पहली खेप की तस्वीरें अभी हाजिर हुई। यह एक विषादजनक स्थिति है कि जौनसार के कई पहाड़ धूसरित व नग्न दिखाई देते हैं। जबकि कई दूसरे शिखर हरे भरे व मोहक हैं मसलन यह देववन शिखर के रास्ते में हरियाली और मुकेश के पोज देनेभर की तो बर्फ भी थी
Thursday, February 01, 2007
Wednesday, January 31, 2007
मेरा सिर चकराता है........
गणतंत्र दिवस की कृपा से सप्ताहांत विस्तारित था और शिक्षक संघ की हड़ताल से और भी ‘सुविधा’ हुई। यानि अवसर था और इच्छा भी, कोई अनदेखा पहाड़ी इलाका महसूस किया जाए। इंटरनेट पर खोजबीन की तय किया – चकराता। पहली वजह तो यह भी कि बहुत कम लोगों ने इसके बारे में लिखा था लेकिन जो थोड़ा बहुत उपलब्ध था उससे काफी उम्मीदें बँधती थीं। पास में मुंडाली में स्कीइंग स्तर की वर्फ मिलने की आशा थी। वैसे जब हिंदी में चकराता लिख गूगल सर्च मारा तो उसने कीबर्ड को जिस वाक्य में पकड़ा वह था..... ‘मेरा सिर चकराता है’
खैर बोरिया बिस्तर बॉंधा, बाल गोपाल समेटे और हो लिए रवाना। और यहॉं हुई गलतियॉं दर गलतियॉं- चलो सूची बनाऍं
1. रास्ते के बारे में योजना कच्ची थी, सिर्फ सड़क होने भर से काम नहीं चलता उसकी गुधवत्ता भी जॉंच लेनी चाहिए खासतौर पर तब जब आपने जिद पाली हुई हो कि आपकी 1997 की मारूति 800 अभी बूढ़ी नहीं हुई है।
2. बिना होटल रिजर्वेशन के घर से निकलने के दुस्साहस के पिछले अनुभव यदि अच्छे रहे हों तो इसका मतलब यह नहीं के अबकि बार भी ढंग का आसरा मिल जाएगा बल्कि प्रोबेबिलिटि का नियम कहता है कि बुरे अनुभव के संभावना अधिक हो गई है।
3. कच्ची तैयारी, सीमित संसाधन, कमजोर कार, अनजान बुरा रास्ता, बच्चे साथ में कुल मिलाकर जोखिम इतना है कि सब ठीक रहे तो हैरानी होनी चाहिए......हैरान होने का मौका नहीं मिला।
तो साहब अपनी अक्खड़ता में हमने ना यमुनानगर का रास्ता चुना ना देहरादून का वरन ‘सबसे छोटे’ बागपत-बड़ौत-सहारनपुर-कालसी के रास्ते को चुना और जाहिर है पछताए। जल में कुंभ, कुंभ में जल की तर्ज पर सड़क पर खेत खेत पर सड़क थी। जैसे तैसे सुबह छ: दिल्ली से चलकर पॉंच बजे शाम कालसी पहुँचे यानि चकराता की चढ़ाई रात में करनी पड़ी सॉस अटकी रही। पहुँचकर और निराश होना पड़ाक्योंकि बर्फ का नामों निशां ना था, खाना बस ‘ऐसा ही’ था खैर अगले दिन देववन चोटी और टाईगर झरने का आनंद और थकान समेटी और वापसी के लिए रास्ते बदलने का निर्णय लिया और तय पाया कि चकराता-नागथाल-मसूरी होकर दिल्ली जाऍं लेकिन जैसा कहा गया है कि टू रांग्स डोंट मेक ए राईट इस रास्ते में थोड़ा हिस्सा तो सुंदर था पर बाकी में हमने अब तक के कुछ सबसे उजाड़ पहाड़ों का अनुभव लिया। मसूरी पहुँचने तक इतना थक चुके थे कि क्या कहें और अभी वापसी बाकी थी। घबराइए नहीं भले ही हम रात 11.30 बजे खतौली पहुँचे पर वहॉं के सार्वकालिक ट्रैफिक जाम ने बख्शा नहीं देर रात या कहें अल्ल सुबह घर पहुँचे। इति श्री चकराता कथा। बाकी मँगनी के कैमरे की तस्वीरें उपलब्ध होते ही साझा की जाऍंगी।
खैर बोरिया बिस्तर बॉंधा, बाल गोपाल समेटे और हो लिए रवाना। और यहॉं हुई गलतियॉं दर गलतियॉं- चलो सूची बनाऍं
