Saturday, September 13, 2008

दिल्‍ली के ये बम मीडिया के लिए सौदा हैं

ये पोस्‍ट बेहद गुस्‍से में लिखी गई है, विवेक की उम्‍मीद न करें।

दिल्‍ली में इस वक्‍त कुछ बम विस्‍फोट हो रहे हैं। लोग मारे जा रहे हैं' ये दुकानदारी का समय है चैनलों के लिए। जिस पैमाने पर गैर जिम्‍मेदाराना रिपोर्टिंग अभी चल रही है, उसके बिना पर तो खुद इन चैनलों पर आतंकवाद फैलाने का मुकदमा चलना चाहिए। मौके पर खड़े पत्रकार शोर सुनते ही शोर मचा रहे हैं नेशनल मीडिया में कि मानव बम मिला ... कमबख्त मुड़कर जॉंच भी नहीं रहे कि खबर है या अफवाह... दो ही मिनट बाद गुब्‍बारे वाला बच्‍चा- मानव बम नहीं .. सबसे अहम गवाह हो जा रहा है। मुझे तो लगता है कि मीडिया वालों से तो कहीं ज्‍यादा जिम्‍मेदार व पेशेवर खुद वे आतंकवादी हैं जिन्‍होंने बम प्‍लांट किए। उनका काम है आतंक फैलाना और वे वहीं कर रहे हैं। लेकिन ये कम्‍बख्‍त पत्रकार व चैनल क्‍या इनका काम भी आतंक फैलाना है..अगर नहीं तो वे क्‍यों ये कर रहे हैं।  कोई इन्‍हें बंद करो नहीं तो ये देश में आग लगवा देंगे- 

एक बानगी देखें-

 

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Thursday, September 11, 2008

बढ़ी सब्सिडी- सरकारी पैसे से बनें हाजी

वैसे ऐसा लिखने में चट से संघी करार दिए जाने का जोखिम है पर कम्‍यूनिस्‍ट करार व संघी करार दिए जाने का जोखिम हम पहले भी उठाते रहे हैं, एक बार और सही। आज की खबर है कि सरकार ने हज के लिए सब्सिडी फिर से बढ़ा दी है- बावजूद बेपनाह बढ़ गए ईंधन के दाम व किराए के हज करने वालों को वही बारह हजार देना होगा बाकी सरकार टैक्सपेयर्स की जेब से भरेगी। और हॉं इस बार और ज्‍यादा लोगों को हाजी होने का पुण्‍य दिलाने का ठेका सरकार ने लिया है। वैसे हमें मुसलमानों पर अधिक पैसा खर्च करने से दिक्‍कत नहीं है, सच्‍चर समिति से भी नहीं थी पर तीर्थयात्रा के लिए सब्सिडी हमें एक सबसे ऊत काम लगता है। शिक्षा, प्रवेश, पढ़ाई, वजीफा ठीक है पर क्‍योंकि ये प्रकाश की ओर ले जाने वाले कदम हैं पर धर्म के नाम पर हजारों खर्च करना वो भी अपनी मेहनत के नहीं खैरात के...ये तो ठीक नहीं। यूँ भी एक मुसलमान दोस्‍त ने बताया कि नियमत: जब ऐसा कोई व्‍यक्ति हज करता है जो खुद उसकी कीमत अदा न करे तो इसे धर्म में वर्जित किया गया है। खैर किताब कुछ भी कहती हो पर हमारा मानना है कि इस तरह के टंटे मुस्‍िलम समुदाय के आत्‍मसम्‍मान  के विरुद्ध हैं जिसका विरोध खुद इस समुदाय को भी करना चाहिए।

 

