
यह ठीक है कि उपलब्ध चिट्ठाशास्त्रीय प्रतिमान हिंदी चिट्ठाकारी की प्रवृत्ति का पूरा ढाँचा व्याख्यायित करने में असमर्थ हैं किंतु इसका समाधान अपना मौलिक चिट्ठाशास्त्र गढ़ना है न कि उससे निरपेक्ष हो जाना। ऐसा करना सारे चिट्ठा जगत को गिफ्टरैप कर बरास्ता अविनाश इलैक्ट्रानिक मीडिया को भेंट कर देने जैसा होगा। हम कितना भी नकारें हमें मानना होगा कि कि चिट्ठाजगत को बाकी मीडिया वाले चिट्ठा उद्योग की तरह देखते हैं अत: उससे दो दो हाथ करने के लिए हमें अपना चिट्ठाशास्त्र चाहिए ठीक वैसे ही जैसे कि साहित्य को अपना स्वरूप निश्चित करने के लिए साहित्यशास्त्र चहिए होता है।
ऐसा तुरंत क्यों जरूरी है ?
इसलिए कि चिट्ठाकारी को ‘एक तरह की डायरी’, मीडिया ऐक्सटेंशन, छपास रोगियों का अभयारण्य आदि प्रचारित कर इसके स्वतंत्र रूप पर प्रश्नचिह्न लगाने की कवायद खूब आसानी से दिखाई दे रही है। ‘लो चलो हम सिखाते हैं’ के भाव से लोग टीवी की दुनिया से आ रहे हैं और महमूद फारूकी जैसे मित्र जाने अनजाने इस ‘बेचारे’ चिट्ठाजगत पर जो कृपा कर रहे हैं बिना इसे जाने समझे वे ऐसा इसलिए कर पा रहे हैं कि वे आँखों में आँखें डाल कह पा रहे हैं कि हिंदी चिट्ठाकारी क्या है यह खुद हिंदी चिट्ठाकारी को ही नहीं पता। वे इसलिए ऐसा कर पा रहे हैं कि अपने जैविक विकास में चिट्ठाकारी ने जो अपना विशिष्ट रूप हासिल किया है वह खुद को उस सैद्धांतिकी से नहीं जोड़ पाया है जो ब्लॉगिंग ने पिछले दस वर्षों में खड़ी की है। ब्लॉग शोध की प्रवृत्ति शायद ऐसा करने की दिशा में एक सही कदम हो पर अभी तो एक ‘शायद’ मुँह बाए खड़ा है।
क्या सैद्धांतिकी इस औपनिवेशिक सोच को रोक पाएगी जिससे खतरा झांक रहा है ?
हाँ, जरूर। एक बार दम भर इस ओर देखें आप पाएंगे कि चिट्ठाशास्त्र मुख्यधारा हिंदी जगत का मातहत या छोटा भाई नहीं है। वह खुद एक मुकम्मल संरचना है। यह बोध चमत्कार करने में समर्थ है।
चलिए मान लिया कि चिट्ठाशास्त्र जरूरी है पर कौन रचेगा इसे, समय की तो कमी है ही साथ ही हम साइबर कैफै चलाने वाले हैं, ऐकाउटेंट हैं, साफ्टवेयर वाले हैं ये सैद्धांतिकी का काम हम कैसे करें?
इसी लिए जरूरी है कि ये काम हम करें, कोई सुधीश पचौरी, कोई नामवर, कोई राजेंद्र यादव इसे करने बैठ जाए इससे पहले जरूरी है कि हम इसे निष्पादित करें। क्योंकि हम जो है उसके जैविक विकास से इसके सिद्धांत निकालेंगे, कृत्रिमता से मुक्त। विश्वविद्यालयी एप्रोच से चिटठाकारी का भला संभव नहीं, ये अपने अनुभव से कह रहा हूँ मान लीजिए। बाकी रही आचार संहिता की बात तो कितनी भी बना लो ये तो नूह्हें चाल्लेगी।