1. रास्ते के बारे में योजना कच्ची थी, सिर्फ सड़क होने भर से काम नहीं चलता उसकी गुधवत्ता भी जॉंच लेनी चाहिए खासतौर पर तब जब आपने जिद पाली हुई हो कि आपकी 1997 की मारूति 800 अभी बूढ़ी नहीं हुई है।
2. बिना होटल रिजर्वेशन के घर से निकलने के दुस्साहस के पिछले अनुभव यदि अच्छे रहे हों तो इसका मतलब यह नहीं के अबकि बार भी ढंग का आसरा मिल जाएगा बल्कि प्रोबेबिलिटि का नियम कहता है कि बुरे अनुभव के संभावना अधिक हो गई है।
3. कच्ची तैयारी, सीमित संसाधन, कमजोर कार, अनजान बुरा रास्ता, बच्चे साथ में कुल मिलाकर जोखिम इतना है कि सब ठीक रहे तो हैरानी होनी चाहिए......हैरान होने का मौका नहीं मिला।
तो साहब अपनी अक्खड़ता में हमने ना यमुनानगर का रास्ता चुना ना देहरादून का वरन ‘सबसे छोटे’ बागपत-बड़ौत-सहारनपुर-कालसी के रास्ते को चुना और जाहिर है पछताए। जल में कुंभ, कुंभ में जल की तर्ज पर सड़क पर खेत खेत पर सड़क थी। जैसे तैसे सुबह छ: दिल्ली से चलकर पॉंच बजे शाम कालसी पहुँचे यानि चकराता की चढ़ाई रात में करनी पड़ी सॉस अटकी रही। पहुँचकर और निराश होना पड़ाक्योंकि बर्फ का नामों निशां ना था, खाना बस ‘ऐसा ही’ था खैर अगले दिन देववन चोटी और टाईगर झरने का आनंद और थकान समेटी और वापसी के लिए रास्ते बदलने का निर्णय लिया और तय पाया कि चकराता-नागथाल-मसूरी होकर दिल्ली जाऍं लेकिन जैसा कहा गया है कि टू रांग्स डोंट मेक ए राईट इस रास्ते में थोड़ा हिस्सा तो सुंदर था पर बाकी में हमने अब तक के कुछ सबसे उजाड़ पहाड़ों का अनुभव लिया। मसूरी पहुँचने तक इतना थक चुके थे कि क्या कहें और अभी वापसी बाकी थी। घबराइए नहीं भले ही हम रात 11.30 बजे खतौली पहुँचे पर वहॉं के सार्वकालिक ट्रैफिक जाम ने बख्शा नहीं देर रात या कहें अल्ल सुबह घर पहुँचे। इति श्री चकराता कथा। बाकी मँगनी के कैमरे की तस्वीरें उपलब्ध होते ही साझा की जाऍंगी।
Wednesday, December 13, 2006
2006 :पढ़े-लिखे का लेखा-जोखा
2006 बस फिसल सा ही गया है। प्रत्यक्षा ने एक चिथड़ा सुख का जिक्र किया तो इच्छा हुई कि जरा मुड़. के देखा जाए कि साल भर में की हमारी कमाई क्या रही। यानि इस साल कौन-2 सी किताबें पढ.ने का अवसर मिला, मतलब उन पाठ्यपुस्तकों के अलावा जो पढ़ाने भर के लिए पढ़ना जरूरी था। अपने कारण हैं मेरे पास (शायद बहाने कहना चाहिए) पर ये सूची बहुत लम्बी नहीं है। जो पुस्तकें बिल्कुल पहली बार पढ़ीं वे रहीं-
संवत्सर : ये अज्ञेय का कम प्रसिद्ध विचार गद्य है। समय (कहना चाहिए काल) पर सूक्ष्म दार्शनिक चिंतन है। दिक् व काल मेरी रुचि का क्षेत्र है इसलिए इस अपेक्षाकृत दुर्लभ रचना को पढ़ना आनंददायी घटना थी।
अंतिम अरण्य : निर्मल का उपन्यास।
मेरा नन्हा भारत : मनोज दास की रचना My little India का नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित अनुवाद एक दार्शनिक जब भ्रमण पर निकले तो ये अनुभव पर्यटन से कहीं भिन्न होता है और नितांत निजी नहीं वरन् जातीय होता है।
The City of Djinns : William Dellrymple दिल्ली का संस्मरणात्मक इतिहास
