शब्द जल्दी में हैं
कविता हो जाने की
सरे राह फिसल कर
बन जाते हैं चिट्ठी
व्यभिसार की
बालों में फिरती उँगलियों के पोरों पर
आ चिपकते हैं
चीकट झूठ
तुम अपनी कविताओ में
शिरोरेखा क्यों नहीं लगातीं
सारी शिरोरेखाएं बन गयीं
कीलें दीवार पर ठुंके
प्रशस्ति पत्रों की।
Thursday, December 10, 2015
शब्द जल्दी में हैं
Thursday, April 16, 2015
तो तुम्हें कौन प्यार करेगा
अच्छा तो तुम्हें कौन प्यार करेगा
सभी कविताएं अगर हो जाएं स्वकीया
प्रेम बन जाए जेलखाना
कह लो घर जी आए तो
आटा गूंथती देह पर चुहचुहा आई बूंदों पर
लुटाने के लिए
बहुत प्यार है दुनिया के कैदखानों में
पर कहो
मेलोड्रामा पर तमतमा आए तन पर
सिकुड़ गई ऑंखों पर भी तो आना चाहिए न प्रेम।
अपने नहीं कर सकते सच्चा प्रेम
स्वकीया प्रेम पर तालाबंदी चाहिए।
Saturday, April 04, 2015
पैदा भी होती , फिर बनाई जाती है स्त्री
एक फेसबुक मित्र ने सवाल उठाया कि उनकी नन्हीं साढ़े तीन साल की बच्ची घड़ी घड़ी मेकअप या श्रृंगार में रूचि लेती दिखती है तथा इसकी साफ व्याख्या समझ नही आ रही। वे खुद बहुत श्रृंगार पसंद नहीं इसलिए बच्ची अनुकरण में ऐसा कर रही हो इसकी संभावनाएं कम ही हैं, इसी तरह ''औरतें मर्दों को अच्छा दिखने के लिए सजती हैं'' का सामाजिक प्रलाप इतनी नन्हीं बच्ची पर लागू करने से वे झिझक रहीं थीं क्योंकि इतनी छोटी बच्ची में भला यौन चेतना कैसे स्वीकार की जाए। हम स्त्री सवाल पर संवेदना रखने वाले स्त्री निर्मिति को समाजीकरण से आकार लिया हुआ ही मानते रहे हैं किंतु खुद हमारे घरों के नन्हें पुरुष व नन्हीं स्त्रियॉं तमाम सचेत प्रयासों के बावजूद गुडि़यॉं, मेकअप पसंद करती दिखती हैं (या बालक बंदूक या हिंसक हथियारों के प्रति आकर्षित होते दिखते हैं)। क्या मसला कुछ कुछ प्राकृतिक भी है ?
इस संबंध में मुझे जोए क्विर्क की पुस्तक ''इट्स नॉट यू इट्स बायोलॉजी'' बहुत काम की लगती है। पुस्तक उद्विकास की द्ष्टि से मनुष्य के व्यवहार की पड़ताल करती है तथा यौनिकता व उद्विकास पर एक नई अंतर्दृष्टि देती है।
सच यह हैं कि हाँ नन्ही बच्चियां भी प्रतिलिंगी को आकर्षित करने के लिए ही ऐसा करती हैं... ये चेतन मन का व्यवहार नहीं है ये उसकी उद्विकास की नियति है। लंबी उद्विकास प्रक्रिया जेनेटिक स्तर पर ऐसी निर्मिति बनाती है अतः यह परिवेश की भूमिका का नकार नहीं है।
साढ़े तीन साल ही नहीं गर्भस्थ शिशु या जन्म के एकदम बाद के शिशु के व्यवहार के भी यौनिक पक्ष हैं, हाँ स्वाभाविक है यह सोशियो बायोलॉजी का वह अंश ही है जिसे जेनेटिक कहा जाता है किन्तु genes स्वयं में केवल सूचना रसायनों की श्रंखला भर हैं जो प्रत्येक प्रजाति ने उद्विकास क्रम में तय कर ली हैं तथा प्रत्येक परिवेशगत घटना चाहे वह प्रदूषण हो जुकाम या बलात्कार... ये इन सूचना श्रृंखलाओं में बदलाव ले आती है।
सामान्य स्त्री व्यवहार पुरुष जीन के धारण के लिए सर्वोपयुक्त पात्र होने का विज्ञापन तथा सामान्य पुरुष व्यवहार उपयुक्त जीन वाहक तथा जन्मोपरांत बेहतर पालक होने का विज्ञापन होता है।
समाजीकरण की भूमिका इस स्वस्थ गर्भधारक/ अच्छी जीन/अच्छे पालक के अर्थ निर्धारण में है।
ऐसा कोई जीव वैज्ञानिक नियम नहीं है की जीन पालक से ही ली जाएगी... अलग अलग भी ली जा सकती है।
नन्ही बच्ची के व्यवहार का यौनिक पक्ष ये है की वह मैं बेहतर पात्र हूँ का विज्ञापन कर रही है... परिवेश व समाजीकरण से वह बाद में यह सीख सकती है की सर्वश्रेष्ठ जीन व पालक प्राप्त करने के इस विज्ञापन की भूमिका वह कम मानने लगेगी तथा अन्य व्यवहारों (मसलन मोर की पूंछ के समकक्ष मनुष्य व्यवहार) पर ज्यादा निर्भर करेगी।
इस संबंध में मुझे जोए क्विर्क की पुस्तक ''इट्स नॉट यू इट्स बायोलॉजी'' बहुत काम की लगती है। पुस्तक उद्विकास की द्ष्टि से मनुष्य के व्यवहार की पड़ताल करती है तथा यौनिकता व उद्विकास पर एक नई अंतर्दृष्टि देती है।
सच यह हैं कि हाँ नन्ही बच्चियां भी प्रतिलिंगी को आकर्षित करने के लिए ही ऐसा करती हैं... ये चेतन मन का व्यवहार नहीं है ये उसकी उद्विकास की नियति है। लंबी उद्विकास प्रक्रिया जेनेटिक स्तर पर ऐसी निर्मिति बनाती है अतः यह परिवेश की भूमिका का नकार नहीं है।
