Friday, June 08, 2007

हिंदू स्‍त्री का जीवन - High Caste Hindu Women


हिंदी के पढ़ाक चिट्ठाकार हँसें तो हँसें पर सच है कि पंडिता रमाबाई की पुस्‍तक The High Caste Hindu Women मैंने अब तक नहीं पढ़ी थी, वाबजूद इसके कि वर्षों से इसके बारे में सुन रखा था और पढ़ने की चाह भी थी पर और बहुत सी चाहों की तरह बस लंबित ही थी। फिर इसका हिंदी अनुवाद हाथ लगा जो संवाद प्रकाशन से आया है। शीर्षक है-‘हिंदू स्‍त्री का जीवन’ । परसों इसे पढ़ना शुरू किया और आज ही खत्‍म किया है। मेरी सिफारिश मानें तो ये पुस्‍तक एक मस्‍ट रीड श्रेणी की पुस्‍तक है।
पंडिता रमाबाई (1858-1922) का जन्‍म एक ब्रा‍ह्मण परिवार में हुआ और तमाम बिडंबनाओं और कष्‍टों को सहते हुए उन्‍होंने उच्‍च जाति की स्त्रियों विशेषकर विधवाओं की दशा सुधारने के लिए आधुनिक दृष्टि से कार्य किया। ‘हिंदू स्‍त्री का जीवन’ तत्‍कालीन अमरीकी व ब्रिटिश जनता का ध्‍यान भारतीय स्त्रियों की दशा की ओर आकर्षित कर संसाधन जुटाने के इरादे से लिखी गई थी। हैरानी की बात है कि उत्‍तर भारतीय पाठ्यपुस्‍तकों में राष्‍ट्रनायकों की जीवनियों में आमतौर पर पंडिता रमाबाई को स्‍थान नहीं दिया जाता है जबकि वे शुरूआती शिक्षित भारतीय महिलाओं में से एक थीं जिन्‍होंने स्‍त्री सशक्तिकरण के भारतीय संस्‍करण को खड़ा करने में अहम योगदान दिया। यहॉं तक कि संस्‍कृत की पाठृयपुस्‍तकें भी इस संस्‍कृत विदुषी के स्‍थान पर इंदिरा गांधी या झांसी की रानी से ही काम चला लेना चाहते हैं। कारण ये रहा है कि संस्‍कृत के शास्‍त्री लोग इस प्रथम महिला 'शास्‍त्री' से इसलिए नाराज रहे हैं कि इन्‍होंने बाद में ईसाई धर्म स्‍वीकार कर लिया था और ब्राह्मण होते हुए भी एक बंगाली कायस्‍थ से कोर्ट मैरिज करने का निर्णय लिया था- एक सहयोगी ने बताया कि इस साल NCERT की एक मीटिंग में पंडित लोगों ने ये आशंका जाहिर की कि जीवनी में इन ‘तथ्‍यों’ की वजह से बालमन पर ‘बुरा प्रभाव’ पड़ सकता है।

हिंदू स्‍त्री का जीवन का अंग्रेजी संस्‍करण 1886 में प्रकाशित हुआ। पंडिता रमाबाई की इस पुस्‍तक ने जहॉं अपने समय में विवादों और चर्चा को जन्‍म दिया वहीं इसने भारतीय स्‍त्री जीवन में बदलाव की शुरूआत की। पुस्‍तक में आठ अध्‍याय हैं जिनमें लेखिका उच्‍च जाति की भारतीय स्त्रियों के बचपन, वैवाहिक जीवन, वैवाहिक अधिकार, वैधव्‍य आदि का तार्किक विश्‍लेषण करती है और जनसंख्‍या आंकड़े (1881 की जनगणना के) आदि का उपयोग कर अपने मत को रूथापित करती हैं।

मनुस्‍मृति की इतनी तीखी आलोचना के लिए उस युग में एक स्‍त्री को बहुत साहस जुटाना पड़ा होगा। वे कुछ उदाहरण पेश करती हैं-


