Tuesday, February 09, 2010

हर घेटो खुद शहर पर एक सवाल है

हिन्‍दी के मानूश हैं पर गणित से मो‍हब्‍बत रही है इतनी कि पहले भी कहीं कह चुके हैं कि गणित की याद उस प्रेमिका की तरह टीस देती है जिससे विवाह न हो पाया हो (कोई ये न माने कि हिन्‍दी से चल रहे गृहस्थिक प्रेम में हमें कोई असंतुष्टि है :) पर पुराने प्रेम की टीस इससे कम थोड़े ही होती है) खैर गणित में जब कोई सवाल अटक जाता था तो बस वो अटक जाता था  और जितना सर भिडा़ओ हल न होकर देता था ..जल्द ही समझ आ गया कि ऐसे में कापी बंद कर घूमने चल देना चाहिए वापस आने तक सवाल का हल या अब तक की कोशिशों की गलती सूझ चुकी होती थी। जब पिछले दिनों तमाम कोशिशों के बावजूद छत्‍तीसगढ़ के ब्‍लॉगर साथियों की खुद से नाराजगी पकड़ में न आई तो हम कापी बंद कर इधर उधर टहलने निकल पड़े। इधर यानि अपने ही ब्‍लॉग पर अपने ही ब्‍लॉग पर दो साल पहले जनवरी 2008 की एक पोस्‍ट और उधर यानि कल मित्र बिल्‍लौरे के ब्‍लॉग पर अनूप के साक्षात्‍कार... इन दोनों पोस्‍टों में ही हमें इस फिनामिना को और बेहतर समझने के सूत्र दिखे।
जब हम ब्‍लॉगस्‍पेस को समझना चाहते हैं तो पब्लिक स्‍पेस की शब्‍दावली में ही समझना होगा। इसलिए अगर किसी शहर में घेटो तैयार हों तो इसके लिए खुद घेटो को या उसके बाशिंदो को दोष देना उनके खड़े होने की प्रक्रिया के प्रति उदासीनता को ही दर्शाता है। दिल्‍ली के ओखला या जाफराबाद में लोग घेटो इसलिए नहीं बसाते कि उन्‍हें असुविधाएं पसंद हैं या तंग गलियों में रहना उन्‍हें अच्‍छा लगता है वरन इसलिए कि बाकी शहर उनके प्रति या तो उदासीन हैं या उनकी उपेक्षा कर रहा है।
'घेटो' के घेटो होने में अपरिचित जगह में अपने जैसों को इकट्ठा कर अपनी असुरक्षाओं से कोप करने का भाव होता है। जो पूरे शहर में डरा डरा सा घूमता है क्‍योंकि वह वहॉं खुद को अजनबी सा पाता है, अल्‍पसंख्‍यक पाता है या शक की निगाह में पाता है वह जैसे ही अपनी बस्‍ती में आता है जो उसने बसाई ही है 'अपने जैसों' की वहॉं वह फैलता है कुछ ज्‍यादा ही फैलता है- गैर आनुपातिक होकर। पहली पीढ़ी के प्रवासी महानगर की सुखद एनानिमिटी के आदी नहीं होते और उससे बचकर भागते हैं और वह छोटी सी बस्ती ही उन्‍हें सुकून देती है जहॉं एनानिमिटी की जगह 'पहचान' की गुजाइश होती है इस तरह महानगर में घेटो बसते हैं- ओखला, तैयार होता है, जाफराबाद, बल्‍लीमारान और मुखर्जीनगर।
ये सही है कि ये प्रवृत्ति मूलत: फिजीकल स्पेस की है तथा इसे वर्च्‍युअल पर सीधे सीधे लागू करने के अपने जोखिम हैं। पर ये घालमेल हम हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत में होता ही रहा है एक बार फिर सही।  अगर छत्‍तीसगढ़ या किसी और क्षेत्र या समूह के ब्‍लॉगर इस पूरे ब्‍लॉगशहर को पूरा अपना न मानकर अपनी बस्‍ती बसाना चाहते हैं तो इसे कानूनी नुक्‍तेनजर से समझने की कोशिश इस एलियनेशन को और बढ़ाएगी ही इसलिए जरूरी है इसे पूरे ब्‍लॉग शहर की असफलता के रूप में देखे जो कुछ साथियों में इस एलियनेशन के पनपने को रोक नहीं पाई।
गणित के उस बेहद उलझे सवाल के साथ सुविधा ये होती थी कि किताब के आखिर में दिए हल से मिलाने पर पता चल जाता था कि हमारा हल ठीक हे कि नहीं। काश ऐसी कोई सुविधा यहॉं भी होती।

16 comments:

मनोज कुमार said...