साढ़े तीन साल ही नहीं गर्भस्थ शिशु या जन्म के एकदम बाद के शिशु के व्यवहार के भी यौनिक पक्ष हैं, हाँ स्वाभाविक है यह सोशियो बायोलॉजी का वह अंश ही है जिसे जेनेटिक कहा जाता है किन्तु genes स्वयं में केवल सूचना रसायनों की श्रंखला भर हैं जो प्रत्येक प्रजाति ने उद्विकास क्रम में तय कर ली हैं तथा प्रत्येक परिवेशगत घटना चाहे वह प्रदूषण हो जुकाम या बलात्कार... ये इन सूचना श्रृंखलाओं में बदलाव ले आती है।
सामान्य स्त्री व्यवहार पुरुष जीन के धारण के लिए सर्वोपयुक्त पात्र होने का विज्ञापन तथा सामान्य पुरुष व्यवहार उपयुक्त जीन वाहक तथा जन्मोपरांत बेहतर पालक होने का विज्ञापन होता है।
समाजीकरण की भूमिका इस स्वस्थ गर्भधारक/ अच्छी जीन/अच्छे पालक के अर्थ निर्धारण में है।
ऐसा कोई जीव वैज्ञानिक नियम नहीं है की जीन पालक से ही ली जाएगी... अलग अलग भी ली जा सकती है।
नन्ही बच्ची के व्यवहार का यौनिक पक्ष ये है की वह मैं बेहतर पात्र हूँ का विज्ञापन कर रही है... परिवेश व समाजीकरण से वह बाद में यह सीख सकती है की सर्वश्रेष्ठ जीन व पालक प्राप्त करने के इस विज्ञापन की भूमिका वह कम मानने लगेगी तथा अन्य व्यवहारों (मसलन मोर की पूंछ के समकक्ष मनुष्य व्यवहार) पर ज्यादा निर्भर करेगी।
Tuesday, December 16, 2014
साकी पीए तो बने मधुशाला
मन की बात में मोदीजी
ने इस बार नशे को अपना निशाना बनाया है, बहुत निरापद सी बात लगती भी
है, नशा अंतत: एक
व्यसन है तथा इसके कोई लाभ हमारे जाने हैं भी नहीं। हॉंलाकि यह भी अहम है कि हमें इतिहास
का ऐसा कोई कोना ज्ञात भी नहीं है जहॉं नशा मौजूद नहीं था, नही
ही हम तारीख के ऐसे किसी मोड़ को ही जानते हैं जब आम लोग नशे की बुराइयों से ऐसे अपरिचित
हों कि उन्हें किसी शासनाध्यक्ष द्वारा इसकी जानकारी दिए जाने की जरूरत महसूस हो।
लोग अक्सर शराब से बरबाद हुए घरों के
दास्ताँ सुनाते हैं इसे पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता किन्तु मुझे लगता है इसकी
वजह यह द्रव्य स्वयं में उतना नहीं है जितना शराब पीने की हमारे यहाँ की प्रचलित
व्यवस्था है। स्कूल कॉलेज के होस्टलों की बीयर पार्टियों से लेकर गली मोहल्ले के
अँधेरे कोनों की देसी दारु बैठकों तक हमारे यहाँ शराब पीना लगभग पूरी तरह एक
मर्दाना स्पेस है बल्कि मर्दवाद की नर्सरी है। शराब के घूँटों के साथ चलने वाली
बातें लगभग पूरी तरह स्त्री विरोधी तथा मर्दवादी अहम् को ग्लोरिफाई करने वाली होती हैं ... घर पहुंचकर होने वाली चीखपुकार
व हिंसा तथा पत्नी पिटाई शराब के नशे के प्रभाव में शायद कम होती और इस कोचिंग ओवर
अ ड्रिंक के नशे में ज्यादा होती है। शराब बुराई है तो किसी को नहीं पीना चाहिए
किन्तु यदि इस स्वर्ग को पाना कठिन हो तो शराब पीने की संस्था व स्पेस का डी
जेण्डरीकरण किया जाना चाहिए। औरत मर्द को साथ पीने दें ये सिर्फ मर्दों के वेवड़ेपन
से कम नुकसानदेह रहेगा। शराब को अँधेरे कोनों से निकालिये भले ही घर में आने देना
पड़े।
Friday, November 28, 2014
परिवार (शाला) भंग कर दो
आप किसी विचार या सरणी में यकीन रखते हों तो जरूरी नहीं कि उसकी हर केनन से सहमत ही हों। मसलन समाज में स्त्री अधिकारों का सवाल मुझे अहम लगता है इससे मेरा जुडा़व तथा सहमति भी है। स्त्री विमर्श में घरेलू श्रम को उत्पादक मानने की एक बेहद लोकप्रिय धारा है। इनका मानना है कि घरेलू स्त्रियॉं (हाउसवाईव्स) को काम नहीं करती नहीं माना जाना चाहिए.. फिर इसके पक्ष और अनेक सिद्धांत भी हैं जैसे उनके द्वारा सुबह से शाम तक किए जाने वाले कामों का आर्थिक मूल्य लगाकर ये सिद्ध किया जाता है कि देखिए इस काम को कामकाजी स्त्रियों से तुलना करके देख लें वगैरह वगैरह। इसके ही समानांतर परिवार संस्था का महिमामंडन व इसके लिए हाउसवाईव्स का त्याग वगैरह भी गिनाया जाता है। ये सारे तर्क खारिज किए जा सकने वाले नहीं हैं न ही किसी के घर पर रहकर परिवार का पालन करने की पसंद (च्वाइस) या मजबूरी को उसके अपमान या शोषण का आधार बना सकने की कोई वकालत ही कर रहा हूँ। अपने ही परिवार व पास पड़ोस के अनुभवों के आधार इसे भी स्वीकार करता हूँ कि हाउसवाइफ होना बिना मेहनत का काम नही है। किन्तु...
