Monday, January 28, 2008

एक ब्लॉग मंच्‍यूरियन काउंटर के दूसरी ओर

'एक हक्‍का नूडल्‍स प्लीज़'

पर्स से सौ का नोट निकालते हुए मैंने कहा। कल ही की बात है, पड़ोस के मैट्रोवॉक नाम के मॉल में शाम को गए थे। बच्‍चों की इच्‍छा नूडल्‍‍स खाने की थी। पैन्‍टालून समूह के इस फास्‍टफूड सेल्‍फ सर्विस रेस्‍त्रां में कभी कभी जान होता है।

'ओह सर आप' मुस्‍कराकर और चौंकते हुए काउंटर आपरेट करते युवक ने कहा। मैंने देखा...ओह। ये सो... था। मेरा विद्यार्थी...नहीं भूतपूर्व नहीं बाकायदा वर्तमान का विद्यार्थी। उसने सम्‍मान से मेरा आर्डर लिया...मेरे न न पर भी करते हुए भी डिस्‍‍काउंट भी किया और जब मुझे मेरी ट्रे सर्व की तो उसमें शीतल पेय के दो गिलास अतिरिकत थे जो आर्डर में नहीं थे। मैं अपने छात्र को ज्‍यादा शर्मिंदगी में नहीं डालना चाहता था इसलिए ज्‍यादा  नुकुर नहीं की।

काउंटर के टचस्‍क्रीन टर्मिनल पर मेरा हिसाब बनाते हुए जो केवल नूडल्स से बढ़ाकर मेंने पूरे डिनर का कर दिया था, hakka अपने उस विद्यार्थी में मुझे एक खास बात दिखी उसका चेहरा आत्‍मविश्‍वास से दमक रहा था। और उसकी कमीज पर लगी नेमप्‍लेट पर नाम था..'अविनाश'। 'ये क्‍या सो... तुमने ये किसके नाम की नेमप्‍लेट लगा रखी है' उसने मेरी ओर देखा और थोड़ा हड़बड़ाते हुए सा कहा 'सर वो नाम हम लोग बदल लेते हैं..' 

अब इधर ये अक्सर होना लगा है जब कॉलेज में पढ़ने वाले बच्‍चे जेबखर्च के लिए या कैरियर के लिए काम धंधा शुरू कर दें। ये काई जरूरी नहीं कि पहले कि तरह ट्यूशन पढ़ाने का काम हो, वरन कई बार तो ये एक मुकम्मल कैरियर मूव होती है। यूँ भी पढ़ाई से किसी रोजगार का भरोसा  तो मिलता नहीं। 

अपने 'सर' यानि हमारे लिए सो.. ने खाना अच्‍छा उपलब्‍ध कराया था। चमचमाते काउंटर ने और रेस्‍त्रां के 'अपमार्केट' होने ने 'वेटर' जैसा होने से यदि कोई शर्मिंदगी उपजती हो तो उसे मिटा दिया था। और हॉं ठीक वैसे, जैसे कि हम जैसे कई ब्‍लॉगर करते हैं उसने अपनी कॉलेज/घर की पहचान को कामकाज की पहचान में घालमेल करने से बचने के लिए किसी और नाम का बैज भी धारण कर लिया था।  स्मार्ट वैरी स्मार्ट..।

 

Sunday, January 20, 2008

लीजिए रविजी अब हमारे फीडकाउंट भी आपके बराबर

डिस्‍क्‍लेमर : हम घोषित रूप से मगलू बोले तो मग्‍गल हैं, हमारी इस पोस्‍ट को कतई तकनीकी न माना जाए।

रविजी ने हैरानी व्‍यक्‍त की कि रचनाकार के 1400 के लगभग फीडबर्नर सब्‍सक्राइबर दिख रहे हैं जो सही नहीं हो सकते, कोई फीडबर्नरी लोचा है। आउट आफ क्‍यूरोसिटी हमें लगा कि हम चालीस के आस पास लटके हैं तो क्‍या किया जाए- गए गूगल देवता की शरण में पता चला कि आप अपने चिट्ठे पर कितने सब्‍सक्राइबर दिखना चाहते हैं ये आपके में हाथ में है। ( इस कथन का संकेत रचनाकार के सब्‍सक्राइबर आधार की तरफ नहीं है)

मसलन ऊपर का चिकलेट देखें इसमें जितने भी सब्‍सक्राइबर दिख रहे हैं वे हैं रचनाकार के ही [ ;)) हे हे]  उनके यहॉं बढेंगे घटेंगे तो यहॉं भी, जबकि यदि आप इसे क्लिक करेंगे तो ये आपको उनके नहीं हमारे फीड पर ही ले जाएगा।

