Wednesday, December 09, 2009

हमारा अँगूठा हाजिर है श्रीमान

थोड़ी देर लिंक खोजा पर मिला नहीं लेकिन याद ताजा है कि पिछले दिनों किसी ने सवाल उठाया था कि कुछ लोग अपने कार्यालय से ब्‍लॉगिंग करते हैं ये कहॉं तक उचित है ये संभवत पाबलाजी, अनूपजी या ज्ञानदत्‍तजी को या शायद हमें भी संबोधित था, लेकिन  अपने मन में ये कोई सवाल ही नहीं है क्‍योंकि हमारे लिए नैतिकता की परिभाषा इतनी स्‍थूल नहीं है। तब भी पिछले दिनों इलाहाबाद में जब ज्ञानदत्‍तजी समय प्रबंधन के मसले पर मंच से मुखातिब थे तो हमने ये कहकर कि सवाल हमारा नहीं बेनामी है पूछा ...ये बताऍं कि क्‍या दफ्तर से ब्‍लॉगिंग करने में नैतिकता का कोई सवाल उठता है... ज्ञानदत्‍तजी का उत्‍तर बेहद शांत व स्‍पष्‍ट था... नहीं ये कतई नैतिकता का सवाल नहीं है। सुबह उठते ही ज्ञानदत्‍तजी अल्‍ल सुबह घर से कंप्‍यूटर चलाते हैं और देखते हैं कि ट्रेनों का स्‍टेटस क्‍या है... ब्‍लॉगिंग करते हैं..काम करते हैं...दफ्तर में भी ये क्रम रहता है...दरअसल दफ्तर व घर का जो बंटवारा समझा जा रहा है वह बेहद कृत्रिम है असल जिंदगी में दोनों जगह काम होता है ... चौबीस घंटे की नौकरी है... इस मायने में घर के सब काम भी उसी कार्यालयी मनोदशा से ही जुड़े हैं इनके बीच तनाव व नैतिकता का सवाल बेमानी है।

हमें पांडेयजी के इस उत्‍तर से न कोई हैरानी हुई न परेशानी क्‍योंकि हमारा खुद का दृष्टिकोण यही रहा है। ये सवाल हमारे पेशे के बारे में अक्‍सर उठाया जाता है..दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में शिक्षकों को प्रति सप्‍ताह अठारह घंटे कक्षाएं लेनी होती है, हम विद्यार्थियों की हाजिरी लेते हैं तथा इसे सत्र के बाद दाखिल कर देते हैं इसे ही हमारी हाजिरी भी माना जाता है  अलग से न आने के समय की बंदिश है न जाने की... बस उम्‍मीद ये की जाती है कि कक्षा के समय हम कक्षा में उपस्थित रहेंगे। इतने सब के बाद भी जितनी शिद्दत से हम छुट्टियों का इंतजार करते हैं कोई और नहीं करता दिखता।  आखिर क्‍यों ?

वजह वही है जो ज्ञानदत्‍तजी ने बताई। शिक्षक के लिए कक्षा और कक्षा से बाहर के काम की जो हदबंदी कई लोगों खासकर नौकरशाही किस्‍म की सोच के लोगों के दिमाग में है वो शैक्षिक दुनिया का सच नहीं है। आज ही फेसबुक में एक दोस्‍त ने पूछा कि बायोमैट्रिक हाजिरी के बारे में आपकी क्‍या राय है- उनका इशारा विश्‍वविद्यालय के अधिकारियों द्वारा प्रत्‍येक शिक्षक के अंगूठे के छाप से रोजाना हाजिरी लेकर ये सुनिश्चित करने के प्रस्‍ताव से था जिसके तहत हर शिक्षक को रोजाना 6-8 घंटे कॉलेज में रहना होगा। फिलहाल प्रस्‍ताव को टाल दिया गया है पर ये प्रस्ताव कितना फूहड़ है इसे केवल वे ही समझ सकते हैं जो दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय या जेएनयू जैसे विश्‍वविद्यालयों की कार्यसंस्‍कृति से परिचित हैं। ऐसा नहीं है कि यहॉं  गैरहाजिर रहने की समस्‍या यहॉं है ही नहीं पर वाथवाटर के साथ बेबी फेंक देना मूर्खता है। शिक्षक केवल 6-8 घंटे रोजाना शिक्षक नहीं होता वो चौबीस घंटे केवल शिक्षक ही होता है। जिस पचास मिनट के पीरियड में वह कक्षा लेता है उसमें उसके अब तक के सारे ज्ञान को शामिल रहना होता है ठीक वैसे ही जैसे कि एक कलाकार के श्रम को उसके प्रदर्शन के मिनटों की गणना करके नहीं समझा जा सकता। ये पचास मिनट शिक्षक का काम नहीं होते वरन उसकी परफार्मेंस होते हैं उसका काम तो उस सारे रियाज को समझा जाना चाहिए जो वह पूरे दिन करता है और हमारे लिए तो दिन भी कम पड़ता है।  अगर हमारे कॉलेज हमें कॉलेज में ही इस रियाज के मौके देने को तैयार हों तो शायद किसी को भी पूरे दिन वहॉं रहने में तकलीफ न हो। हम जब कॉलेज से  रवाना होते साथियों से दिन भर की विदाई का हाथ मिलाते हैं तो सदैव सवाल होता है ...कहॉं ? क्‍योंकि अधिकांशत: कॉलेज के बाद किसी गोष्‍ठी, लेक्‍चर, पुस्‍तकालय, सुपरवाइजर, मंडी हाउस, विश्‍वविद्यालय ही जाना होता है या कभी कभी उत्‍तर सुनाई देता है ... कहीं नहीं यार घर ही जाउ़ंगा थकान है घर जाकर पढूंगा... कोई शुद्ध लिपिकीय तरीके से इस बात की जॉंच पर बल दे सकता हे कि इस सब 'कामों' में कितने 'पर्सनल' हैं कितने 'आफीशियल' यानि बताएं कि जो उपन्‍यास आप पढ़ रहे हैं वो पाठ्यक्रम का ही है न... वगैरह।  हमारी नजर में कसौटी ये है कि आउटपुट की तुलना करें। देश के बहुत से राज्‍यों में शिक्षक हाजिरी देते हैं स्‍कूल कॉलेज में मौजूद रहते हैं लेकिन सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का परिणाम कहीं कम होता है... क्‍या स्‍वविवेक पर निर्भर स्‍वाभिमानी  प्रोफेसर को अंगूठाछाप बना देना उन्‍हें बेहतर शिक्षक बनाएगा.. हमें तो शक है, पर अगर अब द्रोणाचार्य के एकलव्‍य बनने की बारी है तो हमारा अंगूठा हाजिर है श्रीमान। 