गदर 1857 (ऑंखों देखा हाल) : मोइनुद्दीन हसन। मोइनुदीन हसन कोई इतिहासकार नहीं ये महाशय तो इस संग्राम के दौरान दिल्ली के एक थानेदार थे और जाहिर है विद्रोह के केंद्र में थे। संयोग रहा कि the city of.. तथा इस पुस्तक को मैने क्रम से पढ़ा क्योंकि ये एक दूसरे के रिक्त स्थानों को भरती हुई पुस्तकें हैं।
मई अड़सठ, पेरिस : लाल बहादुर वर्मा का सद्य प्रकाशित उपन्यास।
The Road Less Travelled :Scot M Peck बेस्टसेलर प्रजाति की रचना
पीली छतरी वाली लड़की (उदय प्रकाश) - 'अमॉं हिंदी की खाते हो और अभी तक ये भी नहीं पढ़ा....' के आरोप से मुक्ति के लिए पढ़ी और कोई अफसोस नहीं हुआ।
त्रिशंकु : मन्नू भंडारी की कहानियॉं
दो पंक्तियों के बीच (राजेश जोशी) पूरे साल में पूरा कविता संग्रह बस यही पढ़ा है। हॉं छुटपुट कविताऍं जरूर पढ़ने का अवसर मिला।
साहित्य और स्वतंत्रता : प्रश्न प्रतिप्रश्न (देवेंद्र इस्सर) अच्छी साहित्यालोचना
कुछ किताबें पढ़ाने के लिए या अन्य कारणों से फिर से पढ़ीं मसलन चीड़ों पर चॉंदनी, नई सदी और साहित्य, कर्मभूमि, सूरज का सातवॉं घोड़ा, शब्द और स्मृति।
इच्छा है कि पढ़ी पुस्तकों पर कुछ विस्तार से लिखूँ पर पता नहीं हो पाता है कि नहीं पर......
संवत्सर : ये अज्ञेय का कम प्रसिद्ध विचार गद्य है। समय (कहना चाहिए काल) पर सूक्ष्म दार्शनिक चिंतन है। दिक् व काल मेरी रुचि का क्षेत्र है इसलिए इस अपेक्षाकृत दुर्लभ रचना को पढ़ना आनंददायी घटना थी।
अंतिम अरण्य : निर्मल का उपन्यास।
मेरा नन्हा भारत : मनोज दास की रचना My little India का नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित अनुवाद एक दार्शनिक जब भ्रमण पर निकले तो ये अनुभव पर्यटन से कहीं भिन्न होता है और नितांत निजी नहीं वरन् जातीय होता है।
The City of Djinns : William Dellrymple दिल्ली का संस्मरणात्मक इतिहास
गदर 1857 (ऑंखों देखा हाल) : मोइनुद्दीन हसन। मोइनुदीन हसन कोई इतिहासकार नहीं ये महाशय तो इस संग्राम के दौरान दिल्ली के एक थानेदार थे और जाहिर है विद्रोह के केंद्र में थे। संयोग रहा कि the city of.. तथा इस पुस्तक को मैने क्रम से पढ़ा क्योंकि ये एक दूसरे के रिक्त स्थानों को भरती हुई पुस्तकें हैं।
मई अड़सठ, पेरिस : लाल बहादुर वर्मा का सद्य प्रकाशित उपन्यास।
The Road Less Travelled :Scot M Peck बेस्टसेलर प्रजाति की रचना
पीली छतरी वाली लड़की (उदय प्रकाश) - 'अमॉं हिंदी की खाते हो और अभी तक ये भी नहीं पढ़ा....' के आरोप से मुक्ति के लिए पढ़ी और कोई अफसोस नहीं हुआ।
त्रिशंकु : मन्नू भंडारी की कहानियॉं
दो पंक्तियों के बीच (राजेश जोशी) पूरे साल में पूरा कविता संग्रह बस यही पढ़ा है। हॉं छुटपुट कविताऍं जरूर पढ़ने का अवसर मिला।
साहित्य और स्वतंत्रता : प्रश्न प्रतिप्रश्न (देवेंद्र इस्सर) अच्छी साहित्यालोचना
कुछ किताबें पढ़ाने के लिए या अन्य कारणों से फिर से पढ़ीं मसलन चीड़ों पर चॉंदनी, नई सदी और साहित्य, कर्मभूमि, सूरज का सातवॉं घोड़ा, शब्द और स्मृति।
इच्छा है कि पढ़ी पुस्तकों पर कुछ विस्तार से लिखूँ पर पता नहीं हो पाता है कि नहीं पर......