यदि आप भी इस बात का कोई रोब गांठना चाहते हैं कि आपके सैकडों, हजारों यहॉं तक की लाखों पाठक हैं तो बस इतनी संख्‍‍या वाला कोई ब्‍लॉग देखें मसलन आपके लिए पेश हैं कुछ धुरंधर चिट्ठाकारों के फीडकाउंट-

 

रविरतलामी का हिन्‍दी ब्‍लॉग

डिजीटल इंस्‍पिरेशन

प्रोब्‍लॉगर

 टेकक्रंच

आप इन चिकलेट को (ओपेरा या फायरफाक्स में) राइट क्लिक से कॉपी इमेज एड्रेस करें और अपने खुद के चिकलेट कोड में इमेज एड्रेस की जगह चेप लें। बस हो गया यानि अब लिंक तो आपकी ही फीड का रहेगा लेकिन दिखेंगी रविजी, अमित आदि आदि के सब्‍सक्राइबरों की संख्‍या।

अगर आप कोड के साथ खेलने के शौकीन हैं (हम तो कतई नहीं हैं) तो  इसमें थोड़े बहुत बदलाव करके इस चिकलेट के रंग या लिखें हुए को भी बदल सकते हैं। जैसे कि हमारे मूल फीडकाउंट, जी बाईं ओर की पट्टी देखें 30-35 की दरिद्र संख्‍या वाला :), उस पर हमने reader की जगह pathak लिख मारा है। यूनिकोड अभी सपोर्ट नहीं कर रहा हौ गीक लोग ध्‍यान दें।

इससे ये गुत्थी तो नहीं सुलझती कि रचनाकार पर इतने पाठक कयों दिख रहे हैं। क्‍योंकि उनके चिट्ठे के पाठक वाकई उनके ही पाठक हैं ये तो दिख रहा है। पर ये तो पता लग ही जा रहा है कि फीडबर्नर के चिकलेट कतई विश्‍वसनीय मानक नहीं हैं। :))

 

 

 

 

Wednesday, January 16, 2008

हालिया कीवर्ड विश्‍लेषण

केवल सूचना के लिए नीचे उन शब्‍दों की खोजों के घटते क्रम में सूची है जिन्‍हें सर्च इंजिनों में खोजते हुए पाठक हाल में इस ब्‍लॉग तक पहुँचे हैं-

  1. बाढ़
  2. नग्नता
  3. hindi blog
  4. सुधीश पचौरी
  5. masijeevi
  6. stree
  7. graho ka khel
  8. gaahe bagaahe
  9. नास्तिकता
  10. swarn sambandh 2005
  11. kahe taree karan
  12. chabees january kavita
  13. irotik
  14. megha patekar
  15. martand panchag
  16. khab
  17. नैपकिन विवाद
  18. सैक्सी
  19. jo na kah sake hindi blog
  20. om hai param pita ka naam
  21. गंगा
  22. बहाई मंदिर
  23. imeje
  24. photo irotik
  25. faishan
  26. irotik photo
  27. www.koriyan masala.com
  28. दैनिक बास्कर
  29. tootiya
  30. k ka ki kee
  31. मनोविज्ञान
  32. मंत्र
  33. porn unaka
  34. dainik bhas
  35. स्त्री विमर्श
  36. samir lal blog hindi
  37. राजधानी
  38. porn kiya hote hai
  39. मेरी
  40. साहित्य जगत
  41. poem on parishram
  42. अब इस दिल का
  43. हिन्दी कहानी
  44. नीलिमा नोट पैड
  45. तमाचा
  46. धुरविरोधी
  47. high caste list hindu
  48. गंगा नदी
  49. जलिया वाला बाग
  50. poems vivaah
  51. bhee - j
  52. sach hai mahaj sangharsh ke vishay par hindi kavita
  53. indiyan barata
  54. उपन्यास
  55. megha patekar hindi

Tuesday, January 15, 2008

सामुदायिक ब्‍लॉग और घेटोआइजेशन के खतरे

सामुदायिक ब्लॉगों का चलन हिन्‍दी चिट्ठासंसार के लिए नया नहीं है। चिट्ठाचर्चा, अक्षरग्राम एक अरसे से चालू हैं। यही नहीं नारद के रूप में एक एग्रीगेटर भी रहा है जो 'सामुदायिक' था (है तो अब भी किंतु उसकी भूमिका काफी सीमित हो गई है) अत: सामुदायिक होने की परिघटना नई नहीं है किंतु हाल फिलहाल में सामुदायिक ब्‍लॉगों का चलन कुछ बढ़ गया है। दरअसल एग्रीगेटरों की आपसी प्रतियोगिता की तार्किक परिणति चिट्ठों की आपसी प्रतियोगिता के रूप में हुई है तथा कई सामुदायिक ब्‍लॉग शुरू हुए हैं, भड़ास विशेष रूप से उल्‍लेख्‍य है। रिजेक्‍ट माल, इयत्‍ता, मोहल्‍ला, हिन्‍द युग्म आदि को भी जोड़ लें तो यह बाकायदा एक फिनामिना कहा जा सकता है। कई अन्‍य ब्‍लॉगरों ने अन्‍यों से आग्रह पर पोस्‍टें लिख्‍ावानी भी शुरू की हैं।

