Sunday, February 18, 2007

सवाल दर सवाल....बदलाव चाहिए


हिंदी भाषा के राजभाषा वाले पक्ष की बात करने पर अक्‍सर यह आशंका हो जाती है कि आप भी हिंदी-हिंदू-हिंदुस्‍तान बिरादरी से मान लिए जाओगे। पर भैय्ये इस डर से लेखक अगर लिखना बंद कर दे कि लोग क्‍या सोचेंगे तब तो फिर लिखना छोड़कर वहीं समीरानंद के हरिद्वार वाले घाट पर जा विराजना चाहिए। क्‍यों ???
तो सच यह है कि दो सच्‍चाइयों पर बात करने का मन है पहली तो यह कि एक किताब है और बहुत खूबसूरत किताब है जिसे कॉंख में दबाए चश्‍मेधारी बाबा साहेब की मूर्तियॉं आपको देश भर में मिल जाऐंगी.....जी साहब हमारा संविधान । तो इस संविधान की ही धारा 343 कहती है कि भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी है। और बाद में संसद के चंद कानूनों ने भी इस बात को दोहराया है। दूसरी सच्‍चाई है कि देश की नौकरशाही के बाबुओं के खूब नानुकुर करने के बावजूद देश में एक कानून लागू हो ही गया है वह है सूचना के अधिकार का कानून इस कानून का मतलब यह है कि अब इस देश का कोई भी नागरिक हर उस सूना को पाने का अधिकारी हो गया है जो संसद या विधानसभा को पाने का हक है।
इन दोनों ही सच्‍चाइयों से देश का कुलीन तंत्र कष्‍ट में है पर वे अपना मुँह धो रखें।
मैं तो जिस बात पर ध्‍यान आकर्षित करना चाहता हूँ वह बहुत आसान सी है और वह यह कि अगर आप अपनी भाषा के लिए इतना सब करते हैं तो एक और काम कीजिए- वह यह कि इन दोनों सच्‍चाइयों को मिलाकर एकसाथ पढि़ए । मतलब यह है कि अब आप केवल दस रुपए की फीस दीजिए और चंद सवाल निम्‍न प्रकार लिखिए।

(1)क्‍या इस कार्यालय पर राजभाषा अधिनियम लागू होता है ?
(2)पिछले तीन वर्षों में साइनबोर्ड, स्‍टेश्‍नरी, साफ्टवेयर, ........(कार्यालय की प्रकृति के अनुसार स्‍वंयं भरें) आदि पर कितना व्‍यय किया गया।
(3)इनमें से कितने कार्यों में हिंदी की सामग्री नहीं तैयार हुई। क्‍या इसकी पूर्वानुमति ली गई थी ? पत्र संलग्‍न करें।
इसी तरह के बाबुओं के लिए तकलीफदेह सवाल बनाकर दफ्तरों में दाखिल करें और बदलाव की शुरूआत देखें। ऐसा आप किसी भी सरकारी या अर्धसरकारी मसलन विश्‍‍वविद्यालय , कॉलेज आदि के के साथ कर सकते हैं।

Friday, February 16, 2007

खूबसूरत देह का गोदना और कंठ पार्श्‍व पर विराजमान हिंदी जीत

हम बैठे सुबकाते ही रहे और हमारी हिंदी देखो कहॉं से कहॉं जा सवार हुई। अपनी एक पोस्‍ट में हम टसुए बहाए जा रहे थे कि कैसे गोदना विमर्श में हिंदी हाशिए पर रह जाती है........पर अब वे दिन हवा हुए। उठाइए आज का अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्‍तान टाइम्‍स- देखिए मुखपृष्‍ठ और जानिए कि खूबसूरत जिस्‍मों के गोदने (टैटू) में हिंदी कैसे आकंठ (वैसे गर्दन के पी‍छे को कंठ-पार्श्‍व कहना चाहिए) विद्यमान है।


