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देखिए इस डॉक्यूमेंट में ये शब्द कितनी बार आते हैं, किन सन्दर्भों में आते हैं तथा कोई ठोस, वेरिफाइएबल वायदा करते हैं या नहीं।
उम्मीद एक दुधारी शब्द है
ज़िंदा रखता है
लेकिन जीने नहीं देता।
छल के बाद
धोखे और टूटे पुलों के बावजूद
आहटों पर मुड़कर
पीछे देखने को विवश करता है
यही बेशर्म शब्द
लेकिन आगे नहीं देखने देता
स्वीकार कर हर घटित को,
आगे चलने के लिए जरूरी है
कि
उम्मीद को दफ़न किया जाए
या होने दिया छटपटा कर बेदम।
मेरी वह दोस्त इतने भरोसे की जिससे बात करने में भरोसे पर विचार नहीं करना पड़ता। उस रोज़ किसी वजह से अकेले थे हम उसके घर, यह कोई अलग घटना नहीं थी जिसे महसूस किया जाता। फिर वक़्त हुआ, मैंने कहा अच्छा चलता हूँ दरवाजे के और मुड़ा हाथ अनदेखे ही दरवाजे के लैच की दिशा में बढ़ा.. तब मुझे दिखा, बस यही क्षण बस यही। मैं सहज ही मुड़ा था लेकिन देखा कि वह चौंकती है और फिर एक, नहीं आधा ही कदम पीछे होती है। उसके दोनों हाथ इवेसिव भंगिमा में छातियों की और गए थे...ओह। मैं बेहद आहत और हैरत निगाह से देकगता हूँ , सेकण्ड का चौथाई भर ही रहा होगा वो एक अपोलेजेटिक मुस्कान देती है...मैं सोचकर मुस्करा देता हूँ कि कहीं उसे बुरा न लगे। फिर मुझे लगता है कि आखिर यही सब तो उसका कुल हासिल है, पहला रिफ्लेक्स एक्शन खुद को बचाने का... किसी मर्द पर भरोसा न् कर पाना...पर मैं नीचे आ गाड़ी में रो देता हूँ। खुद के अपमान पर शायद नहीं, उसकी जिंदगी पर। ज़िन्दगी का उसका हासिल 'इनेबिलिटी तो ट्रस्ट'... ज़िन्दगी हमेशा कवच निकालकर ही जीना.. ओह मेरी प्यारी।
उस क्षण मुझे पता था पता होना था कि उस क्षण का वह अ-भरोसा व्याप्त हो पूरी ज़िन्दगी पर छाएगा। अपने ही इस कवच की कैद... बाद की बस सारी कहानी इस अ-भरोसे के बीज के उगने, वृक्ष हो जाने की कहानी है।
मेरी वह दोस्त इतने भरोसे की जिससे बात करने में भरोसे पर विचार नहीं करना पड़ता। उस रोज़ किसी वजह से अकेले थे हम उसके घर, यह कोई अलग घटना नहीं थी जिसे महसूस किया जाता। फिर वक़्त हुआ, मैंने कहा अच्छा चलता हूँ दरवाजे के और मुड़ा हाथ अनदेखे ही दरवाजे के लैच की दिशा में बढ़ा.. तब मुझे दिखा, बस यही क्षण बस यही। मैं सहज ही मुड़ा था लेकिन देखा कि वह चौंकती है और फिर एक, नहीं आधा ही कदम पीछे होती है। उसके दोनों हाथ इवेसिव भंगिमा में छातियों की और गए थे...ओह। मैं बेहद आहत और हैरत निगाह से देकगता हूँ , सेकण्ड का चौथाई भर ही रहा होगा वो एक अपोलेजेटिक मुस्कान देती है...मैं सोचकर मुस्करा देता हूँ कि कहीं उसे बुरा न लगे। फिर मुझे लगता है कि आखिर यही सब तो उसका कुल हासिल है, पहला रिफ्लेक्स एक्शन खुद को बचाने का... किसी मर्द पर भरोसा न कर पाना...पर मैं नीचे आ गाड़ी में रो देता हूँ। खुद के अपमान पर शायद नहीं, उसकी जिंदगी पर। ज़िन्दगी का उसका हासिल 'इनेबिलिटी टू ट्रस्ट'... ज़िन्दगी हमेशा कवच निकालकर ही जीना.. ओह मेरी प्यारी।
उस क्षण मुझे पता था पता होना था कि उस क्षण का वह अ-भरोसा व्याप्त हो पूरी ज़िन्दगी पर छाएगा। अपने ही इस कवच की कैद... बाद की बस सारी कहानी इस अ-भरोसे के बीज के उगने, वृक्ष हो जाने की कहानी है।
एक होते हैं शब्द
और होती है शब्दों की दुनिया
जैसे एक होता है प्यार
और होती है प्यार की दुनिया
पर सुनो प्यार होता प्यार..
लेकिन प्यार की दुनिया होती है
झूठ, धोखा और लिसड़ा हुआ स्वार्थ
एक होती है कविता
और होती है कविता की दुनिया
टकराती प्रवंचनाएं, फूहड़ अहम् और छद्म शिखर
सुनो दुनिया
तुम हर सच के साथ ऐसा क्यों करती हो
उसे सच रहने क्यों नहीं देती
क्योंकि एक होता है सच
और होती है सच की दुनिया
जो
और चाहे दुनियाभर का कुछ भी हो
सच नहीं होती।
प्रो. गोपेश्वर सिंह हमारे ही विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर हैं।
पहले विभागाध्यक्ष रह चुके हैं। कल के जनसत्ता में उन्होंने आलोचना की
अधोगति के स्यापे में ठीकरा सोशल मीडिया के सर फोड़ा है। विनीत, रवीश और
प्रभात जैसे सक्रिय ब्लॉगरों को उदाहरण की तरह प्रस्तुत करते हुए यह
साबित करने की जिद दिखाई है कि सोशल मीडिया के कथित तुरंता होन के चलते
गंभीर आलोचना की संभावना खत्म हो गई है। मेरी प्रतिक्रिया:
यात्रा में था तो कल जनसत्ता उपलब्ध नहीं था आज पढ़ा है। सोशल मीडिया को
लेकर की गई ये कोई पहली गैर जिम्मेदार टिप्पणी नहीं है। पिछले दस साल
में हम जो ब्लॉग-इंटरनेट वाले हैं उन्होंने उपहास, उपेक्षा,असुरक्षा,
ईर्ष्या सब चरणों को भुगता है, सो ये टिप्प्णी तो फिर भी खिसियाहट
ज्यादा है। तब भी मैंने सोचा था कि पूर्वग्रह छोड़कर प्रो. सिंह के नजरिए
को पूरी सदाशयता से समझने कर कोशिश की जाए। किंतु दिक्कत ये है कि आलेख
में सोशल मीडिया की समझ की एबीसीडी भी नदारद है।