका सबसे स्‍पष्‍ट उदाहरण राज्‍यों के पुनर्गठन का आधार भाषा को बनाया जाना माना जा सकता है। भारत एक राष्‍ट्र के रूप में इस बात को स्‍वीकार करता है कि भारत की विभिन्‍न 'राष्‍ट्रीय' भाषाएं दरअसल उसकी राष्‍ट्रीयताएं है। इनके आधार पर ''राज्‍य'' बनाए गए तथा भारत कहा जाने वाला राष्‍ट्र इन राज्‍यों का ही एक संघ भर है जो गणतंत्रात्‍मक है।  इस बात का विधिक-तकनीकी मतलब मात्र इतना है कि विभिन्‍न भाषिक राष्‍ट्रीयताएं मिलकर एक गणतंत्रात्‍मक ढांचा तैयार करती हैं जो भारत-राष्‍ट्र कहलाता है। ये राष्‍ट्रीयताएं भारत राष्‍ट्र की मातहत संरचनाएं नहीं हैं वरन उसकी स्रोत संरचनाएं है। ये हैं तो भारत है तथा 'किसी भारत' को हक नहीं कि वे इन राष्‍ट्रीयताओं का दमन करे या इन पर राज करे।
अब जरा विचार करें कि ''भारत बनाम इंडिया'' की जो बहस उठाई जाती है वो क्‍या है। मूलत: इस बहस की स्‍थापना है कि भारत के अवसरों, संसाधनों व निर्णयन पर इस तबके का कब्‍जा है जो ''इंडिया'' से व्‍यक्‍त होता है। इसकी पहचान के बाकी मानकों के अतिरिक्‍त सबसे महत्‍वपूर्ण यह है कि ये खुद को अंग्रेजी में व्‍यक्‍त करता है तथा उसके साथ ही अपनी पहचान को देखता है। ये पुन: एक भाषिक राष्‍ट्रीयता ही है। किसी भी प्रकार के निर्णयन में भारतीय राष्‍ट्रीयताओं का दमन कर उनपर एक भिन्‍न राष्‍ट्रीयता का आरोपण उस आपसी समझदारी का  सीधा उल्‍लंघन है जो इन भाषिक राष्‍ट्रीयताओं ने भारत की निर्मिति में अपनाई थी ऐसे में सहज स्‍वाभाविक अपेक्षा होनी चाहिए कि ये भाषिक राष्‍ट्रीयताएं अपने राष्‍ट्र का स्‍वयं निर्माण करें, राष्‍ट्र वे पहले से हैं बस उनके देया पर कब्‍जा किसी और का है उसे आजाद कराने का सवाल है।
भारतीय भाषाओं के लिए संघर्ष करने वाले एक मित्र अक्‍सर ये उदाहरण देते हैं कि हमारा देश लाख अहिंसावादी करार दिया जाए सच्‍चाई ये है कि वह सुनता तभी है जब कोई हथियार उठाए। सिखों का उदाहरण लें हम जीभर उन पर चुटकले गढकर..उनका उपहास करते रहे किंतु जब वे अपने राष्‍ट्र के लिए बंदूके उठाकर खड़े हुए तो कुछ कुर्बानियॉं गईं, आंतकवादी करार दिया गया, दमन कर दिया गया तथापि देश ने नरसंहार भी किया किंतु ये भी सच है कि मुख्‍यधारा में उनके लिए जगह तब ही बन पाई जब वे इस ''अखंडता'' के लालीपॉप से परे देख पाए। भाषिक राष्‍ट्रीयता अभी उस मुकाम पर पहुँची नहीं है लेकिन अंग्रेजियत के हाथो दमन व अपमान अब उस शिखर पर पहुॅच रहा है कि कुछ बलिदान देना पड़ेगा कुछ सजाएं भी दी जानी होंगी। ऐसे हर राष्‍ट्र को खारिज किए जाने की जरूरत है जो उन राष्‍ट्रीयताओं का अपमान करता है जिनसे वह बनता है। यह भी अहम है ये अंग्रेजी को हटाकर हिन्‍दी बैठाने की लड़ाई नहीं हो सकती, जैसे गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज बैठाना आजादी नहीं है। भारतीय भाषिक राष्‍ट्रीयताओं को मिलकर अंग्रेजी-राष्‍ट्रवाद के खिलाफ संघर्ष करना होगा। सीसैट/सेना की अफसरशाही/उच्‍च न्‍यायपालिका कई मोर्चे हैं जीत का रास्‍ता एक ही इंकलाब।

