Saturday, October 24, 2009

इलाहाबाद से गैर-रपटाना....एकदम ब्‍लागराना

इस रपट बहुल वातावरण में हम सरीखे हमारे सामने बहुतई दिक्‍कत है... जब त्‍वरित रिपोर्टिंगों के चलते एक दो तीन चार पॉंच छ: सात... रपटें आ चुकी हों तो हम का करें। बेचारे एक ही नामवर सिंह है गलत तथ्‍य भी एक ही दिया है अब इस पर कितनी बार लिखा जा सकता है.... अमृत उत्‍सव मना चुका व्‍यक्ति एकाध तथ्‍यात्‍मक भूल का हक तो रखता ही है। अपना संकट ये है कि अगर कुछ नहीं लिखा तो कई लोग जिनमें घर के अधिकार-प्राधिकार संपन्‍न लोग शामिल हैं मान बैठेंगे कि हम इहॉं बस मस्‍ती करने आए हैं... तो हमारी निम्‍न बातों पर जरा ध्‍यान दें कि हम मस्‍ती नहीं कर रहे हैं खूब काम कर रहे हैं....

सुबह सुबह खून के आसुओं कर पृष्‍ठभूमि में दो-ठो चाय पीना कम जोर काम नहीं है...

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दो क्‍यों ? अरे साहब हम दम ठोंक कर कहते हैं कि चाय के प्‍यालों का जितना पतन इस शहर में हुआ है उतना तो सांसदों की गरिमा तक का नहीं हुआ...

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हमने खूब अनुमान लगाए कि इस कप का आयतन क्‍या है पर कोई अनुमान तीस एमएल को छू नहीं पाया।

फिर भी चाय साधुवादी थी....क्यों ? इसलिए कि चायवाला साधु था-

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इतने काम को ही ही हम पर्याप्‍त मानते हैं पर यहॉं तो इलाहाबाद न जाने हमसे कितना काम करवा लेने पर उतारू था..मसलन ये कैथा का अनुभव करना..

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न जी इसे कम वीरता का काम न मानें..देखें ये प्रापर इलाहाबादी बालिका तक इस कैथे को चख कैसे उफ कर बैठी हैं-

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और जिन को अबहू लग रहा है कि हम कुछ नहीं कर रहे तो बताइए कि अगर ये जो नामवरजी लुड़कत्व को प्राप्‍त हुए हैं क्‍या इसमें हमारी कोनो भूमिका नही है...

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फिर शाम को अंडा भक्षण...

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सुबह पोहा पूजन

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रात को गपबाजी के चिरकुट सुख-

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इतने काम कर हम बहुत थक गए हैं अनूपजी सर पर सवार हैं चलो नाश्‍‍ता करना ही पडेगा...सुबह भी जलेबी 'खानी पडीं'।

चलते चलते आयोजकों की व्‍यवस्‍था के विषय में बता दें कि पूरा ध्‍यान रखा गया है यहॉं तक कि ब्‍लॉगर संप्रदाय की अनन्‍य आवश्‍यकता टंकी तक की व्‍यवस्‍था परिसर में है जो चाहे झट टंकी आरोहण कर ब्‍लॉगत्‍व को प्राप्‍त हो... हमारी शिकायत बस यही है कि आयोजकों ने ब्‍लॉगरों को शिकायत की गुंजाइश न देकर शिकायत-ब्‍लागिंग की सुविधा नहीं दी है

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एक और बात विनीत के आडियो रिकार्डर खो जाने की खबर से घर के लोग परेशान होंगे कि विनीत जैसा सुपर सतर्क बालक अगर गुमाने पर आतुर हो गए हैं तो हम जैसे गुमातुर व्‍यक्ति क्‍या होगा... तो आश्‍वस्‍त रहें अब तक केवल एक कंघी लापता है...उसकी भी तफ्तीश जारी है। हमारे कमरे के साथी अनूप शुक्‍ल हैं... ये केवल सूचना के लिए है पिछले वाक्‍य से इसका कोनो संबंध नहीं है।