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Friday, August 29, 2008

हिन्‍दी को हिन्‍दी-प्रेम की बैसाखियों से आजाद करने के लिए ब्‍लॉगवाणी को वोट दें

tata_nen_logo चिट्ठाचर्चा में अनूपजी ने दिखाया और हमने देखा, अच्‍छी खबर है।पहली चर्चा में वे ब्‍लॉगवाणी को भूल गए थे, उन्‍होंने केवल देबूदा के पॉडभारती के लिए सिफारिश की पर अगली पोस्‍ट में फिर से साफ कर दिया गया है कि ब्‍लॉगवाणी भी इस कतार में है। फिलहाल इसका रैंक 5 है, कल तक 9 था। हम चाहते हैं शाम तक पहला हो जाए।  हिन्‍दी तो बाजार में अपनी पहचान जमा ही रही है पर ये घटना हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की है। टाटा की मुहर और इंटरनेट पर हिन्‍दी उपक्रम की पहचान वाकई अहम बात है। यूँ भी कई दिन से वोटिंग शोटिंग का खेल इधर हुआ नहीं है। तो चलो जुट जाएं हिन्‍दी को शिखर पर देखने के लिए। पूरा तरीका मैथिलीजी ने अपनी पोस्‍ट में साफ कर दिया है। देखें और वोट दें- कम से कम दो वोट तो आप डाल ही सकते हैं- एक टाटा नैन से रजिस्‍टर करके इंटरनेट पर और दूसरा फोन से एसएमएस से।

हमने सोचा था कि इसे दिल का मामला मानकर, जैसा मैथिलीजी ने कहा हिन्‍दी के इस मुकाम तक पहुँचने की तरह देखेंगे और वोट देंगे तथा देने के लिए कहेंगे। पर सोचें ये तो फर्जीवाड़ा हुआ, आखिर हमसे एक ऐसे नए उपक्रम को चुनने का आग्रह है जो दमदार शुरूआती व्‍यावसायिक उपक्रम है और हम दिल के नामपर वोट दे रहे हैं। ठीक है हमें जीजान से पसंद है ब्‍लॉगवाणी, पर तब भी एक बार जॉंचे कि एक उपक्रम के रूप ब्‍लॉगवाणी कितनी संभावनाएं समेटे है। ऐसा इसलिए भी करें कि इस नजरिए से देखने पर आपको और गर्व की अनुभूति होगी। 

हिन्‍दी की चिट्ठाकारी का समुदाय निरंतर बढ़ रहा हे अत: ये विज्ञापन व आय की संभावनाएं लिए है तथा मजेदार बात ये है कि गूगल एडसेंस द्वारा हिन्‍दी ब्‍लॉगों को बेसहारा छोड़ देने को हमारे अपने एग्रीगेटर ने अवसर की तरह लिया लगता है। टाटा नैन के इस सवाल के जबाव में कि वाकी सब तो ठीक पर ये बताओ कि रोकड़ कैसे कमाओगे, सिरिल साफ करते हैं-

How does the business make money?

We plan to introduce a shopping portal in our website and use our 1600 strong blogger network to advertise, bloggers will be given a commission against sales.

:

It has Marathi and Hindi blogging now, but soon it will be available in all the Indian languages, and also in English. The aim is to becoming the number one community for Indian bloggers.

तथा यह भी-

Just want to put in my two words that the blogger-affiliation scheme is not the only way to earn from a website like blogvani. We'll be exploring the full plethora of options including conventional ones like advertising too.

वाकई .. तो इसका मतलब है कि हमें जल्‍द ही ब्‍लॉगवाणी पर लिस्‍ट होने के लिए, ज्‍यादा से ज्‍यादा लिखने के लिए पैसा मिला करेगा। ये बात तो अच्‍छी लागै है। :)) उससे भी अच्छी बात ये कि हिन्‍दी सिर्फ 'हिन्‍दी प्रेम' की बैसाखी पर नहीं अपने पैरों पर चलेगी। हिन्‍दी प्रेम के भरोसे रहने में बुराई ये है कि तब ये कल्‍याण खाते के आसरे हो जाती है तथा इसमें त्‍याग का दर्प भी आ जाता है फिर क्‍या होता है, पुराने ब्लॉगर जानते हैं कि उसका हश्र क्‍या होता है।   इसलिए आपसे अनुरोध है कि हिन्‍दी को बैसाखी से आजाद कर अपने कदमों चलाने के लिए ब्‍लॉगवाणी को वोट दें। यदि आप एक वोट पहले ही हिन्‍दी-प्रेम के नाम पर दे चुके हैं तो एक और दें- इस बार हिन्‍दी की आर्थिक आत्‍मनिर्भरता के लिए।

