Thursday, March 13, 2008

पाशविक कबीलाई नंगई के खिलाफ मेरे क्रोध को दर्ज मानें

ऐसा कुछ भी तो खास नहीं हुआ, ढंग की पूरी खबर भर के भी लायक नहीं। हमारे कुछ विद्यार्थी भोपाल के कुछ संस्‍थानों से शिक्षा के नवाचारी प्रयोगों का अध्‍ययन कर लौट रहे थे। हरियाणा में पलवल के निकट उनके आरक्षित कोच में घुसकर कुछ स्‍थानीय वीरों ने समूह की छात्राओं के साथ बदतमीजी की स्वाभाविक सी कोशिश की। सत्‍तर छात्र व सात अध्‍यापकों व कर्मचारियों  को इसका कीमत चुकानी पड़ी। ट्रेन के इस डब्‍बे का बाकी ट्रेन से काट दिया गया, छात्रों को मारा पीटा गया, छात्राओं के साथ बदतमीजी के प्रयास हुए। फिर कोच में केरोसीन आदि फेंककर आग लगाले की कोशिश। सात विद्यार्थी घायल हुए एक छात्र दिवाकर अभी तक एम्‍स में है जिसकी ऑंखों को शायद बचाया नहीं जा सकेगा।

मेरे पास भी खूब बौद्धिक विश्‍लेषण के औजार हैं।  भीड़तंत्र के बलवrageती होते जाने पर बात कर सकता हूँ। यह भी याद दिला सकता हूँ कि अब मुंबई वाली ही हरकतें यानि पाशविकता का सामुदायिक व्‍यवहार बन जाना, आम हो गया है..वगैरह वगैरह। चोखेरबाली दृष्टि से देखकर भी व्‍याख्‍या की जा सकती है। पर नहीं मैं केवल क्षुब्‍ध हूँ, आक्रोश में हूँ- रोने या चीखने भर से ही अपने भाव व्‍यक्‍त करना चाहता हूँ। सीआईई (केंद्रीय शिक्षा संस्‍थान), दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय जहॉं के छात्र व अध्‍यापकों के साथ ये हादसा हुआ, मेरा अपना संस्‍थान ही है और इस समय मेरी प्रतिक्रिया परिवार में किसी के साथ हुए हादसे पर प्रतिक्रिया जैसी ही है, एकदम असंतुलित- ये सत्‍तर बच्‍चे अपने साथ कुछ हथियार लेकर क्‍यों नहीं गए। जब उनके साथ ये हो रहा तो पुलिस ने मौजूद होते हुए भी गोली क्‍यों नहीं चलाई वगैरह।

हॉं ये बचकाना क्रोध है, पर जब सब प्रेम, मखौल, स्‍नेह, याद सबको ब्‍लॉगित करते हैं तो मैं अगर आक्रोश, क्रोध में हूँ तो उसे कहने कहीं और क्‍यों जाउं। यहीं दर्ज करूंगा।

13 comments:

Anonymous said...

किसी समय में माना जाता था कि जहां समूह है, वहां पाशविकता पनप नहीं पायेगी, क्योंकि ज्यादातर लोग अच्छे होते हैं. लेकिन अब समीकरण बदल चुके लगते हैं. जहां समूह है, आदमी और भी गंदे काम करेगा.

लगता है समूह में पाशविक प्रकृति के लोग ज़्यादा होते हैं.

Tarun said...

जंगली हैं सब लोग, कानून की तो जिस तरह से धज्जियाँ इंडिया में उड़ती है उस पर तो रिसर्च होनी चाहिये। अरे शायद पशु इस तरह के समूहों से ज्यादा सभ्य होंगे। इन्हें पाशविक कहना निरीह पशुओं को गाली देने जैसा ही है।

Udan Tashtari said...

मेरा क्रोध भी दर्ज करें इस पाशविक दुर्घटना पर.

Pramod Singh said...