Tuesday, August 26, 2014

सरहद ही माने तो काहे की आजादी

कल शचीन्‍द्र आर्य ने शिकायत की थी कि भई फेबु पोस्‍ट को ब्‍लॉग पर ला चेपना गलत बात है।  बात थोड़ा सही भी है अभी भी हिन्‍दी के लोग आनलाइन कोई अपार तो हैं नहीं जो हैं वो उधर भी हैं इधर भी ऐसे में दोनों जगह एक ही सामग्री पाठकश्रम के साथ अन्‍याय है। दूसरे ये भी कि ब्‍लॉगिंग व फेसबुकिंग दोनों की प्रकृति एक ही तो है नहीं। लेकिन दूसरा पक्ष भी है- फेबु पोस्‍ट की उम्र बेहद कम होती है कुछ मिनटों से लेकर एकाध घंटा फिर वह आती जाती या डूबती उतराती रहती है। जबकि ब्‍लॉग तुलनात्‍मक रूप से कहीं दीर्घायु होते हैं। इसलिए वे पेास्‍ट जिनके विषय में अगले को लगे कि इसका अचार बनाया जा सकता है उसे ब्‍लॉग के जार में रखकर धूप लगाने में कोई बुराई भी नहीं है। ब्‍लॉग पर डाली गई पोस्‍ट समझिए फिलहान अभिलेख बनाने के लिए हैं। ये जरूर है कि उधर से इधर चेपते समय उसमें लिंक फोटो तथा लेख में कुछ बदलाव या विस्‍तार की गुंजाइश रहनी चाहिए।
आज मुझे अपने इन्‍बाक्‍स में किसी बलूचिस्‍तान हाउस से बलूचिस्‍तान की आजादी के समर्थन में एक ईमेल प्राप्‍त हुई। मुझे कुछ हैरानी हुई, वो इसलिए कि मैं इस मुद्दे से कतई जुड़ा नहीं रहा हूॅ। व्‍यक्तिगत तौर पर मुझे लगा कि इसे किसी न किसी तरह भारत में फैलने फैलाने की छूट मिली रही है क्‍योंकि इतना निकट होते हुए भी मुझे कभी कश्‍मीर की आजादी के समर्थन में या उत्‍तरपूर्व के अलगाववादी (चाहें तो आजादी कह लें) आंदोलनों को इतना खुलकर प्रचार करते नहीं देखा। इस पर मेरी फेबु पोस्‍ट:
यदि आपके इन्‍बॉक्‍स में बिना किसी सदस्‍यता, रुचि आदि के अचानक ''बलूचिस्‍तान की आजादी'' के समर्थन में कोई ईमेल आ टपके जो किसी एक्टिविज्‍म से न उपजी हो वरन पीआर परिघटना लगे तो बलूचिस्‍तान या पाकिस्तान पर तो नहीं किंतु अपने आनलाइन एक्टिविज्‍म पर आलोचनात्‍मक नजर की जरूरत तो है। तो भैया बलूचिस्‍तान हाऊस वालो अगर वाकई पाकिस्‍तान में आपके मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, दमन का आप शिकार हैं तो मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं किंतु अगर किन्‍हीं भारतीय ऐजेंसियों के प्रभाव में आप फूल रहे हों तो जान लीजिए कि हम अपने ही देश के बीसियों समुदायों की इच्‍छा व मानवाधिकारों के लिए कुछ नहीं कर पाए हैं- इरोम शर्मिला आपको बता देंगी हमारे ''राज्‍य'' की हकीकत। व्‍यक्तिगत तौर पर जमीन से उभरे हर सांस्‍कृतिक/अस्मिता संघर्ष को मेरी शुभकामनाएं हैं जो देश कहे जाने वाले आतताई ढांचे से लड़ रहे होते हैं बशर्ते वे ऐसा किसी और देश के बहकावे या भरोसे न कर रहे होते हों। इस लिहाज से सिर्फ बलूचिस्‍तान ही क्‍यों कश्‍मीर, नागालैंड, तिब्‍बत सभी की आजादी के लिए शुभकामनाएं। 


