Wednesday, January 07, 2009

खानपान का देहलवी अंदाज : चाचे दी हट्टी

आइए एक तस्वीर से बात शुरू करें-

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इस तस्‍वीर को देखकर लाजिमी तौर लगेगा कि कोई किरासिन का डिपो है या ज्ञानदत्‍तजी के ब्‍लॉग पर टिप्‍पणीकार अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं पर नहीं दरअसल ये पूरी तस्‍वीर कुछ ऐसे है-

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एक अन्‍य कोण से ये कुछ यूँ दिखती है

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जी दो दो कतारें, पुरुषों के लिए अलग तथा स्त्रियों के लिए अलग। जैसे कि आप अनुमान कर चुके होंगे हम दिल्‍ली की खानपान को लेकर दीवानगी का एक प्रमाण पेश कर रहे हैं। ये छोटी सी लेकिन बहुत जानी मानी दुकान है- चाचे दी हट्टी:

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चाचे दी हट्टी उत्‍तरी दिल्‍ली के व्‍यावसायिक केंद्र कमला नगर में बँग्लो रोड पर है, किरोडीमल कॉलेज के पीछे। वर्षों से दिल्‍ली भर के ग्राहक इस दुकान पर सुबह 10 से लगभग 3 बजे तक लाइन लगाते हैं ताकि वे आलूवाले या सादा भटूरों का मजा ले सकें पिंडी छोलों के साथ। उसके बाद दुकान बंद  तथा रविवार को पूरे दिन की छुट्टी। ठेठ ठसक की दुकानदारी....है कि नहीं।

जैसाकि आप दुकान के आकार से अनुमान लगा सकते हैं ये बेहद छोटी सी दुकान है बमुश्किल सत्‍तर वर्ग फुट की। जिसमें जैसे तैसे कड़ाहा रखकर भटूरे तलने तथा छोले के साथ परोसने वालों के लिए खड़े होने भर की जगह है। लेकिन दिल्‍ली भर इस स्‍वाद की दीवानी है। विश्‍वविद्यालय के छात्र छात्राओं के लिए ये दशकों से मिलने-जुलने व खानपान की जगह बनी हुई है।

अगर दिल्‍ली के स्‍वाद ग्रंथि के इतिहास पर नजर डालें तो दो महत्‍वपूर्ण पड़ाव सहज ही दिखाई पड़ते हैं एक है मुगल चरण, जो पुरानी दिल्‍ली में केंद्रित है- तंदूरी मुर्ग, बटर चिकन, दाल मक्‍खनी, पुरानी दिल्‍ली की चाट आदि वे व्‍यंजन हैं जो इस चरण की देन हैं। दूसरा सोपान है विभाजन के कारण बड़े पैमाने पर विस्‍थापित पंजाबियों के दिल्‍ली आने और दिल्‍ली के अपने दिल व द्वारों को इन पंजाबियों के लिए खोल देने का चरण। इन शरणार्थियों में से अनेक ने खोमचा खानपान का धंधा अपनाया छोले भटूरे इसी कोटि का एक बेहद लोकप्रिय व्‍यंजन सिद्ध हुआ है। चाचे दी हट्टी इसी परंपरा से है।

ऊपर व्‍यक्‍त इतिहास बेहद सरलीकृत है तथा यहॉं उद्देश्‍य दिल्‍ली व पंजाब विशेषकर लाहौर के पहले से विद्यमान संबंधों की उपेक्षा करना कतई नहीं है। दूसरी ओर जब दिल्‍ली की इस शानदार संस्कृति पर विचार करते हैं कि बाहरी प्रभावों को लेकर ये शहर कितना स्‍वागत का रवैया अपनाता है तो आप निश्चित तौर पर गर्व महसूस करते हैं। भाषा, जायका, पहनावा, अंदाज सभी को लेकर एक देहलवी लोच।

आपको इस जायके को खुद महसूस करने के लिए दिल्‍ली सदैव ही आपको आमंत्रित करती है। आलूवाले अठारह रुपए, सादा सोलह रुपए।

19 comments:

रंजू भाटिया said...