हिन्‍दी के मानूश हैं पर गणित से मो‍हब्‍बत रही है इतनी कि पहले भी कहीं कह चुके हैं कि गणित की याद उस प्रेमिका की तरह टीस देती है जिससे विवाह न हो पाया हो ... वाह वाह!!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

न जानते थे कि गणित से मुहब्बत आप की भी हम जैसी ही थी तो हम रकीब हुए।
छत्तीसगढ़ के लोग अपना संगठन बना रहे हैं इसे अलगाव के रुप में लेना उचित प्रतीत नहीं होता। मानव संगठन इसी तरह बनते बनते विस्तार पाते रहे हैं। परिवार से राज्य तक इसी तरह तो विकास हुआ है मानव समाज का।

अर्कजेश said...

प्रथम दृष्‍टया तो यही लगा कि हर घेटो शहर पर सवाल है । लेकिन थोडा और सोचने पर मुझे लगा कि नहीं, घेटो शहर पर नहीं बल्क्‍ि‍ स्‍वतंत्र रूप से एक सवाल है । मतलब घेटो शहर की प्रतिक्रिया स्‍वरूप नहीं है बल्कि विकास की अवस्‍था का एक पडाव है ।

यदि हम शहर के रंग में रंगने को तैयार नहीं है तो घेटो ही बनायेंगे । जैसा कि आपने लिखा है यह सब असुरक्षा की भावना , पहचान का संकट और समुदाय में उसकी तलाश और शहर की रिजर्व जीवन शैली से बचने का उपाय भी है । यह एक स्‍वतंत्र प्रवृत्ति है ।

घेटो बुरा नहीं है लेकिन उसमें बाहर वाले के लिए जो एक आं‍तरिक प्रतिरोध पैदा हो जाता है वही सबसे बडी बुराई है । घूम घामकर फिर वहीं, जहॉं से चले थे , पहुंच जाते हैं कहीं छोटे और कहीं बडे घेटो नजर आते हैं ।

शुरू में बढिया तुलना की गई है प्रेमिका और पत्‍नी के रूप में । गणित और हिन्‍दी की ।

इतना जूझने के बावजूद सब काटकूटकर मुझे कॉपी बंद करने का ही मन कर रहा है ...

Neeraj Rohilla said...

अनूपजी का इंटरव्यू सुना और आपकी पोस्ट की मूल भावना से सहमति है। इसके अलावा इंटरव्यू में कुछ बातें खटकी भी और आशा है कि वो किसी लार्ज पिक्चर का हिस्सा नहीं हैं।

जैसे कि प्रश्नकर्ता का बार बार महिला ब्लागरों के Attitude पर प्रश्न उठाना और Tangential वार करना। अगर समस्या है कि कम से कम चिट्ठे का नाम तो बतायें और खुलकर बतायें कि आपका प्रश्न क्या है, वरना इस तरह के veiled प्रश्न या तो फ़ुरसतिया को फ़ांसने के लिये थे या फ़िर मौज के लिये, ;-) लेकिन इससे इंटरव्यू का मूल्य कम होता है।

ऐसा ही कुछ उनके चिट्ठाचर्चा डोमेन को लेकर किये गये प्रश्न में महसूस हुआ।

दूसरी बहुत अच्छी बात जो इस इंटरव्यू में लगी वो फ़ुरसतिया के द्वारा कही गयी। पहला कि उन्होने हिन्दी ब्लागिंग में पाडकास्टिंग के पुराने प्रयोगों के बारे में बताया जिससे पता चले कि ऐसे प्रयोग पहले भी सफ़लतापूर्वक हो चुके हैं। दूसरा कहना कि म्रणाल पांडे (वो जो भी हों) की बातों को भाव देने का अर्थ है कि हर हफ़्ते कोई नया साहित्यकार आकर ब्लागिंग पर उत्तेजक बयानबाजी करता रहेगा।

आभार,

रचना said...