और ये किंतु एक बड़ा किंतु है। किंतु ये कि ये घरेलू श्रम अक्सर स्त्री विरोधी तथा स्थापित संस्थाओं को मजबूत करने में अधिक इस्तेमाल होता है। परिवार और पितृसत्ता के जितने भी मानक हैं उनमें से किसी से भी टकराने के लिए जिन औजारों की जरूरत है वे इन स्त्रियों के पास आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाते। घरेलू स्त्रियॉं 'बाय च्वाइस' घरेलू हैं ये भी अधिकतर एक भ्रम ही होता है क्योंकि सजग रूप से इन विकल्पों पर बराबरी के साथ कभी विचार हमारी परिवार संरचनाओं में संभव ही नहीं होता... शिक्षा, अवसर या आत्मविश्वास की कमी, पति के पास पहले से रोजगार का होना और सबसे बड़ा- बच्चों का होना अक्सर वे बेरिएबल होते हैं जो स्त्रियों को घरेलू बनाते हैं और फिर इनसे जूझते जूझते इन स्त्रियों के साथ ठीक नहीं होता है जो काफ्का की कहानी मेटामारफोसिस के पात्र के साथ होता है यानि एक तरह का काम करते करते आप खुद ही कायांतरित होकर वेसा ही कुछ बन जाते हैं- काफ्का का पात्र खुद कॉकरोच बन जाता है। इसी पर आधारित 'एक चूहे की मौत' में ये और सजीवता से व्यक्त होता है जब चूहेमारी करते करते ख्ूहेमार खुद चूहा बन जाता है। आशय यह है कि हो सकता है कि कुछ सपने पाले युवती को लगे कि बस पति का शुरूआती जिंदगी में साथ देने के लिए अभी घरेलू कामकाज सही पर फिर धीरे धीरे यही जीवन रेगुलेरिटी में आता है तथा यही घरेलू स्पेस ही इसका मानसिक स्पेस भी बन जाता है और फिर सीमा और पहचान भी। सोच का दायरा फिर वही हो जाता है तथा चूंकि यह स्पेस बेहद जेंडर्ड स्पेस है अत: उसकी सोच भी न केवल इसी दायरे में बंद होती जाती है बल्कि जाने अनजाने सारी ताकत इसे दृढ़ करने में लगती है। मेरा परिवार, मेरे बच्चे, मेरी रसोई मेरा घर... यकीनन इनमें भी खबू ताकत व श्रम लगते हैं तथा इन्हें अगर भुगतान करके करवाया जाए तो धन भी लगेगा किंतु जब घरेलू स्त्री इनमें श्रम व जीवन लगाती है तो यह श्रम परिवार को समतामूलक बनाने में नहीं लग रहा होता, ये इस मायने में उत्पादक भी नहीं होता कि अर्जन व व्यय की समता ला सके सबसे खतरनाक ये कि यह लगभग सदैव चली आ रही स्त्री विरोधी संरचनाओं को पुष्ट करने तथा इसे अगली पीढ़ी में स्थानांतरित करने में अहम भूमिका अदा करता है। कामकाजी व घरेलू महिलाओं के बीच की कटुता व संघर्ष जो चहुँ ओर सहज दिखाई देती है इसका ही उदाहरण है। (मॉंओं के) लाड़ प्यार में पाली गई संतानों का अधिकाधिक डिपेंडेंट होना तथा ज्यादा 'पुरुष' या 'स्त्री' टाईपबद्ध होना भी इसका ही परिणाम है।
स्त्री के घरेलूश्रम की आर्थिक गणना करने से कुछ नहीं होगा या तो इसे मोनेटाइज करना होगा... यानि वाकई काम को आउटसोर्स किया जाए कोई और पेशेवर तरीके से इसे करे तथा इसके भुगतान का जिम्मा साथ कमाकर किया जाए, दूसरा तरीका यह है कि यदि घर के ही लोगों में इसका वितरण होना है तो काम को पूरी तरह डीजेंडर्ड किया जाए तथा बराबर बॉंटा जाए ये तभी संभव है जब बाहर के काम को भी इसी तरह बॉंटा जाएगा। आसान भाषा में कहें तो स्त्री शोषण की मूल भूमि परिवार की संरचना है तथा स्त्री के घरेलू रहते इसे पुनर्संरचित किया ही नहीं जा सकता है। घरेलू स्त्रियॉं इस गैरबराबरी को बनाए रखने के लिए पितृसत्ता का सबसे मजबूत औजार हैं। सबसे अहम है कि घरेलू कामकाम को ग्लोरिफाई करने से बचा जाए। स्पेस डीजेंडरिंग जिसमें मेंटल स्पेस शामिल है की शुरूआत घर की जिम्मेदारी (व कब्जा) सिर्फ औरतों को न देने से ही हो सकती है। परिवार की स्त्रियों का कामकाजी होना कोई अपने आप में पितृसत्ता का घोषणापत्र नहीं है किंतु इसका अभाव पितृसत्ता का विजयघोष अवश्य है।