फोटोग्राफ का स्रोत दिव्‍याँग्‍यु सरकार बताया गया है। इटली की टेनिस सुंदरी मारा सेंटान्जिलों को यह वांछित जीत हासिल भी हुई जब उन्‍होंने अपनी विरोधी को 3-6, 7-5,6-2 से हरा दिया। अब मारा सेंटान्जिलों, उनके कंठ पार्श्‍व, और टेनिस कौशल के बारे में हम तो अपने एकमात्र हिन्‍दी-इतालवी ब्‍लॉगर सुनील दीपक जी के ही आसरे हैं। उन्‍हीं से पूछते हैं क्‍यों श्रीमान क्‍या कहते हैं ???

Thursday, February 15, 2007

बादशाह के काले कपड़े...........देखो बादशाह नंगा है


कहानी पुरानी है पहले भी सुनी हुई थी। साहित्‍य पढ़ता-पढ़ाता हूँ इसलिए इस कहानी की प्रतीकात्‍मकता से भी अपरिचित नहीं था। फिर भी चोटी के इस वैज्ञानिक ने जब अपनी बात कहने के लिए इस कहानी का सहारा लिया तो मैं चमत्‍कृत सा हो गया। अवसर था कॉलेज का स्‍मारक व्‍याख्‍यान और वक्‍ता थे प्रसिद्ध खगोल-भौतिकी वैज्ञानिक जयन्‍त विष्‍णु नार्लिकर जिन्‍हें पद्म विभूषण से नवाजा जा चुका है और विषय था 'आधुनिक सृष्टि विज्ञान : ऐतिहासिक पारप्रेक्ष्‍य में '
नार्लिकर साहब ने बताया कि कई बार विज्ञान कैसे कल्‍पनाओं और कोरी अटकलों को वैज्ञानिक सत्‍यों की तरह व्‍यक्‍त करता है लेकिन उस पर उसी डर से कोई प्रश्‍न चिह्न नहीं लगाता जिस डर से बादशाह को कोई नहीं बताता कि उसने कोई कपड़े नहीं पहने हैं। सृष्टि विज्ञान (कास्‍मॉलॉजी) आजकल ऐसे ही ब्‍लैक होल, ब्‍लैक मैटर और इसी प्रकार की कालिखों की चर्चा कर रही है जबकि उसे बिग बैंग पर सवालिया निशान लगाने चाहिए। खैर इस वैज्ञानिक बहस पर टिप्‍पणी लायक काबलियत तो नहीं मेरे पास लेकिन कह सकता हूँ कि विज्ञान की प्रकृति पर पुनर्विचार जरूरी हो चला है।

Saturday, February 10, 2007

पेशेगत हिंदी ब्‍लागवाद से अभी कितना दूर हैं हम???


मैं अभी तक एक ही ब्‍लागर मीट में गया हूँ और वहॉं भी मैं अकेला हिंदी ब्‍लागर था वहीं मैंने अपने बगल मैं बैठे शिवम से जिनसे मेरा परिचय पहले से था फुसफुसाकर पूछा ‘अमां यार। ये प्राफेशनल ब्‍लागर क्‍या होता है क्‍या ब्‍लाग से पैसा भी कमाया जा सकता है ? अब शिवम अंग्रेजी में ब्‍लागिंग करते हैं और इस दुनिया के कही ज्‍यादा पक्‍के खिलाड़ी हैं। उन्‍होंने जो बताया वह मेरे लिए अप्रत्‍याशित तो न था पर अवास्‍तविक सा अवश्‍य था मतलब बही एडमनी बगैरह। मुझे तब लगा था कि हिंदी ब्‍लागिंग कम से कम अभी तो स्‍वांत: सुखाय ही चलने वाली है। अब मैं फिर से इस सवाल से दो-दो हाथ करना चाहता हूँ कि पेशेगत हिंदी ब्‍लागवाद से अभी कितना दूर हैं हम ?