Sunday, August 24, 2014

रूप-क्षय से भय

उम्र के बीतने के साथ एक बड़ी गड़बड़ ये है कि ये अकेले आपकी नहीं बढ़ती और अगर आपने उम्र से बड़ों और छोटों के साथ बराबरी की दोस्ती की दुर्लभ कला नहीं सीखी हुई है तो आप अक्सर उन लोगों के इर्द गिर्द हो जाते हैं जो अापकी ही तरह बढ़ती उम्र के होते हैं। कल की मनीषा की ब्लॉग पोस्ट ने मजबूर किया कि अपने आस पास बढ़ती उम्र से भयाक्रांत चेहरों को याद करूं। पोशाक-पार्लर-प्रसाधन, खुशी या जरूरत के लिए नहीं - डर के कारण। हमने शायद सभी औरतों को ये अहसास करा दिया है कि रूप है तो तुम हो... उन्हें रूप बचाने में लगे रहने दो (सो भी कोई बची रहने वाली चीज़ थोड़े है) - इस तरह  औरतें रूप-क्षय के अपने भय में लड़ने के लिए मॉल दर मॉल पोशाकों के लिए भटकती हैं या फिर पार्लर या शीशे के सामने इस युद्ध के अपने हथियार मांजती हैं... दुनिया उनके ज़ेहन से थोड़ा धुंधला जाती हैा हम पुरुष दुनिया हम अपने लिए बचाए रख सकते हैं।

Thursday, August 21, 2014

राष्‍ट्र को राष्‍ट्र रहने दो...उसे इज़राइल न करो

अमेरिका के मिसोरी प्रांत के फर्ग्‍यूसन इलाके में आजकल कोहराम मचा हुआ है। एक 18 साल के निहत्‍थे अश्‍वेत पर एक पुलिस अधिकारी ने गोली चलाकर उसकी जान ले ली। उसके बाद से वहॉं अशांति की स्थिति है। अपने ही निहत्‍थे असैनिक नागरिकों पर हिंसा को अक्‍सर राष्‍ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद विरोध आदि के सहारे  सही ठहराने के कोशिश होती रही है। किंतु जो लोग अातंकवाद, राष्‍ट्रीय सुरक्षा या ऐसे ही जुमलों का इस्‍तेमाल अति राष्‍ट्रवाद को हवा देने के लिए करते हैं उनसे सावधान होने की जरूरत है। समाज का मिलिटराइजेशन व आंतरिक सुरक्षा के लिए जासूसी व अन्‍य सर्विलांस तकनीकों के विस्‍तार की वकालत इसी तबके की मांग होती है। संक्षेप में कहें तो देश का इजराइलीकरण करने की जिद। अमरीका के जिन अफसरों को इजराइलीकृत होने भेजा गया था उन्‍होंने ही वापस आकर वह हालात पैदा किए हैं जो वहॉं आजकल फर्ग्‍यूसन इलाके में दिख रहे हैं। भारत के इजराइलीकरण के पक्षधर संघी तो कोई सबक लेंगे नहीं किंतु हम प्रतिरोध करने वाले समझें कि हमारा ये विरोध फिलिस्‍तीन के समर्थन का 'अहसान' नहीं खुद भारत को बचाए रखने के जरूरत है।



Tuesday, August 19, 2014

रट मत - खटपट कर- चल अड़

राष्‍ट्रवादी दोस्‍त जिनमें मेरे कई अपने विद्यार्थी शामिल हैं अक्‍सर बेचैन हो जाते हैं जब उन्‍हें प्रतीत होता है की मेरे वक्‍तव्‍यों में 'राष्‍ट्रवाद' के लिए वो सम्‍मान नहीं दिखता जो उन्‍हें लगता है कि राष्‍ट्रवाद/देशभक्ति का स्‍वाभाविक हक है। मेरे लिए बड़े न होने की जिद में अड़े मित्रों से बस इतना कहना है कि राष्‍ट्र के प्रति अंधभक्ति बस उन प्रक्रियाओं की ओर इशारा भर करती है जो विभिन्‍न प्रतीकों से राष्‍ट्रवाद को अप्रश्‍नेय ''हॉली काऊ'' बनाकर पेश करता है। इस पर डाली गई हर सवालिया नजर को अवमानना से देखा जाता है। बावजूद इस तथ्‍य के सबके सामने होने के कि मध्‍ययुग में जितनी हत्‍याएं धर्म की बदौलत हुईं आधुनिक युग (जिसका उत्पाद 'राष्‍ट्र-राज्‍य' है) में इससे कहीं कम समय में राष्‍ट्रवाद ने इससे बहुत ज्‍यादा हत्‍याएं की हैं।
मेरे लिए राष्‍ट्र किसी भी तरह से राज्‍य के साथ हाईफनेट मातहत पद नहीं है। मेरे लिए राष्‍ट्र, जन से निसृत है तथा राज्‍य उसकी मातहत संरचना जैसे ही किसी ''राष्‍ट्रवाद'' का सहारा ले राज्‍य, राष्‍ट्र पर हावी होता है तुरंत ही राष्‍ट्रवाद सबसे बड़ा राष्‍ट्रद्रोह हो जाता है तथा ऐसे राष्‍ट्रराज्‍य की खिलाफत सबसे बड़ी देशभक्ति।
खैर राष्‍ट्रवाद पर हम सबकी राय मिले इसकी संभावना कम ही है। पर आप कम से कम इस बात की सराहना तो करेंगे कि जब से राष्‍ट्रभक्‍त सरकार के पदासीन होने की हवा चली... 'देशभक्‍त' एक व्‍यंजनापूर्ण डर्टी टर्म हो गई है (जैसे अच्‍छे दिन)!  