Monday, August 11, 2008

ये है सैम-इंडिया मेरी जान

जुगाड़ और रचनात्मकता हम भारतीयों के यूएसपी हैं। पश्चिमी उत्तरप्रदेश की जुगाड़गाड़ी हो यी वाशिंग मशीन का इस्तेमाल थोक में लस्‍सी बनाने के लिए करने की जुगत- हम हैरान करने से नहीं चुकते। ऐसी ही हैरानी से कल दो-चार  हुए जब एन पिज्‍जाहट के  बरोबर में पूरी लकदक के साथ उसका देसी जबाव देखा। ये था समोसा जी अपना बेचारगी भरा समोसा पर पूरे आत्‍मविश्‍वास के साथ। दिल्‍ली की एक सबसे मशहूर समोसे की दुकान पूंचकुइयॉं वालों के समोसे की है जो पिछले साठ सालों से समोसे खिलाने का दावा करती है। उसकी ही एक दुकान पर हमें ये देखने को मिला..IMG_0976

जी आपने सही पढ़ा सैमबर्गर- जिसका हैमबर्गर के बर्गर से गहरा नाता हे पर हैम से बिलकुल नहीं। हैम की जगह है सैम...बोले तो समोसा। समोसे के सैम हो जाने से हमारा परिचय बिट्स पिलानीIMG_0977 में हुआ था वहॉं समोसों को इंजीनियर-विद्यार्थी सैम कहते हैं। इन्‍हीं सैम को सैम विशेषज्ञों ने बर्गर के साथ गठबंधन कर सैमबर्गर तैयार किए हैं। ये दो वैरिएंट में पाए जाते हैं। आलू सैमबर्गर व पनीर सैमबर्गर।

  चित्र के बाद बताने की जरूरत नहीं कि बर्गर-बन में समोसा, चीज़, सलाद रखने से तैयार होने वाला सैमबर्गर वाकई दमदार चीज था। उबाऊ बर्गरों से तो बेहतर था ही। हॉं तेल इसमें काफी था। पर दाम बेहद कम हैं और इस दुकान ने पास के पिज्‍जाहट का तेल कर रखा है।

तो ये हे अपना सैमइंडिया।

 

 

अभी देखा की लाल्‍टू ने कुछ शानदार पोस्‍टें अपने ब्‍लॉग पर लिखी हैं। किसी वजह से न पढ़ पाए हों तो आप इन पोस्‍टों तक इन लिंकों से पहुँच सकते हैं-

खोजते रहो, हर जगह होमो सेपिएन्स
वॉट हैव वी डन

Thursday, August 07, 2008

एक डायरी नोट के साए में सहमा बचपन

बिटिया पढ़ना अभी सीख ही रही है इसलिए जो संदेश उसकी स्‍कूल डायरी में नत्‍थी किया गया था उसकी इबारत से अनजान थी। पर उसमें लिखे संदेश का मर्म उस तक पहुँचा दिया गया था। कक्षा में उसकी अध्‍यापिका ने कक्षा को समझाया था कि किसी भी व्‍यक्ति से कोई टॉफी, चाकलेट या किसी तरह का गिफ्ट न लें। गंदे लोग इसमें बॉम्‍ब रख सकते हैं आदि आदि। डायरी का संदेश इस तरह है-

notice

 

दरअसल तीन दिन पहले की अखबारों की रिपोर्ट थी कि अब दिल्‍ली में आतंकवादियों का अगला निशाना स्‍कूल हो सकते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस ने स्‍कूलों को आगाह किया है कि वे सुरक्षात्‍मक उपाय करें। स्‍कूलों पर आतंकी हमला, सिहरन पैदा करने वाली आशंका है। नन्‍हें खिलखिलाते बच्‍चों को कोई निशाना भला कैसे बना सकता है। पर ये बात कहते हुए भी हमें पता है कि बात बेतुकी है। इन ताकतों पर कोई तर्क काम नहीं करता। पर सच कहें कि इस डायरी-नोट की छाया में बच्‍चे को स्‍कूल भेजते रूह कांपती है। इतना लंबा चौड़ा स्‍कूल हजारों बच्‍चे, हजारों स्‍कूल बैग, बीसियों स्‍कूल बस, टिफिन, खेल का सामान और ये सब तो बस एक ही स्‍कूल में, ऐसे सैकड़ों स्‍कूल है शहर भर में- ऐसे डायरी नोट की आशंका में बेचैन होने वाला पिता मैं अकेला तो नहीं। अब अगर कोई शैतान तय कर ही ले तो उसके लिए क्‍या मुश्किल है एक बम को सरका देना .... उफ्फ।