कोई भी बल द्वारा स्‍त्री की रक्षा नहीं कर सकता, किंतु इन उपायों से स्‍त्री की रक्षा की जा सकती है: स्‍त्री को धन के संग्रह, व्‍यय, वस्‍तु और पदार्थ की शुद्धि, पति तथा अग्नि की सेवा, घर तथा बर्तन आदि की सफाई में नियुक्‍त करें। ( मनु IX, 10-11)

पति के किसी बुरी आदत से ग्रस्‍त होने या शराबी होने या रोगी होने की वजह से पत्‍नी अपने पति के प्रति श्रद्धा नहीं रखती है तो वह पति उससे गहने व अन्‍य आवश्‍यक सामग्री लेकर उसे त्‍याग दे ( मनु IX, 77-78)

संतानहीन स्‍त्री की आठवें वर्ष में, मृत संतान वाली स्‍त्री की दसवें वर्ष में, कन्‍या को ही जन्‍म देने वाली स्‍त्री की ग्‍यारहवें वर्ष में और अप्रियवादिनी की तत्‍काल उपेक्षा कर उसके जीवित रहने पर भी पति दूसरा विवाह कर ले ( मनु IX, 80-81)

पति के दूसरा विवाह करने पर जो स्‍त्री कुपित होकर घर से निकल जाए या निकलना चाहे उसे पति कैद कर ले। ( मनु IX, 83)

स्त्रियों की दशा सुधारने के पंडिता रमाबाई के सुझाव कुछ कुछ हिंदू नन व मिशनरियों की स्‍थापना जैसे प्रस्‍तावित हैं जिन पर बहस व असहमति की गुंजाइश है किंतु अपने समय में रमाबाई का चिंतन निश्‍चय ही आंखे खोलने वाला रहा होगा।

8 comments:

अनूप शुक्ला said...

ये किताब हमने अभी तक नहीं पढ़ी तो क्या इस पर हंसोगे। :) जानकारी के लिये शुक्रिया!

Udan Tashtari said...

पढ़ी तो हमने भी नहीं है. :) चलो कुछ यहीं से जान लिया बाकि कभी पढ़ेंगे तब!

अविनाश said...

ये किताब मेरे पास है। बीच-बीच से कुछ अंश पढ़े। एक सुर में पूरा नहीं पढ़ा। अब पढ़ जाऊंगा। आज/कल में। इसे पढ़ने की प्रेरणा देने के लिए शुक्रिया।

Anonymous said...

'Cast ' नहीं ' caste ' | याद कर लीजिए। cast भी एक अंग्रेजी लफ़्ज है ,जिसका अर्थ ढालना या साँचा होता है।

masijeevi said...

anonymous bhaiya maafh kariye.ee to bahut bada crime kar diye hum. Ab yad rakhenge .vaise itana badaa punya kaa kam kiye ho to naam bhi kamate to acha rahta ee ANONYMOUS -ANONYMOUS kahe khelat ho HAIN ??

Nasiruddin said...

मैंने यह किताब पढी है। भाई, असल में हम हिन्दुस्तानी स्त्री विमर्श को पश्चिम की चीज मानकर उस पर तवज्जो नहीं देना चाहते। आज से सौ साल पहले जिस तरह का स्त्री विमर्श इस देश में चल रहा था यह उसकी बानगी है। और जो दोस्त वाकई में पंडिता रमाबाई सरस्वती के बारे में और जानना चाहते हैं उन्‍हें प्रोफेसर उमा चक्रवर्ती की लिखी किताब 'रिराइटिंग हिस्ट्री- द लाइफ एंड टाइम्‍स ऑफ पंडिता रमाबाई' जरूर देखनी चाहिए। यह काली फार वूमेन का प्रकाशन था।

काकेश said...

पढ़ी तो हमने भी नहीं है. :) चलो कुछ यहीं से जान लिया बाकि कभी पढ़ेंगे तब!

समीर जी से सहमति....

sunita (shanoo) said...

जानकारी के लिये बहुत-बहुत शुक्रिया...