और ये किंतु एक बड़ा किंतु है। किंतु ये कि ये घरेलू श्रम अक्सर स्त्री विरोधी तथा स्थापित संस्थाओं को मजबूत करने में अधिक इस्तेमाल होता है। परिवार और पितृसत्ता के जितने भी मानक हैं उनमें से किसी से भी टकराने के लिए जिन औजारों की जरूरत है वे इन स्त्रियों के पास आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाते। घरेलू स्त्रियॉं 'बाय च्वाइस' घरेलू हैं ये भी अधिकतर एक भ्रम ही होता है क्योंकि सजग रूप से इन विकल्पों पर बराबरी के साथ कभी विचार हमारी परिवार संरचनाओं में संभव ही नहीं होता... शिक्षा, अवसर या आत्मविश्वास की कमी, पति के पास पहले से रोजगार का होना और सबसे बड़ा- बच्चों का होना अक्सर वे बेरिएबल होते हैं जो स्त्रियों को घरेलू बनाते हैं और फिर इनसे जूझते जूझते इन स्त्रियों के साथ ठीक नहीं होता है जो काफ्का की कहानी मेटामारफोसिस के पात्र के साथ होता है यानि एक तरह का काम करते करते आप खुद ही कायांतरित होकर वेसा ही कुछ बन जाते हैं- काफ्का का पात्र खुद कॉकरोच बन जाता है। इसी पर आधारित 'एक चूहे की मौत' में ये और सजीवता से व्यक्त होता है जब चूहेमारी करते करते ख्ूहेमार खुद चूहा बन जाता है। आशय यह है कि हो सकता है कि कुछ सपने पाले युवती को लगे कि बस पति का शुरूआती जिंदगी में साथ देने के लिए अभी घरेलू कामकाज सही पर फिर धीरे धीरे यही जीवन रेगुलेरिटी में आता है तथा यही घरेलू स्पेस ही इसका मानसिक स्पेस भी बन जाता है और फिर सीमा और पहचान भी। सोच का दायरा फिर वही हो जाता है तथा चूंकि यह स्पेस बेहद जेंडर्ड स्पेस है अत: उसकी सोच भी न केवल इसी दायरे में बंद होती जाती है बल्कि जाने अनजाने सारी ताकत इसे दृढ़ करने में लगती है। मेरा परिवार, मेरे बच्चे, मेरी रसोई मेरा घर... यकीनन इनमें भी खबू ताकत व श्रम लगते हैं तथा इन्हें अगर भुगतान करके करवाया जाए तो धन भी लगेगा किंतु जब घरेलू स्त्री इनमें श्रम व जीवन लगाती है तो यह श्रम परिवार को समतामूलक बनाने में नहीं लग रहा होता, ये इस मायने में उत्पादक भी नहीं होता कि अर्जन व व्यय की समता ला सके सबसे खतरनाक ये कि यह लगभग सदैव चली आ रही स्त्री विरोधी संरचनाओं को पुष्ट करने तथा इसे अगली पीढ़ी में स्थानांतरित करने में अहम भूमिका अदा करता है। कामकाजी व घरेलू महिलाओं के बीच की कटुता व संघर्ष जो चहुँ ओर सहज दिखाई देती है इसका ही उदाहरण है। (मॉंओं के) लाड़ प्यार में पाली गई संतानों का अधिकाधिक डिपेंडेंट होना तथा ज्यादा 'पुरुष' या 'स्त्री' टाईपबद्ध होना भी इसका ही परिणाम है।
स्त्री के घरेलूश्रम की आर्थिक गणना करने से कुछ नहीं होगा या तो इसे मोनेटाइज करना होगा... यानि वाकई काम को आउटसोर्स किया जाए कोई और पेशेवर तरीके से इसे करे तथा इसके भुगतान का जिम्मा साथ कमाकर किया जाए, दूसरा तरीका यह है कि यदि घर के ही लोगों में इसका वितरण होना है तो काम को पूरी तरह डीजेंडर्ड किया जाए तथा बराबर बॉंटा जाए ये तभी संभव है जब बाहर के काम को भी इसी तरह बॉंटा जाएगा। आसान भाषा में कहें तो स्त्री शोषण की मूल भूमि परिवार की संरचना है तथा स्त्री के घरेलू रहते इसे पुनर्संरचित किया ही नहीं जा सकता है। घरेलू स्त्रियॉं इस गैरबराबरी को बनाए रखने के लिए पितृसत्ता का सबसे मजबूत औजार हैं। सबसे अहम है कि घरेलू कामकाम को ग्लोरिफाई करने से बचा जाए। स्पेस डीजेंडरिंग जिसमें मेंटल स्पेस शामिल है की शुरूआत घर की जिम्मेदारी (व कब्जा) सिर्फ औरतों को न देने से ही हो सकती है। परिवार की स्त्रियों का कामकाजी होना कोई अपने आप में पितृसत्ता का घोषणापत्र नहीं है किंतु इसका अभाव पितृसत्ता का विजयघोष अवश्य है। Thursday, October 30, 2014
प्रेम रहे अपनी जगह पर, परिवार किंतु लोचा ही है
इस माह हमने अपने विवाह को बीस साल पूरे हाने के अवसर पर ढेर शुभकामनाएं बटोरीं। फेसबुक पोस्ट यूँ थी -
