Saturday, June 23, 2007

हम मंगलू, हम पग्‍गल...तुम स्‍वामी, कृपा करो भर्ता


शब्‍द अपने साथ बहुत कुछ लिए बहते हैं- आस्‍था, विश्‍वास, पूर्वाग्रह और चिंताएं। जब बच्‍चों के साथ बैठकर हैरी पॉटर का हिंदी संस्‍करण देखा था तो एक शब्‍द टकराया था-मंगलू ये किसी घरेलू नोकर का नाम नहीं था, दरअसल ये किसी का नाम नहीं था- ये व्‍यकितवाचक नहीं जातिवाचक संज्ञा थी- ये आपका मेरा सबका नाम था- ये सर्वनाम था। फिल्‍म में उन सब लोगों के लिए जो पॉटर, हरमाईनी .... वगैरह वगैरह की तरह जादू की शक्तियों से वंचित थे यानि आम आदमी- वे ही इन जादूगरों के लिए मंगलू थे- कुछ जादूगरों के लिए ये ‘बेचारे मंगलू’ थे तो बाकी के लिए थे ‘कमबख्‍त’ मंगलू पर थे वे मंगलू ही। सेंट सटीफेंस वाले रामजस और सत्‍यवती वालों को मंगलू समझते हैं- फर्ग्‍यूसन कॉलेज वाले वाडिया कॉलेज वालों को। अंग्रेजी आनर्स वाली हिंदी/संस्‍कृत वालियों को बहनजी या कहें कि मंगलू समझती हैं। ऐसा ही होता है...नहीं?

अब जरा इस पोस्‍ट को देखें- यहॉं मुझे एक शब्‍द दिखा पग्‍गल वैसे तो शब्‍दकोशीय अर्थ में तो ये कुत्‍ते की एक प्रजाति हुई पर यहॉं अर्थ {puggles (That’s people with no programming blood in them)} ...उई...वा। तो हम मंगलू ही नहीं पग्‍गल भी कहे जाएंगे। अब ये कोडिंग/प्रोग्रांमिग वाले लोग बड़े दुखी है कि भई ये पग्‍गलों की दुनिया इन आईटी वालों की दुनिया को सही से न समझते हैं न उसका कुछ शऊर ही इनमें है- अब इस बात को ही लें कि वे इन गीक लोगों का कैसा बेहूदा चित्रण अपनी फिल्‍मों में करते हैं- उदाहरण दक्षिण भारतीय फिल्‍मों से हैं पर आप उन्‍हें बाकायदा क्रिश जैसी फिल्‍मों पर भी लागू कर सकते हैं। उदाहरण के लिए विंडोज98 या नोटपैड, मीडिया प्‍लेयर दिखाकर ऐसा बताते हैं कि हीरो बड़ा तोप प्रोग्रामर है....वगैरह वगैरह।

तो भैया हम बेशऊर गैर गीक लोगों को जरा अपनी हद में रहना सीख लेना चाहिए क्‍योंकि जैसा कि वहॉं गीकोसेपियंस प्रजाति की प्रिया ने बताया (हमारे यहॉं अमित ऐसी कोशिश कर चुके हैं हम पग्‍गल ही इस बात को समझने में आनाकानी कर रहे हैं) कि गीक शैल इनहैरिट द अर्थ एंड दे आर फर्स्‍ट इन लाईन फार द थ्रोन।

9 comments:

Atul Arora said...

लखनऊ की एक साफ्टवेयर कंपनी में काम करता था पहले। उसके मालिक का बर्ह्म वाक्य था कितने भी बड़े तोप प्रोग्रामर हो जाओ, प्रोग्राम का ईंप्लीमेंटेशन ही सफलता का सूत्र है। अब उत्तम प्रदेश का कौन्हो क्लाईंट हो सरकारी या गैर सरकारी वहाँ क्रिश वाली गीकोसेपियंस प्रजाति की प्रिया का एट्टीट्यूड लेकर काम किया तो हो चुका ईंप्लीमेंटेशन । प्रोग्रामर वह भी गीक , कहीं न कहीं अभिमान आ ही जाता है। मुझमें भी आ जाता था, शायद ही कोई विरला हो जो इसके दर्प में पग्‍गलों की दुनिया को टाँट न कसे हो। पर समय सब सिखा देता है। जो आज गीकोसेपियंस है वह दस साल बाद पग्गल बन जायेंगे। यह नियति है।

Amit said...