आप में से कुछ कह सकते हैं

हैं जी ।।। क्‍या मतलब है आपका ? हम लोग बाकायदा पेशेवर ब्‍लागर हैं ! हो सकता है कुछ ब्‍लागर ऐसा सोचने लगे हैं पर मुझे इसमें शक है। इस सवाल के कई आयाम हैं सबसे पहले तो यह कि क्‍या ब्‍लागर समुदाय का आकार है कितना ? गूगल पेजरैंक में तो लगता है कि हममें से अधिकतर 4 के आंकड़े पर हैं। सौ या अधिक पेजलोड प्रतिदिन की औसत वाले हिंदी ब्‍लाग कितने है इसकी भी मुझे जानकारी नहीं। पर शायद अभी तक फुलटाईम हिंदी ब्‍लागर का अवतरण हो नहीं पाया है। प्रोफाइलों से सर खपाने से तो मुझे ऐसा ही लगा। रवि रतलामीजी इस पद के सबसे निकट हैं शायद, पर वे भी मुझे लगता है कि घर का राशनपानी अपनी पेंशन या अन्‍य स्रोतों से चलातें होंगे अभी तक।.......यह सब मैं हिंदी ब्‍लागजगत की निराशाजनक तस्‍वीर खींचने के लिए नहीं कह रहा हूँ बल्कि इसके ठीक विपरीत कारण से कह रहा हूँ।
मेरी मान्‍यता है कि अब वह समय आ गया मान लिया जाना चाहिए जबकि हिंदी ब्‍लाग पत्रकारिता अपना अगला कदम उठाए और यह कदम केवल एक ही दिशा में हो सकता है.....आगे की ओर। मुझे इंटरनेट विज्ञापन जगत की अधिक जानकारी नहीं पर हम में से कुछ चिट्ठाकार जरूर होंगे जो अन्‍य लोगों को राह दिखाएं, मसलन यदि किसी ब्‍लागर ने एडसेंस या किसी अन्‍य मार्ग से अपने लेखन के गुजारे लायक आमदनी का जुगाड़ कर लिया हो तो वह अपनी सफलता की कहानी को बांटे ताकि अन्‍य लोग प्रोत्‍साहित हों।
एकाध सवाल और :
आपके अनुसार कब यानि कितने अरसे के बाद ब्‍लागरों को हिंदी ब्‍लाग में विज्ञापन चस्‍पां करने शुरू करने चाहिए ?
क्‍या हिंदी ब्‍लाग पाठक विज्ञापनों को क्लिक करने से विशेष रूप से परहेज करते हैं ?
अंग्रेजी ब्‍लागों के पेशेगत हो जाने के अनुभव और सिद्धांत हिंदी ब्‍लागिंग पर कितना लागू होते हैं ?