Wednesday, November 11, 2009

मैं चर्चाता हूँ...इसलिए मैं हूँ

अगर इंसान पहचान के कई टुकड़ों में साथ साथ जीता है पिता, मित्र, धर्म, जाति... तो भला ब्‍लॉगर की क्‍योंकर एकमुश्‍त पहचान होगी... वो भी अपने अलग अलग चिट्ठों, पोस्‍टों, टिप्‍पणियों से पहचान हासिल करता है... हम भी करते हैं, पर जब कोई हमसे पूछता है तो जिस पहचान को हम मसिजीवी होने के बाद सबसे अहम मानते हैं वह है चर्चाकार होना। चिट्ठाचर्चा के इतिहास पर हमारी कोनो पीएचडी नहीं है, सुकुलजी इतिहास दर्ज कर चुके हैं बांच लें, चिट्ठाचर्चा ने 1000 पोस्‍टों का सफर पूरा करने के अवसर पर हम केवल इस मंच से अपने जुड़ाव की बात करेंगे और नहीं।

मित्रों के सद्भाव के चलते जनसत्‍ता से ब्‍लॉगों पर एक स्‍तंभ जिखने की पेशकश हुई... पहले अविनाश अपना कॉलम लिखते थे पर उन्‍होंने भास्‍कर ज्‍वाइन कर लिया तो जाहिर है जनसत्‍ता में जारी नहीं रख सकते थे, थानवीजी से फोन पर बात हुई उन्‍होंने कहा कि आपका कालम है खुद कोई नाम रखें... 'चिट्ठाचर्चा' हमने बिना झिझक कहा, आखिर नियमित रूप से पोस्‍टों की चर्चा और भला क्‍या नाम आ सकता था हमारे मन में। जब तक जनसत्‍ता में कॉलम आया चिट्ठाचर्चा नाम ही रहा कभी मन में नहीं आया कि ये शुक्‍लजी के मॉडरेशन में चल रहे किसी सामूहिक ब्‍लॉग का नाम है... भले ही शुक्‍लजी हमसे सौगुनी मेहनत करते हैं चर्चा पर, किंतु चिट्ठाचर्चा हम सब का है... ये 'अविनाश के' मोहल्‍ले या 'यशवंत के' भड़ास सा कम्‍यूनिटी ब्‍लॉग नहीं है ये वाकई हमारी चिट्ठाचर्चा है इसलिए जब कोई टर्राते हुए इसे सुकुलजी के किन्‍हीं गुट की चर्चा कहता है तो झट मन में आता है बड़े आए सुकुलजी...(नारद को लेकर भी ऐसा ही मन में आता था अभी तक तो उम्‍मीद है कि चर्चा के मामले में ये विश्‍वास बना रहेगा)  

ऐसा नहीं कि नाराजगी नहीं हुई खुद अनूप धुरविरोधी प्रकरण में हमसे धुर असहमत थे... उनकी क्‍या कहें घर में खुद नीलिमा असहमत थीं

धुरविरोधी के विरोध का अपना एकदम निजी तरीका है इसपर सेंटी होने की भी जरूरत नहीं है उक्त विचार भी आपके एकदम निजी हैं