हमारे यहॉं अमित ऐसी कोशिश कर चुके हैं हम पग्‍गल ही इस बात को समझने में आनाकानी कर रहे हैं

सरासर गलत बात है, हम ऐसी कोई कोशिश नहीं किया हूँ(हमार मेमोरी की हिस्ट्री में ऐसा कौनो रिकॉर्ड नहीं है), हमार नाम पर कीचड़ उछाला जा रहा है, हम इसका विरोध करता हूँ, इसके विरोध में हम मोर्चा खोलूँगा.. हम... हम्फ़!!! ;)

Pratik said...

काफ़ी जानदार शब्द हैं - मंगलू, पग्गल वगैरह। :)
आप नए-नए शब्द बताकर यूँ ही हमारा शब्द-ज्ञान बढ़ाते रहिए।

Udan Tashtari said...

मंगलू, पग्गल!!! यह नाम कहाँ से मिले भाई!! हम तो बस उसी में खोये हैं हा हा!!!

मसीजीवी की आत्मा said...

"हम मंगलू,हम पग्ग्ल" ये तो सब जानते है तुम हो,कोई नई बात बताओ ,

अनूप शुक्ला said...

हम वो सब कमेंट बांचे थे। यहां भी। फिलहाल हम कुछ नहीं कह रहे सिवाय इसके कि मौज लेने का स्कोप बन रहा है। :)

अनामदास said...

अच्छा है, ज्ञानवर्धन हुआ. शब्दों की यात्रा बड़ी दिलचस्प होती है, शब्द कहीं और से आते हैं आकर कुछ और बन जाते हैं.

पक्षी विज्ञानी डॉक्टर सालिम अली की किताब में पढ़ा था कि खूसट और चुगद उल्लुओं की दो प्रजातियों के नाम हैं, इसी तरह सुर्ख़ाब की तस्वीर देखी तो समझ में आया कि उसके पंखों की बात क्यों होती है, सुर्ख़ाब बत्तख प्रजाति का पंछी है जिसके पंख वाक़ई सुंदर होते हैं.

masijeevi said...

@ अतुल इसी टॉंट-प्रवृत्ति पर छोटा सा टॉंट था- अच्‍छा पकड़े। शुक्रिया
@ अमित, का करें आसपास एक आप ही तो अईसन दिखे जिसे गीक कह सकें- तो आप का नाम दे दिए(इसे ब्‍याज स्‍तुति माना जाए)
@समीर/प्रतीक शुक्रिया- यहीं आस-पास के शब्‍द हैं
@ मेरी छद्म आत्‍मा- 'हम' है भई, सभी नान-गीक शामिल हैं और बेनाम टिप्‍पणी के लिए गीक होने की जरूरत नहीं- अक्‍सर पग्‍गल भी ऐसा कर लेते हैं।
@अनूप- जैसे हम ये न लिखते तो मौका मिलने पर आप मौज लेने से बाज आते।
अनामदास- बिल्‍कुल- वर्षां तक खंजननयन पढ़ाया फिर एक दिन पक्षी की तस्‍वीर देखी तब समझ आया कि खंजनपक्षी की ऑंखे सुंदर नहीं होती वरन खुद पक्षी का आकार सुंदर मानव ऑंख जैसा होता है-
पग्‍गल भी दरअसल 'पग' व 'बीगल' प्रजाति के कुकुर के संकर रूप के लिए इस्‍तेमाल होता रहा है अब गैर गीक के लिए रूढ़ होना शुरू हो रहा है।

Shrish said...

हा हा मसिजीवी जी बहुत दिनों बाद आपकी मजेदार पोस्ट पढ़ने को मिली। आप नए-नए मजेदार शब्द खोजने और गढ़ने में माहिर हैं। साथ ही आपके लेखों के शीर्षक भी उतने ही मजेदार होते हैं।

अब मैं सोच रहा हूँ कि मैं प्रोग्रामर तो नहीं लेकिन भूतकाल में थोड़ी बहुत प्रोग्रामिंग पढ़ी है तो फिर मैं किस श्रेणी में आऊंगा? पग्गल या नॉन-पग्गल शायद अर्ध-पग्गल :)