Tuesday, September 29, 2009

ब्‍लॉगवाणी में चंद कोड्स से अधिक जो कुछ था हमारा था

अब घंटों बाद ये कोई खबर नहीं रह गई है कि ब्‍लॉगवाणी बंद हो गया है। क्रोध, आश्‍चर्य, पीड़ा और भी कई संज्ञाओं से उस भावना को व्‍यक्त करने की कोशिश कर सकता हूँ जो इस खबर को जानने के बाद उपजी हैं। ये सभी संज्ञाएं ठीक भी होंगी पर सच बताने को जी चाहता है और वह ये कि सबसे ज्‍यादा जिस भाव को महसूस किया वह है अपमान। मैथिलीजी व सिरिल से बहुत कुछ सीखा है तथा हम किताबी लोगों में उद्यमी लोगों के प्रति जो अवहेलना का भाव होता हे उससे खुद को जितना कुछ मुक्त कर सका हूँ उसमें इस गुप्‍तद्वय की विशेष भूमिका है। पर इस प्रकरण में ब्‍लॉगवाणी की हत्‍या कर दिए जाने ने मुझे आहत किया है शुद्ध व्‍यक्तिगत हानि। मैथिलीजी तथा सिरिल से संबंध बेहद अनौपचारिक हैं, इतने कि झट से फोन कर दो-चार हजार का उधार मॉंग लेने तक में कभी शर्मिंदगी महसूस नहीं हुई पर इस प्रकरण में इतना अपमानित महसूस कर रह हूँ कि हिम्‍मत नहीं हुई कि फोन या ईमेल कर कुछ कह सकूँ। लगता है एक झटके से उन्‍होंनें  कुछ कहने का अधिकार ही हमसे छीन लिया।

एकाध जगह जहॉं हमने टिप्‍पणी की वहॉं हमने कहा

''ये पूरा प्रकरण ही अत्‍यंत खेदजनक है। न केवल आरोप-प्रत्‍यारोप खेदजनक हैं वरन नीजर्क प्रतिक्रिया में ब्‍लॉगवाणी को बंद किया जाना भी। क्‍या कहें बेहद ठगा महसूस कर रहे हैं...अगर ब्‍लॉगवाणी केवल एक तकनीकी जुगाड़ भर था तो ठीक है जिसने उसे गढ़ा उसे हक है कि उसे मिटा दे पर अगर वह उससे कुछ अधिक था तो वह उन सभी शायद लाख से भी अधिक प्रविष्टियों की वजह से था जो इस निरंतर बहते प्रयास की बूंदें थीं तथा इतने सारे लोगों ने उसे रचा था.... हम इस एप्रोच पर अफसोस व्‍यक्त करते हैं। यदि कुछ लोगों की आपत्ति इतनी ढेर सी मौन संस्‍तुतियों से अधिक महत्‍व रखती है तो हम क्‍या कहें...'' 

जिन ब्‍लॉगरों की आपत्तियों के परिणामस्वरूप ये हुआ उनसे मुझे कुछ खास नहीं कहना, इसलिए भी नहीं कहना चाहता कयोंकि मुझे नहीं लगता उन्‍हें सीधे संबोधित करने का कोई अधिकार मुझे है, मैं ठीक से उन्‍हें जानता पहचानता भी नहीं। शेष कुछ लोगों को सहज ही नारद प्रकरण तथा धुरविरोधी की हत्‍या याद होगी।  काश धुरविरोधी आस पास होता तो वो देख सकता कि कैसे ब्‍लॉगवाणी प्रकरण में  एक हत्‍या को आत्‍म‍हत्‍या करार दिया जा रहा है। नारद में हमारा पैसा नहीं लगा था पर उसे उन लोगों द्वारा मिल्कियत समझने पर हम खुद को ठगा महसूस कर रहे थे जिनका साझे का ही सही पर पैसा व मेहनत इसमें लगी थी। पैसा अपना ब्‍लॉगवाणी में भी नहीं लगा था पर इसे भी हम अपना सा ही समझते थे...गलती हमारी ही थी...एक बार में नहीं सीखे तो धोखा तो होना ही था।

बहुत कुछ कहने की इच्छा नहीं पर दर्ज कर देना चाहते हैं कि भले ही विधिक या जिस भी नजरिए से कोई 'अपनी' साइट मिटा देने से आपको रोक नहीं सकता पर फिर से बेव 2.0 की प्रकृति पर विचार करें... इसमें लगे कोड भले ही आपने रचे हों पर ये कोड जिन शब्‍दों से मिलकर वास्तविक अर्थ गढ़ते हैं वे प्रयोक्ता रचित (यूजर जेनरेटिड) होते हैं अत: इन प्रयोक्ताओं को संभलने का कोई मौका दिए बिना उनके पैरों से कालीन से यह कहकर छीन लेना कि भई ये हमारा कालीन है, हमें न्‍यायपूर्ण नहीं जान पड़ता। 

बस और कुछ कहने को जी नहीं चाहता !!!