Monday, October 23, 2006
जिन्नात का शहर - दिल्ली
विलियम डेलरिम्पल की दिल्ली पर संस्मरणात्मक पुस्तक "City of Djinns- A year in delhi" जो मेरी नजर में इतिहास की एक वाकई प्रामाणिक पुस्तक है को हाल ही में समाप्त किया है। अपने शहर पर किसी 'अन्य' की प्रतिक्रिया की मुझे बहुत अहम जान पड्ती है। इस पर लाल्टू से पहले भी एक बार ब्लॉगिया विमर्श हो चुका है। दिल्ली से यह जुड़ाव प्रत्यक्षानुमा सुखद स्मृतिपुंज भर नहीं है छलली की मेरी स्मृति में (और वर्तमान में भी) बदबूदार बस्तियॉं, गरीबी, असुविधाएं, कंक्रीट सभी है पर हाँ इस शहर से लगाव है अब यह लगाव और यह शहर एक अकादमिक दायित्व भी बन गया है और ज़ाहिर है मैं इस बात से खुश हूँ।
Thursday, September 07, 2006
अन्या से अनन्या
प्रभा खेतान की आत्मकथा के अंश हमारे युग के खलनायक (बकौल साधना अग्रवाल) राजेंद्र यादव की हँस में नियमित प्रकाशित हुए हैं और हिंदी समाज में लगातार उथल पुथल पैदा कर रहे हैं। अब एक सुस्थापित सुसंपन्न लेखिका साफ साफ बताए कि वह एक रखैल है और क्यों है तो द्विवेदी युगीन चेतना वालों के लिए अपच होना स्वाभाविक है। जी प्रभा रखैल हैं किसी पद्मश्री ऑंखों के डाक्टर की (अपनी कतई इच्छा नहीं कि जानें कि ये डाक्टर कौन हैं भला) और यह घोषणा आत्मकभा में है किसी कहानी में नहीं। अपनी टिप्पणी क्या हो ? अभी तो कह सकता हूँ कि - >
मेरे हृदय में
प्रसन्न चित्त एक मूर्ख बैठा है
जो मत्त हुआ जाता है
कि
जगत स्वायत्त हुआ जाता है (मुक्तिबोध)
मेरे हृदय में
प्रसन्न चित्त एक मूर्ख बैठा है
जो मत्त हुआ जाता है
कि
जगत स्वायत्त हुआ जाता है (मुक्तिबोध)
Sunday, September 03, 2006
गोदना, बीयर और मुर्ग-मक्खनी: बोल मेरी हिंदी कितना पानी
हॉं मैं शामिल था और निरंतर केंद्र से परिधि की ओर आ-जा रहा था। जी, जनाब दिल्ली ब्लॉगिया पंचैट हुई, बाकायदा हुई और अच्छी हुई। दरबान के 'यस सर' में 'यस' की आपत्तिजनक दीर्घता 'सर' की विनम्रता से कहीं अधिक हावी थी। या शायद वह वैसे ही थी मैनें ही ज्यादा पढ़ा। खैर कालक्रम से मैं चौथा ब्लॉगर था। (सु)रुचिपूर्ण तैयार होकर आई तीन महिला ब्लॉगरों के बाद पहुँचा मैं बेतरतीब पुरुष (खासतौर पर ब्लो और
स्काउट को यौवनोचित निराशा हुई होगी ......... अब क्या करें हम तो ऐसे ही हैं)
एक एक कर
भी पहुँचे और पंचैट बाकायदा शुरु हुई। कुल हाजिरी नौ, लिंग अनुपात छ: पर तीन का था, गोदना (यानि टैटू) अनुपात भी छ: पर तीन का। मेजबानी व्यवस्था रही रिवर और
स्काउट की