Friday, February 09, 2007

Tuesday, February 06, 2007

चूहा चर्चा: ऐसे ही वक्‍त में


ब्‍लागजगत एकाएक घटनाप्रधान हो चला है। रवि रतलामी जी सुचिंतित चिट्ठाचर्चा में लीन हैं, हिंदी ब्‍लागों से सामग्री बाकायदा चोरी होने लगी है, चोरी के शिकार चर्चा कर रहे हैं, चोरी के कर्ता चर्चा कर रहे हैं और तो और जो चोरी के शिकार बनने लायक सिद्ध न हो सके वे तक चर्चा कर रहे हैं लुब्‍बालुआब यह कि चिट्ठा चर्चा वक्‍त की रवायत हो चली है। चर्चा लायक यदि कुछ है तो केवल चिट्ठे और बस चिट्ठे। ऐसे ही वक्‍त में यह अदना मसिजीवी चिट्ठों पर चर्चा नहीं कर रहा- आपका वक्‍त खोटी करने के लिए मुआफी चाहता हूँ। हम ठहरे पिछली कतार के ब्‍लागर तो हम चिट्ठे पर चर्चा के लायक नहीं, मित्र लाल्‍टू ने नेवले की चर्चा की और मैं कर रहा हूँ चूहे की। किसी खास टॉम व जेरी या मिकी माउस किस्‍म के चूहे की नहीं एकदम आम चूहे की चर्चा जिसने हमारी नाक में दम कर रखा है। यह आम चूहा इस आम की-बोर्डपीट (शब्‍द था कलमघसीट, मैं इसका प्रतिशब्‍द बनाना चाह रहा था) के घर में कहीं रहता है। वैसे मैं जानता हूँ कि वह बाकायदा कैबीनेट में रहता है पर मैं उसका कुछ नहीं कर पाता। क्‍या मैं इस चूहे से डरता हूँ ? क्‍या मैं म्‍यूसोफोबिया विकार का शिकार हूँ ? पता नहीं पर यह सच है कि जब पत्‍नी के कहने पर जाकर रसोई की लाइट जलाता हूँ तो यही मना रहा होता हूँ कि वह दिखाई न दे...। इसलिए कल जब वह रसोई के दराज में पड़े पैकिंग फॉयल से उछलकूद रहा था तो सीधा दराज खोलकर उससे दो दो हाथ करने के बजाय दराज खटखटाकर उसे भगा दिया फिर फॉयल को कूड़ेदान के हवाले किया और आकर सो गया अब आज चूहेदान लगा दूँगा पकड़े जाने पर उसे जैसे तैसे फेंक आएंगे।
इस मूषक वितृष्‍णा का कारण है मेरी पत्‍नी के एम. फिल शोधकार्य, उन्‍होंने शोध किया था बदीउज्‍ज़मॉं के उपन्‍यासों विशेषकर ‘एक चूहे की मौत’ पर यह काफ्का की मेटामॉरफासिस से प्रभावित एक उपन्‍यास है जो दुनिया विशेषकर नौकरशाही की तुलना चूहेमारी से करता है और चूहे के लिजलिजेपन का बेहद सटीक चित्रण करता है। नायक अंतत: स्‍वयं चूहा बन जाता है। शोधकार्य के दौरान घर में सारे दिन चूहा, लिजलिजापन, चूहे मारना.....यह सब होता रहा कि चूहे की कल्‍पना भर भी मजबूर कर देती है कि यदि कहीं से घर में चूहा आ जाए तो यक्‍क..। तो सच है कि सब तो चूहेमारी में लगे हैं और बाकायदा चिट्ठाक्रांति होने को है पर हमें तो बस कोई इस चूहे से मुक्‍त कर दे बस।

Thursday, February 01, 2007

नीलगगन किंतु धूसरित शिखर



पहली खेप की तस्‍वीरें अभी हाजिर हुई। यह एक विषादजनक स्थिति है कि जौनसार के कई पहाड़ धूसरित व नग्‍न दिखाई देते हैं। जबकि कई दूसरे शिखर हरे भरे व मोहक हैं मसलन यह देववन शिखर के रास्‍ते में हरियाली और मुकेश के पोज देनेभर की तो बर्फ भी थी






Wednesday, January 31, 2007

मेरा सिर चकराता है........

गणतंत्र दिवस की कृपा से सप्‍ताहांत विस्‍तारित था और शिक्षक संघ की हड़ताल से और भी ‘सुविधा’ हुई। यानि अवसर था और इच्‍छा भी, कोई अनदेखा पहाड़ी इलाका महसूस किया जाए। इंटरनेट पर खोजबीन की तय किया – चकराता। पहली वजह तो यह भी कि बहुत कम लोगों ने इसके बारे में लिखा था लेकिन जो थोड़ा बहुत उपलब्‍ध था उससे काफी उम्‍मीदें बँध‍ती थीं। पास में मुंडाली में स्‍कीइंग स्‍तर की वर्फ मिलने की आशा थी। वैसे जब हिंदी में चकराता लिख गूगल सर्च मारा तो उसने कीबर्ड को जिस वाक्‍य में पकड़ा वह था..... ‘मेरा सिर चकराता है’
खैर बोरिया बिस्‍तर बॉंधा, बाल गोपाल समेटे और हो लिए रवाना। और यहॉं हुई गलतियॉं दर गलतियॉं- चलो सूची बनाऍं