सहज सा सवाल है कि इस फिनामिना के निहितार्थ क्‍या हैं। भड़ास साफ तौर पर ऐसे पत्रकारों के लिए मंच बनकर उभरता है जो स्‍वयं में विशेष सक्रिय ब्‍लागर नहीं हैं पर यहॉं अपनी बात कह सकते हैं। मोहल्‍ला सदस्‍य ब्‍लॉगरों के लिए 'मुद्दे' के लिए और अपने ब्‍लॉग के साथ साथ अपनी पोस्‍ट को ठेलने के लिए अतिरिक्‍त ब्‍लॉग के रूप में जम गया है। एक मायने में मोहल्‍ला और भड़ास मानों एक दूसरे के पूरक ब्‍लॉग हैं। अंदर उमड़ते घुमड़ते की एकाकी अभिव्‍यक्ति के लिए भड़ास और अधिक औपचारिक व सरोकारी कहन के लिए मोहल्‍ला। ghetto इसीलिए जब सरोकारी लेखन के प्रयास भड़ास पर किए जाने के प्रयास हुए तो इसके प्रतिरोध भड़ास में ही लिखा गया। नीलिमा के लेख को यशवंत ने भडास पर दिया तब भी कहा गया कि भड़ास को भड़ास रहने दें- आशय यह कि भड़ास, भड़ास टाइप लेखन के लिए और मोहल्‍ला अविनाश टाईप लेखने के लिए तैयार सामुदायिक मंच रहे हैं। पर ये तो सामने दिखती सच्‍चाई भर है..इसके पीछे नए सामुदायिक लेखन के ट्रेंड के खतरे भी दिखाई देते हैं। पहला है घेटोआइजेशन का। 'घेटो' के घेटो होने में अपरिचित जगह में अपने जैसों को इकट्ठा कर अपनी असुरक्षाओं से कोप करने का भाव होता है। जो पूरे शहर में डरा डरा सा घूमता है क्‍योंकि वह वहॉं खुद को अजनबी सा पाता है, अल्‍पसंख्‍यक पाता है या शक की निगाह में पाता है वह जैसे ही अपनी बस्‍ती में आता है जो उसने बसाई ही है 'अपने जैसों' की वहॉं वह फैलता है कुछ ज्‍यादा ही फैलता है- गैर आनुपातिक होकर। पहली पीढ़ी के प्रवासी महानगर की सुखद एनानिमिटी के आदी नहीं होते और उससे बचकर भागते हैं और वह छोटी सी बस्ती ही उन्‍हें सुकून देती है जहॉं एनानिमिटी की जगह 'पहचान' की गुजाइश होती है इस तरह महानगर में घेटो बसते हैं- ओखला, तैयार होता है, जाफराबाद, बल्‍लीमारान और मुखर्जीनगर।

सवाल ये है कि 'मोहल्‍ला' या 'भड़ास' के अंतर्जालीय घेटो बनने से किसी अपराजिता, किसी मसिजीवी को भला कया दिक्‍कत होनी चाहिए। शायद कुछ नहीं। इन सामुदायिक बलॉगों पर गैर बिहारी (पूर्वांचलियों) का प्रवेश वर्जित तो नहीं है (न ओखला या जाफराबाद में मुख्‍यधाराईयों का है, ये वर्जना उनके ढांचे से खुद व खुद उपजती है) पर हर वह शहर जिसमें घेटो बसते हैं, वह इन घेटों की वजह से सवालिया निशानों की जद में आता है क्योंकि ये उन सुरक्षाओं के अभाव से उपजते हैं जिनका वादा किसी शहर के शहर होने में ही निहित है। यही अंतर्जालीय शहर यानि हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत पर भी लागू होता है। हम शायद इतना लोकतांत्रिक स्‍पेस बनाने में अब तक असफल रहे हैं कि बिहारी मित्र आपस में ही लिंकन कर, कमेंटकर, और अब सामुदायिक ब्लॉगों में प्रतिभागिता कर शहर में शहर, घेटो बसाने के लिए विवश न हों जाएं। वैसे हो सकता है कि यह बस प्रक्रिया का आरंभिक चरण हो समय बीतते न बीतते सब इस शहर में खप जाएंगे और शहर की छांवदार एनानिमिटी उन्‍हें भी सहज लगने लगेगी और वे ये भी देख पाएंगे कि जाफराबाद की गलिया बाकी शहर की गलियों से कहीं अधिक तंग व सीलन भरी है।