आप तो उस मीट मे थे जिसका विवरण निरंतर आ रहा हैं और उस मे एक जगह कहा गया हैं "शुरूआती ब्लोग्गिंग में ही कुछ टिप्पणियों के कारण उनका एक सामूहिक ब्लोग से विचारधारा का टकराव हो गया और उन्हें भी स्वाभाविक रूप से धडाक से उसी मानसिकता वाला करार देकर खूब किरकिरी की गई ।"http://ajaykumarjha1973.blogspot.com/2010/02/blog-post_09.html

ये किस ब्लॉग के लिये कहा जा रहा हैं किसी ब्लॉग / विचार धारा को लाकर खुल कर ना कहना , नाम ना देना क्या यही ब्लोगिंग हैं ?? जिन साझा ब्लॉग कि बात होरही हैं वो अगर नारी या चोखेर बाली हैं तो जब राज भाटिया ब्लोगिंग मे आये थें तब ये दोनों ब्लॉग अस्तित्व मे ही नहीं थे और राज भाटिया के कमेन्ट काकेश के ब्लोग्पर थे पोस्ट २००७ मे थे

लोग गुट बना कर झूठ को प्रचरित करते रहे क्या फायदा होगा । आप का वहा होना लोगो को भाया या नहीं आप बेहतर ही जानते होगे

और मेरी नीरज रोहिला से पूरी सहमति हैं कुछ भी कहो नाम तो लो कायर को जमात बढ़ा लेना अगर ब्लोगिंग हैं तो वो छत्तीसगढ़ कि हो या पूरे हिंदी ब्लोगिंग कि किस का फायदा नहीं होगा ।

अभिषेक ओझा said...

ब्लॉग जैसी जगह पर गुटबाजी के फंडे तो अपनी समझ के बाहर हैं. ये मेरी कमी है. पर आपकी पोस्ट पसंद आई !

Shiv Kumar Mishra said...

"'घेटो' के घेटो होने में अपरिचित जगह में अपने जैसों को इकट्ठा कर अपनी असुरक्षाओं से कोप करने का भाव होता है।"

ज्यादातर घुटे हुए लोग ऐसे लोगों को इकठ्ठा करते हैं. उन्हें बताते हैं कि तुम अपने अन्दर असुरक्षा की भावना पैदा करो नहीं तो तुम सुरक्षित नहीं रहोगे. बस, घेटो बन जाता है.

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

ब्लॉग कम्यूनिटीज का बनना एक तरह का अर्बनाइजेशन प्रॉसेस है।

Anil Pusadkar said...

मास्साब मैं ये समझ नही पा रहा हूं छत्तीसगढ को लेकर इतना शोर क्यो है?हालांकि एसोसियेशन के गठन मे मुझे भी सदस्य के रूप मे शामिल लिया गया है लेकिन मैंने ही सबसे पहले इसमे पदाधिकारियों की बजाय एक कमेटी बना कर गठन करने का सुझाव दिया था।जिन्होने इसे बनाने की पहल की पता नही वे घेटो हओ या फ़िर कुछ और मगर मुझे याद है इंडियन एक्स्प्रेस के अम्बरीश कुमार ने एक बार नाम तो मुझे याद नही आ रहा है किसी ब्लागर के खिलाफ़ ज़ुर्म दर्ज़ होने पर मुझसे उस मामले की निंदा करने के लिये कहा था और संगठन बनाने के लिये भी।वे स्वाभाव स नीडर और लडाकू हैं,वे मेरे संपादक भी रहे है और जंहा तक़ मै उन्हे जानता हूं वे घेटो भी नही हो सकते।उन्होने छतीसगढ को देखा है और समझा है।मैं आपको विश्वास दिलाता हूं छतीसगढ के ब्लागर अलगाववादी नही है और वे सबके साथ हैं,अब अलग संगठन बनाने को उस नज़र से नही देखना चाहिये।बाकी आपकी मर्ज़ी।

सतीश सक्सेना said...

मैं अनिल पुसाद्कर की बात से सहमत हूँ ,
अगर एक विशाल नगर में कुछ लोग मिलकर अपना पारम्परिक नृत्य या संस्कृतिक उत्सव मना रहे हैं तो आपत्ति किसे है ? राजाओं को, सेनानायकों को या मदारियों को तकलीफ जरूर हो सकती है,
जिन्हें हर समय केंद्र में रहने की आदत पड़ चुकी हो ! समय के हिसाब से उन्हें भी बदलना चाहिए, मदारियों को हर जगह भीड़ मिल जाये यह संभव नहीं हैं , कई बार जमूरे मदारी बन जाते हैं तो उस्तादों के पास भीड़ कम होना स्वाभाविक है ! :-)

अजय कुमार झा said...