लेकिन जब फलक को थोड़ा विस्‍तार देते हैं तो लगता है कि बचपन पर ऐसी तलवारें तो पूरी दुनिया में हैं। फिलीस्‍तीन, अफगानिस्‍तान या इराक के बच्‍चे जिन्‍हें कोई स्कूल या तो नसीब नहीं और है तो भी उनके सुरक्षित से सुरक्षित स्‍कूल हमारे स्‍कूलों से ज्‍यादा असुरक्षित हैं। खुद हमारे देश के कई हिस्‍से वर्षों से इस हिंसा के शिकार हैं। सुना है इराक में बच्‍चे उन मैदानों में खेलते हैं जिनमें बारूदी सुरंगे होने की आशंका है। जब अनुराधा ने कहा कि भगदड़, आतंकवाद आदि घटनाओं को देखने का एक नजरिया औरतों जैसे हाशिए के वर्गों पर उसके प्रभाव के आकलन का भी है तो लोगों को ये अति लगा। पर हम जोर देकर कहते हैं कि आतंकवाद हो, दुर्घटनाएं या फिर प्राकृतिक आपदाएं इनकी मार होती सबके लिए बुरी ही है किंतु ये मार सब पर बराबर नहीं होती।

काश हम बच्‍चों को सहमा देने वाले डायरी नोट्स की छाया से मुक्‍त बचपन दे पाएं।

Wednesday, August 06, 2008

ब्‍लॉगिंग आग्रह की वस्‍तु है

बीमा कंपनियों के विज्ञापनों से शहर आच्‍छादित है। चहुँ ओर मौत और बुढ़ापे का भय बिखरा है। इतना दो तुम्‍हारे अपने इतना पाएंगे...अस्पताल जाना पड़ा तो बिल हम चुकाएंगे... और अंत में पुच्‍छल्‍ला ये कि 'बीमा आग्रह की वस्‍तु है' (इंश्‍योरेंस इज़ अ मैटर ऑफ सालिसिटेशन)। भाषिक प्रयुक्तियॉं बेचैन करती हैं सो हमने पड़ताल की तो पता लगा कि ये कानूनी शब्‍दावली है जिसका अर्थ है कि बीमा को बीमा कराने का इच्‍छुक व्‍यक्ति अधिकार की तरह नहीं मांग सकता। यह तभी किया जा सकता है जब इच्‍छुक कहे कि मेरा बीमा कर दो और बीमा कंपनी कहे कि हम आपका बीमा करना चाहते हैं...दोनों राजी तभी बीमा होगा। ये नहीं कि बोर्ड टंगा देखा और हो गया बीमा। तो इस तरह बीमा आग्रह की वस्‍तु है।

पर भई बीमा तो बीमा है कि नोट-शोट का मामला है। पर ये ब्‍लागिंग कैसे आग्रह की वस्‍तु है। है न.. अगर आप हाल फिलहाल की पोस्‍टें पढें तो आपको भी लगेगा। हमने पढ़ा कि किसी ने पोस्‍ट लिखी कविता या कहानी (या जिस विधा की मान लें उस विधा की रचना थी) एक अन्‍य को मजाक की सूझी उसने उसी तर्ज पर एक और लिख डाली। व्‍यंग्य तो खैर नहीं था विनोद ही था पर शुद्ध विनोद तो शुद्ध घी हो गया है, मिलता ही कहॉं है। करने वाला विनोद भी करे तो सुनने वाला उसे व्‍यंग्‍य ही मानता है। अगला बिफर पड़ा, तुम दो कौड़ी के पाठक मैं प्रसाद, प्रेमचंद- अगले ने कहा कि मेरा ब्‍लॉग आग्रह की वस्‍तु है जिसे मैं चाहता हूँ वो पढ़े बाकी मेरा वक्‍त बर्बाद न करें।    वैसे जब लोगों को पता चला कि 'वक्त बर्बाद न करें' एक गांरटीशुदा जुमला हो गया है तो कृपया वक्‍त बर्बाद करें की भी गुजारिश हुई :))

