Friday, May 04, 2007

हसन जमाल प्रकरण और चौपटस्‍वामी का गिद्धदृष्टि संधान

चौपटस्‍वामी जी ने हसन जमाल प्रकरण पर अपने विचार रखें हैं हमने पढ़े। टिप्‍पणी लिखनी शुरू की तो कुछ ज्‍यादा लंबी हो गई फिर कुछ लिंकन प्रतिलिंकन कर पोस्‍ट बनाना उचित जान पड़ा, इससे जाहिर है एक किस्‍म की एकमुखता इसमें आ गई है उसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

हम चौपट स्‍वामीजी को कहीं गंभीरता से लेते रहे हैं। पर हसन जमाल प्रकरण में वे लिखे से ज्‍यादा पढ रहे हैं। मुझे रविजी (रतलामी) के लेख में, अपनी पोस्‍ट में और अन्‍य लोगों के हसनजी को संबोधित प्रतिक्रियाओं में उनकी व्‍यक्तिगत उपलब्धियों को कूड़ा कहती एक भी प्रतिक्रिया नहीं दिखी। उन्‍हें नोचने की कोशिश, उनपर गिद्धदृष्टि जैसी कोई बात भी कही नहीं है। इन पोस्‍टों की प्रतिक्रिया में जरूर एकाध मित्र ने उत्‍साह का आधिक्‍य दिखाया है जिसे आनुपातिक महत्‍व ही दिया जाना चाहिए।
चौपटस्‍वामी व्‍यक्तियों की निजी तफसीलों में इतने रमे है कि वे परिवारों को खोज रहे हैं, अकारण।
मेरी पोस्‍ट का सीधा सा उद्देश्‍य था जो व्‍यक्‍त था इस प्रकार-


'अब तक चिट्ठाकारी चंद सिरफिरों के खतूत भर थी इसलिए एम एस एम यानि मेन स्‍ट्रीम मीडिया या मुख्‍यधारा मीडिया उदासीन उपेक्षा से काम लेता था पर अब आवरण कथाएं आ रही हैं, इलेक्‍ट्रानिक मीडिया पर कवरेज हो रहा है, लेख भी छप रहे हैं। यानि सत्‍ता प्रतिष्‍ठानों के जड़ दरवाजों पर खटखटाहट अब शुरू हो गई है इसलिए इन दुर्गों के किलेदार हसन जमाल साहब जैसे ही तर्कों के हथियारों से हमला करने वाले हैं। कम से कम दो तर्क तो बार बार आने वाले हैं पहला ये कि इंटरनेट चंद खाते पीते लोगों की चीज है इसका हिंदी मुख्‍यधारा से कोई सरोकार नहीं और दूसरा यह कि यह हिंदी के बहुत छोटे समुदाय की नुमाईंदगी करता है ( यानि से विध्‍न संतोषी लोग हैं) इन्‍हें मत सुनो। ऐसा नहीं जबाव हें नहीं या दिए नहीं जा सकते पर बंधु लोगों संवाद उससे ही हो सकता है जो संवाद में यकीन करता हो। हम तो अपने बीच के अविनाशों से संवाद कायम कर पाने में असफल सिद्ध हुए.....

अर्थात इस प्रकरण को चिट्ठाकारी के लिए आत्‍मालोचन व वैध अवैध तर्कों के लिए तैयार होने की जरूरत को रेखांकित करने के लिए ही इस पोस्‍ट को लिखा गया था। और जैसा कहा गया कि भैया हमारी तो पहुँच उन तक नहीं है (बहुत पहूँचे हुए लोग है भई) पर उनकी पहूँच और प्रतिनिधि देखिए जरूर सब जगह हैं। कृपया उन्‍हें बताइए कि इसमें कोई हेठी की बात नहीं है, आइए हमें जानिए और शामिल होइए ठीक वैसे ही जैसे रविजी व्‍यंजल लिखने का प्रयास करते ही हैं।

बाकी हिंदी उर्दू मसले को संकेतित करना...जैसी हवा और पंगे इधर चिट्ठाजगत में चल रहे हैं, बहुत निर्दोष सी दिख रही चीज नहीं है। वैसे भी मजे की बात है जिन्‍हें चुन चुनकर आप गालिया रहे हैं वे ही वे लोग हैं जिन्‍होंने हसन साहब की चिट्ठाकारी से प्रमुख आपत्ति यानि प्रिंट के विरुद्ध होने वाली बात उसके निराकरण की कोशिश की। रविजी ने उत्‍तर प्रिंट में दिया, और मनीषा ने भी जैसा भी लिखा प्रिंट में लिखा, हमने भी लिखा। दरअसल लगता है चौपटस्‍वामीजी की मुख्‍य आपत्ति कूपमंडूकता शब्‍द से अधिक है....पर रुककर देखें जमाल साहब के तर्कों को, वे कहते हैं- जिसे हाथ से लिखने की या टाईप करने की आदत हो गई है वे हजार प्रलोभनों के बावजूद इंटरनेट के गुलाम नहीं बनेंगे....।
क्‍या कहेंगे इसे आप.. टाईपराईटर की ही तरह आप और हम कंप्‍यूटर पर टाईप करते हैं..इसमें क्‍या संघर्ष है। पर वे खोजकर मानेंगे। जो जी में आए करें हमें क्‍या।
असंतुलित विकास वाले पक्ष पर हम में से किसी ने नही लिखा, न उनके 'महान' व्‍यक्तित्‍व पर कीचड़ उछाली उनके परिवार को बीच में खींचा (कुछ लोगों को इसका विशेष शौक है) हमने केवल तात्‍कालिक उद्दीपक पर उनकी समझ पर प्रश्‍नचिह्न लगाया, जो जरूरी था। उनके तर्क फूहड़ थे, अब वे चौप्‍टस्‍वामी से अपने पुराने कर्मों के आधार पर वकालत करवा रहे हैं, हम फिर वही कह रहे हैं कि ऐसे ही और इससे भी अधिक टटकी तर्कपद्धति से लेकिन अधिक मजबूत किलेबंदी से सवाल उठाए जाएंगे...भाषा इससे भी ज्‍यादा अश्‍लील होगी।

1 comment:

Shrish said...

सहमत हूँ आपसे। भईया सब ने जमाल साहब की अंतर्जालीय कूपमंडूकता पर ही सवाल उठाया, उन पर अन्य कोई आक्षेप किसने लगाया, उनकी बाकी विद्वता पर किसने शक किया। लेकिन हम अब भी कहेंगे कि जमाल साहब को इंटरनैट की आलोचना करने से पहले कम से कम ये बला क्या है इसकी जानकारी ले लेनी चाहिए।