Tuesday, January 08, 2008

हिन्‍दी की कन्‍याएं जींस पहनकर तमिल फिल्‍मों की एक्‍स्‍ट्रा क्‍यों नजर आती हैं

सही कहें तो हमें नहीं पता कि ऐसा क्‍यों होता है।। पर क्‍या ऐसा होता है यानि क्‍या जींस पहनकर यानि आधुनिक फैशन के लिहाज से हिदी वालियॉं और वाले एकदम भैणजी हैं- तो हम झट से चुप्‍पी मार जाएंगे वरना पोलिटिकली करेक्‍ट मित्रों का मोहल्‍ला हमें  कहीं का न छोड़ेगा। पर साफ करें कि ये शब्‍दाभिव्‍यक्ति कहानीकार उदयप्रकाश ने अपनी एक कहानी में रखी है।

विधाता गहरे असमंजस ऊब और थकान के हाल मे रहा होगा जब उसने हिन्दी डिपार्टमेंट की इन कन्याओ की रचना की होगी ।वह इस सृष्टि के किसी अन्य प्राणी को बनाना चाह रहा होगा मसलन नीलगाय जिराफ हिप्पोपोटामस घडियाल हाथी मेढक......

उन्हे देखकर लगता थाकि जैसे अभी उडनखटोला, अनमोल घडी, बावरे नैन, बरसात जैसी फिल्मों का ज़माना चल रहा है . जो इनमे सबसे आधुनिक ह्योती वे पटरी से खरीदी गयी सस्ती जींस की रेडीमेद पेंट  के साथ कोई भी अनमैचिंग टॉप या शर्ट पहन लेती और तमिल फिल्मो की एक्स्ट्रा नज़र आती या फिर अधिक से अधिक मेरा साया फिल्म की हीरोईन साधना जिसके जूडे के भीतर स्टील का गिलास औन्धा छिपा होता.

(पीली छतरी वाली लड़की, पृष्‍ठ 48)

 

तो जब एक जमावड़े में उदय मिले तो ये एक मजेदार चर्चा थी। बाद में बहुत देर तक मैं उनके संवाद को डिस्‍क्‍लेमर संवाद के रूप में ही याद करता रहा। 04-01-08_1603 उन्‍होंने अपने संवाद की शुरूआत ही एक डिस्‍क्लेमर से की- मैं समाजशास्‍त्री नहीं हूँ लेखक हूँ मुझसे विश्‍‍लेषण की, पोलिटिकल करेक्‍टनेस की उम्‍मीद न करें वगैरह वगैरह...बाद में यह भी कहा कि मैं तो अदना सा लेखक हूँ मेरे लिखें में दलित विमर्श न पढें कोई और विमर्श भी न पढें वगैरह वगैरह.. ये भी कि लेखक बहुत बेचारा होता है पिसता है, उसे तड़का लगाना पड़ता है, उसका सलमान रश्‍‍दी कर दिया जाता है तसलीमा कर दिया जाता है वगैरह वगैरह..।

किसी दलित विमर्श के पैरोकार ने उनसे ऊपर की पंक्तियों की सफाई मांगी कि भई ये क्‍या सौंदर्यशास्‍त्र है हिन्दी डिपार्टमेंट की इन कन्याऐं और तमिल फिल्‍मों का एक्‍स्‍ट्रा- इन नस्‍लीय तथा 'आपत्तिजनक' अभिव्‍यक्तियों पर कहते क्‍यों नहीं कुछ - उदयप्रकाश फिर से अपने डिस्‍क्‍लेमर की आड़ में चले गए। ये डिस्‍क्‍लेमर कुछ को ईमानदारी व साहस लगा तो कुछ अन्‍य इससे क्षुब्‍ध नजर आए।

व्‍यक्तिगतरूप से हमारी राय है कि विमर्शात्‍मक चीरफाड़ यानि लेखन दलित-विरोधी है कि स्त्री-विरोधी, मार्क्‍सवादी है कि संघी इसकी शिनाख्‍त करने के हक से पाठक को महरूम नहीं रखा जा सकता और न ही लेखक अपने लिखें की जबाबदेही से सिर्फ इसलिए मुक्‍त हो जाता है कि वह तो लेखक है समाजशास्‍त्री नहीं किंतु यह भी सही है कि पोलिटिकल करेक्‍टनेस अधिक से अधिक एक जेस्‍चर है इसे यथार्थ मांग की तरह नहीं रखा जाना चाहिए।

यदि उदयप्रकाश (या उनके किसी पात्र को) हिन्‍दी डिपार्टमेंट की कन्‍याएं फू‍हड़ लगती हैं तो वे लिखेंगे ही पर जब वे लिखेंगे तो वह पढ़ा भी जाएगा और तब उसकी सफाई भी मांगी जाएगी और तब ये सफाई काफी नहीं रहेगी कि मैं तो केवल लेखक हूँ मुझे गलत मत समझो....

