Monday, November 05, 2007

ब्‍लॉगविरोधी/ब्‍लॉगफोबिक कुछ भले तर्क: एक टैग हम-आप पर

 

पहले हसन जमाल ने ये तर्क या इन तर्कों के भाई बहन प्रस्‍तुत किए थे, ज्ञानोदय में, मसला कुछ कड़वा चला गया था। इधर जब आप किसी लोकतांत्रिक स्‍पेस में रहते हैं तो मुद्दे घूम फिरकर वापस आते रहते हैं। आज यही हुआ हमारे दो विद्वान मित्र दो मग कॉफी और यही कुछ आधा दर्जन तर्कों के साथ हमें हिन्‍दी बलॉग जगत का प्रतिनिधि मानकर (न न हमें ऐसी कोई गलत फहमी नहीं है पर वे भी क्‍या करें शायद हमारे मुँह से इस मीडिया रूप के बारे में कुछ ज्‍यादा सुनते हैं) आ बहसियाए। एक भले वातावरण में हुई ठीक ठाक बहस, पर तर्कों में कोई रियायत नहीं न उधर से इधर से। उनके तर्क हमारे जिस जुमले से भड़के  वह यह था कि हमने उनके ब्‍लॉग मीडिया को खारिज किए जाने के उपक्रम को ब्‍ला‍गोफोबिया करार दिया और उन्‍होंने फिर तो तर्क दिए ही, हमने भी जबाव दिए पर हमारे जबाव क्‍या रहे होंगे आप अनुमान लगा सकते हैं। मित्रों के तर्क हमारी भाषा में ये थे-

  1. वही हसन जमाली राग कि ब्‍लॉग हिन्दी की दुनिया की नहीं खाए पीए अघाए लोगों का शगल है। तकनीक स्‍वयं वर्गीय मार्कर है, कंप्‍यूटर की कीमत, जटिलता का मतलब ही है कि ये हिन्‍दी जमात की चीज नहीं है (गनीमत है एक मित्र की राय को दूसरे मित्र ने ही नहीं स्‍वीकारा वैसे ये उनका सबसे मजबूत तर्क था भी नहीं)
  2. ब्‍लॉग भले ही संपादन, प्रकाशन की सीमाओं का अतिक्रमण करता है इसलिए अनसुनी आवाजों को स्‍पेस देता है पर ये मुख्‍यधारा मीडिया की तुलना में जनमत निर्माण की कोई क्षमता नहीं रखता (केवल कम संख्‍या की वजह से नहीं वरन इसलिए कि इसकी प्रकृति में ये निहित है कि समूह को इससे संबोधित नहीं किया जा सकता)
  3. हिन्‍दी के मुख्‍यधाराई संघर्षों से पलायन कर रहे, या हिन्‍दी के मुख्‍यधाराई स्पेस से खदेड़े गए लोगों की शरणस्‍थली बन चुका है ब्‍लॉगोस्‍पेस। (उनका कहना था कि घरेलू महिलाएं, मैकेनिक, तकनीकी लोग आदि आदि ब्‍लॉग में आए ये तो ठीक- बेआवाजों को आवाज मिली पर ठेठ हिन्‍दी वाले जिनके पास बसने पसरने का स्‍पेस था वे क्‍यों भागकर, ब्‍लॉग के गैर पेशेवरों के ऑंचल में छिपते हैं)
  4. ब्‍लॉग वैयक्तिक दिक्‍कतों की चोट को निकाल बाहर करने का सेफ्टी वाल्‍व भर है ताकि सब जुटकर कोई बड़ी सामुदायिक पहल न बन सके।
  5. संपादन व अन्‍य क्‍वालिटी चैक न होना ब्‍लॉग की सामग्री को कम विश्‍वसनीय बनाते हैं- ये लेखक की एकाउंटेबिलिटी का अंत है। (मैं जो मानता हूँ लिखूंगा, उसके प्रति खुद भी जबाबदेह नहीं)
  6. लेखकीय तेवर में ब्‍लॉग अक्‍खड़ व गरूर भरा लेखन है तिसपर ये भी कि इस गरूर व अक्‍खड़ता का कोई ऐसा गुणात्‍मक आधार भी नहीं कि इसे सहा जाए ( एक तो कोई तोप विचार या लेखन नहीं उस पर अकड़ ऐसी कि महान क्रांतिकारी लेखन कर रहे हैं)

इन तर्कों पर हमारा नजरिया क्‍या है वह पहले कई बार कह चुके हैं चर्चा में दोहरा भी दिया। पर इतना तय है कि एक तो ये सवाल इसलिए खड़े होते हैं कि ब्‍लॉग मीडिया की प्रकृति समझने में कई लोग असमर्थ रहते हैं। इसीलिए ये जरूरी हो जाता है कि प्रिंट आदि में और अधिक लिखा जाए। हम तो कह आए कि इनके जवाब ब्‍लॉग मित्र खुद ही दे देंगे पर आपको अपना फोबिया छोड़कर कंप्‍यूटर तक आकर देखना पड़ेगा। तो हम आप सब टैगित हैं। इसे टैग मानें और बताएं कि ऊपर के तर्क क्‍यों सही नहीं हैं?

3 comments:

अतुल said...

भाई सोचकर बताता हूं

अतुल

बाल किशन said...

भाई हम तो ब्लोग्गिंग को एक क्लब टाईप की चीज समझ कर आए थे कि कुछ दोस्तों की सुन लिए और कुछ दोस्तों को सुना दिए. अपना भी मन हल्का और सामने वाले का भी. कभी कभी प्रशंसा के बदले गाली भी मिल जाए तो कोई बात नही.और ज्ञान वर्धन हो सो अलग. आख़िर इतने सारे लोग मिलकर ग़लत तो नही कर रहे.

अनिल रघुराज said...

तर्कों में दम तो जरूर हैं, लेकिन ये पूरी तरह यथास्थितिवाद के पोषक हैं। हां, लबादा जनप्रतिबद्धता का ओढ़ रखा है। दिक्कत ये है कि इन तर्कों को पेश करनेवाले लोग इतने फंडामेंटलिस्ट होते हैं कि अपने सामने किसी का तर्क नहीं सुनते। इसलिए मैं तो यही कहूंगा कि इनका जवाब देने के बजाय हम लिखते रहें। समाज ने हमको उठाकर फेंका है ताकि हम लिखने को मजबूर हो जाएं तो समाज पर इसका असर भी ज़रूर होगा।