Thursday, September 17, 2009

अरे मेरा विश्‍वविद्यालय खो गया है

अभी कुछ नई जानकारी के लिए अपने विश्‍वविद्यालय की वेबसाइट पर झांका तो ये पाया

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मतलब विश्‍वविद्यालय की भारी भरकम साइट गायब है उसकी जगह एक नवेली हल्‍की फुल्‍की किसी एडवाइजरी समिति की साइट ने हथिया रखी है जिसका विश्‍वविद्यालय से कोई संबंध नहीं है।

वैसे लगता नहीं कि ये हेकिंग का मामला है क्‍योंकि जो साइट आ रही है वो भी एक सरकारी साइट है जिसका पता बाकायदा इलैक्‍ट्रानिक निकेतन का है। यानि ज्‍यादा संभावना ये है कि बाबूगिरी वाले तरीके से नई तकनीक से खेलने का परिणाम है। उम्‍मीद है हमारा खोया विश्‍वविद्यालय ज्‍ल्‍द ही मिल जाएगा। :))

Friday, August 21, 2009

चौं बई जन्‍मदिन तो ठीक, पर जे फोटो चौं चेंपी ए

ठेठ anoopफुरसतिया शैली में अनूप ने सूचना दी है कि वे एक पंचवर्षीय योजना पूरी कर चुके हैं। ये अलग बात है कि जो बात सीधे साधे तरीके से ठग्‍गू का एक लड्डू भेजकर कही जा सकती थी उसके लिए इन्‍होंने इस तस्‍वीर का सहारा लिया। और जब उन लोगों ने पूछा जो पूछ सकते थे (बकिया सब तो वरिष्‍ठ-उरिष्‍ठ, भीष्‍म पितामह वगैरह के चलते हे हे करके रह जाते हैं) - रचना ने सवाल पूछा. बाकी सब ठीक पर ये बताओं की तस्‍वीर और पोस्‍ट में संबंध क्‍या है तो लगे हे हे करने :))

रचनाजी, आपकी बधाई के लिये शुक्रिया। चित्र और पोस्ट का संबंध मैंने जानने की कोशिश नहीं की सिवाय इसके कि चित्र मुझे अच्छा लगा। 

पर जो जानते हैं सो जानते हैं, जैसे जीतू भाई-

अरे वाह! पाँच साल हो भी गए। तुम्हे तो पाठकों को वीरता पुरस्कार देना चाहिए, पाँच साल तक इत्ती लम्बी लम्बी पोस्टें झिलाते रहे। पाँच साल कम समय नही होता, बाकी सभी ब्लॉगवीर कट लिए तुम अभी तक डटे हुए हो, भीष्म पितामह की तरह। याद है पिछली बार भीष्म पितामह किसने कहा था?

पिछले पाँच सालों मे ना जाने कित्ती बार तुम लोगों की चिकाईबाजी करते रहे, सबसे मौज लेते रहे,हमारी खिंचाई करते रहे, सभी विवादों मे टाँग/पैर घुसाते रहे, रात को अमरीकन कुड़ियों से सीयूकूल बनकर बतियाते रहे, सबसे बड़ी बात हर दूसरी चैट विन्डो पर अपने ब्लॉग के लिंक ठेलते रहे। सचमुच काफी वीरता का काम है, कोई मल्टीपरपज बंदा ही इत्ते सारे काम एक साथ कर सकता है। खैर..अब पाँच पूरे हो ही गए है तो बधाई देना तो अपना भी फर्ज है, इसलिए बधाई को नत्थी किया जा रहा है, पावती भेजे।

लिखते रहो, लगातार…..हमे रहेगा इंतजार।

जीतू, ......अमेरिकन कुड़ियों का तो ये आलम है कि जिससे बात करो सब कहती हैं बात नहीं करेंगे -जीतेन्द्र भाई साहब ने रोका है। पता नहीं क्या लफ़ड़ा है तुम्हारा

मतलब ये हैं कि ये जो तस्वीर है न उसके पीछे कोई बात है जिसे कुछ 'पुराने' लोग जानते हैं, हम उनमें शामिल नहीं हैं क्योंकि जो नाम गिनाए हैं उनमें हम नहीं हैं, और हम इससे कतई नाराज नहीं हैं, भला पुराना होने में कौन खुशी की बात है- ठाठ तो नया होने और बने रहने में है।

खैर जो नाम अनूप ने गिनाए हैं वे हैं-

आज के दिन की याद रविरतलामी, देबाशीष, जीतेंद्र चौधरी, अतुल अरोरा,आलोक कुमार, पंकज नरुला, इन्द्र अवस्थी ,रमण कौल,ई-स्वामी, शैल, आशीष श्रीवास्तव , शशि सिंह, जगदीश भाटिया, सृजन शिल्पी , निठल्ले तरुण, श्रीष, बेंगाणी बन्धुओं, काकेश ,प्रियंकर, प्रत्यक्षा, रचना बजाज और बेजी के साथ तमाम ब्लागरों की पुरानी याद के साथ शुरू हुई!