1. रास्‍ते के बारे में योजना कच्‍ची थी, सिर्फ सड़क होने भर से काम नहीं चलता उसकी गुधवत्‍ता भी जॉंच लेनी चाहिए खासतौर पर तब जब आपने जिद पाली हुई हो कि आपकी 1997 की मारूति 800 अभी बूढ़ी नहीं हुई है।
2. बिना होटल रिजर्वेशन के घर से निकलने के दुस्‍साहस के पिछले अनुभव यदि अच्‍छे रहे हों तो इसका मतलब यह नहीं के अबकि बार भी ढंग का आसरा मिल जाएगा बल्कि प्रोबेबिलिटि का नियम कहता है कि बुरे अनुभव के संभावना अधिक हो गई है।
3. कच्‍ची तैयारी, सीमित संसाधन, कमजोर कार, अनजान बुरा रास्‍ता, बच्‍चे साथ में कुल मिलाकर जोखिम इतना है कि सब ठीक रहे तो हैरानी होनी चाहिए......हैरान होने का मौका नहीं मिला।
तो साहब अपनी अक्‍खड़ता में हमने ना यमुनानगर का रास्‍ता चुना ना देहरादून का वरन ‘सबसे छोटे’ बागपत-बड़ौत-सहारनपुर-कालसी के रास्‍ते को चुना और जाहिर है पछताए। जल में कुंभ, कुंभ में जल की तर्ज पर सड़क पर खेत खेत पर सड़क थी। जैसे तैसे सुबह छ: दिल्‍ली से चलकर पॉंच बजे शाम कालसी पहुँचे यानि चकराता की चढ़ाई रात में करनी पड़ी सॉस अटकी रही। पहुँचकर और निराश होना पड़ाक्‍योंकि बर्फ का नामों निशां ना था, खाना बस ‘ऐसा ही’ था खैर अगले दिन देववन चोटी और टाईगर झरने का आनंद और थकान समेटी और वापसी के लिए रास्‍ते बदलने का निर्णय लिया और तय पाया कि चकराता-नागथाल-मसूरी होकर दिल्‍ली जाऍं लेकिन जैसा कहा गया है कि टू रांग्स डोंट मेक ए राईट इस रास्‍ते में थोड़ा हिस्‍सा तो सुंदर था पर बाकी में हमने अब तक के कुछ सबसे उजाड़ पहाड़ों का अनुभव लिया। मसूरी पहुँचने तक इतना थक चुके थे कि क्‍या कहें और अभी वापसी बाकी थी। घबराइए नहीं भले ही हम रात 11.30 बजे खतौली पहुँचे पर वहॉं के सार्वकालिक ट्रैफिक जाम ने बख्‍शा नहीं देर रात या कहें अल्‍ल सुबह घर पहुँचे। इति श्री चकराता कथा। बाकी मँगनी के कैमरे की तस्‍वीरें उपलब्‍ध होते ही साझा की जाऍंगी।

Wednesday, December 13, 2006

2006 :पढ़े-लिखे का लेखा-जोखा

2006 बस फिसल सा ही गया है। प्रत्‍यक्षा ने एक चिथड़ा सुख का जिक्र किया तो इच्‍छा हुई कि जरा मुड़. के देखा जाए कि साल भर में की हमारी कमाई क्‍या रही। यानि इस साल कौन-2 सी किताबें पढ.ने का अवसर मिला, मतलब उन पाठ्यपुस्‍तकों के अलावा जो पढ़ाने भर के लिए पढ़ना जरूरी था। अपने कारण हैं मेरे पास (शायद बहाने कहना चाहिए) पर ये सूची बहुत लम्‍बी नहीं है। जो पुस्‍तकें बिल्‍कुल पहली बार पढ़ीं वे रहीं-