Friday, January 04, 2008

डिबेटिंग फट्टा उर्फ मेंढक टॉंग से सुनता है

औपचारिक रूप से तो नहीं लेकिन अनौपचारिक रूप से कॉलेज की हिन्‍दी वाद विवाद गतिविधियों में कुछ जिम्‍मेदारियॉं मेरी रहती हैं। खासतौर पर प्रतियोगिताओं के लिए जाने वाले प्रतियोगियों को टिप्‍स देने की। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय की डिबेटिंग सर्किट जिसकी चर्चा मैंने पहले भी की थी, वह कई मायने में अलग है यहॉं बाकायदा डिबेटिंग के संप्रदाय हैं मसलन एक तो है 'प्रवाह संप्रदाय' यह एक तरह से स्‍कूल डिबेटिंग की ही निरंतरता हे यानिप्रवाह से बोलो और बम बम। इस पद्धति से केवल दूसरी श्रेणी की प्रतियोगिताएं ही जीती जा सकती हैं इसलिए अच्‍छे वक्ता मौलिक तर्क पद्धति व शैली पर निर्भर करते हैं। इसी कोटि का हमारा एक वक्ता/विद्यार्थी है आ..। यह बालक हर प्रतियोगिता से पहले जानकारियॉं जुगाड़कर संपर्क करेगा...सर अमुक कॉलेज में इतने पुरस्‍कार वाली, 3+1 मिनट की प्रतियोगिता है, विषय है .... 'सर मेरे प्वाइंट ये ये हैं कुछ जोड़ने हैं तो बता दें और एक-दो फट्टे भी बता दें, खासकर स्‍टार्टिंग फट्टा।

अब से 'फट्टा' सुनकर आप जरूर सोच रहे होंगे कि ये क्‍या बला है। दरअसल डिबेटिंग सर्किट में लगातार हिस्‍सेदारी से वक्‍ताओं की मौलिक शैलियॉं विकसित होती हैं तथा इसी क्रम में वे अपने कुछ वाक्‍य, पदरचना या डिबेट शुरू या खत्‍म करने आदि के विशेष जुगाड़ भी विकसित कर लेते थे। इनकी तुलना आप हरभजन या मुरली के 'दूसरा' से कर सकते हैं। हैं तो पूरी तरह से वैध  किंतु ये अनुभव से दूसरे को पीट डालना भर होता है। उदाहरण के लिए एक डिबेट शुरू करने के एक फट्टे पर नजर डालें-SPEECH

अध्‍यक्ष महोदय, एक वैज्ञानिक था, उसने एक मेंढक लिया और कहा 'फ्रागी जंप' मेंढक उछला। अब वैज्ञानिक ने उस मेंढक की एक टांग काट दी और कहा 'फ्रागी जंप‍' मेंढक सवाभाविक हे कुछ कम उछला। इसी तरह वैज्ञानिक ने मेंढक की दूसरी और तीसरी टांग भी काट दी। चौथी टांग काअने के बाद वैज्ञानिक ने कहा कि 'फ्रागी जंप' तो मेंढक बिल्‍कुल भी नहीं उछला... अध्‍यक्ष महोदय वैज्ञानिक ने निष्‍कर्ष दिया .... (थोड़ा सा रुककर) मेंढक टांग से सुनता है। मुझे अपने विपक्षी मित्रों के तर्क इस वैज्ञानिक के निष्‍कर्ष के समान ही प्रतीत हो रहे हैं....

ये फट्टे अक्सर निर्णायकों  पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं पर इन्‍हें देश, काल वातावरण के अनुसार बदलते रहना होता है। मुझे डिबेटिंग के ये फट्टे क्‍यों याद आए....हे हे हे अध्‍यख्‍ज्ञ महोदय यदि कुछ मित्रों के ब्‍लागिंग फट्टे देख मुझे डिबेटिंग फट्टे याद आ रहे हैं तो इसे स्‍वाभाविक ही माना जाना चाहिए.... ;)

Monday, December 31, 2007

रैलियों की राजधानी

राजधानियों को कई लाभ मिलते हैं जो उनके हैं ही तो कुछ और 'लाभ' उन्‍हें घलुए में मिलते हैं। दिल्‍ली सदियों से राजधानी है जिसमें पिछले छ: दशक स्‍वतंत्र लोकतांत्रिक देश की राजधानी के रूप में रहे हैं। उससे पहले भी स्‍वतंत्रता आंदोलन के दिनों में भी यह लोकतांत्रिक संघर्षों की जगह तो थी ही। इसलिए दिल्‍ली सहज ही रैलियों की राजधानी भी है। बोट क्‍लब, रामलीला मैदान, लालकिला मैदान इन जगहों ने न जाने कितना इतिहास बनता बिगड़ता देखा है। कल की दिल्‍ली की रामसेतु रैली में इसने हमारे घर के सामने वाले मैदान (स्वर्ण जयंती पार्क) को भी जोड़ दिया। वैसे रैली पार्क में नहीं थी पार्क के सामने सैकड़ों एकड़ की खुली जगह में हुई थी। इस रैली का मुद्दा रामसेतु था जिसपर बेपनाह पोस्‍टें लिखी जा चुकी हैं हमें कुछ और नहीं कहना। पर रैली और दिल्‍ली पर कुछ कहना बाकी है।