पर हमने चर्चा का विषय इसे बनाया एक बार नहीं लगा कि चिट्ठाचर्चा अनूप के मॉडरेशन में चल रहा ब्‍लॉग है उन्‍हें आपत्ति होगी। दरअसल चिट्ठाचर्चा में वैयक्तिकता व सामुदायिकता का जो संतुलन है उसे महसूसने की जरूरत है इसे साधुवादी वाह वाह से नहीं पकड़ा जा सकता। आप कौन सी पोस्‍ट चर्चा के लिए चुनेंगे ये प्रक्रिया राग द्वेष से मुक्‍त नहीं है होना मुश्किल भी है पर सिद्धांतत: चर्चाकार मानते हैं कि चर्चाकार को अपने विवेक से यह तय करने का हक है इसलिए इन आपत्तियों को कभी तूल नहीं दिया जाता कि कौन सी पोस्‍टें चुनी गईं... इसी प्रकार चर्चाकार की दृष्टि भी स्‍वतंत्र है किंतु दूसरी ओर सरोकारों की एक स्‍वीकृत सामुदायिकता है। पिछले कुछ महीनों से मेरी, नीलिमा तथा सुजाता की   ब्‍लॉगिंग में सक्रियता कम हुई है पर कम से कम इतना प्रयास अवश्‍य करते हैं कि चर्चा अवश्‍य हो जाए भले ही संक्षिप्‍त रह जाए वैसे इसमें कितना योगदान हमारी प्रतिबद्धता है कितना अनूपजी के तकादों का, यह कहना कठिन है।

भविष्‍य की ओर घूरें तो मुझे लगता है कि जैसा कि इलाहाबाद में इरफान ने अपने परचे में कहा था...हम ब्‍लॉगर खुद ब्‍लॉगिंग पर लिखना बांचना पसंद करते हैं इससे तय है कि चर्चा की यात्रा अभी चलेगी...नए चर्चा मंच दिखाई दे रहे हैं...उनकी मौलिकता को लेकर कुछ संशय है पर ये संशय भी मिटेंगे...अपनी तो राय है मोर दि मेरियर।

Thursday, November 05, 2009

हिन्‍दी के हेड कविता क्‍यों नहीं लिखते ?

“हिन्‍दी के हेड हमेशा कवि-आलोचक होते हैं, एकाध तो उपन्‍यास लिखने की धमकी भी दे रहे हैं। ये लोग इसीलिए लेखक को नीची नजर से देखते हैं। साहित्‍य के औजार हैं इनके पास। जब जी चाहा, कुछ भी गढ़ लिया। ये लोग समझदार बहुत होते हैं , लेकिन स्‍याने ? किसने कहा था एजुकेशन कम्‍स बट विज़डम लिंगर्ज। “

- स्‍वदेश दीपक (मैंने मांडू नहीं देखा, पृ. 20)

स्‍वदेश दीपक के इस कथन के आलोक में अपने विश्‍वविद्यालय के पुराने, हाल फिल‍हाल और बेहाल नए-पुराने सब हेड (विभागाध्‍यक्ष...क्‍या भारी शब्द है न) को याद कर जाता हूँ... डा. नगेन्‍द्र, भारी भरकम आलोचक...गैर कवि..और शायद कवित्‍व विरोधी भी। head और फिर सर्वप्रोफेसर सुरेशचंद्र गुप्‍त, नित्‍यानंद तिवारी, बालीजी, महेन्‍द्र कुमार.... और प्रो. निर्मला जैन ( स्‍वदेश दीपक उनके लिए तो ये कथन लिखा ही है) ...और अब प्रो. पचौरी सब के सब एक के बाद एक आलोचक... कवि कोई नहीं। लिखे गए नामों के अलावा कई 'वगैरह' भी हैं जो हेडत्‍व को प्राप्‍त हुए हैं और वे 'वगैरह' इसलिए हैं कि वे कविता तो छोडो कुछ्छे नी लिखते। हमारे विश्‍वविद्यालय को छोडि़ए तमाम हिन्‍दी के हेड शायद इसी व्‍याधि से दर्ज हैं, मैं हैरान हूँ कि विश्‍वविद्यालयी हिन्‍दी की गत का इस तथ्‍य से कोई संबंध बनता है कि हिन्‍दी के हेड कविता नहीं लिखते ?

पुनश्‍च: मैं भी कविता लगभग नहीं ही लिखता :)

Sunday, October 25, 2009

इलाहाबाद...कुर्सियॉं औंधा दी गई हैं, पोडियम दबे पड़े हैं

ब्‍लॉगजगत में हलकान तत्‍व की प्रधानता व सजगता देख दिल बाग बाग हुआ जाता है। लोग हैदराबाद की उपेक्षा और वर्धा वालों की निमंत्रण सूची की अनुपयुक्‍तता से भी दुखी हैं... सजगता भली चीज है इसलिए इन आशंकाओं का स्‍वागत होना चाहिए। पर हम एक ब्‍लॉगर नजर से बात साफ कर देना चाहते हैं कि ब्‍लॉगिंग कोई कूढे का ढेर नहीं कि जिस पर खड़ा होकर कुक्‍कुट मसीहा होने की घोषणा कर सकें...चलिए एक ब्‍लॉगर नजर से बताते हैं कि क्‍यों विश्‍वविद्यालयी आयोजन उत्‍सव भले ही हों...भय खाने की चीज नहीं हैं- अनूपजी हमें यहीं छोड़कर कानपुर चले गए हैं हम भी गेस्‍टहाउस से उसी परिसर में आ गए हैं जहॉं कार्यक्रम था  ताजा हाल ये है कि

नामवरी कुर्सियॉं औंधा दी गई हैं, पोडियम दबे पड़े हैं

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आसनों की अट्टालिका कुछ कहती है क्‍या ?