हमारी इच्छा हुई कि ब्‍लॉग-पितामह के जन्‍मदिन के बहाने इनमें से कुछ के ब्‍लॉग झांक लिए जाएं-

रविजी को छोड़ देते हैं क्‍योंकि वे अभी तक नियमित ही हैं।

देवाशीष की ताजातरीन पोस्‍ट 2008 की वार्षिकी से संबंधित है। 

जीतू ने कल ही लिखा है पर दरअसल लिखा 2005 में था उसीका रीठेलन किया गया है।

आलोक अपनी छोटी लेकिन सार्थक बातें करते ही रहते हैं जैसे ब्‍लैकबेरी क्‍यों काला पत्‍थर है हाल में ही बताया उन्‍होंने।

लंबे गोते तो लगाते हैं अतुल अरोरा कम से कम साल भर का आराम करते हैं अगली पोस्‍ट के लिए। मुष्टिका भिड़त पर उनकी पोस्‍ट जून 2008 में आई थी।

गदाधारी विद्वान दोस्‍त सृजन शिल्‍पी ने जून में एक पुस्‍तक समीक्षा पेश की थी उम्‍मीद है फिर कुछ लिखेंगे।

ईस्‍वामी का टंडीरा प्रणय तो आपने पढ़ा ही होगा....न तो जरूर बांचें।

दिमागी हलचल पंकज भाई बोले तो मिर्ची सेठ में भी होती है उम्मीद है देखी होगी।

दूसरों का क्‍या कहें हम खुद ही रिटायर्ड हर्ट सा खेल रहे हैं, जोश सा आइए नही रहा है। वो तो भला हो कल अनूपजी का फोन आ गया जन्‍मदिन की बधाई मांगने के लिए :)) और  प्रमेंद्र की मेल कि कहॉं भाई जागो, इसलिए आज ये कीबोर्ड पीटा है। सो भी इसलिए कि अनूप ये न कहने लगें कि अब कोई हमसे मौज नहीं लेता।

Saturday, July 11, 2009

38 लाख हिन्‍दी पृष्‍ठ इंटरनेट पर

 

हाल में मेरे हाथ एक खजाना लगा है जिसे मैं आपसे साझा करना चाहता हूँ। चौदह हजार एक सौ बाइस पुस्‍तकों के अड़तीस लाख छत्‍तीस हजार पॉंच सौ बत्‍तीस पृष्‍ठ..... हिन्‍दी के पृष्‍ठ । बेशक ये एक खजाना है जो हम सभी को उपलब्‍ध है एकदम मुफ्त। बस क्लिक भर की दूरी पर। और ये किताबें सब कूड़ा नहीं है वरन खूब काम की दर्लभ किताबें तक इसमें शामिल हैं मसलन 1935 की श्री गणेश प्रसाद द्विवेदी की इस किताब को देखें-

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या चोखेरबालियों को उमंग से भर देने के लिए 1921 की इस किताब को देखें-image

पुरानी किताबों में से फिलहाल मुझे 'टू ईयर्स बिफोर द मास्‍ट' का हिंदी अनुवाद काफी रुचिकर लग रही है, पुस्‍तक 1840 की है पर अनुवाद कब का हे ये पता नहीं चल पा रहा

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केवल पुरानी ही नही नई पुस्‍तकें भी यहॉं उपलब्‍ध है मसलन हिन्‍दी में पहली कक्षा की गणित की इस पाठ्यपुस्‍तक को देखें

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ये सब ओर भी बहुत सी किताबें मुझे मिली हैं भारतीय डिजीटल पुस्‍तकालय पर। भारत तथा विदेश के बहुत से सहयोगियों के साथ चल रहे इस कार्यक्रम के विषय में आप इनकी वेबसाइट से जान ही सकते हैं। किताबें पूरी मूल रूप में उपलब्‍ध हैं तथा TIFF फार्मेट में हैं। आल्‍टरनेटिफ नाम का रीडर वहॉं डाउनलोड के लिए उपलष्‍ण है तथा एक्‍सप्‍लोरर में अच्‍छा काम करता है पर क्रोम पर नहीं चलता । फिर देर किस बात की है जाएं देखें हो सकता है जो किताब आप बरसो से खोज रहे थे पर मिल नही पा रही थी, हो सकता है यहॉं उपलब्‍ध हो फोकट में।

Sunday, June 14, 2009

थेकेडी के एक मसाला उद्यान की यात्रा

देश के तमाम राज्‍यों की तुलना में पर्यटन का जितना विकास केरल ने किया है उतना शायद किसी और राज्‍य ने नहीं। पर्यटन के इस विकास में उनकी रचनात्मकता की विशेष भूमिका है। मसलन बैकवाटर्स को ही लें...अस्‍सी के दशक तक इसे यातायात की बाधा के रूप में देखा जाता था लेकिन दो दशक में ये केरल के यूएसपी के रूप में उभरे हैं, हाउसबोट, आयुर्वेद, मार्शलआर्ट, कुच्‍चीपुड़ी कथकली और यहॉं तक कि मसाले। मसाले जो शुद्ध रूप से एक व्‍यावसायिक गतिविधि हैं को केरलवासियों ने एक पर्यटन गतिविधि बना दिया है। जगह जगह विशेष‍कर थेकेडी इलाके में मसालों के उद्यान लगाए गए हैं जिनका उद्देश्‍य मसाला उत्‍पादन कम है वरन नर्सरी के रूप में एक ही जगह अलग अलग मसालों के चंद पौधे उगाकर उन्‍हें पर्यटकों को दिखाकर उनके विषय में बताना तथा फिर मसाने बेचना, मूल उद्देश्‍य है।