दिल्‍ली की रैलियों पर चर्चा होते न होते कम से कम दो रैलियों की बात खास तौर पर होती दिखती है- एक है रामलीला मैदान की जयप्रकाश नारायण की रैली जिससे आतंकित होकर अंतत: आपातकाल की घोषणा की गई। दूसरी है, बोट क्‍लब पर राममंदिर रैली जिसे आरएसएस और बाकी संघ परिवार ने आयोजित किया था यह व्‍‍यापक (या कहें भयानक) जनसमर्थन के लिए जानी गई 10 से 20 लाख के बीच की अलग अलग संख्‍याएं (शामिल लोगों की) सामने रखी गईं हैं। DSCN1245 जेपी की रैली का अपन को खास पता नहीं, बहुत छोटे रहे होंगे, पर संघी रैली में शहर की हवा याद है। मोहल्‍लों में बनती पूरी-सब्जी की थैलियॉं और ताल मंजीरे वाली प्रभात फेरियॉं भी याद हैं। धर्म वाकई दीवाना बना देने की कूवत रखता है। इस बोट क्‍लब रैली का शहरी सोच पर ये प्रभाव पड़ा कि बोट क्‍लब पर रैलियॉं बंद कर दी गईं।

अब रैलियों की चर्चा जनांदोलन के रूप में कम होती है, तकलीफों के लिए अधिक होती है। रैली से यहॉं ट्रैफिक जाम हुआ, यहॉं दस की जगह चालीस मिनट लगे। काम काज नहीं हुआ। रैली में लोग बिना टिकट आए। अब ये 'बिहारी' आ तो गए हैं मुफ्त में अब आधे तो यही बस जाएंगे दिल्‍ली में आदि आदि।  व्‍यक्तिगत तौर पर रैलियों को इस रूप में देखा जाना (और दिखाया जाना-   कम से कम अंग्रेजी अखबार तो हर रैली की रपट ट्रेफिक-जाम पर ही केन्द्रित रखते हैं) मुझे नहीं रुचता। रैलियॉं शहर को कुछ कष्‍ट देती हैं, राजनीति को हवा देती हैं पर वे शहर का शहर भी बनाती हैं। हमें रामसेतु के मुदृदे से चिढ़ है, हमारी नजर में तो ये राजनीति की दुनिया का ट्राल है पर फिर भी हमें रैलियॉं लोकतंत्र का उत्‍सव लगती हैं, पाकिसतान जैसे असफल लोकतंत्र खूब समझ सकते हैं कि विरोध को इतना खुलकर अभिव्‍यक्त कर सकना कितनी बड़ी नेमत है।

Sunday, December 30, 2007

संडे दिन ही है चिरकुटई का

कुछ ब्‍लॉगर मित्र संडे की ब्‍लॉगिंग को संडे चिरकुटई कहकर करते हैं, कुछ समूची ब्‍लॉगिंग को चिरकुटई घोषित कर चुके हैं। अब प्रमोदजी से तो कोई पंगा लेने से रहा...जब वे कहते हैं कि वे महान हैं तो हम मान लेते हैं कि वे हैं और अब वे कह रहे हैं कि वे चिरकुट हैं तो हम होते कौन हैं कहने वाले  कि वे नहीं हैं- वे महान हैं, वे चिरकुट हैं और जब जक कि वे और खोजें कि वे इसके अलावा क्‍या क्‍या हैं हम माने लेते हैं कि वे महान चिरकुट हैं।