तो भैया अब  ब्‍लॉगिंग, हम लिखें-दुनिया पढे नहीं रह गई :))। अब इसे सैडिस्टिक प्‍लेज़र कहना चाहें तो कहें पर हमें तो ये विवाद बड़ा मोहक सा लगा। वैसे हम साफ बता देना चाहते हैं कि हमारा ब्‍लॉग पढना कतई आग्रह की वस्‍‍तु नहीं है। जो चाहे पढे- रिक्‍शावाला, झल्‍लीवाला या सामानवाला सबका स्‍वागत है। 

 

(बहुत दिनों बाद किसी के फटे में टांग अड़ा रहे हैं, हमें डर लगा कि जैसे पिछले दिनों पंगेबाज पर आरोप लगा कि बस नाम के ही पंगेबाज रह गए हैं, कहीं हमारी भी इमेज न बिगड़ चुकी हो)

Friday, July 11, 2008

मंझली पीढ़ी के बाप की कमर और बस्ते का बोझ

कुछ खाते पीढि़यों के हिसाब से चलते हैं। मसलन बहु को सास ने तंग किया तो बदले में बहु जब सास बन जाएगी तो अपनी बहू को तंग करेगी। पूरी पीढ़ी बीतेगी तब जाकर उधार चुकेगा- अगली पीढ़ी की बहु टेढ़ी निकली तो बेचारी मंझली पीढ़ी वाली मारी गई- पहले सास ने सताया बाद में बहू सताएगी। ये सब भूमिका इसलिए कि हमें लगता है बहुत से मामलों में हमारी पीढ़ी बस यही मंझली पीढ़ी है। जब बालक थे तो पिता की पीढ़ी को लगता था कि हमारी पीढ़ी के बेटे बेहद नालायक हैं, थोड़ा बड़े हुए खुद बाप बने तो बच्‍चों की पीढ़ी को लगता है (कहा तो नहीं पर लगता जरूर है) कि बडे नालायक बाप हैं। अब उन्‍हें कैसे समझाएं कि वो हम पर नालायक होने का आरोप अब नहीं लगा सकते क्‍योंकि अपने हिस्‍से के नालायकी के आरोप हमने तब भुगत लिए थे जब हमारी बारी थी और कायदा ये कहता है कि अब आरोप लगाने की बारी हमारी है।

खैर...अगर आप सोच रहे हैं कि सुबह सुबह इतना ज्ञान हमें कहॉं सो हो गया तो आसान सा तरीका समझाते हैं...15 किलो का वजन अपने पर लादें आपके भी ज्ञान चक्षु खुल जाएंगे। बच्‍चे को स्‍कूल बस तक छोड़ने बस स्‍टाप तक गए थे, वो तो खाली हाथ, लडि़याती आवाज में जानना चाह  रहा था कि हम बीएमडब्‍ल्‍यू क्‍यूं नही ले लेते (हम तो खैर कभी न पूछ पाए कि पिताजी साइकल के टूटे पैडल को ठीक क्‍यों नहीं करवा लेते) जबकि हम उसके भयानक भारी बस्‍ते के बोझ के नीचे कराह रहे थे। तभी हमने सोचा कि जब हम छोटे थे तब तो हमारी पीढ़ी के बच्‍चे अपने बस्ते खुद उठाया करते थे, हमारे ही नहीं पास पड़ोस के भी किसी बाप को हमने बालक का बस्‍ता उठाए नहीं देखा था... तो मतलब ये कि पिछली पीढ़ी में भी हमने बस्‍ता उठाया और अब भी उठा रहे हैं- कुल मिलाकर हम भी मंझली पीढ़ी की बहु हुए न। तब भी कमर दुखी अब भी हम दु:खी। कथित  ज्ञान के इस बस्‍ते की बिडंबना ही यह है कि जो एक बार इसे उठाता है वह दु:खी ही रहता है।