पिछले दिनों हम केरल की यात्रा पर थे वहीं ऐसे ही एक उद्यान में हम गए...सौ रुपए प्रतिव्‍यक्ति की एंट्री फीस अधिक तो लगी (इसका अधिकांश हिस्‍सा उस ड्राइवर को चुपचाप दे दिया जाता हे जो पर्यटकों को ला ता है। नर्सरी मालिक की आमदनी उस बिक्री से होती है जो इन पर्यटकों को मसाले बेचने से होती है)। तो लीजिए आनंद कुछ ऐसे पौधों के चित्रों का जिनके उत्‍पादनों का आनंद तो हम अपने खाने में लेते हैं लेकिन इन पौधों तथा उस प्रक्रिया से अनजान थे जिनसे ये मसाले बनते हैं-

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मीठी शुरुआत- चॉकलेट के पौधे से, इस फल से एक कड़वा कसैला पदार्थ मिलता है जो प्रोसेसिंग के बाद मीठी चॉकलेट में बदल जाता है। ध्‍यान रहे कि केरल के इस हिस्‍से में शानदार घर की बनी चाकलेट खूब खाने को मिलती है।

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ये दुनियाभर में भारत की पहचान कालीमिर्च का पौधा है, दरअसल सही कथन होना चाहिए गोलमिर्च क्‍यों हमें बताया गया कि काली, हरी तथा सफेद गोलमिर्च इसी एक पेड़ से मिलती है...साल में अलग समय तोड़ने तथा प्रोसेसिंग की भिन्‍नता के कारण इनके रंग व तीखापन बदल जाता है।

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थेकेडी की विशेष पहचान यहॉं की इलायची

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ये बांस की तरह पतला लेकिन नारियल की तरह ऊंचा पेड़ सुपारी का है...अपना दिल तोIMG_3222 इस बात से ही दहल गया कि किसी के पान के स्‍वाद के लिए इस पेड़ पर बाकायदा चढ़कर सुपारी तोड़नी होती है।

तब कहीं जाकर ये फल प्राप्‍त होते हैं, जी हुजूर सुपारी का फल यही है...पान में डाली जाने वाली कठोर वस्‍तु इसी फल में छिपी है।

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ये वृक्ष मजेदार है इसके पत्‍ते ही तेजपात कहे जाते हैं...उससे भी मजेदार ये कि इसी वृक्ष के तने की छाल दालचीनी कहलाती है। जिसे तीन तीन साल की शिफ्ट में तने के आधी आधी ओर से छीला जाता है।

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मौसम न होने के कारण फल दिखाई नहीं दिए पर ये पौधा जायफल (Nutmeg)का है इसकी खसियत ये कि जब फूल होता हे तो वह जावित्री कहलाता है और फल हो, तो हो जाता है जायफल (हम मानते थे ये दो एकदम अलग चीजें हैं :))

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विशेष औषधीय लाल केले... केले की एकमात्र प्रजाति जिसमें फल ऊपर से नीचे के स्‍थान पर नीचे से ऊपर की ओर फलता है।

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इसे पर्यटन की समझ ही कहा जाएगा कि अधिकांश मसाला नर्सरियों ने ये समझते हुए कि ज्ञानवर्धक ओवरडोज बच्‍चों के लिए बोरिंग हो सकता है..उन्‍होंने एक बेहद ऊंचा ट्रीहाउस बना रखा हे जो बच्‍चों को बेहद पसंद आता है।