लेकिन बाकी लोग जो वीकडेज़ पर तो नहीं होते पर संडे को उन्हें लगता है कि वे चिरकुट हो गए हैं उनसे हमारी पूरी सहमति है। संडे दिन ही है कम्‍बख्‍त चिरकुटई का। अगर आप पतनशील हैं‍  यानि ताजिंदगी अविनाश टाईप हमेशा पोलिटिकली करेक्‍ट होने का बोझा नहीं ढोना चाहते कभी कभी वो भी र‍हना चाहते हैं जो आप हैं तो जाहिर है कि आप अचानक संडे के दिन महान स्‍त्री संवेदनशीलता नहीं ओढ़ लेना चाहेंगे। आप अपना दिन रसोई में मसाला भूनते नहीं बिताना चाहेंगे। आप चाहेंगे कि आप शनिवार रात से ही संडे शुरू मानें और देर रात तक जागें, संडे खूब देर तक सोएं। रगड़कर अपनी मोटरसाइकल साफ करें या गोल्फ के डंडे को मखमल के रूमाल से रगड़ें। परांठे का नाश्‍ता करें जिसपर मक्‍खन तैरता फिरे। कंप्‍यूटर के कीबोर्ड पर अलसाई अंगुलिया चलाएं, पोर्न देखें या गेम खेलें। नाश्‍ता खत्‍म होते न होते लंच का समय हो चुका हो पर बिना तंग किए कोई इंतजार करे कि कब आपका लंच का मन है और जब आप अंगड़ाते हुए डाइनिंग टेबल तक पहुँचें ठीक तब ही आपका मनपसंद खाना परोस दिया जाएं.....

सूची और लंबी है पर लुब्‍बो लुआब बस इतना है कि संडे को आप लोकतंत्र और संवेदनशीलता को छुट्टी  पर भेज देना चाहते हैं और सामंतवाद और मर्दवाद की छांव में पसरना चाहते हैं।chirkut आप इनमें से कुछ कुछ कर पाने में सफल भी हो जाते हैं मसलन आप लकी हैं तो आपको परांठे का नाश्‍ता मिल जाता है वगैरह वगैरह पर जरा इन कामों पर फिर नजर डालें इनसे ज्‍यादा चिरकुटई और क्‍या होगी।  बोनस में आपको कई और काम करने ही होंगे जैसे आपको नाई की दुकान की तरफ ठेल दिया जाएगा साथ में संलग्नक की तरह एक बच्‍चा कि जरा इसे भी हेअरकट दिलवा दीजिए। कबाड़ी बुलवा लिया जाएगा और आप अपने तमाम लीवर व सिंपल मशीन के ज्ञान से जानते हैं कि इसका फुल्‍क्रम सेंटर में नहीं है तो क्‍या...आप सहजता से मूर्ख बनना स्‍वीकार कर लेते हैं। चिरकुट हैं और क्‍या। सत्रह किलो अखबार छ: रुपए से कितने हुए साब..आप हिसाब लगाते हैं सत्रह छिका एक सौ दो ...पर बोलते नहीं चिढ़े हुए हैं देगा  तो फिर भी एक सो दो ही न। आप उसके जाने का इंतजार करते हैं ताकि फिर से अपने संडे में पहुँच सकें। संडे ससुर एक ही है, चौबीस ही घंटे का और उससे आपकी उम्‍मीदें बहुत हैं...कारपेंटर का काम, बिजली का भी, इसका उसका, बच्‍चे को एलसीएम सिखाने का और छुट्टी मनाने का भी। फिर से इन कामों पर नजर डालो जरा...सब एक से बढ़कर एक चिरकुटई काम।

और कुछ नहीं तो खीजकर कंप्‍यूटर आन करो और गिना दो दूसरे चिरकुट ब्‍लॉगरों को कि संडे के दिन आपने क्‍या क्‍या चिरकुटई की। संडे दिन ही है चिरकुटई का....।

Saturday, December 29, 2007

अब तालाबंद मोहल्‍ला भी काहे का मोहल्‍ला हुआ....क्‍यों अविनाश

सराए में राकेश ने हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग पर कार्यशाला का आयोजन किया था। रविकांत थे, सराए की शोधकर्त्री होने के नाते नीलिमा थीं। विनीत भी थे और चोटी के ब्‍लॉगर अविनाश थे। बंधुआ घाघ होने के नाते हम भी पहुँचे थे। सराए कॉपीलेफ्ट, ओपन सोर्स की अहम जगह है इसलिए बात सहज ही कापीराइट वगैरह पर पहुँच गई। रविकांत का कहना था जिससे हमारी पूरी सहमति है कि जिन्‍हें लगता है कि उनका लिखा सिर्फ 'उनका' रहे उन्‍हें केवल अपनी डायरी में लिखना चाहिए, इंटरनेट उनकी जगह नहीं है ब्‍लॉगिंग तो बिलकुल नहीं। यहॉं कितना भी हल्‍ला कर लो टेक्‍स्‍ट इस या उस वजह से इधर उधर जाएगा ही, जाना भी चाहिए। अचानक अविनाश ने मानो धमाका किया, कहा कि उन्‍होंने अपने चिट्ठे को नकल से बचाने का इंतजाम कर लिया है। अविनाश तकनीक के मामले में हमारी तरह पग्‍गल तो नहीं हैं पर ग़ीक भी नहीं हैं इसलिए हम जानते थे कि कापीस्‍केप वगैरह (यानि आप राइट क्लिक कर कापी या सेलेक्‍ट करने की कोशिश करें तो कोई स्क्रिप्‍ट आपको रोक लेती है) किया होगा- जो उन्हें तो चिढ़ा देता हे जो समीक्षा, प्रसार वगैरह के लिए आपको बढ़ावा देना चाहते हैं पर जो वाकई चोरी करके कंटेट इस्‍तेमाल करना चाहते हैं उन्‍हें नहीं रोक सकता। (दरअसल कंटेट अगर इंटरनेट पर है उसे फैलने से कतई नहीं रोका जा सकता)

