Thursday, June 07, 2007

पहाड़ सुन्‍दर बन पड़ा है...साधुवाद

जब हमने ब्‍लॉगराइनों की व्‍यथा लिखी थी तब कहा था कि इसे हमारा अनुभव न माना जाए क्‍योंकि हम तो उस गुलिस्‍तां के वासी हैं जहॉं हर शाख पर...। यहॉं तो खाते-पीते, उठते-बैठते बस यही चिट्ठाकारी ही रहती है...नाक में दम है (पर किसके, सभी तो इसमें शामिल हैं) केवल बानगी के लिए बताया जाए कि पिछले दिनों धनोल्‍टी घूमने गए थे, पिछली पोस्‍ट में तस्‍वीर भी चेपी थीं वहॉं की। तो जनाब उस भ्रमण में मैं कीबोर्डपीट, नीलिमा, सुजाता, हमारा बेटा, बेटी थे और भी दो लोग थे पर वे इंसान थे यानि सुजाता के पतिदेव व पुत्रदेव। वरना हम सब तो ब्‍लॉगर हैं। वैसे बच्‍चे अपने ही में व्‍यस्‍त थे। ऐसे में एक पहाड़ भ्रमण कितना चिट्ठामयी हो सकता है बिना लैपटॉप-साईबर कैफे-आनलाईन हुए इसका अनुमान भी आपके लिए कठिन होगा। कुछ बानगी प्रस्‍तुत हैं -



धनोल्‍टी से एकाध किलोमीटर आगे (सुरकंडा देवी की ओर) चलते हुए एक मनोरम हरा भरा पहाड़ प्रस्‍तुत हुआ- ठंडे ‘समीर’ के झोंके के प्रभाव से सुजाता के मुँह से सहसा निकला – पहाड़ सुंदर बन पड़ा है....साधुवाद
जाहिर है कि ब्‍लॉगरों से भरी इस किराए की क्‍वालिस में जोरदार ठहाका लगा और एक आफलाइन टिप्‍पणवर्षा शुरू हुई। ....बेचारा ड्राईवर।

नीलिमा व सुजाता ने टिप्‍पणियों की बेंतबाजी शुरू कर दी हम बीच बीच में शामिल होते थे।

(1)

सुजाता: पहाड़ सुंदर बन पड़ा है....साधुवाद
नीलिमा: वाह वाह वाह
मसिजीवी: पहाड़ सुंदर है किंतु ऐसे ही पहाड़ पर मैंने दो वर्ष पर पूर्व टिप्‍पणी की थी यहॉं देखें।
नीलिमा: (कॉपी-पेस्‍ट) विशेष रूप से ये मोड़ पसंद आया...जारी रहें।

(2)
घोड़े वाले ने 3 किमी की दूरी (तपोवन) के लिए 400 रुपए की मांग की जो जाहिर है हमें ज्‍यादा लगे।
सुजाता – यह तो घोड़े के मद में चूर है- कहॉं है मेरी गदा।
रास्‍ता ट्रेकिंग से तय करने का निर्णय लिया पर बाद में नीलिमा को लगा इस पहाड में चढ़ाई ‘फुरसतिया की पोस्‍ट’ की तरह खत्‍म होने का नाम नहीं ले रही थी।

(3)
शनिवार को कम से कम बीस बार सुजाता ने चिंता जाहिर की, पता नहीं देवाशीष ने चर्चा की भी होगी कि नहीं। हमने रविवार को पच्‍चीस बार विश्‍वास जाहिर किया कि आज तो चर्चा नहीं ही हुई। इन सभी पैंतालीस बार हमने सबने गर्दन झटकी कि और लो वो इसे कहते हैं कि हमारा सशक्तिकरण हो रहा है।

इतना सब तो इस भ्रमण में चिट्ठामयी था और आप कह रहे हैं कि हम ब्‍लॉगर मीट में नही थे।

9 comments:

Arvind said...

अब हम पहाड जैसी टिप्पणी तो नही कर सकते परंतु घर बैठे बैठे ही धनौलटी का आनन्द ले लिया. साधुवाद
अरविन्द चतुर्वेदी
भारतीयम्

राजीव said...

ब्लॉगरों में फंसे बेचारे इंसान! उनका खासा मनोरंजन हुआ (वे क्या कुछ और कह सकते हैं, सिवा इसके कि ब्लॉगरों के बीच बहुत मज़ा आया)

अब रही बात टिप्पणियों की। यहाँ पर भी तपोवन की बात, क्या मतलब? आप तो सिर्फ़ धनोल्टी का ही वर्णन करते रहे, तपोवन? मतलब कि गोमुख व और भी आगे। यदि वास्तव में गये तब तो भई अवश्य चित्र व वर्णन दिया जाय, पूरी यात्रा का। बड़ी ही रोमांचक यात्रा है व नयनाभिराम स्थल हैं पूरे रास्ते भर।

Udan Tashtari said...

विवरण बहुत टिप्पणीमय और रोचक बन पड़ा है, साधुवाद!! मगर विवरण का कुछ अधूरापन दिल की गहराईयों में चुभ सा रहा है, वैसे है बहुत रोचक...हा हा!!! यही होना है, जब चिट्ठाकार बन बैठेंगे सैलानी चार!! वाह वाह!!

तो एक शेर कहता हूँ:

बहारें तो हरदम चमन में रहेंगी,
हमारी चर्चा न होगी, तो रौनक न होगी.


--शुक्रिया शुक्रिया..(दाद के लिये अग्रिम) :))

Amit said...

अरे भई आपने तो बहुत पकाया होगा उन गरीब इंसानों को। उनपर तरस खाईये और उनको भी ब्लॉगर बना दीजिए!! ;)

Sanjeet Tripathi said...

हा हा,सही है। यह तो होना ही है, जब दिलोदिमाग मे चिट्ठाकारी हावी हो और चार दीवाने साथ हों फ़िर आप चाहे कहीं भी हो!

Shrish said...

वाह वाह, पोस्ट सुंदर बन पड़ी है, साधुवाद स्वीकारें।

इस बात की जांच होगी कि इतने सारे ब्लॉगरों के सानिध्य में रहने के बाद भी दो 'इंसान' अब तक 'इंसान' ही कैसे हैं। :)

masijeevi said...

राजीवजी ये तपोवन, गोमुख वाला नहीं...धनोल्‍टी में ही एक पर्वत शिखर को भी इसी नाम से पुकारा जाता है। उसी का संदर्भ है।

अनूप शुक्ला said...

चढ़ाई फ़ुरसतिया की पोस्ट की तरह थी इसीलिये उसकी याद सुखद लग रही है। आज सुजाता का दिन है। पिछ्ले शनिवार की कमी पूरी करें।

अविनाश said...

वाह-वाह, पढ़ कर मज़ा आ गया। इसे खानापूरी वाली टिप्‍पणी न मानें। सचमुच मज़ा आ गया- यात्रा का विवरण और उसका अंदाज़। खास कर दो ब्‍लॉगराइनों और एक ब्‍लॉगर की दिलचस्‍प वार्ता। रिपोर्ताज सुंदर बन पड़ा है... साधुवाद!