Thursday, May 28, 2009

मंजन दातुन के लिए बिस्‍लेरी

कल ही दिल्‍ली आकर गिरे हैं बारह दिन के लिए दक्षिण की यात्रा पर थे। दक्षिण भी पूरा नहीं लक्षदीव तथा केरल और बस तमिलनाडु में कन्‍याकुमारी भर। काफी दिन रहे इसलिये अनेक प्रकार के अनुभव रहे अवसर मिलने पर बाकी भी बताएंगे पर लक्षदीव सबसे अनोखा था। दिल्‍ली से हैं पूरी तरह लैंडलाक्‍्ड इसलिए द्वीप के जीवन की कल्‍पना तथा अनुभव एकदम अलग रहा। लक्षदीव पश्चिमी तट के लक्षदीव सागर (अरब सागर का दक्षिणी छोर) में कुछ तीसेक द्वीपों का समूह है ये प्रवाल द्वीप हैं  जिनमें से केवल दस आबाद हैं पर्यटक केवल चार द्वीपों पर जा सकते हैं विदेशी केवल एक द्वीप बंगारम पर ही जा सकते हैं। द्वीप समूह का एकमात्र हवाई अड्डा अगाती द्वीप पर है... इस माह की 16-17-18-19 को हम इसी द्वीप पर थे। जो लोग अंडमान-गोआ-कोवलम या यूरोप अथवा अमरीकी बीचों के अनुभव से समुद्र तथा बीच को पहचानते हैं वे शायद बिना अनुभव किए न मानें लेकिन लक्षदीव इससे बिल्‍कुल अलग है। एक प्रमुख वजह तो है इनका प्रवाल द्वीप होना तथा दूसरा है एकदम अछूता होना। पूरे द्वीप पर एक भी चट्टान नहीं है दरअसल रेत भी रेत न होकर कोरल चूरा ही है इसलिए एकदम सफेद है जिसमें सिलिका का अंश शून्‍य है।

हवाई जहाज से पहली झलक कुछ ऐसी दिखी एक लंबी सी पट्टी और कोने पर छोटी सी बूंद के आकार में।

 

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विकीमैपिया से प्राप्‍त बेहतर तस्‍वीर कुछ ऐसी है-

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अगाती द्वीप का कुल क्षेत्रफल 3.84 वर्ग किमी है ये अधिकतम 6 किमी लंबा तथा एक किमी तक चौड़ा है। हम अगाती बीच रिसॉर्ट में बुकिंग कराकर गए थे वहीं रुके। लक्षदीव जाने के लिए सभी को चाहे वे भारतीय हों परमिट लेना पड़ता है। लक्षदीव का पर्यटन सस्‍ता नहीं है कम से कम हमें तो मंहगा लगा, आफ सीजन के बावजूद तीन दिन का ठहरना बीसेक हजार का पड़ा। लेकिन पूरी दुनिया से परे एकदम दूधिया बीच जिस पर आप लगभग अकेले पर्यटक हों, ये रोजमर्रा अनुभव नहीं है। पूरे द्वीप पर मीठे पानी की कोई नदी आदि नहीं है इसलिए रिसॉर्ट में नलों में समुद्र का खारा पानी ही बहता है जो निवृत्‍त होने यहॉं तक कि नहाने के लिए तो ठीक है पर अगर पीना हो या कुल्‍ला करना हो तो बिस्‍लेरी की उन बोतलों के सहारे रहना पड़ता है जो 450 किमी दूर कोचीन से हवाई मार्ग से आई होती हैं तो हम भी तीन दिनों तक बिस्‍लेरी से कुल्‍ला दातुन का आनंद ले चुके हैं :))

करने को इस छोटे से द्वीप पर कुछ नहीं है सिवाए इस खूबसूरत समुद्र को निहारने और एकदम स्‍वच्‍छ समुद्र में क्रीड़ा करने के, लेकिन इसमें आप कभी थकेंगे नहीं, न बोर ही होंगे। कुछ तस्‍वीरें देखें-

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अभी बस इतना ही शेष बाद में।

Wednesday, April 29, 2009

फ्रान्सिस्‍को गोया और उनकी पेंटिंग '3 मई 1808'

 

'अनभै सॉंचा' दिल्‍ली से निकलने वाली एक त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका है। ताजा अंक में प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक ने आधुनिक कला की दो अहम पेंटिग्‍स फ्रांसिस्‍को गोया की '3 मई 1808 का नरसंहार' तथा पाब्‍लो पिकासो की 'गुएर्निका' का विवेचन है। ऐसा नहीं है कि इन पेंटिंग्‍स पर कम लिखा गया है पर हिन्‍दी में निश्चित तौर पर कम लिखा गया है। अत: सोचा कि गोया की पेंटिंग के विषय में अशोक भोमिक के विवेचन को आपके सामने रखा जाए।

फ्रांसिस्‍को गोया (1746-1828, स्‍पेन) को कला इतिहासकार निर्विवाद रूप से आधुनिक चित्रकला के जनक के रूप में जानते हैं। स्‍पेन का नेपोलियन के कब्‍जे में आना गोया के जीवन  की अहम घटना थी। 3 मई 1808 का नरसंहार इसी क्रम की एक घटना रही। इस चित्र को मूल घटना के छ: वर्षों बाद बनाया गया लेकिन इससे इस चित्र की कलात्‍मक तीव्रता कम नहीं हुई है। मूल चित्र की छवि ये है-

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गोया के इस चित्र में कई गौरतलब बातें हैं जो आम दर्शकों के लिए और समीक्षकों के लिए इस चित्र को इतना खास बनाती हैं।