Monday, August 18, 2014

सरकार बादर ने मानणा त पड़ेगा

खचेढ़ू चाचा नू बताओ कि बालक जीजान से लड़े..लाठी पत्‍थर गाली खाई..भूखे प्‍यासे रहे और क्‍यूँ .. इसलिए कि भाषा जिसमें खाते-पीते-हगते-मूतते हैं उसमें इम्तिहान देने पर ईनाम मिले न मिले पर इसकी सजा नहीं होनी चाहिए। पर न जी... कितेक बेर कही पर जे सरकार बादर नई मान्‍ने तो न ही मान्‍ने।
ढीली अदवायन की चारपाई पर झूलते खचेढ़ू चाचा ने कही कि देख बेट्टा जे एक इम्तिहान, दो नौकरी, पॉंच गॉंव मांगोगे तो न मिलता झोट्टे का मूत... इसलिए बालकन ने कहिए कि दुनिया मांगो... तुम्‍हारी है तुम्‍हें ही मिलणी चाहिए... न दे त दीदे त दीदे मिला के कहो कि देख देणी त तुझे पड़ेगी। आज न त कल।

Sunday, May 04, 2014

एक एम्बेडिड कीबोर्डपीट की साफ्टफीड

बात की शुरूआत हल्‍के-फुल्‍के ढंग से की जाए तो लोगों की रूचि बन जाती है इसलिए मैं अपनी बात एक चुटकले से कर रहा हूँ। ये चुटकला आज अस्‍सी घाट के पास हासिल हुआ... यानि दिखा, लीजिए आप भी देखिए :  



 अब  हँसना बंद कीजिए भई... पोस्‍टर पर विश्‍वास नहीं करते मत करो पर ह्यूमर के नंबर तो बनते हैं अगले के।

खैर हम आजकल बनारस में हैं तथा भले ही हम आम आदमी पार्टी के विधिवत सदस्‍य नहीं हैं किंतु बनारस आए हैं केजरीवाल-मोदी संघर्ष में केजरीवाल को समर्थन देने के लिए। इसलिए इस पोस्‍ट की बातें हमने ऐम्‍बेडिड साफ्ट ब्‍लॉग करार दी हैं जिसे आप डिस्‍क्‍लेमर मान सकते हैं। बनारस पर अपनी राय यह है कि बनारस एक घंटा शहर है,  जो  बजता  नहीं वो बनारसी नहीं। फिर चाहे वो ट्रेफिक हो, लोग या धर्म यहॉं हरकुछ बस बजता है और खूब बजता है। खूब नई चमचमाती इमारत में कोई पुरानी हवेली का अहाता आ बजता है  तो इटालियन स्‍टाइल पित्‍ज़ेरिया में कुल्‍हड़। सबसे ज्‍यादा बजते हैं लोग।

प्रचार आदि के बीच में डेढ़ेक घंटे का अंतराल था हम जा पहुँचे अस्‍सी: 



यहॉं पुरोहिताई, पर्यटन,  ठुल्‍लई सब थे और थी राजनीति :



हम जा जमे एक पित्‍ज़ेरिया में जिसके बारे में हमें पहले हीबता दिया गया था कि अस्‍सी अवलोकन के लिए सबसे सही बाल्‍कनी सीट यही पित्‍ज़ेरिया है


