Friday, February 15, 2008

उजड़ता खेल गांव स्‍टेशन और बेबस बाप का नॉस्‍ताल्जिया

कम से कम हम तो, खुद को रूक्ष व्‍यक्ति गिनते आए हैं। इसलिए इस बात की कम ही उम्‍मीद करते हैं कि किसी सरकारी दफ्तर से आई रस्‍मी पावती भर से हमारी ऑंखें पनीली हो सकती हैं। पर ऐसा हुआ- आज ही दिल्‍ली की मुख्‍यमंत्री के कार्यालय से एक ईमेल मिला ये मेल 11 जनवरी को भेजे गए एक ईमेल के जबाब में थी। इसका संबंध दिल्‍ली के बाल भवन से है। दिल्‍ली का बाल भवन शायद देश की अकेली जगह है जहॉं बच्‍चों के लिए एक ऐसी टॉय ट्रेन है जो है जो स्‍टीम इंजिन से चलती है। भाप के इंजिन से सैर करने का आनंद अब भी कुछ बेहद शाही गाडि़यों में उपलब्‍ध है पर बच्‍चों के लिए है मात्र एक रूपए में वाकई छुक छुक करती ट्रेन। जिसने दिल्‍ली में अपना बचपन गुजारा है, जैसे हमने, वह जानता है कि दिल्‍ली के बचपन का बाकायदा फेयरी टेल है यह ट्रेन। पर है नहीं थी। जी एकाएक यह विश्‍वास करने को जी नहीं चाहता कि गुपचुप इस ट्रेन को बंद कर दिया गया है। मेरे बेटे ने जब वह और भी छोटा था कई बार इस ट्रेन की सैर की थी और मैंने तो उसे किलकते देख कर ही अपने बचपन की यात्रा कर ली थी। पर अब जब वह अपनी छोटी बहन को इसकी सैर कराने ले गया तो ट्रेन को बंद पाकर बाकायदा रो पड़ा (और मैं... हॉं मैं भी)

 

train

बाल भवन में इस ट्रेन के दो स्‍टेशन होते थे और रेलयात्रा के हर अवयव का मिनी संस्करण है- स्‍टेशन, यार्ड, सिग्‍लन, गार्ड, कोयला, सीटी...छोटी सी ट्रेन सिर्फ एक फुट गेज की। मैंने इस ट्रेन पर सवार आज तक कोई शख्‍स नहीं देखा चाहे वो किसी भी उम्र का क्‍यों न हो खुशी से किलक न रहा हो। बाकायदा एक सुरंग आती थी और छोटी सी झील पर बना पुल भी। बाल भवन के अहाते का पूरा चक्‍कर लगाकर ट्रेन वापस स्‍टेशन आती थी। इस ट्रेन का संचालन खुद भारतीय रेलवे किया करती है। वैसे होने को तो राष्ट्रीय रेल संग्रहालय दिल्‍ली में ही है पर व‍हॉं का रेलगाड़ी भद्दी डीजल की शादियों वाली जनरेटर गाड़ी से खिंचने वाली ऐसी ट्रेन है जो रामलीला के मेलों में भी होती है। उसकी तुलना इस स्‍टीम इंजिन के रोमांस से हो ही नहीं सकती।

बेहद उदास मैंने अपने बेटे की इन शंकाओं का समाधान करने की कोशिश की 'वे' (सरकार) इस नन्‍हीं खुशी को क्‍यों बंद कर रहे हैं। और कैसे इसे रोका जाए...उसे लगा कि केवल वह एक रुपए की जगह पचास रुपए देने के लिए तैयार हो जाए तो ट्रेन चल पड़ेगी। मैं इस मासूम सोच पर चुप रह गया। व्‍यावहारिक तौर पर मैंने सोचा कि पत्रकारिता के अपने जान पहचान वालों से बात करूं, ज्ञानदत्‍तजी से आग्रह करूं ओर ऐसे ही बचपने भरे तरीके। पर अंत में खुद बेटे से ही कहा कि वह खुद मुख्‍यमंत्री को एक पत्र लिखे कि वे ही शहर की इस विरासत को बचाने के लिए कुछ करें। उसने ये पत्र लिखा-

 Request to CM

इस पत्र को मेल में नत्‍थी कर मुख्‍यमंत्री को भेज दिया। आज संदीप के नाम से (मुख्‍यमंत्री के बेटे हैं) इस मेल की पावती आई है पूरे एक महीने बाद..

Dear *****ji,
I have received Prabhav's lovely request and would certainly get it lookked into.
With best wishes and regards.

और अब मेरे पास बेटे को बहलाने के लिए कुछ शब्‍द हैं।

9 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

काशः कोई प्रभव की बात को मान ले।

आशीष said...

प्रभाव हम तुम्‍हारे साथ हैं

swapandarshi said...

why do not you start a webcompaign and lets circulate it and send it again as a request to govt, media, railway who so ever,

I was indeed planning this for my children too. too sad it is not there

Mired Mirage said...

मुझे प्रभव के दुखी होने का दुख है ।
घुघूती बासूती

Udan Tashtari said...

प्रभव की आवाज में दम है, मासूमियत है, सच्चाई है और उम्मीद की वो किरण है जो सब कुछ बदल सकती है. जरुर उसकी छोटी बहन इस ट्रेन को चलता देखेगी. बहुत शुभकामनायें और साथ का वादा.

rajivtaneja said...

उम्मीद पे दुनिया कायम है....देखें क्या होता है...

मेरी तरफ से प्रभव को शुभ कामनाएं

Sanjeet Tripathi said...

हम प्रभव के साथ हैं!!!

bhupen said...

kya bolein samajh nahi aa raha. apni sahanubhuti prabhav ke sath hei.

Harish Kumar said...

To Kya ab toy train start ho gayi hai ?