क्‍या कहा जाये..!

swapandarshi said...

meraa virodh bhee darz kare.
I am very shocked to hear this and angry

उन्मुक्त said...

क्रोध आक्रोश तो होता है। क्या कोई सुजाव देगा कि हम क्या और कर सकते हैं।

संजय तिवारी said...

नीचता की हद है.

रचना said...

mae bhi aap kae krodh mae sahbhagii hun . unmukt jee kae prash ka utr haen kii agar kisi kae paas bhi koi tasveer ho unkii jo is kand mae involve they usae ham sab ko apni bllog patti per kale rang kae saath aur is link kae saath daalna hoga takki ham virodh darj karsake aur unko bae nakab bhi kar sakae
masjivi ji chitr uplabdh karaa de koi daale ya naa dale mae avshya dal kar rakhna chaugee

Arun Aditya said...

शुक्र है की एक और गोधरा कांड होते-होते बच गया। और हाँ ये पाशविक हरकत करने वाले किसी खास संप्रदाय के नहीं थे। हैवानियत मुर्दाबाद, इंसानियत जिन्दाबाद।

अरुण said...

शायद यही उनके लिये स्वतंत्रता का मतलब है.नीचता और पाशविकता शायद दूसरो को देख कर ही जागती है,खुद के परिवार को आदमी इस से अलग ही रखता है ,और साथ मे इसे अपनी अभिवयक्ती की स्वतंत्रता बताता है चाहे यहा ब्लोग की दुनिया हो या पलवल की ,बस अपनी भडास निकलनी चाहिये ..

Mired Mirage said...

पाशविकता कह कर पशुओं का अनादर नहीं करूँगी । यह कोई छोटी मोटी बात नहीं है । वह एक्सप्रैस ट्रेन पेसेन्जर में क्यों परिवर्तित कर दी गई ? रे. पुलिस ने अपना काम नहीं किया । उनके विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिये । वे अपना काम क्यों नहीं कर पाए या क्यों नहीं करना चाहते थे, यह भी पता लगाना चाहिये । यदि आवश्यकता हो तो पुलिस को हथियारों से लैस करना चाहिये । क्या इतनी अराजकता इसलिए हो रही है कि पुलिस जिसे रक्षा का काम सौंपा गया है स्वयं बेहद दयनीय स्थिति में है ? उनका वेतन इतना कम है कि ईमानदारी से अपना जीवन यापन करना उनके लिए असंभव है । फिर समाज में भी उनका कोई आदर नहीं है ।
कारण जो भी हों उसकी कीमत हमारे बच्चों से नहीं वसूली जा सकती । यदि इतनी बड़ी संख्या में यात्रा करते हुए युवा सुरक्षित नहीं हैं तो अकेली यात्रा करती कोई युवती कैसे सुरक्षित रहेगी ? हम अपने युवाओं पर आरोप लगाते हैं कि अत्याचार होता रहता है और वे आँखें मूँदे रहते हैं । यहाँ जब युवकों ने अपनी सहपाठिनों के पक्ष में बोलना चाहा तो उनकी यह दुर्गति हुई । अब हम कैसे आशा कर सकते हैं कि वे सड़क पर चलती युवती को बचाने की कभी कोशिश भी करेंगे ?
एक बात और, जो लोग भारतीय सभ्यता या भारतीय गाँवों, कस्बों की संस्कृति की दुहाई देते हैं और विदेशी मानसिकता वाले महानगरीय आभिजात्य वर्ग की कुसंस्कृति की बुराई करते नहीं थकते वे भी अपनी इस तथाकथित संस्कृति पर गौर फरमाएँ ।
घुघूती बासूती

Sanjeet Tripathi said...

क्या किया जाए यह सोचना जरुरी है, हम आखिर क्या बनते जा रहे हैं

काकेश said...

क्रोध है पर घुघुती जी की तरह मैं पशुओं का अनादर नहीं करुंगा.कुछ दिनों में पशु यह जरूर कहेंगे यह इंसानियत है.