हम  जा बैठे गंगा और माहौल को पीने लगे जाहिर है कुछ आर्डर करना ही था तो हमने इस द्रव को चुना इससे पहले की बनारस में अवतरित हुए  मोदी लठैत हमें घाट पर बीयर पीने के आरोप में दुरस्‍त करने आ धमकें देख लें कि ग्रीन टी भर है साथ में जैम वाली ब्राउन ब्रेड थी मतलब शाम बन गई । सेल्‍फी हम भी ले सकते हैं सरजी: 



अब दिल्‍ली वाले जानते हैं कि प्रदूषण ने किया हो या मोबाइल टावर ने परअब ऐसा कर दिया गया है कि घरेलू चिडि़या हमारे लिए विज्‍युअल एक्‍जॉटिका हो गई है। 



वैसे शाम बन ही नहीं ढल भी गई थी अब चूंकि गंगा अपनी आरती करवाने की तैयारी करने लगी थीं इसलिए हम अपनी नास्तिकता को अक्षत बचाए वहॉं से निकल लिए 



वापसी में हमारी नजर पड़ी की सीडि़यों पर रामदेव सटे पड़े हैं कि मोदी सेल में मुफ्त शिविर लगा अपने नंबर बढ़ाए जाएं





Saturday, June 09, 2012

दर्शक की परीक्षा है शांघाई

 

ये सब फेसबुक पर ही ठेलने का सोचा था क्‍योंकि आजकल विचार भी स्‍टेटस/ट्विटर टाईप छोटे छोटे टुकड़े में आते हैं पर थोड़ी ही देर में लगा दो-चार लाइन में बात नहीं बन रही है तो लाइव राइटर खोल लिया।  साफ डिस्‍क्‍लेमर ये कि हम कोई समीक्षा नहीं लिख रहे सर भारी कर दिया है फिल्‍म ने लिखकर हल्‍का कर रहे हैं। हमारी टिकट शाम 7:50 की थी पर सुबह से ही रवीश के इन स्‍टेटसों ने इतना सुनिश्चित कर दिया था कि हम कोरी स्‍लेट दर्शक नहीं थे।


फ़िलिम नहीं डोकूमेंट्री बना दिया है । अरे यार मूवी देख रहा हूं शंघाई । बेकार है। हाँ सुन मकान मालकिन आ रही है । पैसे तैयार रखना । तेरी बॉडी पर फ़र्क पड़ा ? कूलर बढ़िया है । चिन्ता मत करो । शांघाई के इंटरमिशन में यही सब सुनाई दे रहा है । रिव्यू नहीं है ये ।

(ये जाहिर हे उनकी इंटरवल के समय की आसपास वालों की प्रतिक्रिया थी, अपन सहमत हैं हम एक भरे-पूरे परिवार के साथ फिल्‍म देखने के लिए अभिशप्‍त थे जिसमें दादा/नानी/मामा/पोता/ वगैरह वगैरह 16 लोग थे हमारे आस पास की प्रतिक्रियाएं इससे अलग नहीं थीं, कैसी है का उत्‍तर अच्‍छी या ठीक कहने पर तेज उपहास का केंद्र बनना तय था, बने)

इसी क्रम में रवीश के ही बाकी स्‍टेटस

शांघाई । फिर से उसी सिस्टम और राजनीति के क्रूर चेहरे को देखने के लिए ज़रूर देखें । राजनीति फ़िल्म की तरह ड्रामेबाज़ी नहीं है । शायद वो फ़िल्म भी नहीं जैसी फ़िल्में हम देखने के अभ्यस्त हैं । मराठी में बनी सियासत फ़िल्म की याद आ रही थी । अर्ध सत्य की भी । कुछ फ्रेम लाजवाब हैं । अभय देओल वाकई बेजोड़ कलाकार है । हाशमी में नई संभावनाएं नज़र आ रही है । राजनीति को जस का तस धर दिया है दिबाकर ने ।

तथा ये भी थे:
शांघाई को साधारण फ़िल्म कहूं तो आप नाराज़ हो जायेंगे क्या ? तब से सोच रहा हूं ज़बरन फ्रेम पाठ कर क्या कोई फ़िल्म महान हो सकती है ।