वाह यह ठिकाना तो हमें भी नही मालूम था ...:) इसको बताने का शुक्रिया ...चांदनी चौक में इस तरह की दीवानगी देखी है कई जगह ..यह नया ठिकाना पता चला

Alpana Verma said...

haan suna hai is jagah ke bare mein..aur bhi kayee jagah hain dilli mein aisee hi...
chaat pakodi ,mithayeeyan khane ka jo mazaa ,jo swad Dilli aur UP mein milta hai --aur duniya mein kahin nahin....

विवेक सिंह said...

मास्साब मुँह में पानी आ गया :)

Anonymous said...

पता तो अपने को भी नहीं था इस जगह के बारे में, तो बताने के लिए बहुत धन्यवाद। कभी मौका लगा तो चाचे दी हट्टी के भठूरों का भी स्वाद लिया जाएगा! :D

Anonymous said...

दिल्ली में लोग लाइन में खड़ें हो तो वाकई बहुत बड़ी बात है.
अब आपने इसके बारे में बताया है तो इन्तजार करेंगे कि आप इसे हमें कब खिलाते हैं:)

सागर नाहर said...

आपको इस जायके को खुद महसूस करने के लिए दिल्‍ली सदैव ही आपको आमंत्रित करती है। आलूवाले अठारह रुपए, सादा सोलह रुपए।
सिर्फ दिल्ली आमंत्रित करती है, आप नहीं?
जब दिल्ली आना हुआ तो आपको हमें ये सारी चीजें खिलवानी होंगी, मास्साब!

दिनेशराय द्विवेदी said...

हर शहर में हैं ऐसी दुकाने इक्का दुक्का। बिलकुल ठसक वाली।

Anonymous said...

बड़ी अच्छी जगह बता दी. हमें भी पता नहीं था. अगली बार ज़रूर आजमाएँगे. वैसे यह किरोदीमल कॉलेज की वजह से ज़्यादा चल पड़ी लगती है. आभार.

dhiru singh { धीरेन्द्र वीर सिंह } said...

धन्यबाद ,एक नया स्वाद बताने का वैसे शाहजहाँ रोड पर संघ लोकसेवा आयोग के बरावर मे सप्लाई की चाट पर भी ऐसी ही लाइन लगी देखि है

प्रवीण त्रिवेदी said...

हम भी इन्तजार करेंगे कि आप इसे हमें कब खिलाते हैं....?????

सुशील छौक्कर said...

बहुत खाए हैं यहाँ के छोले भठूरें। और कभी मौका मिले तो पटेल चेस्ट के सामने जहाँ फोटोस्टेट की दुकाने वहाँ शुरु में ही एक छोले वाला खड़ा होता हैं 12 बजे के बाद। वहाँ जाकर भी खाए।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बेहद लज़ीज़ पोस्ट रही आज की -
- लावण्या

Unknown said...

haan sir ham jab delhi main the to aksar jaaya karte the...bahut hi mast hoti hai yahan ki chaat..

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर, वेसे तो हर इलाके मै कोइ ना कोई चीज यु ही मशहुर हो आती है, आप क धन्यवाद, अगली बार कभी दिल्ली आये तो चाचे दि हट्टी पे जरुर जायेगे.
धन्यवाद

Anonymous said...

या ज्ञानदत्‍तजी के ब्‍लॉग पर टिप्‍पणीकार अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं दिल्ली की ये हालत है कि टिपियाने के लिये भी लोगों को दुकान पर जाना पड़ता है। हमारे कानपुर में तो कभी भी घर बैठे टिपिया सकते हैं।

अविनाश वाचस्पति said...

चलिए उसकी मशहूरियत में

आपने अपने को भी जोड़ा

अब लगें आपके ब्‍लॉग पर

भी लाईनें टिपियाने के लिए

ऐसी शुभकामनायें हैं हमेशा।

Gyan Dutt Pandey said...

टिप्पणियों की लाइन तो आपके यहां भी चाचे दी हट्टी छाप है! :-)

Anonymous said...

आप पैक करा कर भेजेंगे तो ठंडे हो जाएंगे इसलिए बेहतर यही है कि दिल्‍ली आने तक मेरठ के ही भटूरों से काम चलाया जाए। वैसे जायका यहां भी अच्‍छा है और लाईन ऐसे लगती है मानो मुफ्त में बंट रहे हों।

Anonymous said...

Although we have differences in culture, but do not want is that this view is the same and I like that!
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