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घोषणापत्रों की गत ये हो गई है

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अभी संजयजी ने बताया कि हम चौथा पॉंचवा खंबा हैं...

बाहर मीडिया से मिले तो बोल पड़े- यह पांचवा स्तंभ है. संभवत: नामवर सिंह भी मानते हैं कि चार स्तंभ कमजोर हुए हैं इसलिए नियति के कारीगर ने इस पांचवे स्तंभ को गढ़ने का काम शुरू कर दिया है.

गिनती आप खुद कर लें कि कौन सा है पर इतना तय है मीडिया एक खंबा तो है .. देख लें-

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बहुत से लोगों को आपत्ति है कि कुछ को फूल मिले कुछ को नहीं... तो जान लें कि हर गुलदस्‍ते की परिणति एक ही है -'कचरापेटी'

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तो तंबू बंबू उखड़ चुका है...लोगों से मिले उन्हें जाना.. मनीषा, आभा, प्रियंकर, अनूप, इरफान, भूपेन, रवि, अफलातून, बोधिसत्‍व, विनीत, अजीत,प्रवीण....और भी इतने लोग... किसी पर कोई प्राइस टैग नहीं था, कोई बिकाऊ नहीं था... सब जानते हैं मानते हैं कितनी ही संगोष्‍ठी हों... ब्‍लॉगिंग वो तो नूंहए चाल्‍लेगी :)

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Saturday, October 24, 2009

इलाहाबाद से गैर-रपटाना....एकदम ब्‍लागराना

इस रपट बहुल वातावरण में हम सरीखे हमारे सामने बहुतई दिक्‍कत है... जब त्‍वरित रिपोर्टिंगों के चलते एक दो तीन चार पॉंच छ: सात... रपटें आ चुकी हों तो हम का करें। बेचारे एक ही नामवर सिंह है गलत तथ्‍य भी एक ही दिया है अब इस पर कितनी बार लिखा जा सकता है.... अमृत उत्‍सव मना चुका व्‍यक्ति एकाध तथ्‍यात्‍मक भूल का हक तो रखता ही है। अपना संकट ये है कि अगर कुछ नहीं लिखा तो कई लोग जिनमें घर के अधिकार-प्राधिकार संपन्‍न लोग शामिल हैं मान बैठेंगे कि हम इहॉं बस मस्‍ती करने आए हैं... तो हमारी निम्‍न बातों पर जरा ध्‍यान दें कि हम मस्‍ती नहीं कर रहे हैं खूब काम कर रहे हैं....

सुबह सुबह खून के आसुओं कर पृष्‍ठभूमि में दो-ठो चाय पीना कम जोर काम नहीं है...

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दो क्‍यों ? अरे साहब हम दम ठोंक कर कहते हैं कि चाय के प्‍यालों का जितना पतन इस शहर में हुआ है उतना तो सांसदों की गरिमा तक का नहीं हुआ...

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हमने खूब अनुमान लगाए कि इस कप का आयतन क्‍या है पर कोई अनुमान तीस एमएल को छू नहीं पाया।

फिर भी चाय साधुवादी थी....क्यों ? इसलिए कि चायवाला साधु था-

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इतने काम को ही ही हम पर्याप्‍त मानते हैं पर यहॉं तो इलाहाबाद न जाने हमसे कितना काम करवा लेने पर उतारू था..मसलन ये कैथा का अनुभव करना..

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न जी इसे कम वीरता का काम न मानें..देखें ये प्रापर इलाहाबादी बालिका तक इस कैथे को चख कैसे उफ कर बैठी हैं-

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और जिन को अबहू लग रहा है कि हम कुछ नहीं कर रहे तो बताइए कि अगर ये जो नामवरजी लुड़कत्व को प्राप्‍त हुए हैं क्‍या इसमें हमारी कोनो भूमिका नही है...

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फिर शाम को अंडा भक्षण...