बीस बरस हुए आज साथ रहते हुए।। हम कोई आदर्श युगल नहीं हैं, गनीमत है नहीं हैं। ये सीधा सादा कॉलेज रोमांस था जो बहुत थोड़े से ड्रामे के बाद शादी में तब्दील हुआ, आज के पैमानों पर कहें तो बोरिंग भी कह सकते हैं। असल कहानी उसके बाद शुरू होती है। मुझ जैसे औघड़ टाईप के साथ रहना निबाह ले जाना खुद मेरे लिए ही मुश्िकल होता पर नीलिमा इसे बखूबी कर रही है बीस सालों से। शादी का मसला जब मेरी मॉं के पास पहुँचा तो मुझे कहा गया अभी बच्चे हो (कुल जमा साढ़े इक्कीस था तब मैं) हम मना थोड़े ही कर रहे हैं जब थोड़ा सेटल हो जाओ कर लेना नीलिमा से ही शादी... हमने कहा कि शादी साथ साथ संघर्ष के लिए करना चाहते हैं, भेाग के लिए नहीं।प्रेम की सफाई देनी पड़े ये त्रासद है। पर साफ करना जरूरी है कि विवाह संस्था व परिवार संस्था के प्रति हमारी अनास्था बदस्तूर जारी है :)
शायद ज्यादा आदर्शवादी कथन था पर सच है कि पिछले बीस सालों में सबसे आनंद के क्षण, स्मृतियों में उकरे हुए क्षण यही संघर्ष के क्षण हैं। एमए/एमफिल/पीएचडी/बेरोजगारी/नौकरी/ब्लॉगिंग सब साथ साथ। मेरा सामंती होना कोई ऐसा सीक्रेट नहीं है कि संधान करना पड़े न ही इसे स्वीकार कर लेना इसका समाधान है... पर थ्री-इडियट के डायलॉग ''अपने सबसे कमजोर स्टूडेंट का साथ मैं कभी नहीं छोड़ता'' की तर्ज पर नीलिमा ने न मेरीे सामंतीयता को नियति मानकर स्वीकार किया, न उसके लक्षणों को इंगित करना ही छोड़ा। हमारा प्रेम शायद एक-दूसरे के परिष्कार के लिए संघर्ष भर ही है। ढेर शिकायत हैं हमें एक दूसरे से, मुझे लगता है नीलिमा अपनी भाषा, क्षमता, अपेक्षा के साथ कम न्याय करती है... वो खिलखिलाकर कहती है हूँ तो तुमसे सुंदर न।।तुम्हें लगता है कि मुझे अपने व्यवहार में और डेमोक्रेटिक होने की जरूरत है मसलन बाथरूम में वायपर मारने, सामान सही जगह रखने का सलीका सीखने की जरूरत है। अगर मैं बीस साल पहले की तुलना में जरा सा भी बेहतर इंसान हूँ तो इसका पूरा श्रेय नीलिमा को है किंतु अगर वैसा ही ठस हूँ या उससे भी कमतर हो गया हूँ तो ये मेरी अपनी 'योग्यता और इनर्शिया' है। हमने साथ साथ संघर्ष में संस्थाओं पर सवाल उठाना सीखा है और ये भी कि असल जिंदगी में इन सवालों के उतरने में थोड़ा हेर फेर आगे पीछे होगा ही। धर्म ईश्वर नास्तिकता के सवालों तुम कम तल्ख हो मैं पैट्रआर्की के सवाल पर हल्का व धीमा रह जाता हूँ। यकीन बस इतना कि रास्ता हमारा ठीक है सच्चा भी शायद। केक, उपहार गहने वाला नाता हमारा है नहीं, हो भी कैसे दोनों की तनख्वाह एक ही ज्वाइंट एकाउंट में जाती है तुम्हारे ही पैसे से तुम्हें उपहार देकर काहे बजट खराब करना फिर पसंद भी तुम्हारी मुझसे बेहतर है। इसलिए प्यार जताना थोड़ा कठिन हो जाता है, पर सुनो मेरे साथ बीस साल रह जाने वाली को बड़ा वाला गैलेन्ट्री अवार्ड बनता है, सालगिरह मुबारक साथी।।
Friday, October 03, 2014
दोस्तों से बाहर ही मिला जाए
बस्ती के बच्चे मानो साझा ही थे, कम से कम लगता तो ऐसा ही था। इसका मतलब मात्र इतना था कि बच्चों को डॉंटने या कभी कभी एकाध धौल जमा देने का हक केवल अपने बच्चों तक सीमित नहीं था। ऐसे में बच्चों को सम्मान से न मिलने, बोलने या उन्हें सम्मान न देने की जो खांटी भारतीय परंपरा है उसका पूरा सम्मान हमारी बस्ती में भी था। दो गांवों के बीच बसी ये बस्ती दिल्ली कर पहली खेप की कच्ची बस्ती थी। अब बच्चों के लिए आपस में एक दूसरे के माता-पिता से अपमानित होने की घटनाएं आम थीं पर फिर भी सहज नहीं थीं। यूँ किस बात पर सम्मानित और किस पर अपमानित महसूस करना है इसे लेकर हम बहुत स्पष्ट नहीं थे। ज्यादा खेलने, कम पढ़ने आदि को लेकर हुआ अपमान एक वैध कारण से हुआ अपमान था तथा सहज पच जाता था। मेरे लिए सबसे असहज स्थितियॉं वे होती थीं जब मेरे परिवार के लोग अक्सर मॉं