कुल मिलाकर ये कि  अपन अच्‍छी या बुरी फिल्म देखने नहीं गए थे वरन उस बेचैनी से साक्षात्कार करने गए थे जिसने रवीश जैसे नित छवियों में ही गिरे व्‍यक्ति तक को सुबह से शाम तक घेर लिया था और एक मायने में कनफ्यूज भी कर दिया था। हालांकि जल्द ही रवीश ने भी महसूस किया कि अच्छी/बुरी के फ्रेम में इस फिल्‍म का आस्‍वादन नहीं किया जा सकता।  गनीमत रही कि ब्‍लॉग पर रवीश ने फिल्म का जो विश्‍लेषण किया है वह हमसे तब चूक गया था उसे आज पढ़ा है।

इस सब पूर्वोन्‍मुखीकरण के बाद हमने फिल्‍म देखी और सही है बेचैन होकर आए..डीटी में देखी जो खुद ही एक भारत नगर को उजाड़कर बनाया गया है तथा उजड़े इस आईबीपी की चमक में झांक नहीं सकते (सोलह टिकट चार हजार के पड़े थे मेजबान को, जिन्‍हें अंत तक इनके बेकार जाने का अहसास था)... बेचैनी हमें भी उसी फ्रेम से सबसे ज्‍यादा हुई...ट्रक आता है और ध्‍धा..ड़   डा.अली..रामदास हो गए। फिल्‍म एप्रिसिएशन कोर्स में हमारे साथी रहे दोस्‍त जो सह दर्शक भी थे ने बताया कि कैमरा वीक है, ट्रीटमेंट खास नहीं फिल्‍म खुद को ठीक से खोलती नहीं...पूरी फिल्म सस्‍ती कास्‍ट के साथ बनाई गई है... (मतलब चार हजार बेकार गए) :) हम सुनते हुए भी वहीं अटके थे । ...ट्रक आता है और ध्‍धा..ड़   डा.अली..रामदास हो गए 

भीड़ ठेलकर लौट गया वह

मरा पड़ा है रामदास यह

देखो देखो बार-बार कह

लोग निडर उस जगह खड़े रह

लगे बुलाने उन्हें जिन्हें संशय था हत्या होगी।

फिल्म अपनी नजर में दर्शक की परीक्षा है। एक टिकट खरीद हर दर्शक हर फिल्‍म को कसौटी पर परखता है ये फिल्‍म पासा पलटती है दर्शक की परीक्षा लेती है... प्रेमचंदी सुखांत नहीं है कोई हीरो नहीं है न कृष्‍णन न कोई ओर...कोई प्रतिशोध में कोई महत्‍वाकांक्षा है... बार बार वही फ्रेम ललकारता है..मरने के लिए तैयार हो

पर मरने का आनंद... हमारे अंदर सुला दिया गया युवक बीच बीच में रुमानियत में भरकर फुसफुसाता है कि ....जो हो आनंद तो उसी में है।

Sunday, January 15, 2012

अब तो ये नूंहए चाल्‍लेगी

 

ब्‍लॉग लिखना नहीं वरना ब्‍लॉग पढ़ना भी कम हुआ है। आज रवीश की एक कवितानुमा पोस्‍ट देखी तो मन में सवाल भर्राया कि भले आदमी आनलाइन दुनिया में इतना समय खपाने और बहुल उपस्थिति को साधें कैसें ? अगर ट्विटर, फेबु, ब्‍लॉग, प्‍लस वगैरह के साथ ईमानदारी से रहें और घर, परिवार, नौकरी में भी बेईमान न हों तो ये बुहत मुश्कि‍ल हो जाएगा। सवाल केवल समय का नहीं है, मास्‍टर कोई सबसे व्‍यस्‍त जीव तो है नहीं पर मामला दिमागी तौर पर जुड़ाव का भी है। खैर फिलहाल हम ईमानदारी को टाल रहे हैं, डिसक्‍लेमर ये है कि भले ही रिश्‍वत उश्‍वत की कोनो गुंजाइश हमारे धंधे में नहीं है पर हम साफ बता दे रहे हैं कि सोचने, लिखने व नौकरी पीटने, घर गिरस्‍ती संभालने के मामले में हम पूरी तरह से ईमानदारी से सक्रिय नहीं हैं। कुल मिलाकर अपना नएसाला प्रण ये है कि लिखेंगे मन की, अगर वो 140 अक्षरों में हुआ तो ट्विटर पर ठेलेंगे...थोड़ा ज्‍यादा हुआ तो फेसबुक पर... कुछ और ज्‍यादा तो ब्‍लॉग पर। अब तो ये नूंहए चाल्‍लेगी। 