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सुबह पोहा पूजन

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रात को गपबाजी के चिरकुट सुख-

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इतने काम कर हम बहुत थक गए हैं अनूपजी सर पर सवार हैं चलो नाश्‍‍ता करना ही पडेगा...सुबह भी जलेबी 'खानी पडीं'।

चलते चलते आयोजकों की व्‍यवस्‍था के विषय में बता दें कि पूरा ध्‍यान रखा गया है यहॉं तक कि ब्‍लॉगर संप्रदाय की अनन्‍य आवश्‍यकता टंकी तक की व्‍यवस्‍था परिसर में है जो चाहे झट टंकी आरोहण कर ब्‍लॉगत्‍व को प्राप्‍त हो... हमारी शिकायत बस यही है कि आयोजकों ने ब्‍लॉगरों को शिकायत की गुंजाइश न देकर शिकायत-ब्‍लागिंग की सुविधा नहीं दी है

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एक और बात विनीत के आडियो रिकार्डर खो जाने की खबर से घर के लोग परेशान होंगे कि विनीत जैसा सुपर सतर्क बालक अगर गुमाने पर आतुर हो गए हैं तो हम जैसे गुमातुर व्‍यक्ति क्‍या होगा... तो आश्‍वस्‍त रहें अब तक केवल एक कंघी लापता है...उसकी भी तफ्तीश जारी है। हमारे कमरे के साथी अनूप शुक्‍ल हैं... ये केवल सूचना के लिए है पिछले वाक्‍य से इसका कोनो संबंध नहीं है।

Tuesday, September 29, 2009

ब्‍लॉगवाणी में चंद कोड्स से अधिक जो कुछ था हमारा था

अब घंटों बाद ये कोई खबर नहीं रह गई है कि ब्‍लॉगवाणी बंद हो गया है। क्रोध, आश्‍चर्य, पीड़ा और भी कई संज्ञाओं से उस भावना को व्‍यक्त करने की कोशिश कर सकता हूँ जो इस खबर को जानने के बाद उपजी हैं। ये सभी संज्ञाएं ठीक भी होंगी पर सच बताने को जी चाहता है और वह ये कि सबसे ज्‍यादा जिस भाव को महसूस किया वह है अपमान। मैथिलीजी व सिरिल से बहुत कुछ सीखा है तथा हम किताबी लोगों में उद्यमी लोगों के प्रति जो अवहेलना का भाव होता हे उससे खुद को जितना कुछ मुक्त कर सका हूँ उसमें इस गुप्‍तद्वय की विशेष भूमिका है। पर इस प्रकरण में ब्‍लॉगवाणी की हत्‍या कर दिए जाने ने मुझे आहत किया है शुद्ध व्‍यक्तिगत हानि। मैथिलीजी तथा सिरिल से संबंध बेहद अनौपचारिक हैं, इतने कि झट से फोन कर दो-चार हजार का उधार मॉंग लेने तक में कभी शर्मिंदगी महसूस नहीं हुई पर इस प्रकरण में इतना अपमानित महसूस कर रह हूँ कि हिम्‍मत नहीं हुई कि फोन या ईमेल कर कुछ कह सकूँ। लगता है एक झटके से उन्‍होंनें  कुछ कहने का अधिकार ही हमसे छीन लिया।

एकाध जगह जहॉं हमने टिप्‍पणी की वहॉं हमने कहा

''ये पूरा प्रकरण ही अत्‍यंत खेदजनक है। न केवल आरोप-प्रत्‍यारोप खेदजनक हैं वरन नीजर्क प्रतिक्रिया में ब्‍लॉगवाणी को बंद किया जाना भी। क्‍या कहें बेहद ठगा महसूस कर रहे हैं...अगर ब्‍लॉगवाणी केवल एक तकनीकी जुगाड़ भर था तो ठीक है जिसने उसे गढ़ा उसे हक है कि उसे मिटा दे पर अगर वह उससे कुछ अधिक था तो वह उन सभी शायद लाख से भी अधिक प्रविष्टियों की वजह से था जो इस निरंतर बहते प्रयास की बूंदें थीं तथा इतने सारे लोगों ने उसे रचा था.... हम इस एप्रोच पर अफसोस व्‍यक्त करते हैं। यदि कुछ लोगों की आपत्ति इतनी ढेर सी मौन संस्‍तुतियों से अधिक महत्‍व रखती है तो हम क्‍या कहें...'' 

जिन ब्‍लॉगरों की आपत्तियों के परिणामस्वरूप ये हुआ उनसे मुझे कुछ खास नहीं कहना, इसलिए भी नहीं कहना चाहता कयोंकि मुझे नहीं लगता उन्‍हें सीधे संबोधित करने का कोई अधिकार मुझे है, मैं ठीक से उन्‍हें जानता पहचानता भी नहीं। शेष कुछ लोगों को सहज ही नारद प्रकरण तथा धुरविरोधी की हत्‍या याद होगी।  काश धुरविरोधी आस पास होता तो वो देख सकता कि कैसे ब्‍लॉगवाणी प्रकरण में  एक हत्‍या को आत्‍म‍हत्‍या करार दिया जा रहा है। नारद में हमारा पैसा नहीं लगा था पर उसे उन लोगों द्वारा मिल्कियत समझने पर हम खुद को ठगा महसूस कर रहे थे जिनका साझे का ही सही पर पैसा व मेहनत इसमें लगी थी। पैसा अपना ब्‍लॉगवाणी में भी नहीं लगा था पर इसे भी हम अपना सा ही समझते थे...गलती हमारी ही थी...एक बार में नहीं सीखे तो धोखा तो होना ही था।