ब्लॉगर समुदाय की खास बात रुचिगत वैविध्य है। इस नौ की मंडली में दो टेकीज़ ( यानि साफ्टवेयर पारंगत) थे तीन विद्यार्थी, हम दो (यानि मैं ओर रिवर) विश्वविद्यालय अध्यापक थे, दो पत्रकार थे और अन्य 'अन्य' थे। जाहिर है चर्चा के लिए अनंत विषयों की संभावना थी आर हुई भी- पत्रकारिता की दलदल को नापा गया, अध्यापिकाओं की उम्र को आंका गया, अनुपस्थित ब्लॉगरों की निंदा का सुख लिया गया । गोदने पर विस्तृत चर्चा हुई- गोदना संप्रदाय से तीन जीव थे, गोदना प्रशंसक एक और गोदना विरोधी एक - शेष तटस्थ । निष्कर्ष रहा- देह मेरी मर्जी मेरी। तितलियॉं थीं, डेविड का सितारा था और अमूर्तन भी था। रिवर की सिफारिश वाला बटर चिकन तो किसी को न मिला पर मिली तीन चार चरण बीयर, पनीर टिक्का, दाल रोटी और ढेर सारी मूंगफली और बाद में शौचालय शिकार (Loo Hunting) को विवश करती कॉफी डे की कॉफी। अच्छा समय रहा। और हॉं । बटर चिकन इसलिए नहीं मिला कि मीनू में खोजने वालों को उम्मीद न थी कि बटर चिकन को मुर्ग मक्खनी भी कहा जा सकता है।
स्काउट को यौवनोचित निराशा हुई होगी ......... अब क्या करें हम तो ऐसे ही हैं)
एक एक कर
वरुण
शिवम
प्रसूंक
अरुणि
महाराजाधिराज
भी पहुँचे और पंचैट बाकायदा शुरु हुई। कुल हाजिरी नौ, लिंग अनुपात छ: पर तीन का था, गोदना (यानि टैटू) अनुपात भी छ: पर तीन का। मेजबानी व्यवस्था रही रिवर और
स्काउट की
ब्लॉगर समुदाय की खास बात रुचिगत वैविध्य है। इस नौ की मंडली में दो टेकीज़ ( यानि साफ्टवेयर पारंगत) थे तीन विद्यार्थी, हम दो (यानि मैं ओर रिवर) विश्वविद्यालय अध्यापक थे, दो पत्रकार थे और अन्य 'अन्य' थे। जाहिर है चर्चा के लिए अनंत विषयों की संभावना थी आर हुई भी- पत्रकारिता की दलदल को नापा गया, अध्यापिकाओं की उम्र को आंका गया, अनुपस्थित ब्लॉगरों की निंदा का सुख लिया गया । गोदने पर विस्तृत चर्चा हुई- गोदना संप्रदाय से तीन जीव थे, गोदना प्रशंसक एक और गोदना विरोधी एक - शेष तटस्थ । निष्कर्ष रहा- देह मेरी मर्जी मेरी। तितलियॉं थीं, डेविड का सितारा था और अमूर्तन भी था। रिवर की सिफारिश वाला बटर चिकन तो किसी को न मिला पर मिली तीन चार चरण बीयर, पनीर टिक्का, दाल रोटी और ढेर सारी मूंगफली और बाद में शौचालय शिकार (Loo Hunting) को विवश करती कॉफी डे की कॉफी। अच्छा समय रहा। और हॉं । बटर चिकन इसलिए नहीं मिला कि मीनू में खोजने वालों को उम्मीद न थी कि बटर चिकन को मुर्ग मक्खनी भी कहा जा सकता है।
Friday, September 01, 2006
बीयर कबाब में हिंदी हड्डी
रिवर ने सुझाया और कई ने हाथों हाथ लिया कि दिल्ली में एक ब्लॉगर मीट हो ( हिंदी में कहें तो ब्लॉगिया पंचैट) और कल सब मतलब कई लोग मिल रहे हैं। खर्चा खाना पीना (रिवर का सुझाव है बीयर और बटर चिकन) अपना अपना। बातचीत कविता पर और अपना-आपकी।