Monday, July 11, 2011

लद्दाख यात्रा

अरसे बाद पोस्‍ट लिखी जा रही है, ब्‍लॉग पढ़ना भी कुछ कम हो रहा है... क्‍यों? कई बहाने बनाए जा सकते हैं पर हम मास्‍टरों की दिक्‍कत ये है कि वे लाख बहाने बनाएं पर दुनिया का सबसे चालू बहाना उनसे मुँह मोड़े रहता है... वे कह सकते हैं कंप्‍यूटर खराब है, बीमार हैं, इंटरनेट नहीं चल रहा... आदि आदि। पर वे ये नहीं कह सकते कि समय नहीं मिला, व्‍यस्‍त था। मास्‍टर और व्‍यस्‍त... कौन मानेगा, खुद समय आकर गवाही देगा...मैं समय हूँ..हर मास्टर के पास मैं बहुतायत में हूँ... जो मास्‍टर कहे मेरे पास समय नहीं है...वो झूठ बोलता है... उसने अपने विद्यार्थियों से अच्‍छे बहाने बनाना तक नहीं सीखा, उस पर विश्‍वास न करो। तो भैया हम बीमार थे (झूठ), हमारे कंप्‍यूटर खराब थे (झूठ), हमारे ब्राडबैंड का भट्टा बैठ गया था (झूठ)... पर हमारे पास समय की कमी नहीं थी (सच)। एक और सच ये भी है कि हम नहीं लिख रहे थे क्‍योंकि हमें पता है सदैव पता था कि मेरे-उसके- किसीके लिखने न लिखने दुनिया थमती नहीं है। तो आज मन किया इसलिए लिख रहे हैं :)

समय की अधिकता के कई साइड इफेक्‍ट्स में से एक ये भी है कि हम यात्रा खूब करते हैं। जबसे ब्‍लॉग लिखने में विराम आया तब से कई यात्राएं की हैं...हिमाचल में अलग अलग यात्राओं में सिरमौर क्षेत्र, डलहौजी, धर्मशाला, मैक्‍लाडगंज, मनाली, रेवलसार आदि जाना हुआ। बीच में काम से जुड़ी एक यात्रा में अहमदाबाद भी जाना हुआ जहॉ बेहद सौम्‍य संजय बेंगाणी भाई से भी एक संक्षिप्‍त मूलाकात हुई।  जिस यात्रा की बात मैं आज करना चाह रहा हूँ वह इनसे अलग हाल की हमारी लद्दाख यात्रा है। पिछले दिनों यानि 12 से 21 जून 2011 को हम भारत के 'अभिन्‍न अंग' कश्‍मीर राज्‍य में थे... तीन दिन घाटी के सुंदर इलाकों..गुलमर्ग, पहलगाम तथा श्रीनगर में बिताने के बाद हम उड़ चले लेह की ओर। श्रीनगर से लेह की हवाई यात्रा मात्र 30 मिनट की थी किंतु ये एक दुनिया से बिल्‍कुल भिन्‍न दुनिया में पहुँचने जैसा था... बहुत कम लोग पर्यटन के लिए लेह-लद्दाख पहुँचते हैं उनमें भी भारतीय पर्यटक और कम होते हैं...दरअसल कुछ साल पहले तक भारतीय पर्यटक विदेशी पर्यटकों की तुलना में चौथाई भी नहीं होते थे..राजग सरकार के विवादास्‍पद सिंधु-उत्‍सव के आयोजन के बाद से लद्दाख भारतीय स्‍थानीय पर्यटन के नक्‍शे पर आया है और पिछले तीन चार साल से भारतीय पर्यटकों की संख्‍या विदेशियों से अधिक हुई है। लोग अक्‍सर दिल्‍ली से सीधे लेह की फ्लाइट लेते हैं या कुछ लोग श्रीनगर से सड़क मार्ग से लेह जाना पसंद करते हैं जिसमें वे जोजिला दर्रे व कारगिल के खूबसूरत रास्‍ते से लेह पहुँचते हैं। ये रास्‍ता दो दिन में पूरा होता है जिसमें मार्ग में कारगिल में रुकना पड़ता है। सर्दियों में रास्‍ता बंद हो जाता है। हमारी योजना भी इसी रास्‍ते से जाने की थी पर श्रीनगर-लेह की टिकट सस्‍ती मिल जाने तथा इससे दो दिन बचने से ये कुल मिलाकर सड़क मार्ग की तुलना में सस्‍ती पड़ रही थी फिर बच्‍चों के आराम को ध्‍यान में रखते हुए हवाई मार्ग से ही लेह जाने का निर्णय लिया।