बहुत कुछ कहने की इच्छा नहीं पर दर्ज कर देना चाहते हैं कि भले ही विधिक या जिस भी नजरिए से कोई 'अपनी' साइट मिटा देने से आपको रोक नहीं सकता पर फिर से बेव 2.0 की प्रकृति पर विचार करें... इसमें लगे कोड भले ही आपने रचे हों पर ये कोड जिन शब्‍दों से मिलकर वास्तविक अर्थ गढ़ते हैं वे प्रयोक्ता रचित (यूजर जेनरेटिड) होते हैं अत: इन प्रयोक्ताओं को संभलने का कोई मौका दिए बिना उनके पैरों से कालीन से यह कहकर छीन लेना कि भई ये हमारा कालीन है, हमें न्‍यायपूर्ण नहीं जान पड़ता। 

बस और कुछ कहने को जी नहीं चाहता !!!

Thursday, September 17, 2009

अरे मेरा विश्‍वविद्यालय खो गया है

अभी कुछ नई जानकारी के लिए अपने विश्‍वविद्यालय की वेबसाइट पर झांका तो ये पाया

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मतलब विश्‍वविद्यालय की भारी भरकम साइट गायब है उसकी जगह एक नवेली हल्‍की फुल्‍की किसी एडवाइजरी समिति की साइट ने हथिया रखी है जिसका विश्‍वविद्यालय से कोई संबंध नहीं है।

वैसे लगता नहीं कि ये हेकिंग का मामला है क्‍योंकि जो साइट आ रही है वो भी एक सरकारी साइट है जिसका पता बाकायदा इलैक्‍ट्रानिक निकेतन का है। यानि ज्‍यादा संभावना ये है कि बाबूगिरी वाले तरीके से नई तकनीक से खेलने का परिणाम है। उम्‍मीद है हमारा खोया विश्‍वविद्यालय ज्‍ल्‍द ही मिल जाएगा। :))

Friday, August 21, 2009

चौं बई जन्‍मदिन तो ठीक, पर जे फोटो चौं चेंपी ए

ठेठ anoopफुरसतिया शैली में अनूप ने सूचना दी है कि वे एक पंचवर्षीय योजना पूरी कर चुके हैं। ये अलग बात है कि जो बात सीधे साधे तरीके से ठग्‍गू का एक लड्डू भेजकर कही जा सकती थी उसके लिए इन्‍होंने इस तस्‍वीर का सहारा लिया। और जब उन लोगों ने पूछा जो पूछ सकते थे (बकिया सब तो वरिष्‍ठ-उरिष्‍ठ, भीष्‍म पितामह वगैरह के चलते हे हे करके रह जाते हैं) - रचना ने सवाल पूछा. बाकी सब ठीक पर ये बताओं की तस्‍वीर और पोस्‍ट में संबंध क्‍या है तो लगे हे हे करने :))

रचनाजी, आपकी बधाई के लिये शुक्रिया। चित्र और पोस्ट का संबंध मैंने जानने की कोशिश नहीं की सिवाय इसके कि चित्र मुझे अच्छा लगा। 

पर जो जानते हैं सो जानते हैं, जैसे जीतू भाई-

अरे वाह! पाँच साल हो भी गए। तुम्हे तो पाठकों को वीरता पुरस्कार देना चाहिए, पाँच साल तक इत्ती लम्बी लम्बी पोस्टें झिलाते रहे। पाँच साल कम समय नही होता, बाकी सभी ब्लॉगवीर कट लिए तुम अभी तक डटे हुए हो, भीष्म पितामह की तरह। याद है पिछली बार भीष्म पितामह किसने कहा था?

पिछले पाँच सालों मे ना जाने कित्ती बार तुम लोगों की चिकाईबाजी करते रहे, सबसे मौज लेते रहे,हमारी खिंचाई करते रहे, सभी विवादों मे टाँग/पैर घुसाते रहे, रात को अमरीकन कुड़ियों से सीयूकूल बनकर बतियाते रहे, सबसे बड़ी बात हर दूसरी चैट विन्डो पर अपने ब्लॉग के लिंक ठेलते रहे। सचमुच काफी वीरता का काम है, कोई मल्टीपरपज बंदा ही इत्ते सारे काम एक साथ कर सकता है। खैर..अब पाँच पूरे हो ही गए है तो बधाई देना तो अपना भी फर्ज है, इसलिए बधाई को नत्थी किया जा रहा है, पावती भेजे।

लिखते रहो, लगातार…..हमे रहेगा इंतजार।

जीतू, ......अमेरिकन कुड़ियों का तो ये आलम है कि जिससे बात करो सब कहती हैं बात नहीं करेंगे -जीतेन्द्र भाई साहब ने रोका है। पता नहीं क्या लफ़ड़ा है तुम्हारा