पहली बार नहीं है कि मंझली पीढ़ी के बाप इस कराह से गुजर रहे हैं..अनादि काल से होता रहा है। दरअसल खुद की निगाह में तो हर पीढ़ी मंझली पीढ़ी होती है। बेचारा राम- बाप के पास तीन तीन बीबीयॉं थीं, बुढ़ापे की लपलपाहट में जवान बीबी की बात में आया और रामजी गए चौदह साल के लिए जंगल में..लेकिन अगली पीढ़ी ने कहॉं  मानी उसकी बात.. वो तो तैयार थे धनुष उनुष लेकर मां का बदला लेने को। बेचारे राम आक्‍खी जिंदगी एक बीबी के लिए भी तरसते रह गए। दरअसल जैसे जैसे समय बहता है वह हर किसी को किसी न किसी लिहाज से तो मंझलेपन की त्रासदी में डालता ही है। जाति आधारित शोषण, स्‍त्री शोषण, आरक्षण, पोलिटिकल करेक्‍टनेस के बाकी मोर्चे किसी को भी देख लो मंझली पीढ़ी ही कीमत चुकाती दिख रही है।

Thursday, July 10, 2008

ये लीजिए आईएईए से नाभकीय समझौते का मसौदा

अभी कल तक जिन कागज पत्रों को भारत विदेशमंत्री यह कहकर दिखा नहीं रहे थे कि कमअक्‍ल भारतीयों को दिखाना ठीक नहीं है जबतक अमरीकी आका नहीं कहेंगे नहीं दिखाएंगे वह 24 घंटे बीतते न बीतते सबके सामने है। यदि आपने अब तक न पढ़ा हो तथा इच्‍छुक हों तो मसौदा इस लिंक पर उपलब्‍ध है-

भारत- आईएईए ड्राफ्ट सेफगार्ड्स

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Saturday, July 05, 2008

विषयों के गिरते उठते बाजार भाव

हमने कभी शेयर बाजार में दमड़ी का निवेश नहीं किया पर इसका कोई सैद्धांतिक कारण नहीं है सीधी सी वजह है कि गांठ में फालतू दमड़ी रही ही नहीं इसलिए निवेScreenHunter_01 Jul. 05 07.01श नहीं खर्च करते हैं। इसके बावजूद शेयरों के भाव उठने गिरने से जो ग्राफ बनता हे उसे देखने में अच्‍छा लगता है। वो संतरी रंग का आरेख ऊपर उठता और फिर गिरता दीखता है कितना अच्‍छा खेल है। जिसके ढेर पैसे लगे होते होंगे उनके दिल की धड़कन भी ऊपर नीचे होती होगी हमें तो वो बादलों में बन रही आकृति सा लगता है, इसलिए नीचे गिरता सा दिखता है तो मन करता है कि वाह क्‍या भारत के नक्‍शे के नीचे की आकृति बन रही है, गिरते गिरते पूरे कन्‍याकुमारी तक पहुँचे तो मजा आए।