मेरे दोस्तों को डॉंटतीं या ऐसा कुछ कहतीं जो उन्हें असहज बनाता। बाद में अक्सर मैं मॉं से लड़ता पी उनके लिए ये साधारण बात होती। वे चल्ल तू चुप रै... कह के मटिया देती। घटना के बाद मुझे इस दोस्त से मिलना असहज लगता तथा बहुत दिनों तक मैं उससे बचता फिरता। अक्सर बाद में पता लगता कि उसने इस अपमान को महसूस नहीं किया था या कम से कम वो ऐसा मुझसे कहता। वैसे ऐसी स्थितियों से बचने का सबसे आसान तरीका जो सामूहिक रूप से निकाला गया था वो था... घर की बजाए घर के बाहर गली में मिलना। मसलन आधी छुट्टी में खाने के लिए दोस्त के घर के लिएनिकले गली के नुक्कड़ पर उसे छोड़ा कि रुको मैं खाना खाकर आता हूँ... वो बेचारा भले ही भूखा हो, इत्मीनान से गली के बाहर इंतजार करेगा...बाद में मैं नेकर से हाथ पोंछता आकर मिलूंगा आगे चल देंगे। खैर दोस्त के घरवालों से खुद अपमानित होने से बचने तथा उससे भी ज्यादा दोस्तों को घर के लोगों के हाथों अपमानित होने की आशंका या भय ऐसा मिथकीकृत होकर मन में बैठ गया है कि मैं आजतक दोस्तों की अपने ही घर में उपस्थिति को लेकर सहज नहींहो पाया। अरसे तक घर अड्डा बना रहा दोस्त सहज भाव से आजे रहे, रुक भी जाते पर मैं लगातार चौकन्ना असहज ही बना रहा। इतना कि एक समय तो मेरे दोस्तों का घर में ही जुमला ही था, अरे अपना ही घर समझो। मेरा अपना पाठ है कि मेरे इसी भय के चलते नीलिमा भी कभी अपनी ससुराल में जम नहीं पाई.. मुझसे उसे घर में अकेला नहीं छोड़ा जाता था, लगातार आशंका रहती कि कहीं कोई कुछ कह न दे।
खैर ये तो चंद हफ्ते की बात रही फिर सड़क पर आ गए। उसके बाद भी ये भय बना रहा तथा आजतक है। शायद निराधार नहीं है कई प्यारे दोस्त बेचारे किनारे हो गए क्योंकि वे ऐसा अपमान सह नहीं पाए। या हो सकता ये भी केवल मेरे मन ने मान भर लिया हो। पर आज भी मेरे मन के भयों में सबसे भयानक प्रिय लोगों का अपने लोगों द्वारा अपमान का भय है इससे दोनों खो जाते हैं। सोचता हूँ दोस्तों से फिर बाहर ही मिला जाए।
खैर ये तो चंद हफ्ते की बात रही फिर सड़क पर आ गए। उसके बाद भी ये भय बना रहा तथा आजतक है। शायद निराधार नहीं है कई प्यारे दोस्त बेचारे किनारे हो गए क्योंकि वे ऐसा अपमान सह नहीं पाए। या हो सकता ये भी केवल मेरे मन ने मान भर लिया हो। पर आज भी मेरे मन के भयों में सबसे भयानक प्रिय लोगों का अपने लोगों द्वारा अपमान का भय है इससे दोनों खो जाते हैं। सोचता हूँ दोस्तों से फिर बाहर ही मिला जाए।
Thursday, September 04, 2014
कैसे करें गूगल वाॅइस टाईपिंग से बोलकर हिन्दी में टाईपिंग -
मेरी पिछली पोस्ट के बाद कई दोस्तों ने यह आग्रह
किया है कि गूगल वॉइस टाइपिंग से फेसबुक पर पोस्ट, ब्लॉग पोस्ट या माइक्रोसॉफ्ट वर्ड
मेँ कैसे लिखा जाए इसका खुलासा किया जाए अब आप जानते ही हैं की हम कोई तकनीकी
व्यक्ति तो हैं नहीं। लेकिन हमने इसके लिए एक साधारण सा जुगाड अपनाया है- तो बिंदु बार बात
करते हैं
1. सबसे पहले अपने एंड्रॉयड फोन की सेटिंग्स मेँ जाए आपको लेंगुएज एंड इनपुट ऑप्शन मिलेगा
2; इसके तहत आगे जाकर भाषा मेँ अब हिंदी की सुविधा मिल गई है आप इसे सेलेक्ट कर लैं ( ध्यान रखेँ हिंदी भाषाओं की सूची मेँ अंग्रेजी क्रम के बाद नीचे देवनागरी मेँ लिखा हुआ है) उसे सेलेक्ट करेँ
3- अब गूगल वॉइस इनपुट की भाषा अंग्रेजी तथा हिंदी दिखाई दे रही है।
4- अच्छा रहेगा कि आप इससे अंग्रेजी को हटा देँ केवल हिंदी रहने दें, इसे हिंदी इनपुट की दक्षता बेहतर हो जाती हे एेसा मैंने अनुभव किया है।
5- अब आप या तो फेसबुक ये किस ब्लॉग आदि मेँ टाइपिंग के स्थान पर सीधे वॉयस इनपुट का इस्तेमाल कर सकते हैं मेरे फोन मेँ यह सुविधा स्पेस बार को दबाए रखने पर विकल्प के रूप में उपलब्ध हो रही है।