1. चित्र में बाई आरे असहाय लोगों का झुंड है जहॉं कुछ लोग मारे जा चुके हैं कुछ लोग मर रहे हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जा मरने वाले हैं। इस सबके साथ साथ आतंकित कुछ और लोब भी हैं जो मारे नहीं जाएंगे पर संहार से भयभीत वे भी हैं। इन बाईं ओर के लोगों की संरचना में सीधी ज्‍यमितीय आकृतियॉं नहीं हैं। वे मुड़ी तुड़ी आकृतियों से बनी आक्रांत-आतंकित आकृतियॉं हैं।

2- दाहिनी ओर कतारबद्ध अतिकाय आकृतियॉं यीधी रेखाओं की ज्‍यमितीय आकारों से बनी सैनिकों की आकृतियॉ है जो बंदूक ताने हैं। पृष्‍ठभूमि में भी साधी रेखाओं से बनी महल की आकृति है जो इस हत्‍याकांड में में किस ओर है ये इसके ज्‍यमितीय होने से पता चलता है।

3- सैनिकों के पीछे का महल व्‍यवस्‍था का प्रतिनिधित्‍व करता है। 

4. चित्र के दोनों हिस्‍सों के संरचनात्‍मक व वर्गीय अंतर ही इस चित्र को गोया की महान रचना बनाते हैं। सैनिकों के चेहरे न दिखाकर गोया ने शोषण, संहार व अत्‍याचार के सहज दिखने वाले सतही माध्‍यमों को अनावश्‍यक महत्‍व न देते हुए संहार को संचालित करने वाली शक्तियों की ओर इशारा किया है।

5. चित्र में सबसे महत्‍वपूर्ण उपस्थिति सफेद कपड़ेवाले आदमी की है जो अत्‍याचार से भयभीत नहीं है।

6. जमीन पर रखी लालटेन से निकलता (पुन: सीधी रेखा में) प्रकाश भी महत्‍वपूर्ण युक्ति है जिसका इस्‍तेमाल गोया ने किया है।

   कुल मिलाकर 3 मई 1808 दो सौ साल पहले की एक घटना का चित्रण भर नहीं है वरन चित्रकार की पक्षधरता व शोषण के तंत्र का शानदार दस्‍तावेज भी है।

Friday, March 13, 2009

अपने बच्‍चे का मैला तो हमने भी कमाया है... शर्माजी जी इतनी नाराज क्‍यों हैं?

मैं लावण्‍याजी का लेखन यदा कदा पढ़ता रहा हूँ...आजकल लावण्‍या आहत हैं... बेहद आहत। आखिर उनकी माताजी को बुरा कहा गया है उन्‍हें नाराज होने का हक है। जरूरी नहीं कि आप वैध बात पर नाराज हों...आप चाहें तो बेबात या कम बात पर भी नाराज हो सकते हैं। हमारी पिछली पोस्‍ट को ही लें... बेचारे प्रोग्रामर ने दिन रात एक कर ज्‍योतिष पर प्रोग्राम बनाया हम बैठेठाले दु:खी होने की ठान बैठे।  लावण्‍याजी तो खैर इस बात पर नाराज हैं कि किसी नीलोफर ने उन्‍हें ये कहा...

कितना प्यारा होता हरिजन होना आज पता चला.
आप भी तो चमारिन ही हैं लावण्या दी यह तो आप ही बता चुकी हैं कि आपकी मां मैला कमाती थीं और आप उससे खेलती थीं।
अपनी जात का जिक्र करने का धन्यवाद।

ये चोखेरबाली की एक पोस्‍ट पर हुआ जिसमें लावण्‍या ने विमान परिचारिका कुंदा के जीवन से परिचय करवाया है थोड़ी बहुत गड़बड़ है मसलन 1976 में अपना कैरियर चुनने वाली कुंदा केवल 25 वर्ष की कैसे हुईं...पर ये ब्‍यौरों की बात दीगर है...विवाद नीलोफर की टिप्‍पणी से हुआ क्‍योंकि जैसे ही लावाण्‍याजी को याद दिलाया गया कि आपकी मॉं भी तो मैला कमाती थीं.. अत: चमारन हुईं वे आहत हो गईं तथा इसे वे अपनी माताजी के विरुद्ध अपशब्‍द मान बैठीं...और फिर नीलोफर नाम के विषाक्‍त मन की खोज शुरू हो गई।

मेरी अम्मा : स्वर्गीय सुशीला नरेंद्र शर्मा

मुझे जल्दी गुस्सा नही आता !परन्तु, मेरी अम्मा के लिए कहे गए

ऐसे अपशब्द,हरगिज़ बर्दाश्त नहीं कर सकती ।This is absolutely, "unacceptable "

a grave insult to my deceased & respected Mother who is not alive to defend herself.