मतलब ये हैं कि ये जो तस्वीर है न उसके पीछे कोई बात है जिसे कुछ 'पुराने' लोग जानते हैं, हम उनमें शामिल नहीं हैं क्योंकि जो नाम गिनाए हैं उनमें हम नहीं हैं, और हम इससे कतई नाराज नहीं हैं, भला पुराना होने में कौन खुशी की बात है- ठाठ तो नया होने और बने रहने में है।

खैर जो नाम अनूप ने गिनाए हैं वे हैं-

आज के दिन की याद रविरतलामी, देबाशीष, जीतेंद्र चौधरी, अतुल अरोरा,आलोक कुमार, पंकज नरुला, इन्द्र अवस्थी ,रमण कौल,ई-स्वामी, शैल, आशीष श्रीवास्तव , शशि सिंह, जगदीश भाटिया, सृजन शिल्पी , निठल्ले तरुण, श्रीष, बेंगाणी बन्धुओं, काकेश ,प्रियंकर, प्रत्यक्षा, रचना बजाज और बेजी के साथ तमाम ब्लागरों की पुरानी याद के साथ शुरू हुई!

हमारी इच्छा हुई कि ब्‍लॉग-पितामह के जन्‍मदिन के बहाने इनमें से कुछ के ब्‍लॉग झांक लिए जाएं-

रविजी को छोड़ देते हैं क्‍योंकि वे अभी तक नियमित ही हैं।

देवाशीष की ताजातरीन पोस्‍ट 2008 की वार्षिकी से संबंधित है। 

जीतू ने कल ही लिखा है पर दरअसल लिखा 2005 में था उसीका रीठेलन किया गया है।

आलोक अपनी छोटी लेकिन सार्थक बातें करते ही रहते हैं जैसे ब्‍लैकबेरी क्‍यों काला पत्‍थर है हाल में ही बताया उन्‍होंने।

लंबे गोते तो लगाते हैं अतुल अरोरा कम से कम साल भर का आराम करते हैं अगली पोस्‍ट के लिए। मुष्टिका भिड़त पर उनकी पोस्‍ट जून 2008 में आई थी।

गदाधारी विद्वान दोस्‍त सृजन शिल्‍पी ने जून में एक पुस्‍तक समीक्षा पेश की थी उम्‍मीद है फिर कुछ लिखेंगे।

ईस्‍वामी का टंडीरा प्रणय तो आपने पढ़ा ही होगा....न तो जरूर बांचें।

दिमागी हलचल पंकज भाई बोले तो मिर्ची सेठ में भी होती है उम्मीद है देखी होगी।

दूसरों का क्‍या कहें हम खुद ही रिटायर्ड हर्ट सा खेल रहे हैं, जोश सा आइए नही रहा है। वो तो भला हो कल अनूपजी का फोन आ गया जन्‍मदिन की बधाई मांगने के लिए :)) और  प्रमेंद्र की मेल कि कहॉं भाई जागो, इसलिए आज ये कीबोर्ड पीटा है। सो भी इसलिए कि अनूप ये न कहने लगें कि अब कोई हमसे मौज नहीं लेता।

Saturday, July 11, 2009

38 लाख हिन्‍दी पृष्‍ठ इंटरनेट पर

 

हाल में मेरे हाथ एक खजाना लगा है जिसे मैं आपसे साझा करना चाहता हूँ। चौदह हजार एक सौ बाइस पुस्‍तकों के अड़तीस लाख छत्‍तीस हजार पॉंच सौ बत्‍तीस पृष्‍ठ..... हिन्‍दी के पृष्‍ठ । बेशक ये एक खजाना है जो हम सभी को उपलब्‍ध है एकदम मुफ्त। बस क्लिक भर की दूरी पर। और ये किताबें सब कूड़ा नहीं है वरन खूब काम की दर्लभ किताबें तक इसमें शामिल हैं मसलन 1935 की श्री गणेश प्रसाद द्विवेदी की इस किताब को देखें-

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या चोखेरबालियों को उमंग से भर देने के लिए 1921 की इस किताब को देखें-image

पुरानी किताबों में से फिलहाल मुझे 'टू ईयर्स बिफोर द मास्‍ट' का हिंदी अनुवाद काफी रुचिकर लग रही है, पुस्‍तक 1840 की है पर अनुवाद कब का हे ये पता नहीं चल पा रहा

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केवल पुरानी ही नही नई पुस्‍तकें भी यहॉं उपलब्‍ध है मसलन हिन्‍दी में पहली कक्षा की गणित की इस पाठ्यपुस्‍तक को देखें

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ये सब ओर भी बहुत सी किताबें मुझे मिली हैं भारतीय डिजीटल पुस्‍तकालय पर। भारत तथा विदेश के बहुत से सहयोगियों के साथ चल रहे इस कार्यक्रम के विषय में आप इनकी वेबसाइट से जान ही सकते हैं। किताबें पूरी मूल रूप में उपलब्‍ध हैं तथा TIFF फार्मेट में हैं। आल्‍टरनेटिफ नाम का रीडर वहॉं डाउनलोड के लिए उपलष्‍ण है तथा एक्‍सप्‍लोरर में अच्‍छा काम करता है पर क्रोम पर नहीं चलता । फिर देर किस बात की है जाएं देखें हो सकता है जो किताब आप बरसो से खोज रहे थे पर मिल नही पा रही थी, हो सकता है यहॉं उपलब्‍ध हो फोकट में।