1. सबसे पहले अपने एंड्रॉयड फोन की सेटिंग्स मेँ जाए आपको लेंगुएज एंड इनपुट ऑप्शन मिलेगा
2; इसके तहत आगे जाकर भाषा मेँ अब हिंदी की सुविधा मिल गई है आप इसे सेलेक्ट कर लैं ( ध्यान रखेँ हिंदी भाषाओं की सूची मेँ अंग्रेजी क्रम के बाद नीचे देवनागरी मेँ लिखा हुआ है) उसे सेलेक्ट करेँ
3- अब गूगल वॉइस इनपुट की भाषा अंग्रेजी तथा हिंदी दिखाई दे रही है।
4- अच्छा रहेगा कि आप इससे अंग्रेजी को हटा देँ केवल हिंदी रहने दें, इसे हिंदी इनपुट की दक्षता बेहतर हो जाती हे एेसा मैंने अनुभव किया है।
5- अब आप या तो फेसबुक ये किस ब्लॉग आदि मेँ टाइपिंग के स्थान पर सीधे वॉयस इनपुट का इस्तेमाल कर सकते हैं मेरे फोन मेँ यह सुविधा स्पेस बार को दबाए रखने पर विकल्प के रूप में उपलब्ध हो रही है।
अब बताते हेँ कि फ़ोन से टाइप की गई इस सामग्री
को ऑफलाइन एमएस वर्ड या कंप्यूटर पर कैसे ले जाएं जैसे मैंने अपनी फेसबुक पोस्ट मेँ बताया
इसका सबसे आसान तरीका है कि फोन पर टाइप की गई सामग्री को आप बजाय फोन मेँ सेव करने
की क्लाउड मे सेव करें यह आप गूगल ड्राइव मेँ कर सकते हेँ अथवा ड्रापबाक्स लैसी किसी सुविधा मेँ कर सकते हैं। जैसे
ही आप फाइल को क्लाउड मे सेव करेंगे यह आपके कंप्यूटर पर भी उपलब्ध हो जाएगी अब आप
संपादन का काम अपने लैपटॉप या डेस्कटॉप पर कीजिए। और बताने की जरूरत नहीं कि उसके बाद इस सामग्री का जैसा प्रयोग करना
चाहिए वैसा करेँ । तो मुझ अनगढ़ व्यक्ति के लिए यह साधारण सा जुगाड़ बहुत अच्छे
से काम कर रहा है। उम्मीद करता हूँ आपको भी से लाभ हुआ होगा।
इस पूरी पोस्ट को भी बोलकर ही लिखा गया है। पहला शब्द बोलने से लेकर संपादित कर पब्लिश करने तक कुल 9 मिनट लगे हैं। अच्छा ही है- क्यो ?
मेरा फोन Gionee P-3 है तथा Android 4.2.2 है
इस पूरी पोस्ट को भी बोलकर ही लिखा गया है। पहला शब्द बोलने से लेकर संपादित कर पब्लिश करने तक कुल 9 मिनट लगे हैं। अच्छा ही है- क्यो ?
मेरा फोन Gionee P-3 है तथा Android 4.2.2 है
हिन्दी में बोलकर लिखी गई मेरी पोस्ट - शुक्रिया गूगल हिन्दी वॉइस टाईपिंग
आज एक ब्लॉग पोस्ट लिखने के विषय मेँ सोचा था हैरान करते हुए यह गूगल वॉइस टाइपिंग का सहारा मिल गया है इसलिए मैंने सोचा है क्यूँ न इसकी ही सहायता से
पूरी ब्लॉग पोस्ट लिखें कुछ गलती हो तो हो ही जायेंगी पर संपादित कर लेना फिर भी
आसान रहेगा तो दोस्तो यह मेरी पहली ब्लॉग पोस्ट है जो टाइपिंग की बजाए बोलकर लिखी जा
रही है हाँ इसके बाद मुझे इसके संपादन कुछ समय लगाना पड़ा है फिर भी मुझे लगता हे
कि जुगाड काम आ रहा है इसके लिए लगातार इंटरनेट का उपलब्ध होना तो खैर जरुरी है लेकिन
फिर भी आजकल के हिसाब से इसे अच्छा ही कहा जाएगा छोटी बहुत गलतियाँ वर्तनी मेँ ये कर
रहा है लेकिन हिंदी टाइपिंग की सुविधा जिन लोगोँ के पास नहीँ है उनके लिए तो यह वरदान ही कहा जाएगा काफी बोल चुका अब देखता हूँ कि कैसा बन पड़ा
है।
पहला विचार: मुझे लगता है कि अगर फोन को इस तरह पकड़ कर बोलने की बजाए मेँ हैंड्स फ्री या ब्लू टूथ का इस्तेमाल करुँगा तब गलतियो की गुंजाइश और भी कम हो जाएगी हिंदी स्पीच रिकग्निशन ओर अंग्रेजी स्पीच रिकग्निशन में यह अंतर तो है ही कि हिंदी मेँ हमारी आवाज ओर बोलने का तरीका सबसे सामान्य होता है यानि कि अंग्रेजी मेँ जितनी गलती एक स्पीच रिकग्निशन सॉफ्टवेयर करता है उतनी हिंदी वाला सॉफ्टवेयर नहीँ करेगा ये अलग बात हे की किसी ने अब तक एक पूरी तरह निर्दोष सॉफ्टवेयर बनाने की कोशिश ही नहीँ की थी अब गूगल इस सोफ्टवेयर को लेकर आया है तो उम्मीद है अच्छा ही रहेगा अभी देखते हेँ मुझे उम्मीद है कि जल्द से जल्द गूगल को इसका ऑफलाइन संस्करण भी लेकर आना चाहिए असली मजा तो तभी आएगा आपने बोलना शुरु किया ओर एक लेख तैयार इससे बेहतर भला और क्या चाहिए !!