संवत्‍सर : ये अज्ञेय का कम प्रसिद्ध विचार गद्य है। समय (कहना चाहिए काल) पर सूक्ष्‍म दार्शनिक चिंतन है। दिक् व काल मेरी रुचि का क्षेत्र है इसलिए इस अपेक्षाकृत दुर्लभ रचना को पढ़ना आनंददायी घटना थी।

अंतिम अरण्‍य : निर्मल का उपन्‍यास।

मेरा नन्‍हा भारत : मनोज दास की रचना My little India का नेशनल बुक ट्रस्‍ट से प्रकाशित अनुवाद एक दार्शनिक जब भ्रमण पर निकले तो ये अनुभव पर्यटन से कहीं भिन्‍न होता है और नितांत निजी नहीं वरन् जातीय होता है।

The City of Djinns : William Dellrymple दिल्‍ली का संस्‍मरणात्‍मक इतिहास

गदर 1857 (ऑंखों देखा हाल) : मोइनुद्दीन हसन। मोइनुदीन हसन कोई इतिहासकार नहीं ये महाशय तो इस संग्राम के दौरान दिल्‍ली के एक थानेदार थे और जाहिर है विद्रोह के केंद्र में थे। संयोग रहा कि the city of.. तथा इस पुस्‍तक को मैने क्रम से पढ़ा क्‍योंकि ये एक दूसरे के रिक्‍त स्‍थानों को भरती हुई पुस्‍तकें हैं।

मई अड़सठ, पेरिस : लाल बहादुर वर्मा का सद्य प्रकाशित उपन्‍यास।

The Road Less Travelled :Scot M Peck बेस्‍टसेलर प्रजाति की रचना

पीली छतरी वाली लड़की (उदय प्रकाश) - 'अमॉं हिंदी की खाते हो और अभी तक ये भी नहीं पढ़ा....' के आरोप से मुक्ति के लिए पढ़ी और कोई अफसोस नहीं हुआ।

त्रिशंकु : मन्‍नू भंडारी की कहानियॉं

दो पंक्तियों के बीच (राजेश जोशी) पूरे साल में पूरा कविता संग्रह बस यही पढ़ा है। हॉं छुटपुट कविताऍं जरूर पढ़ने का अवसर मिला।

साहित्‍य और स्‍वतंत्रता : प्रश्‍न प्रतिप्रश्‍न (देवेंद्र इस्‍सर) अच्‍छी साहित्‍यालोचना

कुछ किताबें पढ़ाने के लिए या अन्‍य कारणों से फिर से पढ़ीं मसलन चीड़ों पर चॉंदनी, नई सदी और साहित्‍य, कर्मभूमि, सूरज का सातवॉं घोड़ा, शब्‍द और स्‍मृति।
इच्‍छा है कि पढ़ी पुस्‍तकों पर कुछ विस्‍तार से लिखूँ पर पता नहीं हो पाता है कि नहीं पर......

Monday, October 23, 2006

जिन्‍नात का शहर - दिल्‍ली

विलियम डेलरिम्‍पल की दिल्‍ली पर संस्‍मरणात्‍मक पुस्‍तक "City of Djinns- A year in delhi" जो मेरी नजर में इतिहास की एक वाकई प्रामाणिक पुस्‍तक है को हाल ही में समाप्‍त किया है। अपने शहर पर किसी 'अन्‍य' की प्रतिक्रिया की मुझे बहुत अहम जान पड्ती है। इस पर लाल्‍टू से पहले भी एक बार ब्‍लॉगिया विमर्श हो चुका है। दिल्‍ली से यह जुड़ाव प्रत्‍यक्षानुमा सुखद स्‍मृतिपुंज भर नहीं है छलली की मेरी स्‍मृति में (और वर्तमान में भी) बदबूदार बस्तियॉं, गरीबी, असुविधाएं, कंक्रीट सभी है पर हाँ इस शहर से लगाव है अब यह लगाव और यह शहर एक अकादमिक दायित्‍व भी बन गया है और ज़ाहिर है मैं इस बात से खुश हूँ।