आदरणीय रचना ,
आपसे वैचारिक मतभेद , और सच कहूं तो आपसे क्यों आपके लिखे पोस्टों और उनमें दिए संदेशों और निहितार्थों से मेरा तालमेल न बैठता हो ये मुमकिन है और इसके लिए मुझे कभी कोई अफ़सोस रहा भी नहीं । और शायद यही वजह रही है अब मैंने आपकी उस विचारधारा के रास्ते में पडना बंद कर दिया है , और जहां तक मुझे याद है शायद कभी आपका नाम , आपकी पोस्ट का जिक्र या लिंक देकर कुछ सहमति या असहमति नहीं जताई होगी , कम से कम उस तरह अंदेशों अनुमानों पर तो नहीं ही । और स्वाभाविक रूप से अपनी आदत के अनुसार कभी भी जाने अनजाने भी कभी अमर्यादित भाषा शैली शब्द आदि का प्रयोग नहीं किया है । और ऐसी ही अपेक्षा मैं भी आपसे तथा दूसरों से करता हूं । ऐसा पहली बार ही मेरी निगाह में आया है इसलिए सोचा कि कुछ ज्यादा लिखने से पहले यहीं सब लिख दूं । किंतु भविष्य में यदि आपकी तरफ़ से ऐसा प्रयास किया गया तो आप जानती हैं कि मुझे भी अपनी बात को कहना आता है , और तब शायद आप भी इसे अन्यथा नहीं लेंगी । यही टिप्पणी आपको मेल कर रहा हूं । आईंदा यदि मेरा संदर्भ दें तो या तो उसे उन्हीं अर्थों में दें जिसमें वो हैं नहीं तो फ़िर अपनी बात को प्रमाणित करें । किसी टिप्पणी की प्रतिक्रिया में पोस्ट लिख देने की कभी आदत नहीं रही इसलिए यही कह/लिख रहा हूं अभी फ़िलहाल ।धन्यवाद

रचना said...

ajay
in future please refrain from sending personal emails to me
and i have already given the proof of kakesh blog

अजय कुमार झा said...

रचना जी ,
यदि ऐसा है तो भविष्य में इस बात का ख्याल रखें कि कहीं भी मेरे नाम , मेरी टिप्पणियों, और मेरे पोस्ट का लिंक देने की आप कृपा न करें । उम्मीद है आप इसे मानने में ईमानदारी बरतेंगी । निजी रूप से मेल सिर्फ़ एहतियातन भेजी गई थी , ताकि बाद में ये न कहा जाए कि बात को बढाने से पहले सीधे संवाद स्थापित करना चाहिए था । और अब इस मुद्दे पर यहां कुछ कहना मसीजीवी की पोस्ट की मूल बातों से भटकना /भटकाना होगा ...जो मैं नहीं चाहता ।धन्यवाद

मसिजीवी said...

रचना से इस मामले में सहमति है कि संज्ञाओं के स्‍थान पर सर्वनामों का प्रयोग बिंदास ब्‍लॉगिंग नहीं है महज पोलिटिकल करेक्‍टनेस की जुगत है।

अनिलजी देख पा रहे होंगे कि मूल पोस्‍ट में बात ब्‍लॉग में बिहारवाद के आरोप के संदर्भ में थी पर सही है कि छत्‍तीसगढ (या लखनऊ ऐसोसिएशन) इस साइबर अर्बनाइजेशन की उसी प्रवृत्ति के द्योतक दिखते हैं। इससे हमें या किसी को आपत्ति है ऐसा नहीं है वरन हम तो इसे महत्‍तवपूर्ण मानकर इसे समझने पर जोर भर दे रहे हैं। अगर रूपक में ही देखें तब भी कोई विचारवान शहरी घेटो का विरोध नहीं करेगा

रचना said...

mr ajay i dont send emails to you , i dont think email ethics says that you should send one to me

no where on your blog its written that no one should link your post any thing can be said using links
its normal practice in bloging and much better then slanging without giving links

अजय कुमार झा said...

रचना जी ,
मुझे लगता है आपसे किसी भी बात के लिए तर्क करना अपना समय खराब करना है , मतलब अपनी उर्जा को नकारात्मकता में झोंकना है । क्योंकि हिंदी ब्लोग्गिंग में कभी आपको कुछ बेहतर न तो दिखा है न दिखेगा शायद । रही बात मैंने अपने ब्लोग पर किस बात की अनुमति दे रखी है किस बात की नहीं ये भी अपने विवेकानुसार ही है , आप जैसे नहीं कि जब लगा कि टिप्पणियां तल्ख आएंगी तो टिप्पणी झेलने का माद्दा ही न रहा तो टिप्पणी द्वार बंद करके बैठ गए । अब दोबारा आपकी टिप्पणी का उत्तर देने नहीं आऊंगा , जरूरत पडी तो अपनी पोस्ट के माध्यम से अपना पक्ष रखने की कोशिश करूंगा ।