केवल बताने भर के लिए मोहल्ला से कापी पेस्‍ट हाजिर है-

लेकिन फिल्म तो अच्छी तब बनती जब ईशान अच्छा पेंटर भी नहीं बनता या कुछ भी अच्छा नहीं कर पाता तो भी लोग उसे समझते और प्यार देते। हर बच्चा कुछ न कुछ बहुत अच्छा करे ये उम्मीद नहीं करना चाहिए। ये जरूरी तो नहीं है कि वो कुछ बढ़िया करे ही। कोई भी बच्चा एवरेज हो सकता है, एवरेज से नीचे भी हो सकता है। लेकिन इस वजह से कोई उसे प्यार न दे ये तो गलत है।

(हमने कुछ नहीं किया ये ताला ओपेरा पर खुद ही नहीं चलता)

 

हिन्‍द युग्‍म के मामले में काफी बहस से यही तय हुआ था कि कापीराईट समर्थकों के लिहाज से भी कंटेट पर ये ताला बेकार है। no copyright पर हिन्‍द युग्‍म के मामले में ये फिर भी थोड़ा समझ में आने वाली बात थी कि वे नए आगे आने की कोशिश करते कवियों की जगह है और कविता पर रचनात्मक मालिकाना दावे को बहुत अच्‍छा न भी कहें तो भी ये समझ में तो आता ही है।

पर मोहल्‍ला तो बंधुवर है ही मोहल्‍ला। मेरा तेरा इसका उसका मो‍हल्‍ला। क्‍या ये सिर्फ उनका है जो इसमें रहते हैं कि उनका भी है जो इससे गुजरते भर हैं। चॉंदनी चौक में कटरा, कूचा, मोहल्‍ला, बाजार ये सब अलग अलग किस्‍म की बसावटें मानी जाती हैं। कूचे में जरूर इस बात का प्रावधान होता है कि बाहर ही एक दरवाजा है जिस पर ताला चाहें तो लगा सकते हैं पर उस पर भी ताला लगाते नहीं हैं। आप तो माहल्‍ला ही तालाबंद किए दे रहे हैं।  अरे मित्र जो चोरी कर आपका कंटेंट ले जा रहे हैं वे ले तो मोहल्‍ला ही रहे हैं न। जहॉं ले जाकर उसे टिकाएंगे वो ही खुद मोहल्‍ला हो जाएगा जो दरअसल 'आपका' ही होगा। वैसे ये भी मजेदार हे कि हिन्‍द युग्म और मोहल्‍ला दोनों ही सामुदायिक ब्‍लॉग हैं जिन्‍हें सामग्री के प्रचार (भले नाम हटाकर) से कम गुरेज होना चाहिए क्‍योंकि इन ब्‍लागों पर भी मुख्‍य मॉडरेटर की सामग्री कम होकर अन्‍य साथियों की अधिक होती है।

खैर अपनी तो राय यह है कि भाई लोग, जो मोहल्‍ला तालाबंद है वह भी क्‍या मोहल्‍ला हुआ। 

Friday, December 28, 2007

लीजिए स्‍वागत करें हिन्‍दी के कच्‍चे रास्ते पर पहली व्‍‍हाइट केन खट खट का

हमने अपने मित्र की हिन्‍दी यूनिकोड से टेक्‍टाइल जद्दोजहद की चर्चा की थी। और लीजिए म्‍यूजिकेडिमिक वाले  कच्‍चे रास्‍ते की पहली खट खट हो गई है ब्‍लॉगजगत के दरवाजे पर। कच्‍चे रास्‍ते के राही हमारी तरह हिंदीबाज नहीं हैं, शैक्षिक जगत के व्‍यक्ति हैं विषय है इतिहास। ग्रामोफोन इंडस्‍ट्री के इतिहास पर शोधलीन हैं। शास्‍त्रीय संगीत की अच्‍छी समझ है। उनका वायदा है कि इन सभी विषयों पर वे अपनी अंगुलियॉं चलाते रहेंगे। techdisability

के ये ब्‍लॉगर हिन्‍दी के संभवत पहले दृष्टिहीन ब्‍लॉगर हैं, इस लिहाज से तकनीकी पचड़े रहेंगे पर समय बीतते न बीतते ये पचड़े कम ही होंगे, इसलिए दिल खोलकर स्वागत करें इस खट खट का।