Sunday, January 04, 2009

दुश्‍मन देश की बच्चियॉं मुझे सोने क्‍यों नहीं देती

पाकिस्‍तान एक 'शत्रु' देश है, उसकी मुसीबतों के लिए के वो खुद जिम्‍मेदार है, जैसा बोएगा वैसा काटेगा...जैसे कई दिलासे देने वाले कथन सोचे जा सकते हैं पर मुझे फिर भी नही लगा कि पाकिस्‍तान के इलाके की इन बच्चियों को 'उनकी औरतें' मानकर उनकी बदहाली पर प्रसन्‍न हुआ जा  सकता है। खबर है कि पाकिस्तान के स्‍वात घाटी क्षेत्र में तालीबान शासन लागू हो चुका है। और इन शासनों का पहला निशाना जाहिर है महिलाएं होती हैं। सभी लड़कियों के स्‍कूल बंद कर दिए गए हैं (ज़ाहिर है सहशिक्षा की अवधारणा वहॉं है ही नहीं) जो सात साल से ज्‍यादा उम्रकी बच्‍ची बाहर दिखे उसे कत्‍ल कर देने का फरमान है, किसी महिला को घर से बा‍हर अकेले जाने की इजाजत नहीं है किसी मर्द के साथ दिखें तो निकाहनामा लेकर चलना अनिवार्य है, पूरी तरह से शरीर ढककर चलना है,  घर की सभी कुंआरी बच्चियों का नाम मस्जिद में दर्ज कराना अनिवार्य है ताकि उनका निकाह तालीबानी लड़ाकों से किया जा सके। वे अध्‍यापिकाएं जो बच्चियों के इन स्‍कूलों में पढ़ाती थीं बेरोजगार हो चुकी हैं, यूँ भी किसी महिला को बाहर काम करने की इजाजत नहीं है...

taliban_murder_two_womenafghanist_2

ओह।। खैर मुझे क्‍या वो तो दुश्‍मन देश की बात है...या शायद मुझे खुश होना चाहिए कि ये दुश्‍मन देश की बात है। मेरी बच्‍ची तो होमवर्क निपटाकर इत्‍मीनान से सो रही है दुनियाभर की बच्चियों का ठेका मैं नहीं ले सकता। मुझे सोने दो दुश्‍मन देश की बच्चियों।

 

 

तस्वीर यहॉं से

16 comments:

रचना said...

मेरी बच्‍ची तो होमवर्क निपटाकर इत्‍मीनान से सो रही है

bhagwaan aap ki bachchi ko hamesha befikr rakhae aur aap ka aur neelima kaa vard hast hamesha uskae upar rahae

dushman desh mae kyaa ho rahaa haen wo samsyaa kabhie yaan naa aaye bas is aur jagruktaa ko ham sab apna saamajik kartavy samjhae

डॉ .अनुराग said...

बचपन में स्कुल में एक निबंध था जब तक कोई भी बच्चा भूखा सोयेगा ये सभ्यता अग्रसर नही मानी जायेगी...ओर मासूमो का न कोई मजहब होता है....न कोई जात...पता नही ये कौन से रास्ते है जो खुदा के बन्दे तय करते है खुदा के वास्ते !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

देश कभी देश का दुश्मन नहीं होता। दुश्मनी होती है हुक्मरानों में। यह तो सीधे सीधे मानवाधिकार हनन है। पूरी दुनिया को इस पर चेतना चाहिए। इस में हम इस काम में अपनी भूमिका तय कर सकते हैं

Anonymous said...

ख़ुदा भी अपनी बच्चियों की ये हालत देख कर रोता होगा

पाकिस्तान हमारा दुश्मन नहीं लगता मुझे, दुश्मन तो वहां बैठे अतिवादी लोग हैं.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

दुश्मनी हमारी पकिस्तान से थी और है . . बेचारे पाकिस्तानी आतंक से ज्यादा पीड़ित है हम तो जान गवा रहे वह बेचारे जान के साथ साथ अपनी इज्ज़त भी गवा रहे है .यह इन्तहा है जुल्म की पकिस्तान मे

Ratan Singh Shekhawat said...

यह तो बर्बरता है चाहे वे किसी भी देश में हों !

amit said...

पाकिस्तान शत्रु नहीं है वरन्‌ वहाँ के हुक्मरान, आला फौजी अफ़सर और अन्य कुछ लोग शत्रुता का भाव रखते हैं। वैसे भी हम लोग शत्रुता में भी दया दिखाने के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। यदि वहाँ की आवाम दुखी है और उस पर अत्याचार हो रहा है तो इससे हमें भी दुख हो सकता है, आखिर सब हैं तो मनुष्य ही!!