ये बाजार भाव केवल शेयरों के ही ऊपर नीचे नहीं होते वरन कुछ ऐसी मदों के भी होते हैं जिनसे हमें बहुत फर्क पड़ता है। मसलन हिन्‍दी को ही लीजिए। कई सालों से बारहवीं पास करके आए बच्‍चें को बीए में प्रवेश देते रहे हैं। वो गर्व या चिंता से अपनी अंकतालिका हमें थमाते हैं और हम उसे परामर्श देते हैं -अरे आपके तो हिन्‍दी इलेक्टिव में 80 हैं- हिन्‍दी आनर्स ले लो अच्‍छा करोगे। वो करेले के सूपपान का सा कड़वा मुँह बनाता है.. न जी न हम तो बीए पास ही लेंगे- हिन्‍दी आनर्स नहीं, संस्‍कृत भी नहीं..अरबी नहीं फारसी नहीं और बांग्‍ला तो कतई नहीं (हमारे यहॉं यही भाषाएं पढ़ाई जाती है पर विश्‍‍वास है कि अन्‍य भारतीय भाषाओं की हालत इनसे बेहतर नहीं ही होगी)। अंगेजी आनर्स मिलेगा नहीं ... साल दर साल यही दोहराया जाता है। भारतीय भाषाओं का बाजार भाव का आरेख  हर बार अरब सागर  से शुरू होता है और कन्‍याकुमारी जाकर रुकता  हे फिर ऊपर नहीं चढ़ता। जब हम विद्यार्थी हुआ करते थे तो विज्ञान इस दुनिया के टिस्‍को व रिलायंस होते थे, अब पता नहीं कि शेयर बाजार में टिस्‍को की हालत कैसी है पर दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में तो बीएससी के ग्राहक गायब हैं। बस बीकाम या बीए अर्थशास्‍त्र ही हैं जो चुम्बक की तरह सारे मलाई खींच ले जाते हैं। हिन्‍दी को छाछ भी मिल जाऐ तो गनीमत। ऐसे में बंगाली-उर्दू- संस्‍कृत को क्‍या मिलता होगा इसका अनुमान आप सहज ही लगा सकते हैं। इतना जान लें कि पहली ही कट आफ में लिखकर टांग दिया गया है कि अरेबिक, फारसी व बंगाली में हर व्‍यक्ति के लिए दाखिला खुला है।

वैसे अनुभव ये भी बताता है कि हिन्‍दी ने खुद को बेहतर पोजिशन कर लिया है अब 50 प्रतिशत पर नहीं 60 प्रतिशत पर प्रवेश मिलता है। दरअसल बहुत से विद्यार्थियों खासकर ठीकठाक चेहरे मो‍हरे वाली लड़कियों को लगने लगा है कि टीवी पत्रकार बनने के लिहाज से हि‍न्‍दी ली  जा सकती है (यूँ भी पत्रकारिता में  भूत चुड़ैल, सनसनी आदि ही तो करना है कौन महान योग्‍यता चाहिए ) ऐसे में पूरे साल में दो विद्यार्थी भी ऐसे मिल जाएं जो साहित्‍य पढ़ने के इरादे से बीए में आए हों तो हम निहाल हो जाते हैं।

Tuesday, July 01, 2008

एडसेंस की हिन्‍दी को पूर्ण-विदाई !!

आज ही गूगल एडसेंस की मेल आई है कि वे एडसेंस की रेफरेल योजना ( AdSense Referrals programme ) को विदा करने वाले हैं। उनकी मेल का अनुवाद है-

ऐडसेंस रेफ़रल कार्यक्रम में भाग लेने के लिए धन्यवाद . हम
अगस्‍त के अंतिम सप्‍ताह में ऐडसेंस रेफ़रल कार्यक्रम को समाप्‍त कर रहे हैं . उस समय के बाद , ऐडसेंस कोड विज्ञापन प्रदर्शित करनप बंद कर देगा

ऐसा वे सिर्फ हिन्‍दी के साथ नहीं कर रहे हैं जैसा कि उन्‍होंने एडसेंस के मामले में किया है वरन वे रेफरेल की व्‍यवस्‍था ही खत्‍म कर रहे हैं। किंतु हिन्‍दी के लिए इसका मतलब ये हुआ है कि एडसेंस के कंटेंट आधारित विज्ञापन तो उन्‍हें मिलने पहले ही बंद हो गए थे जो थेड़ी बहुत कमाई संभव थी वह केवल रेफरेल विज्ञापनों से ही थी। अब रेफरेल विज्ञापन भी बंद हो जाएंगे। पेशेवर हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग का सपना अब और दूर खिसक जाएगा। यदि गूगल से परे सोचकर हिन्‍दी के चिट्ठाकार आगे बढ़ना चाहें तब भी राह आसान नहीं क्‍योंकि कोई भी अन्‍य विज्ञापन प्रदाता अभी भी पर्याप्‍त विज्ञापन जुगाड़ने में सफल नहीं हो पा रही है।

लगता है कि ब्‍लॉगिंग के भरोसे नौकरी छोड़ने का सपना पूरा होने से पहले ही हम रिटायर हो चुके होंगे। :))