लद्दाख में हम कुल सात दिन रहे। पहले दो दिन समुद्रतल से दस हजार से ज्‍यादा ऊंचाई पर होने के कारण कम आक्‍सीजन में अभ्यस्‍त होने के लिए लेह में ही रहे... पहले दिन आराम किया तथा दूसरे दिन लेह का स्‍थानीय भ्रमण किया जिसमें हेमिस तथा थिक्‍से की बुद्ध विहार तथा सिंधु नदी का दर्शन प्रमुख था। दरअसल लद्दाख में हर मोड़, भू आकृति इतनी भिन्‍न इतनी खूबसूरत है कि लद्दाख को टूरिस्‍ट प्‍वाइंटों में बांटकर उसे मार्केट करने की रणनीति मुझे मूर्खता लगती है...अपनी भू आकृति में अपेक्षाकृत बंजरता भी इतनी सुंदर हो सकती है इसे केवल महसूस ही कर सकते हैं। मैं और नीलिमा दोनो ही भाषा के व्‍यक्ति हैं पर पहँचते ही समझ गए कि इस सौंदर्य का वर्णन करने का प्रयास भाषा की क्षमता को बढ़ाकर आंकना है। कश्‍मीर बेहद सुंदर है...उसे धरती का स्‍वर्ग कहा जाता...ठीक है किंतु लद्दाख...इसे कुछ कहा नहीं जा सकता यह कहे जाने के परे है। ये चहकने पर नहीं मौन पर विवश करता है।

अगल दो दिन हमने नुबरा-घाटी कहे जाने वाले लद्दाख क्षेत्र में बिताए। हुंडर गांव में लगाए गए कैंप में हम रूके। ये वह क्षेत्र है जो मेरी अब तक देखी गई भूआकृतियों में सबसे हैरान करने वाला रहा। सबसे पहले तो यहॉं पहुँचने के लिए खार्दुंग ला नाम के दर्रे से गुजरना होता है दुनिया का सबसे ऊंचा मोटरमार्ग वाला दर्रा है 18000 फीट से अधिक ऊंचाई पर आक्‍सीजन बेहद कम हो जाती है तथा अक्‍सर यात्रियों की तबियत बिगड़ जाती है... वहॉं अधिक देर न रुकने की सलाह दी जाती है। इसके बाद उतरकर हम पहुँचते हैं नुबरा नदी क्षेत्र में जो इस बर्फीली दुनिया में बाकायदा एक रेगिस्तान है जिसमें बालू के दूर दूर तक बिखरे टिब्‍बे हैं जिनपर बाकायदा ऊंटों की सवारी होती है। यानि एक ही भूआकृति में बर्फीले पहाड़, नदी, और रेगिस्तान है... आप कुदरत की रचना पर बस हैरान हो सकते हैं।

नुबरा से लौटकर अगल दो दिन बेहद खूबसूरत पांन्‍गांग झील की यात्रा में बिताए। थ्री ईडियट फिल्‍म में लोकेशन के तौर पर इस्‍तेमाल होने के कारण लोकप्रिय हुई यह विशालकाय झील दुनिया की सबसे ऊंची खारे पानी की झील है। झील का तीन चौथाई हिस्‍सा चीन तथा एक चौथाई भारत के पास है। पानी इतना खारा है कि झील में मछली तक नहीं रह पाती। ये झील निश्चित तौर प्राकृतिक सौंदर्य की खान है... आंखें खुद ब खुद झुक जाती हैं मानों हार स्‍वीकार कर रही हों कि इतना सौंदर्य खुद में समा सकें इतना बूता नहीं हैं। फिर से एक मौन।

ऊपर लिखे शब्‍दों को यात्रा वृतांत न माना जाए...लद्दाख अवर्णनीय है। ये शब्‍द तो केवल सनद हैं कि हम वहॉं थे। एक अंजुलि चित्र, यदि कभी दुस्‍साहस कर पाया तो विस्‍तार से इस यात्रा को शब्‍दों में बांटने का प्रयास करुंगा -

स्‍लाइडशो की दुड़वा तस्‍वीरों की बजाए इत्‍मीनान से तस्‍वीरें देखना चाहें तो पूरी एल्‍बम नीचे है।

Ladakh 2011