जो हो रहा है वह हमारे नज़रिए से है तो गलत ही, जब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का शासन आरंभ हुआ था तब वहाँ भी ठीक ऐसा ही हुआ था, औरतों का घर से निकलना मुहाल हो गया था, लड़कियों का पढ़ना लिखना बंद हो गया था, सिर्फ़ लड़को को पढ़ाया जाता था मदरसों में तालिबान की पद्धति के अनुसार, कह सकते हैं कि उनको इनडॉक्ट्रिनेट (indoctrinate) किया जाता था!!

ऊपर पोस्ट में इंडियन एक्सप्रेस का लिंक गलत लगा गए हैं, सही लिंक यह है

Mired Mirage said...

जबसे यह समाचार पढ़ा है तब से फिर से अफगानिस्तान के तालिबानी दिनों व इरान की खबरों की याद आ रही है। विचलित तो होती हूँ परन्तु क्या कहा जाए? इतना ही जानती हूँ संसार का कोई भी धर्म स्त्री के लिए नहीं बना। यदि धर्म और स्त्री का कोई सम्बन्ध है तो वह बस यही है कि वह स्त्री को कंट्रोल करने में पुरुष की सहायता करता है। यदि भगवान होता तो वह ऐसे स्थानों में स्त्री को जन्म ही नहीं देता।
बचपन में जब रेखागणित पढ़ते थे तो सिद्ध करो वाली बात और अंत में QED लिखना बहुत पसंद था। काश, जीवन भी इतना ही सरल होता। यह सब देखकर कोई भी स्त्री या स्त्री से सहानुभूति रखने वाला कहता कि भगवान नहीं है, है तो हमारे जैसा ही अशक्त और अत्याचारी ही है। और अंत में लिखता QED.
घुघूती बासूती

विवेक सिंह said...

हाँ दया ही आती है पर कर क्या सकते हैं !

Suresh Gupta said...

यह किसी हालत में खुश होने वाली बात नहीं है. इस का विरोध किया जाना चाहिए. सीमा पर भी इंसान रहते हैं. ऐसी हेवानियत के ख़िलाफ़ सारे इंसानों को एक जुट होकर संघर्ष करना चाहिए. आपने अपने ब्लाग पर यह पोस्ट लिखी, कुछ ब्लाग्कारों ने उस पर अपनी टिपण्णी दी, यह भी एक तरह का विरोध है.

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

दया ही आती है पर कर क्या सकते हैं!!!!

प्राइमरी का मास्टर का पीछा करें

Vinod Srivastava said...

मास्टर साहेब
प्रणाम.
आपने अपनी अनिद्रा रोग का आरोप दुश्मन देश की बच्च्चियों पर कुछ कुछ वैसे ही लगा डाला है जैसे हम अपनी हर विफलताओं के लिए उसी देश पर लगाते आयें हैं. आपकी पीड़ा जायज है, लेकिन कभी आपने अपने देश की बच्चियों के हालात पर नजर डाली है? कड़कती ठण्ड में उपले पाथते, बर्तन रगड़ते, कचरा बीनते हुए बच्चियों ने कभी आपकी नीद नही चुरायी? बचपन की दहलीज पार होते ही शादी करके मसल दिए जाने की कराह आपने कभी नही सुनी? लाखों बच्चियां प्रति वर्ष कोख में कत्ल की जा रही हैं, हजारों G B रोड, सोनागाछी और कमाठीपुरा में जिन्दा लाश में बदली जा रही हैं. आज जब फिर दुश्मन की बच्चिया सताएं तो अपने देश की बच्चियों के बारे में सोचियेगा. शायद सभी होमवर्क करके गरम रजाइयों में दुबकी नही मिलेंगी.
विनोद श्रीवास्तव

आदर्श राठौर said...

कठमुल्लाओं से कहो बंद करें ये सीख
बहुत कसैली हो गई अब शरियती ईख

अनूप शुक्ल said...

दुखद!

संजय बेंगाणी said...

खुश होने का प्रश्न ही नहीं उठता. कट्टरता की सबसे ज्यादा मार महिलाओं पर पड़ती है. दुखद है, अमानविय है.

राज भाटिय़ा said...

दुशमनी तो उन कट्टर पंथियो से, वहां की सरकार से है, आम जनता तो हमारे जेसी ही है,फ़िर क्या एक मुस्लमान की बेटी हमारी बेटी जेसी नही ? मुझे तो अपने दुशमन की बेटी भी अपनी बेटी लगती है, सच मै तरस आता है, लेकिन वहां कोई क्या कर सकता है, हम तो उस खुदा से जिसे हम भगवान कहते है बस दुआ ही कर सकते है की दुनिया की सब बेटियो को अपनी हिफ़ाजत मै रखे, ओए इन शेतानो को जहन्नुम नसीब करे.
धन्यवाद