स्थान कैफे-100, कनॉट प्लेस समय - 2-9-2006 , 1 बजे
हिंदी ब्लॉग जगत से तो अकेला ही होउंगा जब तक कि आप में से कोई आने का इरादा न बना ले। रिवर के ब्लॉग पर कन्फर्म करें।
स्थान कैफे-100, कनॉट प्लेस समय - 2-9-2006 , 1 बजे
हिंदी ब्लॉग जगत से तो अकेला ही होउंगा जब तक कि आप में से कोई आने का इरादा न बना ले। रिवर के ब्लॉग पर कन्फर्म करें।
Tuesday, August 29, 2006
धराशाही खिड़की के शिकार
मित्रो,
वापस आ गया हूँ। दरअसल विंडोज क्रैश हो गया था और रिइंस्टाल करने पर बड़ी नाजायज सा मॉंग कर रहा था हिंदी शुरू करने के लिए (मॉंग रहा था असली विंडोज सी डी) खैर अब जुगाड़ हो गया है। उम्मीद की जा सकती है डाक आती रहेगी।
वापस आ गया हूँ। दरअसल विंडोज क्रैश हो गया था और रिइंस्टाल करने पर बड़ी नाजायज सा मॉंग कर रहा था हिंदी शुरू करने के लिए (मॉंग रहा था असली विंडोज सी डी) खैर अब जुगाड़ हो गया है। उम्मीद की जा सकती है डाक आती रहेगी।
Friday, March 31, 2006
कहा मानसर चाह सो पाई
फिलहाल काफी पंकमय अनुभव कर रहा हूँ। लेक्चररी की एक छोटी सी लड़ाई लड़ रहा था- हार गया। पदमावती का रूप पारस था जो छूता सोना हो जाता और जैसा कि लाल्टू अन्यत्र संकेत करते हैं इस विश्वविद्यालयी दुनिया में काफी कीचड़ भरा है। इसे भी जो छूता है पंकमयी हो जाता है। देखते हैं शायद इस ब्लॉग सरोवर के स्पर्श से विरेचन (कैथार्सिस) हो जाए। आमीन
Saturday, February 25, 2006
कामरेड की मौत पर एक बहस
वह
पलक झपकाने भर तक को तैयार नहीं
उत्साह से कहती हैं
उसकी ऑंखें
देखना जल्द ही सवेरा होगा
मैं मुस्का देता हूँ हौले से बस।
होती हो सुबह- हो जाए
मुझे गुरेज नहीं
पर तुम सा यकीन नहीं मुझे
सवेरे के उजाले में
सच मानों मैं तो डरता हूँ
उस बहस से- जो तब होगी
जब अँधेरे में अपलक ताकने से
पथरा जाएंगी तुम्हारी ऑंखें
साथी कहेंगे- कामरेड
अँधेरे ने एक और बलि ले ली
मैं कहूँगा
ये हत्या उजाले ने की
पलक झपकाने भर तक को तैयार नहीं
उत्साह से कहती हैं
उसकी ऑंखें
देखना जल्द ही सवेरा होगा
मैं मुस्का देता हूँ हौले से बस।
होती हो सुबह- हो जाए
मुझे गुरेज नहीं
पर तुम सा यकीन नहीं मुझे
सवेरे के उजाले में
सच मानों मैं तो डरता हूँ
उस बहस से- जो तब होगी
जब अँधेरे में अपलक ताकने से
पथरा जाएंगी तुम्हारी ऑंखें
साथी कहेंगे- कामरेड
अँधेरे ने एक और बलि ले ली
मैं कहूँगा
ये हत्या उजाले ने की
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