('शर्मा' पर बलाघात मेरा है)

फिर नीलोफर की पहचान के सूत्र भी दिए गए हैं... ये ब्‍लॉगर तोतो चान नाम का ब्‍लॉग चलाती/ते हैं।

बस यहीं हमारे दिमाग की घंटी बजी.. तोतोचान एक शानदार किताब है तथा औसत पाठक की पसंद नहीं होती, जो अपने ब्‍लॉग का नाम तोता चान रखता है वो आउट आफ बाक्‍स सोचनेवाला ब्‍लॉगर है, कम से कम टुच्‍ची विषाक्‍तता के लिए तो नहीं। मैंनें टिप्‍पणी फिर पढ़ी और अब सोचता हूँ कि मैला कमाना (कथित कर्म आधारित जाति व्‍यवस्‍था के समर्थक सोचें) अगर दलित होने का परिचायक है तो कौन सी मॉं चमारन (सही शब्‍द भंगी बनेगा) नहीं है.. अपने बच्‍चे के पाखाना साफ करने से बचने वाली... बच सकने वाली मॉं कहॉं पाई जाती है ? कौन सा बच्‍चा कभी अपने पाखाने से खेलने का सत्‍कर्म नहीं कर चुका होता?

कितनी भी अरुचिकर लगे पर लावण्‍या दी थोड़ा क्‍लोज रीडिंग करें (मैंने गूगलिंग की पर मुझे वो पोस्‍ट नहीं मिली जहॉं लावण्‍याजी ने अपने 'सत्‍कर्म' की बात लिखी हो पर मैं मान लेता हूँ कि कहीं उन्‍होंने लिखा होगा कि उनकी मॉं शिशु लावण्‍या का पाखाना साफ करती थीं...जिससे वे खेलने पर उतारू होती थीं, ऐसा न भी लिखा हो तो ये कोई आपत्तिजनक कल्‍पना नहीं है)

पर दूसरी ओर देखें कि दलित (लावण्‍या न जाने क्‍यों अभी भी 'हरिजन' शब्‍द के इस्तेमाल पर बल देती हैं जिसे आमतौर पर जागरूक दलित आपत्तिजनक मानते हैं) मुद्दे पर संवेदनशीलता के साथ लिखने वाली लेखिका 'चमार' शब्‍द के इस्‍तेमाल से इतना आहत महसूस करती हैं..उन्‍हें करना भी चाहिए पर इसका प्रतिकार झट 'शर्मा' शब्‍द से विभूषित माताजी का नाम देने की अपेक्षा, चमार शब्‍द में निहित अपमान को हटाने की ओर प्रवृत्‍त होकर ही होना चाहिए। मुझे इस सारे प्रक्रम में बेबात के पैट्रोनाइजेशन लेकिन जरा सी त्‍वचा खुरचते ही जातिवादी अहम की झलक दिखाई देती है।  वरना यदि कोई मैला कमाता है या कमा चुका है इससे उसे हरिजन/भंगी/चमार कहकर अपमानित किया जा सकता है? इस आधार पर हममें से सभी की मॉं हमारा मैला कमा चुकी हैं... तमाम डायपरबहुल पालनपोषण के बावजूद हमने भी अपने बच्‍चों का मैला कमाया है... आप चाहें तो कहें हमें भंगी/चमार।

Thursday, March 05, 2009

धत्‍त !!! अब ज्‍योतिष ब्‍लॉगवाणी में भी

ज्‍योतिष के साथ तो पता नहीं पर ब्‍लॉगजगत के ज्‍योतिषियों साथ हमारा 'स्‍नेह' अब जग जाहिर है। ऐसे में अपनी छवि के साथ न्‍याय करते हुए हमारा हक बनता है कि कहीं नया ज्‍योतिष प्रपंच देखें तो चिहुँकें तो इसी बात से न्‍याय करते हुए आज हम धत्‍त कह रहे हैं। इस छवि को देखें-

jyotish

वैसे तो जो कलंक रेखा :) जो हमने खींची हे वो पर्याप्त मोटी है पर तब भी दिखने में कुछ कठिनाई हो तो छवि पर चटका लगा सकते हैं।

वैसे ये विज्ञापन भर है जो ब्‍लॉगवाणीकार मित्रों की कंपनी द्वारा विकसित उत्‍पाद को प्रचारित भर करता है, और बेशक उन्‍हें इसका पूरा हक है। पर जब हमने दु:खी होने की ठान ली है तो भला हमें कौन रोक सकता है। वैसे प्रोग्रामर मित्र इस साफ्टवेयर को लेकर काफी लौकिक सोच रखते हैं पर आशंका है कि कुछ लोग तो इसकी अलौकिक लपेट में आते ही होंगे।

हमें लगा कि ज्योतिष के पसरते गर्तचक्र पर अपना रंज व्‍यक्त करते चलें। बाकी तो होगा वही जो ब्‍लॉगजगत की 'कुंडली में लिखा' होगा।:)