Sunday, June 14, 2009

थेकेडी के एक मसाला उद्यान की यात्रा

देश के तमाम राज्‍यों की तुलना में पर्यटन का जितना विकास केरल ने किया है उतना शायद किसी और राज्‍य ने नहीं। पर्यटन के इस विकास में उनकी रचनात्मकता की विशेष भूमिका है। मसलन बैकवाटर्स को ही लें...अस्‍सी के दशक तक इसे यातायात की बाधा के रूप में देखा जाता था लेकिन दो दशक में ये केरल के यूएसपी के रूप में उभरे हैं, हाउसबोट, आयुर्वेद, मार्शलआर्ट, कुच्‍चीपुड़ी कथकली और यहॉं तक कि मसाले। मसाले जो शुद्ध रूप से एक व्‍यावसायिक गतिविधि हैं को केरलवासियों ने एक पर्यटन गतिविधि बना दिया है। जगह जगह विशेष‍कर थेकेडी इलाके में मसालों के उद्यान लगाए गए हैं जिनका उद्देश्‍य मसाला उत्‍पादन कम है वरन नर्सरी के रूप में एक ही जगह अलग अलग मसालों के चंद पौधे उगाकर उन्‍हें पर्यटकों को दिखाकर उनके विषय में बताना तथा फिर मसाने बेचना, मूल उद्देश्‍य है।

पिछले दिनों हम केरल की यात्रा पर थे वहीं ऐसे ही एक उद्यान में हम गए...सौ रुपए प्रतिव्‍यक्ति की एंट्री फीस अधिक तो लगी (इसका अधिकांश हिस्‍सा उस ड्राइवर को चुपचाप दे दिया जाता हे जो पर्यटकों को ला ता है। नर्सरी मालिक की आमदनी उस बिक्री से होती है जो इन पर्यटकों को मसाले बेचने से होती है)। तो लीजिए आनंद कुछ ऐसे पौधों के चित्रों का जिनके उत्‍पादनों का आनंद तो हम अपने खाने में लेते हैं लेकिन इन पौधों तथा उस प्रक्रिया से अनजान थे जिनसे ये मसाले बनते हैं-

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मीठी शुरुआत- चॉकलेट के पौधे से, इस फल से एक कड़वा कसैला पदार्थ मिलता है जो प्रोसेसिंग के बाद मीठी चॉकलेट में बदल जाता है। ध्‍यान रहे कि केरल के इस हिस्‍से में शानदार घर की बनी चाकलेट खूब खाने को मिलती है।

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ये दुनियाभर में भारत की पहचान कालीमिर्च का पौधा है, दरअसल सही कथन होना चाहिए गोलमिर्च क्‍यों हमें बताया गया कि काली, हरी तथा सफेद गोलमिर्च इसी एक पेड़ से मिलती है...साल में अलग समय तोड़ने तथा प्रोसेसिंग की भिन्‍नता के कारण इनके रंग व तीखापन बदल जाता है।

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अन्‍नानास

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थेकेडी की विशेष पहचान यहॉं की इलायची

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ये बांस की तरह पतला लेकिन नारियल की तरह ऊंचा पेड़ सुपारी का है...अपना दिल तोIMG_3222 इस बात से ही दहल गया कि किसी के पान के स्‍वाद के लिए इस पेड़ पर बाकायदा चढ़कर सुपारी तोड़नी होती है।

तब कहीं जाकर ये फल प्राप्‍त होते हैं, जी हुजूर सुपारी का फल यही है...पान में डाली जाने वाली कठोर वस्‍तु इसी फल में छिपी है।

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ये वृक्ष मजेदार है इसके पत्‍ते ही तेजपात कहे जाते हैं...उससे भी मजेदार ये कि इसी वृक्ष के तने की छाल दालचीनी कहलाती है। जिसे तीन तीन साल की शिफ्ट में तने के आधी आधी ओर से छीला जाता है।

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मौसम न होने के कारण फल दिखाई नहीं दिए पर ये पौधा जायफल (Nutmeg)का है इसकी खसियत ये कि जब फूल होता हे तो वह जावित्री कहलाता है और फल हो, तो हो जाता है जायफल (हम मानते थे ये दो एकदम अलग चीजें हैं :))

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विशेष औषधीय लाल केले... केले की एकमात्र प्रजाति जिसमें फल ऊपर से नीचे के स्‍थान पर नीचे से ऊपर की ओर फलता है।

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इसे पर्यटन की समझ ही कहा जाएगा कि अधिकांश मसाला नर्सरियों ने ये समझते हुए कि ज्ञानवर्धक ओवरडोज बच्‍चों के लिए बोरिंग हो सकता है..उन्‍होंने एक बेहद ऊंचा ट्रीहाउस बना रखा हे जो बच्‍चों को बेहद पसंद आता है।