पहला विचार: मुझे लगता है कि अगर फोन को इस तरह पकड़ कर बोलने की बजाए मेँ हैंड्स फ्री या ब्लू टूथ का इस्तेमाल करुँगा तब गलतियो की गुंजाइश और भी कम हो जाएगी हिंदी स्पीच रिकग्निशन ओर अंग्रेजी स्पीच रिकग्निशन में यह अंतर तो है ही कि हिंदी मेँ हमारी आवाज ओर बोलने का तरीका सबसे सामान्य होता है यानि कि अंग्रेजी मेँ जितनी गलती एक स्पीच रिकग्निशन सॉफ्टवेयर करता है उतनी हिंदी वाला सॉफ्टवेयर नहीँ करेगा ये अलग बात हे की किसी ने अब तक एक पूरी तरह निर्दोष सॉफ्टवेयर बनाने की कोशिश ही नहीँ की थी अब गूगल इस सोफ्टवेयर को लेकर आया है तो उम्मीद है अच्छा ही रहेगा अभी देखते हेँ मुझे उम्मीद है कि जल्द से जल्द गूगल को इसका ऑफलाइन संस्करण भी लेकर आना चाहिए असली मजा तो तभी आएगा आपने बोलना शुरु किया ओर एक लेख तैयार इससे बेहतर भला और क्या चाहिए !!
Monday, September 01, 2014
टैग निर्वाह और मेरी पसंदीदा पुस्तकें
पुराने साथियों को टैग करने वाला खेल जरूर याद होगा। किसी बात को लेकर टैग करते थे फिर शर्त पूरी करने वाला आगे टैग करने का अधिकार पाता था। जहॉं तक अपनी पढ़ी पुस्तकों की सूची पेश करने की बात है ये हम पहले भी कर चुके हैं। इस बार फेसबुक पर ये दौर लौटा है। इसे बुक बकेट चैलेंज कहा जा रहा है। ''बाल्टी भर किताबें'' चुनौती के लपेटे में Vikas Divyakirti तथा Pankaj Dubey ने हमें भी ले लिया है। इन दोनों की चुनौती देती सूचियॉं भी खासी रोचक व विपरीत कोटि की हैं। जहॉं पुराने मित्र विकास बहुपठ छवि के हैं तिस पर मुसीबत ये कि उनकी विशाल मित्र सूची में उनके विद्यार्थी ज्यादा जमे हैं अत: उनके सामने छवि निर्वाह का संकट। अत: उनकी सूची भी जाहिर है उनके साहित्य, समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र, राजव्यवस्था.. सभी विषयों का प्रतिनिधित्व करने वाली है इससे विकास की गंभीरता पर्याप्त गंभीरता से स्थापित होती है। पंकज दूसरे छोर के प्राणी हैं वे अपनी अगंभीरता को बहुत गंभीरता से लेने वाले 'लूजर' हैं इसलिए उनकी सूची में चाचा चौधरी, बिल्लू, पिंकी, भोकाल को गिना सकने का साहस व ब्रांड छवि है। अपनी हालत दोनों मोर्चों पर पतली है। खैर मेरी पढ़ी हुई जो पुस्तकें मेरी नजर में अहम हैं तथा जिनके पढ़ने से मुझे लगता है मेार सोच बदली है, वे हैं-
1. Its not you, its biology- Joe Quirk
2- शब्द और स्मृति - निर्मल वर्मा
3- भाषा संस्कृति व राष्ट्रीय अस्मिता- न्गुगी वा थ्योंगो
4- A Brief History of Time - Stephen Hawking
5- संवत्सर - अज्ञेय
6- शेखर एक जीवनी - अज्ञेय
7- राग दरबारी- श्रीलाल शुक्ल
8- दिवास्वप्न - गीजूभाई बधेका
9- दिक् व काल: अन्तर्अनुशासनीय संदर्भ - डा. वीरेन्द्र सिंह
10- स्त्री उपेक्षिता - सीमोन द बोवुआ
2- शब्द और स्मृति - निर्मल वर्मा
3- भाषा संस्कृति व राष्ट्रीय अस्मिता- न्गुगी वा थ्योंगो
4- A Brief History of Time - Stephen Hawking
5- संवत्सर - अज्ञेय
6- शेखर एक जीवनी - अज्ञेय
7- राग दरबारी- श्रीलाल शुक्ल
8- दिवास्वप्न - गीजूभाई बधेका
9- दिक् व काल: अन्तर्अनुशासनीय संदर्भ - डा. वीरेन्द्र सिंह
10- स्त्री उपेक्षिता - सीमोन द बोवुआ
कई पुस्तकें शिकायतें कर रही हैं यायावारी, वामचिंतन, नास्तिकता व इंजीनियरिंग की कुछ और किताबों का भी मुझ पर गहरा प्रभाव है। पर 10 को 10 ही रहने देते हैं।
अब चूंकि परंपरा कहती है कि इस चनौति को आगे पेया किया जाना चाहिए तो अपनी जिज्ञासा के लिए आगे मैं Sujata Tewatia, मित्र Ashok Aazami तथा Laxman Sonu को यह चुनौती आगे पेश करता हूँ कि वे अपनी दस पुस्तकों की सूची पेश करें। सामान्यत: उन्हें ऐसा 24 घंटे में कर देना चाहिए।
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